मणिपुर में रात-रात जाग कर घरों की रखवाली करने वाली ये महिलाएं कौन हैं?
दिलीप कुमार शर्मा
बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से

- मणिपुर के कई हिंसाग्रस्त इलाक़ों में महिलाएं घरों की पहरेदारी कर रही हैं.
- हाल ही में महिलाओं के विरोध के कारण सेना को चरपमंथी काडरों को छोड़ना पड़ा.
- राज्य में कई मज़बूत महिला संगठन हैं, जो सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहे हैं.
- 2004 में मीरा पैबी की महिलाओं ने सेना के ख़िलाफ़ नग्न प्रदर्शन किया था.
- इन संगठनों में मीरा पैबी, इमास, इमा कैथल प्रमुख हैं.
- इमा कैथल महिलाओं का सबसे जुझारू संगठन है. इसमें क़रीब 7,000 सदस्य हैं.
- 1904 से 1939 के बीच बुज़ुर्ग महिलाओं ने मीरा पैबी का गठन किया था.
मणिपुर में मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के बीच जातीय हिंसा को भड़के 55 दिन से अधिक का वक्तस बीत चुका है. लेकिन देश के पूर्वोत्तर में बसे छोटे से इस प्रदेश में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है.
इम्फ़ाल घाटी से लेकर पहाड़ी ज़िलों तक सभी जगह, दिन में कुछ घंटों की राहत के बाद वहां अब भी कर्फ़्यू लगा हुआ है और इंटरनेट भी बंद है.
महज़ 28 लाख की जनसंख्या वाले मणिपुर में हालात क़ाबू करने के लिए सेना और पुलिस बलों के 40 हज़ार जवान तैनात हैं.
फिर भी आए दिन रह-रह कर हिंसा की आग भड़क उठती है. लेकिन इन सबके बीच मणिपुर में पिछले कई दशकों से महिला आंदोलन की बागडोर संभाल रही मीरा पैबी (महिला मशाल वाहक) से लेकर इमा कैथल यानी मदर्स मार्केट से जुड़े महिला संगठन एक बार फिर चर्चा में हैं.
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महिला संगठनों की चर्चा क्यों?
दरअसल इन महिला संगठनों की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि बीते शनिवार इम्फ़ाल ईस्ट में एक प्रतिबंधित 'सशस्त्र विद्रोहियों' के 12 काडरों को सेना ने पकड़ लिया था.
लेकिन वहां मौजूद क़रीब 1,200 महिलाओं के समूह ने कथित तौर पर सुरक्षाबलों को अभियान चलाने से रोक दिया.
ऐसे में दोनों पक्षों के बीच टकराव की आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए सेना को सभी काडरों को छोड़ना पड़ा.
मणिपुर घाटी में मीरा पैबी से जुड़ी महिलाएं विरोध प्रदर्शनों और नाकेबंदी का नेतृत्व कर रही हैं और वह कई बार सुरक्षाबलों को ऑपरेशन करने से रोकती हैं.

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भारतीय सेना ने इस घटना के बाद एक बयान जारी कर बताया कि स्थानीय महिला एक्टिविस्ट जानबूझकर उनका रास्ता रोकती हैं और सुरक्षाबलों के काम में हस्तक्षेप कर रही हैं.
सेना ने महिलाओं के इस क़दम को ग़ैरक़ानूनी और राज्य की क़ानून-व्यवस्था के लिए नुकसानदायक बताया था.
हालांकि, सेना की इस बात के जवाब में किसी भी स्थानीय महिला संगठन या फिर महिला कार्यकर्ता ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है.

क्या है मीरा पैबी का इतिहास
मणिपुर में मीरा पैबी (महिला मशाल वाहक) मैतेई महिलाओं द्वारा कई दशकों से चलाया जा रहा एक सामाजिक आंदोलन है. मैतेई महिलाओं का यह आंदोलन ब्रिटिश शासन काल से चला आ रहा है.
हालांकि, मीरा पैबी से पहले भी यहां महिलाओं के दो ऐसे आंदोलन हुए हैं जिन्हें सामूहिक रूप से नूपी लान (महिला विद्रोह) के नाम से जाना जाता है.
साल 1904 और 1939 के बीच 50 से 70 साल की कुछ बुजुर्ग महिलाओं ने मीरा पैबी समूह का गठन किया जिन्हें "इमास" कहा गया. मणिपुरी में "इमास" का अर्थ मां होता है.
70 के दशक में मैतेई महिलाओं ने शराब और नशीली दवाओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ा. आज़ादी के बाद मीरा पैबी संगठन में सभी उम्र वर्ग की महिलाएं शामिल थीं.
इन महिलाओं ने इम्फ़ाल और मणिपुर के अन्य जगहों की सड़कों पर ‘लालटेन रात्रि मार्च’ किया. नशे में धुत लोगों को दंडित किया और शराब की दुकानों में आग लगा दी.
इस तरह मीरा पैबी की पहचान "नागरिक समाज के संरक्षक" के रूप में होने लगी.
मैतेई समुदाय की महिलाएं मीरा पैबी के बैनर तले सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए जलती मशाल को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं.
संगठन की महिलाओं का कहना है कि कठिन परिस्थिति में मणिपुर की हर महिला 'मीरा पैबी' बन जाती है जिसका सीधा असर समुदायों पर पड़ता है.

