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क्या किसानों के ख़ौफ़ से मेहरबानी दिखा रही हैं सरकारें?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''मोदी जी साढ़े चार साल से प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने हिंदुस्तान के किसानों का एक रुपए का क़र्ज़ माफ़ नहीं किया है. कांग्रेस पार्टी और बाक़ी सभी विपक्षी पार्टी एक होकर नरेंद्र मोदी से क़र्ज़ा माफ़ करवाकर दिखाएंगे. हम उनसे लड़ेंगे, एक इंच पीछे नहीं हटेंगे, उनको रात भर सोने नहीं देंगे, जब तक हिंदुस्तान के किसान का क़र्ज़ माफ़ नहीं होगा.''
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नवनियुक्त कांग्रेस सरकारों की ओर से किसानों का क़र्ज़ माफ़ किए जाने के बाद राहुल गांधी की प्रेस वार्ता में कही गई इस बात से स्पष्ट है कि आगामी लोकसभा चुनावों में किसानों के मुद्दे अहम होंगे.
छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में केंद्र और राज्यों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की हार के पीछे किसानों के आक्रोश को भी एक वजह बताया जा रहा है.
तो क्या भारतीय राजनीति में हमेशा से हशिए पर रहे किसान अब केंद्र में आ गए हैं? क्या मौसम, फ़सल की बढ़ती लाग़त और उपज की कम क़ीमत, बैंकों और साहूकारों के क़र्ज़ और बढ़ते ख़र्च की मार झेल रहे किसान अब एक राजनीतिक शक्ति बन गए हैं?
किसानों और ग्रामीण भारत के मुद्दों पर काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी साईंनाथ कहते हैं, "किसान अब एक संवेदनशील वोटर वर्ग बन गया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि किसान किसी एक पार्टी को ही वोट देगा."
साईंनाथ कहते हैं, "तीन राज्यों में जो हुआ वो किसानों के ग़ुस्से का नतीजा है. इस बार ये ग़ुस्सा भाजपा के ख़िलाफ़ चला गया. इससे पहले ये महाराष्ट्र में कांग्रेस के ख़िलाफ़ भी जा चुका है और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भारी हार झेली है. 2004 में आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडु और कर्नाटक में एसएम कृष्णा की सरकारों की हार की वजह भी किसानों का ग़ुस्सा ही था. लेकिन किसान कभी भी एक एकजुट राजनीतिक शक्ति के तौर पर नहीं उभरा है. किसान किसी एक पार्टी को वोट नहीं करते, वो अलग-अलग पार्टियों को वोट करते रहे हैं. देश भर में दस करोड़ किसान हैं जिनका कोई एक संगठित संगठन नहीं है."
पी साईंनाथ कहते हैं, "ये निश्चित है कि सभी राजनीतिक दल 2019 चुनावों से पहले किसानों के हितों में बहुत बातें करेंगे. नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में यही किया था. उन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था, एक साल के भीतर स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया था. लेकिन मोदी सरकार ने ही साल 2015 में सूचना के अधिकार के तहत बताया और अदालत में शपथपत्र देकर कहा कि ऐसा करना संभव नहीं है. साल 2016 में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कह दिया कि सरकार ने कभी ऐसा कोई वादा किया ही नहीं था."
सरकार बना और गिरा सकते हैं किसान?
वहीं दूसरी तरफ कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "किसान राजनीतिक रूप से अहम हो रहे हैं ये गुजरात चुनावों के दौरान ही नज़र आना शुरू हो गया था. गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र सौराष्ट्र में सत्ताधारी दल भाजपा को मात खानी पड़ी थी. इससे ये संदेश स्पष्ट था कि ग्रामीण क्षेत्र सरकार से नाराज़ है. लेकिन शायद इस पर ध्यान नहीं दिया गया और अब हिंदी क्षेत्र के तीन प्रांतों का जो नतीजा आया है उससे ये लगता है कि पहली बार किसानों को ये समझ आया है कि वो सरकार पलट सकते हैं."
देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "पहली बार भारत में इतने व्यापक स्तर पर किसान और उनके मुद्दे राजनीतिक रूप से अहम हुए हैं. ये राजनीतिक रूप से बेहद अहम बदलाव है. अब तक भारत की इस आबादी की दो ही भूमिका रहीं थीं. या तो इन्हें वोटबैंक समझा गया था या लैंडबैंक. लेकिन आज किसान को अपनी राजनीतिक ताक़त समझ आ रही है. किसानों में ये समझ पैदा होना देश की राजनीति के लिए बेहद अहम हो गया है."
देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि आज सरकारें जो किसानों से वादे कर रही हैं अगर वो पूरे नहीं हुए या उनमें कोई कोताही की गई तो किसान इसका जवाब 2019 चुनावों में देंगे.
कांग्रेस का चुनावी एजेंडा
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के तेवरों से स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी के चुनावी एजेंडे में किसान सबसे ऊपर रहने वाले हैं.
कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी कहती हैं, "चुनाव नतीजों के बाद अचानक ये ख़बर बन रही है कि कांग्रेस किसानों को लुभाना चाहती है. ऐसा नहीं है. राहुल गांधी ने लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ 44 सीटें आने के बावजूद भूमि अधिग्रहण विधेयक के ख़िलाफ़ काम किया और सरकार को घुटने टिकवा दिए वहीं से कांग्रेस ने किसानों के हक़ की लड़ाई शुरू कर दी थी."
रागिनी कहती हैं कि कांग्रेस पार्टी किसानों को वोटबैंक नहीं मानती है, वो कहती हैं, "मंदसौर में जब किसानों ने आवाज़ उठायी तो सरकार ने गोली चलवा दी और छह किसान मारे गए. किसानों ने राजस्थान में जब खाद मांगा तो उन पर लाठीचार्ज हुआ. ग़ाज़ियाबाद और नोएडा में किसानों पर पुलिस ने प्रहार किया."
"सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वादा पूरा नहीं किया. सिंचाई के लिए बिजली पानी, फ़सल के लिए खाद नहीं दिया गया. किसानों को संपन्न बनाने का कोई रोड मैप जारी नहीं किया गया. आवाज़ उठाने पर गोली लाठी चलाई गई. ऐसे में किसानों का ग़ुस्सा होना लाजमी था. किसान अब उस पार्टी को वोट कर रहा है जिससे उसे उम्मीद हैं."
बीजेपी का पक्ष
वहीं उत्तर प्रदेश के भदोसी से सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त कहते हैं, "किसानों की समस्याएं न एक दिन में खड़ी हुई हैं और न ही उनका समाधान एक दिन में होगा. हमारे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष किसानों की समस्याओं को निबटाने के लिए तत्परता से काम कर रहे हैं."
हालांकि वीरेंद्र सिंह मानते हैं कि किसानों में ग़ुस्सा है और सरकार उनके ग़ुस्से और समस्याओं को समझ रही है और उसके लिए हर ज़रूरी क़दम उठा रही है.
वो कहते हैं, "किसानों की सरकार से अपेक्षाएं बढ़ी हैं और हम उन्हें पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं. जो ग़ुस्सा दिखा है वो अस्थायी है. मैं किसान होने के नाते इस बात से ख़ुश हूं कि आज़ादी के बाद पहली बार किसान इस देश की राजनीति का केंद्र हो गया है और किसान ही भारत की संसदीय राजनीति का फ़ैसला करेगा."
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ज़ोर-शोर से किसानों के मुद्दे उठाने और इसे लेकर बीजेपी की तैयारी के सवाल पर वीरेंद्र सिंह कहते हैं, "राहुल गांधी अगर किसानों की समस्या को चुनाव का अहम मुद्दा बनाते हैं तो मुझे और हमारी पार्टी को इस बात की ख़ुशी होगी. किसानों के हक़ की लड़ायी में वो हमारे सामने टिक नहीं पाएंगे."
क्या क़र्ज़माफ़ी है समाधान?
इसी बीच राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने भी बुधवार शाम किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने की घोषणा कर दी. लेकिन क्या सिर्फ़ क़र्ज़माफ़ी से किसानों की समस्याओं का समाधान हो पाएगा? देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "चार दशकों से किसानों की आय नहीं बढ़ी है. आर्थिक सर्वे बताता है कि 17 राज्यों में किसान परिवारों की सालाना आए बीस हज़ार रुपए है. क्या कभी किसी ने पूछा कि किसान परिवार इतनी कम आय में कैसे गुज़ारा कर रहा है? क़र्जमाफ़ी करना देश की ज़रूरत है. लेकिन ये किसानों की समस्या सुलझाने की दिशा में पहला और छोटा क़दम है."
इसी सवाल पर पी साईंनाथ कहते हैं, "स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट, खेती में कम होता सार्वजनिक निवेश, न्यूनतम समर्थन मूल्य, पानी की समस्या, क़र्ज़माफ़ी, क़र्ज़संकट, ज़मीन उर्वरता जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए एक विशेष सत्र होना चाहिए. कृषि संकट को ख़त्म करने की दिशा में कर्ज़माफ़ी पहला क़दम है."
साईंनाथ कहते हैं, "राहुल गांधी ने किसानों की इन समस्याओं पर भाजपा की नाकामी से फ़ायदा उठाया है. किसान आज राहुल गांधी की बात सुन रहे हैं क्योंकि उनके मन में भाजपा से धोखा खाने की भावना है. आज राहुल गांधी को किसान अधिक संख्या में सुन रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वो उनके लिए कुछ करेंगे."
तो क्या राहुल गांधी किसानों को कांग्रेस की ओर खींच पाएंगे? पी साईंनाथ कहते हैं, "तीन राज्यों में कांग्रेस सरकारें अगले पांच महीनों में किसानों के लिए क्या करती हैं ये इस पर निर्भर रहेगा. करने के लिए बहुत काम पड़ा है. क़र्ज़माफ़ी बस शुरुआत है और ये किसानों की समस्याएं सुलझाने के लिए पर्याप्त नहीं है. राहुल ने किसानों को संदेश दिया है कि वो उनकी बात सुन रहे हैं, लेकिन ये देखना होगा कि वो किसानों की कितनी बात सुनते हैं और उनके लिए कितना कर पाते हैं."
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