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मध्य प्रदेश: देश के सबसे ग़रीब ज़िले अलीराजपुर के अच्छे दिन कब आएंगे?- ग्राउंड रिपोर्ट
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, अलीराजपुर से
बजरी की उम्र 23 साल के आसपास होगी. वैसे किसी को उनकी असली उम्र का पता नहीं है. कुछ गाँव वालों का अंदाज़ा है कि वो 20 साल से ज़्यादा की नहीं होंगी.
इतनी-सी उम्र में ही वे तीन बेटियों की माँ भी बन चुकी हैं और इसमें भी कोई हैरानी नहीं है कि उनकी तीनों बेटियों का जन्म उन्हीं के सुदूर गाँव की टूटी-फूटी झोपड़ी में हुआ है.
बजरी और उनकी बेटियां भाग्यशाली थीं कि वो बच गईं, नहीं तो इन इलाक़ों में प्रसव के दौरान मृत्यु होना आम बात है. यहाँ दूर-दूर तक चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है.
उनके पति केरा बताते हैं कि महिलाओं को प्रसव के लिए नाव से या फिर खाट पर लिटाकर ककराना ले जाना पड़ता है और फिर वहाँ से सोंडवा तहसील. ये 35 किलोमीटर का सफ़र है.
बजरी, मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के उस इलाक़े में रहतीं हैं, जहाँ पहुँच पाना अपने-आप में मुश्किल काम है. कमज़ोर शरीर वाले तो यहाँ पहुँचने में बेहाल हो जाते हैं. ये इलाक़े बाक़ी के ज़िले से पूरी तरह कटे हुए हैं.
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अलीराजपुर के इन गाँवों तक पहुँचना बेहद मुश्किल
बिपरजोय तूफ़ान के दौरान यहाँ तेज़ हवाएं चल रही थीं और रुक-रुक कर बारिश भी हो रही थी.
ऐसे में नर्मदा नदी के उस पार जाने के लिए कोई ‘मोटर-बोट’ मिलना भी नामुमकिन सा था.
गाड़ी से ककराना पंचायत तक ही जाया जा सकता है. फिर नदी किनारे तक का पैदल सफ़र.
नदी के उस पार कई गांव हैं, जैसे पेरियातर, झंडाना, सुगट, बेरखेड़ी, नदिसिरखड़ी, आंजनबारा, डूबखेड़ा, बड़ा आम्बा, जल सिंधी, सिलकदा, रोलीगांव. मगर ये गाँव, उत्तरी या पूर्वी भारत के जैसे नहीं हैं जहाँ कई मकान एक साथ होते हैं.
इन्हें यहां ‘फलिया’ कहा जाता है यानी एक जगह सब घर नहीं होते हैं. दो घर अगर एक पहाड़ी पर हैं तो दो तीन घर दूसरी पहाड़ी पर. इन बिखरे हुए घरों को ही यहां के लोग ‘फलिया’ कहते हैं.
क़रीब पौन घंटे के सफ़र के बाद हम पेरियातर ‘फलिया’ में पहुँचे. अलग-अलग पहाड़ियों पर एक दो मकान नज़र आ रहे थे. चढ़ाई चढ़ने के बाद बजरी की झोपड़ी में पहुंचे.
यहां वो एक झोपड़ी में अपने पति और बच्चों के साथ रहती हैं जबकि उनके 70 साल के ससुर एक दूसरी झोपड़ी में.
मिट्टी में लथपथ बजरी के तीनों बच्चों में से एक, छोटी वाले बेटी पालने में है जो छत पर लगी लकड़ी से बँधा हुआ है. बच्चा कमज़ोर हैं और कुपोषित हैं. बजरी भी वैसी ही हैं. घर में न खाने का इंतज़ाम है न कपड़ों का.
बजरी की ख्वाहिशें ऐसी कि सुन कर आंखें नम हो जाए
वैसे तो बजरी ज़्यादा नहीं बोलती हैं, मगर बच्चों के कपड़ों के बारे में पूछने पर वो सहसा बोलने लगती हैं.
