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लहसुन के किसान मंडियों में छोड़ कर जा रहे अपनी फ़सल, जानें क्यों- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मध्य प्रदेश के मंदसौर से
मध्य प्रदेश में मंदसौर के किसानों के बीच फिर असंतोष फैला हुआ है. यहां जगह-जगह प्रदर्शन भी हो रहे हैं. वजह है- किसानों को उनकी लहसुन की फ़सल के उचित भाव का नहीं मिलना.
मंदसौर में भारत की सबसे बड़ी लहसुन की मंडी है जहां दूर-दूर से किसान अपनी फ़सल इस आस से लेकर आते हैं ताकि उन्हें अपनी लहसुन की उपज के उचित भाव मिल जाए.
मंडी के बाहर दूर-दूर तक ट्रालियों की लाइनें लगी हैं. दूर दराज़ के इलाकों से आए किसान यहाँ चार पांच दिनों से जमे हैं. कोई सागर से अपनी फ़सल लेकर आया है तो कोई भोपाल के पास से. यहाँ पर राजस्थान से भी किसान अपना लहसुन बेचने आए हैं.
भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के अनुसार पूरे भारत में सबसे ज़्यादा लहसुन की खेती मध्य प्रदेश में ही होती है. इसके बाद राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में इसकी पैदावार होती है.
मंदसौर की मंडी के व्यापारी बताते हैं कि जो खेती मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में होती है उसकी गुणवत्ता सबसे अच्छी होती है और मांग भी.
लेकिन मंडी में मौजूद किसान कहते हैं पिछले तीन सालों से लहसुन की पैदावार की उन्हें ज़्यादा मुनाफ़ा नहीं हो पाया था. मगर इस साल तो लहसुन के भाव इतने ज़्यादा गिर गए हैं कि किसानों को उसे पैदा करने में आई लागत भी नहीं मिल पा रही है.
किसानों का आरोप है कि ईरान और चीन से आई लहसुन ने बाज़ार ख़राब कर दिया है. वहीं, वो ये भी कहते हैं कि इस साल लहसुन का निर्यात भी नहीं हो पा रहा है.
इस साल मध्य प्रदेश में लहसुन की बम्पर फ़सल हुई है जिसने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में पूरे भारत में 3.1 अरब मिट्रिक टन लहसुन की फ़सल हुई है जिसमें अकेले मध्य प्रदेश का योगदान 70 प्रतिशत का है. इस साल फ़सल और भी ज़्यादा हुई है.
लागत से भी कम पैसे
मंदसौर के सरकारी कृषि उत्पादन मंडी के प्रभारी जगदीश चंद बाबा ने बीबीसी से कहा कि इस साल किसान लहसुन की जो फ़सल मंडी में लेकर आए हैं उसकी गुणवत्ता पहले से हल्की है. इस वजह से कीमतें नहीं मिल पा रही हैं.
वे कहते हैं, "यहाँ फ़सल गुणवत्ता के हिसाब से बिकती है. जैसी क्वालिटी होती है रेट उसी हिसाब से ही मिल रहे हैं."
लेकिन इस बार भाव इतने कम हो गए हैं कि किसान या तो अपनी फ़सल मंडी में ही छोड़कर चले जा रहे हैं या फिर उसे नदी और नालों में बहा दे रहे हैं. कुछ किसान तो अपने उत्पाद को जला भी रहे हैं क्योंकि उन्हें लागत से भी कम पैसे मिल रहे हैं.
लेकिन जगदीश चंद बाबा कहते हैं कि अब जो फ़सल मंडी में आ रही है वो फ़सल आखिरी है, जो किसानों के घरों में चार महीने से रखी हुई थी.
उनका कहना था, "ऊटी वाली 'क्वालिटी' की लहसुन को अब किसानों ने दो चार दिनों में बोना शुरू भी कर दिया है. अंतिम समय में किसानों का माल मंडी पहुँच रहा है. जिन किसानों ने स्टॉक भी कर रखा है उन्हें तो बेचना ही है लाकर के. अब तो ख़राब होने आ गई है लहसुन...."
