ओशो: आचार्य रजनीश का साम्राज्य बनने और बिखरने की कहानी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अपने लाखों प्रशंसकों, शिष्यों और अनुयायियों के लिए वो सिर्फ़ ‘ओशो’ थे. भारत और फिर बाद में पूरी दुनिया में उन्हें ‘आचार्य रजनीश’ और ‘भगवान श्री रजनीश’ के नाम से जाना जाता था.
‘ओशो’ का अर्थ है वो शख़्स जिसने अपने आपको सागर में विलीन कर लिया हो. उन्हें दुनिया से गए लगभग 33 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज भी उनकी लिखी किताबें बिक रही हैं, उनके वीडियो और ऑडियो सोशल मीडिया पर आज भी ख़ूब देखे-सुने जाते हैं.
ओशो में लोगों की दिलचस्पी इसलिए भी जगी क्योंकि वो किसी परंपरा, दार्शनिक विचारधारा या धर्म का हिस्सा कभी नहीं रहे. 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश में जन्मे ओशो का असली नाम चंद्रमोहन जैन था.
वसंत जोशी ओशो की जीवनी ‘द ल्यूमनस रेबेल लाइफ़ स्टोरी ऑफ़ अ मैवरिक मिस्टिक’ में लिखते हैं, "ओशो एक सामान्य बच्चे की तरह बड़े हुए लेकिन तब भी उनमें कुछ ऐसा अलग था जो उन्हें सामान्य बच्चों से अलग करता था. बचपन से ही उनमें एक गुण था सवाल पूछना और प्रयोग करना. शुरू से ही लोगों में उनकी दिलचस्पी थी. मानव प्रवृत्ति पर पैनी नज़र रखना उनका मुख्य शुगल हुआ करता था. नतीजा ये हुआ कि अपने से बाहर की दुनिया और मानव मस्तिष्क पर उनकी बारीक नज़र हुआ करती थी."
कॉलेज से निकाले गए

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जब 1951 में बीए पास करने के बाद ओशो ने जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज में दाखिला लिया तो दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर से उनकी ठन गई. वो लेक्चर के दौरान उनसे सवाल पूछते थे कि प्रोफ़ेसर जवाब देते-देते तंग आ जाते थे और समय पर अपना कोर्स पूरा नहीं कर पाते थे.
वसंत जोशी लिखते हैं, "आख़िरकार जब प्रोफ़ेसर से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उन्होंने प्रधानाचार्य को अल्टीमेटम दे दिया कि उस कॉलेज में या तो वो रहेंगे या चंद्रमोहन जैन. प्रधानाचार्य ने चंद्रमोहन को अपने दफ़्तर में बुलाकर कॉलेज छोड़ देने के लिए कहा. हालांकि उन्होंने माना कि इस प्रकरण में उनकी कोई गलती नहीं है लेकिन वो नहीं चाहते कि इस मुद्दे पर उनके कॉलेज के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर अपने पद से इस्तीफ़े दे दें. चंद्रमोहन ने इस शर्त पर कॉलेज छोड़ने का फ़ैसला किया कि प्रिंसिपल उनका दाख़िला किसी और कॉलेज में करा देंगे."
रजनीश इतने कुख्यात हो चुके थे कि शुरू में हर कॉलेज ने उन्हें अपने यहाँ रखने से इनकार कर दिया. बाद में बड़ी मुश्किल से डीएन जैन कॉलेज में उनका दाख़िला हो पाया.
युवावस्था में रजनीश को हमेशा सिरदर्द की शिकायत रही. एक बार जब उनका सिरदर्द बहुत बढ़ गया तो उनके फुफेरे भाई क्रांति और अरविंद को उनके पिता को बुलवाना पड़ा. उनके पिता का मानना था कि अत्यधिक पढ़ाई के कारण रजनीश के सिर में दर्द होता है. उनको याद था कि किस तरह रजनीश अपने माथे में बाम लगाकर पढ़ना जारी रखते थे.
प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ आध्यात्मिक गुरु बने