“कपड़ा, कपड़ा ख़रीदें या बाज़ार से राशन लेकर खाएँ? कपड़ा ख़रीद लेंगे तो फिर बाज़ार से राशन नहीं ख़रीद सकते. अगर बाज़ार से राशन खरीद लेते हैं तो फिर कपड़े नहीं खरीद सकते. मसाला लेते हैं तो मिर्ची नहीं खरीद सकते. मिर्ची ख़रीदते हैं तो फिर हल्दी और मसाला नहीं मिल पाएगा.”
वो बताती हैं कि उनके परिवार के साथ ऐसा भी अक्सर होता है जब उन्हें कुछ नहीं मिल पाता है और तो बच्चे भूखे रह जाते हैं.
“कुछ नहीं मिले तो क्या कर सकते हैं ? भूखे ही रहेंगे न. दो दो दिनों तक भूखे ही रह जाते हैं. कोई लाकर तो देता नहीं. क्या खाएँ?”
आम गृहिणियों की तरह तो नहीं मगर बजरी को अपने परिवार के लिए रोज़मर्रा की आवश्यकताओं के लिए अपनी छोटी-छोटी सी ख्वाहिशें हैं जिन्हें सुनकर हमारे साथ गए पटवारी योगेश धाकरे की आँखें नम हो गईं.
बजरी ने अपनी ख्वाहिशों की छोटी-सी फ़हरिस्त सुनाई, “नमक चाहिए, मिर्ची भी, हल्दी, मसाला, दाल, कड़ाही चाहिए, बर्तन चाहिए, कड़छी चाहिए, थालियाँ चाहिए, कपड़े चाहिए, तेल, मसाले, कुछ भी नहीं है.”
बजरी और ‘फलियों’ में रहने वाली उनके जैसी महिलाओं के पास, बाल संवारने के लिए कंघी तक नहीं है. न ही सजने सँवारने के लिए दूसरी ज़रूरी चीज़ें. जैसे आईना.
मैंने सवाल पूछा तो वो अपने आपको रोक नहीं पाईं. एक महिला का दर्द छलक उठा, “कंघी भी नहीं है, बालों में लगाने के लिए तेल नहीं है, लाली-पाउडर भी नहीं. कान के झुमके भी नहीं हैं. नाक में नथ भी नहीं है. बाल बाँधने के लिए भी कुछ नहीं है. चूड़ियाँ भी नहीं हैं, पैरों की पायल भी नहीं है. नाखूनों के रंगने के लिए भी कुछ नहीं है. गले में पहनने के लिए भी नहीं.”
हर दिन एक नया संघर्ष
अलीराजपुर आदिवासी बहुल क्षेत्र है. यहां की आबादी में लगभग 90 प्रतिशत आदिवासी ही हैं.
दूसरे इलाक़ों की तुलना में पेरियातर और उसके जैसे आस पास के ‘फलियों’ में रहने वाले आदिवासियों की ज़िंदगियों में कोई उत्साह नहीं है. उनके सामने हर दिन एक नया संघर्ष लेकर आता है.
यहां रहने वाली बहुत बड़ी आबादी के पास राशन कार्ड भी नहीं है, जिससे वो नाव से ककराना में मौजूद सरकारी राशन की दुकान से खाने के लिए कुछ ला पाते.
बजरी बताती हैं कि स्थानीय सरपंच से कई बार अनुरोध करने पर भी उनके परिवार का राशन कार्ड नहीं बन पाया है.
पेरियातर में जहाँ बजरी का घर है वहाँ पास के ही ‘फलिए’ में एक शादी हो रही है इसलिए आज का दिन बजरी और उसके परिवार के लिए भी ख़ास है. आज उसके बच्चों को दाल और चावल खाने को मिला है. ऐसा कई दिनों बाद हुआ है.
वर्ष 2021 में आई नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि पूरे भारत में अलीराजपुर ही वो ज़िला है, जहाँ सबसे ज़्यादा ग़रीबी है. ये पहली बार था जब आयोग ने ‘मल्टी डायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स’ यानी 'बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक' साझा किया.