अधिकारी वजह क्या बता रहे हैं?
मध्य प्रदेश सरकार के अधिकारियों का कहना है कि वर्ष 2020-21 के सर्वेक्षण के अनुसार दस साल पहले तक प्रदेश की कुल 94,945 हेक्टेयर ज़मीन पर लहसुन का उत्पादन होता था. मगर अब इसका उत्पादन इस वर्ष तक 1,93,066 हेक्टेयर तक पहुँच गया है जो कि लगभग दोगुना है. इसलिए इस बार लहसुन का उतना भाव नहीं मिल रहा है.
अधिकारी कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में लहसुन काफ़ी अच्छे भाव में बिका था. इसलिए सभी किसानों ने दूसरी फ़सल नहीं लगाई और ज़्यादातर किसानों ने लहसुन ही बोया जिसकी वजह से फ़सल की पैदावार बहुत ही ज़्यादा हो गई.
बालाराम चौधरी अपनी फ़सल बेचने धर्म नगरी उज्जैन के पास के गाँव से आए हैं. वो सरकार की दलील को नहीं मानते.
वे बीबीसी से कहते हैं, "इतना भारी भरकम उत्पादन नहीं हो गया है कि सरकार ने भाव इतने कम कर दिए हैं. ज़मीन तो उतनी ही है. ज़मीन तो बढ़ नहीं गई है. इस बार गेहूं का भी मध्य प्रदेश में अच्छा उत्पादन हुआ है. लहसुन का भी अच्छा उत्पादन हुआ. ये दोनों ही उत्पाद 'रोटेशन' में लगे हुए थे जिसके बावजूद भी लहसुन के भाव नहीं मिल पा रहे हैं."
"सरकारी नीतियां ख़राब हैं"
बालाराम चौधरी का आरोप है कि सरकार की नीतियाँ ख़राब हैं. वे कहते हैं कि सरकार ही लहसुन का निर्यात ठीक से नहीं कर रही है.
लेकिन इन सब के बीच लहसुन की खेती करने वाले किसान बेहाल हो रहे हैं. मंदसौर के पास जावरा की मंडी का भी यही हाल है जहां लहसुन से भरी ट्रालियों की लाइन लगी हुई है.
मंदसौर ज़िले के किसान जगदीश पाटीदार कुज्रौत गाँव के रहने वाले हैं. वे कहते हैं कि इस महंगाई के दौर में लहसुन के उत्पादन में भी ख़र्च बढ़ गया है. मिसाल के तौर पर वे बताते हैं कि एक बीघे में लहसुन बोने से लेकर मंडी तक लाने में एक किसान को कम से कम बीस से पच्चीस हज़ार का ख़र्च आता है.
लेकिन पाटीदार कहते हैं कि इस साल स्थानीय लहसुन की बिक्री 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल हो रही है. इस कारण काश्तकार बहुत परेशान हैं.
उनका कहना था, "किसान अपनी फ़सल को लेकर मंडी तक बहुत मुसीबत से आते हैं. अब किसानों को भाव भी नहीं मिल पा रहा है. माल लाने वाली गाड़ी तक का किराया भी पूरा नहीं हो रहा है. इस कारण कुछ किसान अपना उत्पाद यहीं छोड़ कर चले जा रहे हैं या जला रहे हैं. क्या करें?"
मंडी में हमारी मुलाक़ात राम प्रसाद से हुई जो बहुत दूर का सफ़र तय कर अपनी उपज के साथ मंदसौर पहुंचे हैं. वो राजस्थान के शाजापुर के रहने वाले हैं.