मीरा पैबी की अहमियत इस बात से लगाई जा सकती है कि मणिपुर में जारी हिंसा की स्थिति का जायज़ा लेने पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने मीरा पैबी की कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात कर विस्तार से बात की थी.
हालांकि, मणिपुर में हिंसा रोकने को लेकर केंद्र और मणिपुर सरकार के रवैये से मीरा पैबी काफ़ी नाराज़ है.
मणिपुर में जारी हिंसा और सरकार की भूमिका पर मीरा पैबी की वरिष्ठ कार्यकर्ता नांगबाई लोयरेबम ने बीबीसी से कहा, "मणिपुर में संघर्ष विराम के दौरान मैतेई लोगों पर हमला हुआ. सैकड़ों लोगों की जान गई.”
वे कहती हैं, “केंद्र और मणिपुर की सरकार को बुनियादी नियमों को तोड़ने वाले इन समूहों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई करनी चाहिए थी लेकिन कुछ नहीं किया गया. इसलिए हम महिलाएं अब ख़ुद अपनी ज़मीन और समुदाय की सुरक्षा कर रहे हैं. हम शांति और मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता बचाने के लिए रक्षा की मुद्रा में हैं."
2004 में असम राइफल्स के ख़िलाफ़ राजधानी इम्फ़ाल में जिन 12 महिलाओं ने नग्न प्रदर्शन किया था उनमें नांगबाई लोयरेबम भी शामिल थीं.

72 साल की हो चुकीं नांगबाई आज भी मणिपुर में जारी हिंसा को रोकने की दिशा में मीरा पैबी संगठन की कमान संभाले हुए हैं.
मीरा पैबी की भूमिका पर वह कहती हैं, "हम महिलाएं रात को जाग कर अपने-अपने इलाक़े की रखवाली करती हैं. सरकार के सामने अपनी बात भी रख रही हैं, ताकि राज्य में शांति कायम हो सके. ”
वे कहती हैं, “कुछ महिलाएं धरना दे रही हैं तो कुछ महिलाएं हिंसा पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए अलग-अलग इलाकों में जाती हैं. प्रदेश में जब से हिंसा शुरू हुई है हमारी महिलाओं ने चैन से नींद तक नहीं ली है. सुरक्षाबलों पर हमें भरोसा नहीं है और सरकार हमारी बात सुन नहीं रही है. हमें बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है."
वह बताती हैं, "अगर केंद्र और मणिपुर सरकार हमारी मदद करती है तो सभी माताएं और मीरा पैबी युद्ध रोकने के लिए संघर्षपूर्ण मोर्चे पर जाने के लिए तैयार हैं."
नांगबाई कहती हैं कि असल में वो तमाम महिलाएं जो अपने क्षेत्र की सुरक्षा और बचाव के लिए आगे आ रही हैं, वे सभी मीरा पैबी हैं.

क्या है इमा कैथल?
इस समय मीरा पैबी की भूमिका निभाने वाले बहुत सारे महिला संगठन हैं. इनमें इमा कैथल भी अहम भूमिका निभा रहा है.
इमा कैथल संगठन की प्रचार सचिव 58 वर्षीय पुइनाबती कोंसम हाल ही में नई दिल्ली से लौटी हैं.
वह अपनी महिला कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने गई थीं.
मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल में इमा कैथल दुनिया का एक ऐसा सबसे बड़ा बाज़ार है जिसे क़रीब पांच हज़ार महिलाएं चलाती हैं.
इस बाज़ार को चलाने वाली महिलाओं को इमा अर्थात मां कहा जाता है. लेकिन इमा कैथल की सबसे अनोखी बात यह है कि बाज़ार चलाने वाली महिलाओं के नेतृत्व में यह बाज़ार मणिपुरी महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता का केंद्र है.
सेना के काम में बाधा डालने की बात पर पुइनाबती कोंसम कहती हैं, "मुझे नहीं मालूम कि सेना किन महिला एक्टिविस्ट की बात कर रही है. जिस समय मैतेई लोगों पर हमला हुआ असम राइफल्स जिस कदर चुपचाप खड़ी होकर देखती रही, उससे लोगों में भरोसा कम हुआ है."
"हमारे लोगों को बड़ी बेरहमी से मारा गया. पहाड़ियों से हम पर बहुत गोलियां बरसाई गईं लेकिन किसी ने हमारी हिफ़ाजत नहीं की. हम अब ख़ुद को बचाने के लिए गांव की रखवाली करते हैं. शायद इसलिए सेना को गांव में घुसने से लोगों ने रोका होगा."