ये रिपोर्ट वर्ष 2019 और 2020 के बीच हुए ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई.
अलीराजपुर- एक नज़र में
कुल आबादी - 7 लाख 28 हज़ार
साक्षरता दर - 36 प्रतिशत
अति निर्धन लोग- 71 प्रतिशत
कुल क्षेत्रफल - 3182 वर्ग किलोमीटर
शहरी आबादी - 8 प्रतिशत
ग्रामीण आबादी - 92 प्रतिशत
(स्रोत--ओपीएचआई का सर्वेक्षण)
ओपीएचआई की रिपोर्ट में अलीराजपुर दुनिया में ग़रीबी से सबसे ज़्यादा प्रभावित
नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इस ‘बहुआयामी ग़रीबी सर्वेक्षण’ या देश में ग़रीबी का आकलन ‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डिवेलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने जो कार्यप्रणाली विकसित की है, उसी आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है.
हालांकि वर्ष 2018 में ‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) ने जो पूरी दुनिया की ग़रीबी का आकलन करने वाले अपने सर्वेक्षण की रिपोर्ट पेश की थी उसमें मध्य प्रदेश के अलीराजपुर को विश्व के सबसे ज़्यादा ग़रीबी से प्रभावित इलाके के रूप में चिन्हित किया गया था.
‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) के 2018 के सर्वेक्षण के अनुसार अलीराजपुर में रहने वाले 76.5 प्रतिशत लोग ग़रीब चिन्हित किये गए थे.
भूख, ग़रीबी और पलायन की कहानी
वहीं नीति आयोग के वर्ष 2021 के नवंबर माह में जारी किये गए ‘बहुआयामी ग़रीबी सर्वेक्षण’ में बताया गया है कि इस जिले में कुल आबादी के 71.3 प्रतिशत लोग ग़रीब तो हैं ही, साथ ही, इस जिले में साक्षरता का दर भी भारत में सबसे कम है.
बजरी के पति केरा बताते हैं कि देश के इस हिस्से में रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी कितनी मुश्किलों से भरी हुई है. वो कहते हैं कि नदी के पार वाले इलाकों में किसी तरह की कोई बुनियादी व्यवस्था नहीं है. न सड़कें हैं, ना बिजली और ना ही कोई स्कूल.
वो मजदूरी के लिए अपने परिवार को लेकर गुजरात चले जाते हैं. फिर कुछ पैसे जमा होते हैं तो लौट आते हैं.
उनका कहना था, “खेतों में मज़दूरी करने के लिए गुजरात चले जाते हैं. वहाँ पर एक से डेढ़ महीने रहकर फिर वापस घर लौट आते हैं. यहाँ पर तो मजदूरी मिलती नहीं. बच्चों को भी साथ लेकर जाना पड़ता है. घर पर बूढ़े पिता को अकेला छोड़कर.”
'रोज़गार क्या मिलेगा यहां?'
अलीराजपुर में रोज़गार के ज़रिए भी बहुत कम या सीमित हैं इस वजह से ये इलाका बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन का गवाह भी है.
केरा कहते हैं, “रोज़गार क्या मिलेगा यहाँ? नर्मदा गए तो मछली पकड़ कर ले आते हैं. इससे धंधा कैसे चलेगा? इसके अलवा कोई दूसरा चारा ही नहीं है. सरकार की तरफ़ से कोई मदद नहीं मिल रही है.”
केरा के पिता तूर सिंह की उम्र ढल रही है. पहले वो भी मजदूरी करने गुजरात जाया करते थे. मगर अब उनके शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया है. अब वो बीमार ही रहते हैं. उनकी सबसे बड़ी चिंता है इलाके में स्वास्थ्य के संसाधनों का नहीं होना.