मंडी में व्यवस्था का अभाव
राम प्रसाद बताते हैं कि वो लहसुन के 180 बोरे लेकर इस मंडी में आए हैं. वे बताते हैं कि अपने गाँव से मंडी तक एक बोरे का किराया उन्हें सौ रुपये पड़ा है. पिछले चार दिनों से वो मंडी में ही रुके हुए हैं क्योंकि उनकी फ़सल की बोली ही नहीं लग पाई है.
राम प्रसाद कहते हैं, "सौ दो सौ रुपये तो यहाँ खाने के ही लग जाते हैं. मंडी में व्यवस्था ही नहीं है किसी चीज़ की. पानी तक नहीं है. नहाने तक का भी इंतज़ाम नहीं है. शौच जाने के भी 15 रुपये देने पड़ते हैं. 15 रुपये नहाने के. इतना पैसा कहाँ से लाऊँ?"
मंडी में मौजूद कई किसान ऐसे भी हैं जो मंडी के संचालन पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि सरकार और स्थानीय प्रशासन, कृषि मंडी के संचालन का कोई तरीक़ा ही नहीं बना पाए हैं. वो कहते हैं कि इसी वजह से किसानों के बीच हाहाकार मचा हुआ है.
राम बाबू भी राजस्थान के राजगढ़ से अपना लहसुन मंडी में बेचने आए हैं. उनका कहना था कि लहसुन की खेती मुश्किल है क्योंकि इसमें किसानों को बड़ी मेहनत करनी पड़ती है जबकि दूसरी फ़सलों में ऐसा नहीं है.
"जब बोली लगा दी ही है तो ख़रीदना ही पड़ेगा"
राम बाबू बताते हैं कि लहसुन लगाने से लेकर उसे काटने तक उन्होंने पांच से 6 महीने तक का वक्त लगाया है. फिर चार महीने लहसुन की फ़सल को घर पर रख कर उसे सुखाने में लगे.
वे कहते हैं, "मई, जून, जुलाई और अगस्त के महीने निकल गए. उसके बाद मैं अपनी फ़सल यहाँ लेकर आया. मुझे क्या मिला? मेरे साथ हज़ारों किसान हैं जिनका करोड़ों का नुकसान बारिश की वजह से हुआ है. बोली लग जाने के बावजूद किसान अपनी लहसुन की फ़सल को मंडी में ही छोड़कर चले गए थे. सरकार को सोचना चाहिए कि जब बोली लगा दी ही है तो ख़रीदना ही पड़ेगा."
ये हालात क्यों पैदा हुए?
इस हालात के पीछे किसान बिचौलियों का हाथ मानते हैं. मंदसौर से चालीस किलोमीटर दूर रहने वाले सत्यनारायण पाटीदार कहते हैं कि मौजूदा हालत में लहसुन दो रुपये से लेकर 8-10 रुपये किलो तक ही बिक रहा है. अब आप शहरों को ही देख लीजिए वहां किस भाव लहसुन बिक रहा है? जब वहां इतना महंगा बिक रहा है तो आख़िर जेब किसकी गरम हो रही है? हम तो यही सवाल पूछ रहे हैं."
लहसुन की खेती किसानों के लिए उतनी आसान भी नहीं है क्योंकि इसकी लागत बढ़ती ही जा रही है.
लहसुन की पड़ताल करते हुए हम मंदसौर से दूर खजुरिया सारंग गाँव पहुंचे जहां लहसुन की बुवाई का काम चल रहा था. काफी बड़े से खेत में लगभग पचास महिलाएं एक-एक लहसुन की गिरी की बुवाई में लगी थीं.
लहसुन का गणित
खजुरिया सारंग गाँव में हमारी मुलाक़ात खेत के मालिक किसान विकास ठाकुर से हुई जिन्होंने लहसुन की खेती का अर्थशास्त्र समझाने की कोशिश की.