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रजनीश ने अपने करियर की शुरुआत 1957 मे रायपुर के संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रवक्ता बन कर की. सन 1960 में वो जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर बन गए. उनको उस ज़माने में एक तेज़-तर्रार अध्यापक माना जाता था.
इसी दौरान एक आध्यात्मिक गुरू के रूप में उन्होंने अपना करियर शुरू किया और पूरे भारत का दौरा करने लगे और राजनीति, धर्म और सेक्स पर विवादास्पद व्याखयान देने लगे.
कुछ दिनों बाद उन्होंने प्रोफ़ेसर के पद से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह से गुरू बन गए. सन 1969 में उन्होंने मुंबई में अपना मुख्यालय स्थापित किया. एक साल पहले उनसे मिली माँ योग लक्ष्मी उनकी प्रमुख सहायक बन गईं और वर्ष 1981 तक इस पद पर रहीं.
इसी दौरान उनकी मुलाकात एक अंग्रेज़ महिला क्रिस्टीना वुल्फ़ से हुई. उनको रजनीश ने संन्यासी नाम 'मा योगा विवेक' दिया. वो उन्हें अपने पिछले जन्म की दोस्त मानते थे. वो उनकी निजी सहयोगी बन गईं.
मौलिक विचारों के कारण प्रसिद्धि

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रजनीश ने शुरू से ही सदियों से चली आ रही धार्मिक धारणाओं और कर्मकांडों के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई. एक आध्यात्मिक गुरु के तौर पर ओशो का मानना था कि संगठित धर्म लोगों का आध्यात्मिक ज्ञानोदय के बजाए लोगों में विभाजन का ज़रिया बना है.
उनकी नज़र में धर्म कुरीतियों का शिकार होकर अपनी जीवन शक्ति खो चुका है. ओशो ने धर्म और राजनीति को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जिसका एकमात्र उद्देश्य लोगों पर नियंत्रण करना है. उन्होंने पूर्वी दर्शन और फ़्रॉयड के मनोविश्लेषण का अद्भुत समन्वय लोगों के सामने पेश किया और खुले शब्दों में ‘सेक्सुअल लिबरेशन’ की वकालत की.
जटिल अवधारणाओं को सामान्य भाषा में पेश करने की उनकी क्षमता ने अलग-अलग पेशे के कई लोगों को उनकी तरफ़ खींचा. जाने-माने लेखक खुशवंत सिंह ने उनकी तारीफ़ करते हुए लिखा था, "ओशो भारत में पैदा हुए सबसे मौलिक विचारकों में से एक थे. इसके अलावा वो सबसे अधिक विचारशील, वैज्ञानिक और नए विचारों वाले शख़्स थे."
अमेरिकी लेखक टॉम रॉबिंस का मानना था कि ‘ओशो की किताबें पढ़कर लगता है कि 20वीं सदी के सबसे महान आध्यात्मिक गुरु थे.’
लकड़ी की माला और लॉकेट में ओशो का चित्र

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कई सालों तक ओशो की सचिव रहीं मां आनंद शीला बहुत कम उम्र में उनके संपर्क मे आ गई थीं. ओशो अपनी हर महिला अनुयायी को ‘मां’ का नाम दिया करते थे क्योंकि वो हर महिला को मातृत्व का प्रतीक मानते थे. हर पुरुष अनुयायी को वो ‘स्वामी’ कहकर पुकारते थे ताकि उन्हें हमेशा ये बात याद रहे कि उन्हें अपने ऊपर नियंत्रण रखना है.
शीला अपनी आत्मकथा ‘डोंट किल हिम, द स्टोरी ऑफ़ माई लाइफ़ विद भगवान रजनीश’ में लिखती हैं, "जब मैं उनके कमरे में दाख़िल हुई तो भगवान मेरी तरफ़ देख कर मुस्कराए और अपनी बाहें फैला दी. उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया और बहुत धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया. मैंने उनकी गोद में अपना सिर रख दिया. थोड़ी देर बाद जब मैं चुपके से उठकर जाने लगीं तो उन्होंने मुझे फिर बुला लिया. उन्होंने कहा शीला कल तुम मुझसे ढाई बजे मिलने आओगी. ये कहकर उन्होंने मेरे सिर पर अपना हाथ रख दिया."
ओशो अपने हर शिष्य को लकड़ी की बनी एक माला देते थे जिसमें एक लॉकेट होता था और उसके दोनों तरफ़ ओशो का चित्र लगा होता था. हर संन्यासी से ये अपेक्षा की जाती थी कि वो हर समय उस लॉकेट को पहने. वो हर संन्यासी को एक नया नाम भी देते थे ताकि वो भूतकाल से अपने आप को अलग कर सके. वो चाहते थे कि उनके शिष्य नारंगी या लाल कपड़े पहने. ये ज़रूरी होता था कि वो कपड़े ढीले हों ताकि 'आसानी से शरीर में ऊर्जा का संचार हो सके'.
विवादास्पद विषयों पर भाषण