बातचीत में वो कहते हैं, “अगर बीमार हो जाएँ तो क्या करें? सरकारी अस्पताल लेकर जाना पड़ेगा. इलाके में कोई अस्पताल नहीं है. अस्पताल में बोलना पड़ता है कि गाँव से आए हैं. बीमार को खाट में उठाकर ले जाना पड़ता है. ज़्यादा बीमार हो जाएँ तो गाँव में झाड़-फूँक करने वाले को बुलाते हैं और मरीज़ मर जाए तो उसे गाड़ देते हैं. कहाँ ले जाएँ उसे?”
तूर सिंह कहते हैं कि उनके ‘फलिये’ तक आने-जाने में नाव ही एकमात्र सहारा है. लेकिन वो सब समय नहीं मिल पाती है. उनके अनुसार नाव से आने-जाने में एक व्यक्ति के सौ रूपए लगते हैं और उतना पैसा किसी के पास नहीं है.
इसलिए गंभीर रूप से बीमार हुए लोगों को इलाज के लिए ले जाने का दूसरा ज़रिया है खाट, जिस पर लादकर पहाड़ियों को पार करके कई घंटों के सफ़र करने के बाद ककराना पंचायत पहुंचा जा सकता है.
फिर वहां से छोटे वाहनों के ज़रिए सोंडवा तहसील लेकिन सोंडवा में भी स्वास्थ्य की उतनी बेहतर सुविधा नहीं होने के कारण अक्सर मरीजों को गुजरात ही ले जाया जाता है.
हमारे साथ इन गाँवों का दौरा करने गए मध्य प्रदेश सरकार में पटवारी के पद पर कार्यरत योगेश धाकरे बताते हैं कि कई लोगों के आधार कार्ड इसलिए नहीं बन पाए हैं क्योंकि लोगों की उँगलियों के छाप मिट गए हैं. ख़ास तौर पर बुजुर्गों के.
वो मानते हैं कि ये इलाका पूरी तरह से कटा हुआ है जिसकी वजह से किसी भी तरह का विकास यहाँ तक नहीं पहुँच पाया है. वो बताते हैं कि मनरेगा के तहत मजदूरी के लिए यहाँ के लोग राज़ी नहीं होते हैं.
वो बताते हैं, “मनरेगा में काम इसलिए नहीं करना चाहते हैं यहाँ के ग्रामीण क्योंकि एक तो उन्हें लगता है कि मजदूरी की दर कम है और दूसरा ये कि पैसे मिलने में दो तीन महीने लग जाते हैं. वहीं गुजरात में मजदूरी करने अगर ये जाते हैं तो इन्हें हर हफ्ते मजदूरी मिल जाती है. पूरा परिवार काम करता है तो कुछ पैसे भी जमा हो जाते हैं.”
दो साल में अलीराजपुर की तस्वीर बदलने का दावा
अलीराजपुर के जिलाधिकारी, राघवेन्द्र सिंह से जब बीबीसी ने इस बाबत पूछा तो उन्होंने स्वीकार किया कि ज़िले में रोज़गार के संसाधन कम हैं जिस वजह से पलायन होता है. ज़िलाधिकारी बताते हैं कि पूरे जिले में उद्योग नहीं के बराबर ही हैं.
इसके अलावा वो ये भी कहते हैं कि अलीराजपुर की ज़मीन उतनी उपजाऊ भी नहीं है जिसकी वजह से कृषि से लोगों को ज़्यादा फ़ायदा नहीं हो रहा है. वो ये भी मानते हैं की साक्षरता दर में भी ज़िला तुलनात्मक रूप से पिछड़ा हुआ है.
मगर राघवेन्द्र सिंह कहते हैं कि आने वाले दो सालों के अंदर अलीराजपुर की छवि बदल जाएगी जब नर्मदा नदी से पीने के पानी की सीधी सप्लाई लोगों तक पहुँचेगी.
बीबीसी से बात करते हुए सिंह कहते हैं, “अभी सबसे बड़ी उपलब्धि हमारी है कि सिंचाई के लिए नर्मदा का पानी खेतों में ‘पाइपलाइन’ के ज़रिए पहुंचाया जा रहा है. वर्ष 2025 तक नर्मदा का पानी भी लोगों तक ‘पाइपलाइन’ के ज़रिये पहुँच जाएगा. इस योजना की शुरुआत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी.”