ठाकुर के अनुसार, "अगर हम लहसुन को छांट कर भी ले जाते हैं जैसे बड़ा माल थोड़ा अलग, उससे छोटा अलग, इस तरीक़े से भी बेचें तो सबसे छोटा 200 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाएगा. उससे बड़ा पांच सौ रुपये प्रति क्विंटल बिकेगा. उससे बड़ा हज़ार या 1200 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाएगा. अगर उससे बढ़कर थोड़ा अच्छा भाव मिले तो दो सौ का आठ सौ पकड़ लो. आठ सौ वाले का दो हज़ार पकड़ लो. और जो ढाई हज़ार तीन हज़ार का माल है उसके चार हज़ार पकड़ लो. तो लहसुन 4,000 रुपये प्रति क्विंटल क्विंटल बिक तो गया. मगर वो है कितना? सिर्फ एक क्विंटल. मतलब दस क्विंटल में से सिर्फ एक क्विंटल माल ऐसा निकला जो 4,000 रुपये प्रति क्विंटल बिका. जिसका सरकार इतना प्रोपागांडा करती है कि इतने का बिका. लेकिन वो बिका कितना? एक बीघे में सिर्फ एक क्विंटल? "
मंदसौर की मंडी में बोली लगाने आये व्यापारी कहते हैं कि चीन और दूसरे देशों से आया लहसुन इसलिए ज़्यादा बिकता है क्योंकि उसकी कलियाँ बड़ी हैं और 'सल्फर' की मात्रा भी कम है.
शलेन्द्र बम भी लहसुन के व्यापारी हैं. बीबीसी से बातचीत के क्रम में वे कहते हैं, "चीन के लहसुन में सल्फ़र कम है. भारत के लोग ऐसा लहसुन पसंद नहीं करते हैं. हालांकि दक्षिण भारत में लोग इसे ख़ूब पसंद करते हैं क्योंकि उसकी कलि बड़ी होती है. छीलने में परेशानी भी नहीं होती है. एक कलि में काम हो जाता है. भारत के लहसुन में सल्फ़र ज़्यादा है. अमेरिका, भारत के लहसुन का इस्तेमाल नहीं करता है. लेकिन ओमान और दुबई जैसी जगहों पर भारत का लहसुन पसंद किया जाता है."
लेकिन कुछ व्यापारी कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगर देखा जाए तो सभी जगह लहसुन की काफ़ी अच्छी पैदावार हुई है. वहीं भारत से लहसुन का निर्यात भी बंद पड़ा हुआ है.
राजू पन्नालाल कुमावत व्यापारी हैं और 'लहसुन किंग' के नाम से जाने जाते हैं.
वे कहते हैं, "इंटरनेशनल मार्केट में इस साल लहसुन की काफ़ी अच्छी फ़सल हुई है. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है चीन से आया हुआ लहसुन. यूरोप में चीन का माल ही चलता है. मौजूदा हालात में 'ट्रांसपोर्टिंग' की वजह से लहसुन का निर्यात या तो बहुत ही कम या फिर नहीं के बराबर हो पा रहा है."
"चूँकि भारत का लहसुन निर्यात नहीं हो पा रहा है इसलिए तुर्की के पास के देश उससे ख़रीद रहे हैं. चीन का माल यूरोप जा रहा है."
वे कहते हैं, "समस्या माल भेजने की है. अपना एक्सपोर्ट होता था श्रीलंका, बांग्लादेश, पकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, फ़िलिपीन्स और वियतनाम. इन देशों में भारत से सबसे ज़्यादा एक्सपोर्ट होता था. पर अबकी बार ट्रांसपोर्टिंग महंगी हो गई. जो ईरान का माल आया था वो भारत में प्रोसेसिंग के नाम पर ही आया था. वो प्रोसेसिंग तो हुई नहीं. बाज़ारों में ही बिका."
किसानों में पनप रहे असंतोष के मद्देनज़र मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले पर बैठक बुलाकर ज़िलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वो समस्या का समाधान करने में पहल करें. इसके अलावा सभी मंडियों में 'ग्रेडिंग मशीनों को फ़ौरन लगवाने' के निर्देश भी उन्होंने दिए हैं.
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