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ओशो अपना भाषण हिंदी या अंग्रेज़ी में दिया करते थे. अनुयायियों को निर्देश थे कि भाषण के समय वो अपनी आँखें बंद रखें. ओशो विवादास्पद विषयों पर अपनी राय रखने के लिए मशहूर थे.
विन मैकॉरमक अपनी किताब ‘द रजनीश क्रोनिकल’ में लिखते हैं, "उनके विचार इतने विवादास्पद होते थे कि कई बार भारतीय संसद में उन पर प्रतिबंध लगाने के बारे में चर्चा हुई. अलग-अलग लोगों को आकृष्ट करने के लिए ओशो कई अलग-अलग विषय चुनते थे. उनके श्रोता मिलीजुली पृष्ठभूमि से आते थे. हर आयु, धर्म और नस्ल के लोग उनका भाषण सुनने के लिए जमा होते थे. जो भी उनके संपर्क में आता था या तो उनका शिष्य बन जाता था या उनका विरोधी. कोई उनके प्रति उदासीन नहीं रह सकता था."
1972 के दौरान भारत आने वाले विदेशी पर्यटक उनकी तरफ़ आकृष्ट होना शुरू हो गए थे. उनकी सचिव लक्ष्मी बहुत सावधानी से उनसे मिलने वालों को चुना करती थीं. उन सबसे पहले एक ‘डायनेमिक मेडिटेशन’ में शामिल होने के लिए कहा जाता था और फिर ओशो से उनकी मुलाकात कराई जाती थी. शुरू में वो रोज़ सुबह 6 बजे चौपाटी के समुद्र तट पर अपना भाषण दिया करते थे.
रात में वो किसी हॉल या अपने घर पर ही लोगों को संबोधित करते थे. कभी कभी उनके सुनने वालों की संख्या 100 से 120 के बीच रहा करती थी और कभी कभी वो बढ़कर 5000 से 8000 के बीच हो जाया करती थी.
पुणे में बनाया रजनीश आश्रम