मणिपुर में शुरू हुई हिंसा के बाद से इमा कैथल की महिलाओं ने ख़्वैरमबंद इमा कैथल जॉइंट कोऑर्डिनेटिंग कमेटी फ़ॉर पीस का गठन किया है.
इस समिति के ज़रिए ये महिलाएं अपने समुदाय की मदद के लिए आवाज़ उठा रही हैं.
पुइनाबती कोंसम कहती हैं, "जबसे हमारे प्रदेश में हिंसा भड़की है तब से हमारा जीवन ख़तरे में पड़ गया है. इसलिए इमा मार्केट की हम क़रीब 7,000 महिलाएं शांति के लिए एक कमेटी बनाकर हरसंभव प्रयास कर रही हैं ताकि हमारे प्रदेश में हिंसा बंद हो सके. हमने केंद्र सरकार के कई मंत्रियों और मानवाधिकार संस्थाओं के समक्ष अपनी बात रखी है."
मणिपुर में महिलाओं की भूमिका का इतिहास
मणिपुर में ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए अन्याय, स्वतंत्रता-पूर्व मणिपुर में महाराजा की आर्थिक नीतियों और आज़ादी के बाद के सामाजिक और प्रशासनिक समस्याओं जैसे विभिन्न मुद्दों के ख़िलाफ़ हुए विरोध का नेतृत्व महिलाओं ने ही किया था.
मैतेई महिलाओं के संघर्ष पर बात करती हुई मणिपुर विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक अध्ययन विभाग की सहायक प्रोफ़ेसर मीना लोंगजाम कहती हैं, "किसी भी संघर्ष क्षेत्र में महिलाएं शांतिदूत का काम करती हैं."
"मणिपुर की महिलाओं का अपना इतिहास रहा है. यहां राजशाही के समय मणिपुरी महिलाओं की अपनी अदालत हुआ करती थी जहां वो अपराधियों को सज़ा देती थीं. लिहाज़ा आज भी किसी सामाजिक मसले के ख़िलाफ़ मैतेई महिलाएं ढाल बनकर खड़ी हो जाती हैं."

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वो कहती हैं, "मैतेई महिलाएं न केवल बहादुर हैं बल्कि किसी भी तरह की स्थिति से निपटना जानती हैं. सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) क़ानून के नाम पर सुरक्षाबलों के साथ फ़र्जी मुठभेड़ में यहां की सैकड़ों माताओं ने अपने बेटों को खोया है. किसी ने अपने पति को खोया है. लेकिन वे कभी पीछे नहीं हटी है. इमा कैथल बाज़ार एक बड़ा उदाहरण है जहां सैकड़ों माताएं काम कर अपने परिवार का गुज़ारा करती हैं."
"आज भी ये महिलाएं मणिपुर को हिंसा से बाहर निकालने का प्रयास कर रही हैं. राज्य में हिंसा शुरू होने के बाद से हर मोहल्ले में महिलाएं रात को पहरा देती हैं, ताकि संदिग्ध घटना को पहले ही रोक सकें."
मणिपुर में अन्य कई समुदाय के लोग बसे है लेकिन सामाजिक मुद्दों को लेकर मैतेई महिलाओं का संगठन सबसे ज्यादा सक्रिय रहा है.
चमकदार हरी पहाड़ियों से घिरे मणिपुर में कभी कंगलीपक साम्राज्य फला-फूला था. अंग्रेज़ी हुकूमत ने इसे रियासत में तब्दील कर दिया.
मणिपुरी लोगों को बहुत कम उम्र से ही निडर योद्धाओं के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था और उन्हें साम्राज्य की सीमा पर तैनात किया जाता था.
ज़िंदगी के बाकी सभी काम महिलाओं के हिस्से में थे. यही मणिपुर के समतावादी समाज की नींव में है, जो आज भी मौजूद है.
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