सुविधाएं पहुंचाने में क्या है दिक्कत?
अलीराजपुर के जिलाधिकारी का कहना है कि सिर्फ़ उन इलाकों में समस्या ज़्यादा है जो नर्मदा के डूब क्षेत्र में आते हैं और जहां पहुंचना मुश्किल है.
उनका कहना था,“आप उत्तर भारत के गाँवों की अगर संरचना देखेंगे तो यहाँ ये बिलकुल अलग है. यहाँ गावों में एक साथ कई घर नहीं मिलेंगे. यही कारण है कि सरकारी अमले के लिए एक-एक घर तक सुविधा पहुँचाना मुश्किल है क्योंकि दो घर कहीं हैं तो दो घर काफ़ी दूरी पर कहीं और.''
इसके अलावा, वो कहते हैं, दूसरे इलाकों में तेज़ी से विकास हो रहा है जिसकी झलक ज़िला मुख्यालय से लेकर गांवों तक देखी जा सकती है जहाँ नई सडकें बनकर तैयार हो गई हैं.
उनका कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में भी अलीराजपुर अब पहले से बेहतर कर रहा है जिसकी झलक 10वीं और 12वीं के बोर्ड की परीक्षाओं के परिणामों में मिलती है.
क्यों खाली हैं अलीराजपुर के गांव?
आदिवासी कार्यकर्ता नितेश अलावा का दावा है कि अलीराजपुर ज़िला कई मानकों में देश के दूसरे हिस्सों से बहुत कमज़ोर है.
वो इसके लिए जनप्रतिनिधियों के रवैए को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. नितेश अलावा कहते हैं कि साल के ज़्यादातर महीनों में अलीराजपुर के गाँव खाली मिलते हैं जहाँ सिर्फ़ बुज़ुर्ग ही नज़र आते हैं.
क्या अलीराजपुर की किस्मत बदलेगी?
वो कहते हैं, “पूरा का पूरा गाँव खाली हो जाता है. लोग मजदूरी के लिए परिवार के साथ पलायन कर जाते हैं. ये लोग सिर्फ़ दो बार ही अपने गाँव लौटते हैं. किसी पारिवारिक समारोह में या फिर दीपावली पर. खरीफ़ की फ़सल कटने के साथ ही यहाँ के ग्रामीणों का जाना शुरू हो जाता है.”
अलावा के अनुसार दो अलीराजपुर हैं; एक वो जो मुख्यालय और आसपास का इलाक़ा है जो ठीक दिखता है और दूसरा वो जहां लोगों के पास पहनने के कपड़े, मकान और दूसरी जरूरी सुविधाएं तक नहीं हैं
‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) का ‘वैश्विक बहुआयामी ग़रीबी सर्वेक्षण’ की रिपोर्ट वर्ष 2018 में आई, यानी वो साल जब मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे और फिर वर्ष 2019 में आम चुनाव हुए.
नीति आयोग के सर्वेक्षण की रिपोर्ट वर्ष 2021 में आई. अब मध्य प्रदेश में फिर से विधानसभा के चुनाव दस्तक दे रहे हैं.
पिछले पाँच सालों में प्रदेश में पहले 15 महीने कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार रही और फिर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार फिर से बन गई.
मगर यहाँ के रहने वाले आदिवासी कार्यकर्ताओं और सामजिज कार्यकर्ताओं को लगता है कि इन चुनावों का अलीराजपुर के लोगों के लिए कोई ख़ास महत्त्व नहीं है इसलिए क्योंकि क्षेत्र के बड़े इलाकों में नेता वोट मांगने तक नहीं जाते हैं.
पेरियातर जहाँ पर मैं मौजूद हूँ, यहाँ के लोगों को याद तक नहीं है कि उन्होंने किसी जन प्रतिनिधि को आखिरी बार कब देखा था.
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