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कुछ दिनों बाद ओशो को मुंबई का जीवन कठिन लगने लगा. मुंबई की तेज़ बारिश के कारण उनकी एलर्जी और दमा दिनोंदिन बढ़ने लगा. उनके विदेशी अनुयायी भी मुंबई की मानसून बारिश के आदी नहीं थे. उन्हें तरह-तरह की बीमारियों ने घेरना शुरू कर दिया. उन्होंने अपनी सचिव से मुंबई के आसपास कोई जगह ढूँढने के लिए कहा.
काफ़ी सोच-विचार के बाद तय किया गया कि वो पुणे में अपना आश्रम बनाएंगे. पुणे का मौसम और आबोहवा मुंबई से बेहतर थे. उन्होंने आश्रम के लिए कोरेगाँव को चुना.
आनंद शीला लिखती हैं, "पुणे पहुँचने के बाद ओशो ने अपने-आप को लोगों से अलग-थलग करना शुरू कर दिया. शुरू में वो आश्रम के गार्डेन में लोगों से मिला करते थे. बाद में लोगों के लिए उनसे मिलना बहुत मुश्किल हो गया. वो अपने इर्द-गिर्द सिर्फ़ मज़बूत और भरोसेमंद लोगों को रखना चाहते थे. दरअसल, उन्हें अनुयायियों नहीं मज़दूरों की तलाश थी. उन्होंने अधिकतर भारतीयों को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया. जब उन्हें लगने लगा कि कई लोग सिर्फ़ जिज्ञासा के कारण उनके आश्रम आ रहे हैं तो उन्होंने आश्रम में प्रवेश की फ़ीस बढ़ा दी. यही नहीं अपने भारतीय अनुयायियों को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्होंने अंग्रेज़ी में भाषण देना शुरू कर दिया."
यौनिकता से जुड़े नैतिक मुद्दों को ताक पर रखा
वो हमेशा कुर्सी पर बैठते थे और उनके शिष्य ज़मीन पर. जल्द ही उन्होंने पुणे में अपने को स्थापित कर लिया और रोज़ करीब 5000 लोग उन्हें सुनने आने लगे.
पुणे में रजनीश आश्रम के कारण पर्यटन बढ़ने लगा. आश्रम ने पुणे को दुनिया के नक्शे पर स्थापित करने में भी एक बड़ी भूमिका निभाई. उसने पुणे की अर्थव्यवस्था को भी एक स्थायित्व प्रदान किया और शहर में धन और रंगों की बहार आ गई.
ओशो के आश्रम में तरह-तरह की थेरेपीज़ दी जाने लगीं और पानी की तरह पैसा आने लगा. इन थेरेपीज़ में सेक्स थेरेपीज़ को सबसे अधिक महत्व मिलने लगा. इनमें यौनिकता को बिना किसी पूर्वागृह के स्वीकार किया जाने लगा. यौनिकता के साथ जुड़े नैतिक मुद्दों और रोक-टोक को ताक पर रख दिया गया.
आनंद शीला लिखती हैं, "भगवान चाहते थे कि हम बिना किसी ईर्ष्या और अधिकार की भावना के काम करें. भारतीय लोगों को इन थेरेपीज़ में भाग नहीं लेने दिया जाता था. हर कोई ये नहीं समझ पाया कि ओशो ने इन थेरेपीज़ में भारतीय लोगों के भाग लेने पर क्यों रोक लगा दी? उनसे इस बारे में कई सवाल पूछे गए. उनका तर्क था कि पश्चिम के लोग एक उत्पीड़क दुनिया से आते हैं. उनका रहन-सहन और मानसिकता भारतीय लोगों से बिल्कुल जुदा है. उनको एक सक्रिय थेरेपी की ज़रूरत है जबकि भारतीय लोगों के लिए निष्क्रिय और शांत ध्यान पर्याप्त है."
आश्रम की महिलाओं के साथ यौन उन्मुक्तता

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ओशो ने अपने आश्रम में यौन पार्टनर्स को बदलने को हमेशा प्रोत्साहित किया.
ओशो के एक शिष्य रहे टिम गेस्ट अपनी किताब ‘माई लाइफ़ इन ऑरेंज, ग्रोइंग अप विद द गुरु’ में लिखते हैं, "कई भारतीय उनकी किताब ‘संभोग से समाधि’ को पोर्नोग्राफ़िक किताब मानते हैं. इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचती है क्योंकि इसमें खुलेआम सेक्स के बारे मे बात की गई है. ये किताब लिखकर वो सेक्स को दबाने की सोच रखने वाले साधु-संतों के दुश्मन बन गए. अपने विचारों को खुलेआम अभिव्यक्त करने की उनकी वकालत को सेक्सुअल पार्टनर्स बदलने के प्रोत्साहन के रूप में देखा गया. उन पर आश्रम की महिलाओं में यौन उन्मुक्तता को बढ़ावा देने के आरोप भी लगे".
थोड़े समय में पुणे के रजनीश आश्रम का कुल क्षेत्र 25 हज़ार वर्ग मीटर हो गया. वहाँ पर एक मेडिकल सेंटर बनाया गया जहाँ दुनिया भर से लाए गए डॉक्टरों और नर्सों को रखा गया. आश्रम में रहने वाले लोगों और पूर्णकालिक मज़दूरों के लिए मेडिकल सेवा मुफ़्त रखी गई.
आनंद शीला लिखती हैं, "ओशो नहीं चाहते थे कि उस संकुचित जगह पर नवजात बच्चों को रखा जाए इसलिए संन्यासिनों को गर्भवती होने को लिए हतोत्साहित किया जाता था. ओशो ने आश्रम के कई पदाधिकारियों से गर्भ निरोधक ऑपरेशन कराने के लिए कहा था क्योंकि गर्भवती महिलाएँ और पैदा हुए बच्चे आश्रम के लिए समस्या बन सकते थे. आश्रम के अंदर बच्चे पैदा करने पर मनाही थी और न ही गर्भवती महिलाएँ आश्रम के अंदर रह सकती थीं."
ओशो अक्सर ‘यौन रिपरेशन’ की बात करते थे इसलिए संन्यासी खुला सेक्स जीवन जीते थे जिसकी वजह से आश्रम में संक्रामक यौन रोग बढ़ने लगे. कुछ संन्यासियों के तो एक महीने में 90 के करीब यौन संपर्क देखे गए.
आनंद शीला लिखती हैं, "मुझे आश्चर्य होता था कि इतने व्यस्त दिन के बाद भी संन्यासियों को सेक्स के लिए समय किस तरह मिल जाता था."
परफ़्यूम और इत्र से एलर्जी

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इस बीच ओशो की बीमारियाँ बढ़ने लगीं. उनकी एलर्जी, अस्थमा और पीठ में दर्द और बढ़ गया.
जब उनका मधुमेह बढ़ा तो उन्होंने अपने निवास से निकलना और भाषण देना बंद कर दिया. उनकी आँखें कमज़ोर होती चली गईं और किताब पढ़ने के बाद उनके सिर में एक बार फिर दर्द रहने लगा.
आनंद शीला लिखती हैं, "उनको परफ़्यूम से बहुत एलर्जी थी. हमें उन लोगों को उनके पास आने से रोकने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी जिन्होंने सेंट लगाया होता था. सुबह और शाम के भाषणों से पहले हर श्रोता के शरीर को सूँघा जाता था कि कहीं उसने कोई परफ़्यूम तो नहीं लगा रखा है. ये एक अजीब तरह की प्रक्रिया थी लेकिन ओशो को एलर्जी से बचाने के लिए ये ज़रूरी था."
अमेरिकी जेल में 17 दिन

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पुणे से भी ओशो का दिल भर गया. उन्होंने अमेरिका में ओरेगन में एक आश्रम बनाने की योजना बनाई जिसमें हज़ारों लोग एक साथ रह सकें. 31 मई, 1981 को वो मुंबई से अपने नए आश्रम के लिए रवाना हुए.
जहाज़ की सभी फ़र्स्ट क्लास की सीटें उनके और उनके निकट सहयोगियों के लिए बुक थीं. उनके साथ उनके ढाई हज़ार आश्रमवासियों ने भी अमेरिका का रुख़ किया. इनमें मशहूर फ़िल्म अभिनेता विनोद खन्ना भी थे. इस बीच ओशो ने 93 रोल्स रॉइस कारें खरीदीं लेकिन यहीं से उनके बुरे दिन शुरू हो गए और उनका अमेरिकी सपना ताश के पत्तों की तरह ढहना शुरू हो गया.
उन पर प्रवासी नियमों का उल्लंघन करने के लिए मुकदमा चलाया गया. उन्हें 17 दिन अमेरिकी जेल में रहना पड़ा, जेल से निजात मिलने पर वो अमेरिका छोड़ने के लिए राज़ी हो गए. इसके बाद उन्होंने कई देशों में शरण लेने की कोशिश की लेकिन एक के बाद एक कई देशों ने उन्हें अपने यहाँ लेने से इनकार कर दिया.
आखिरकार वो अपने देश भारत वापस आने के लिए मजबूर हुए.
19 जनवरी, 1990 को उन्होंने मात्र 58 साल की उम्र में इस दुनिया से अलविदा कहा. पुणे के उनके निवास ‘लाओ ज़ू हाउज़’ में उनकी समाधि बनाई गई जिसके टॉम्ब स्टोन पर लिखा गया, "ओशो, जो न कभी पैदा हुए, न कभी मरे. उन्होंने 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस धरती की यात्रा की."
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