बांग्लादेश से बिगड़ते रिश्ते क्या भारत के लिए नया सिरदर्द?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले साल अगस्त में छात्रों के नेतृत्व में हुए एक विद्रोह के बाद बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा.
शेख़ हसीना का लगातार 15 साल से चला आ रहा शासन ख़त्म होने के साथ ही बांग्लादेश में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी.
बांग्लादेश छोड़ने के बाद शेख़ हसीना ने भारत में शरण ली और वे तब से भारत में ही हैं.
शेख़ हसीना के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफ़ी मज़बूत दिखते थे, उनमें पिछले कुछ महीनों में लगातार गिरावट आती दिखाई दी है.
हालिया फ़ैसलों से बढ़ीं तल्खियां

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हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से पोर्ट्स के माध्यम से यार्न (ऊन या कपास के धागों) के आयात को निलंबित कर दिया है.
बांग्लादेश के नेशनल बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू का ये फ़ैसला बांग्लादेश में बेनापोल, भोमरा, सोनमस्जिद, बंग्लाबांधा और बुरीमारी पोर्ट पर लागू कर दिया गया है. यही वो पोर्ट्स हैं, जिनसे बांग्लादेश में भारत से यार्न का आयात किया जाता था.
कुछ ही दिन पहले भारत ने भारी भीड़ का हवाला देते हुए बांग्लादेश के लिए अपनी उस ट्रांसशिपमेंट सुविधा को वापस ले लिया था, जिसके तहत भारत के हवाई अड्डों और बंदरगाहों से हो रहे निर्यात में भारत के सामान के अलावा बांग्लादेश के निर्यात को भी जगह दी गई थी.
भारत का ट्रांसशिपमेंट की सुविधा को वापस लेने का फ़ैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के सलाहकार मोहम्मद यूनुस के बीच बैंकॉक में हुई मुलाक़ात के कुछ ही दिन बाद हुआ.
गुरुवार 17 अप्रैल को भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से जब भारत और बांग्लादेश के संबंधों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "भारत बांग्लादेश के साथ सकारात्मक और रचनात्मक संबंध बनाने की उम्मीद करता है. हम एक लोकतांत्रिक, समावेशी और समृद्ध बांग्लादेश के पक्ष में हैं. जहां तक व्यापार मुद्दों का सवाल है, पिछले हफ्ते हमने ट्रांसशिपमेंट सुविधा के बारे में घोषणा की थी. हमने यह कदम हमारे बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर देखी जा रही भीड़ की वजह से उठाया था. लेकिन मैं आपको यह भी याद दिलाना चाहूंगा कि इन उपायों की घोषणा करने से पहले बांग्लादेश की तरफ़ से जो घटनाक्रम हुए हैं, उन पर भी एक नज़र डालें."
शेख़ हसीना को भारत में शरण मिलना और बांग्लादेश में हिंदुओं को निशाना बनाया जाना जैसे मुद्दे भी दोनों देशों के बीच दिक्क़तें बढ़ाते नज़र आ रहे हैं.
बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और मोहम्मद यूनुस के बीच क़रीब 40 मिनट तक बातचीत हुई थी. इस बातचीत में जहां मोदी ने बांग्लादेश में निशाना बनाए गए हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया, वहीं यूनुस ने उनसे शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण के लिए ढाका के अनुरोध के बारे में पूछा था.


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चीन और पाकिस्तान की तरफ़ दोस्ती का हाथ
हाल ही में मोहम्मद यूनुस चीन गए थे और वहाँ एक ऐसा बयान दिया, जिससे विवाद पैदा हो गया.
यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर के सातों राज्यों को लैंडलॉक्ड (ज़मीन से चारों ओर से घिरा) क्षेत्र बताया और बांग्लादेश को इस इलाक़े में समंदर का एकमात्र संरक्षक बताते हुए चीन से अपने यहाँ आर्थिक गतिविधि बढ़ाने की अपील की.
बैंकॉक में प्रधानमंत्री मोदी और मोहम्मद यूनुस के बीच बातचीत के बाद भारत सरकार ने कहा कि मोदी ने यूनुस से कहा, "माहौल को खराब करने वाली बयानबाज़ी से बचना चाहिए". इशारा यूनुस के चीन में दिए गए बयान की तरफ ही था.
इसी बीच ख़बरें आईं कि बांग्लादेश चीन और पाकिस्तान की मदद से लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से चालू करने की योजना बना रहा है, जो भारत की सीमा के काफ़ी नज़दीक है और भारत की सुरक्षा के लिए एक चिंता का विषय हो सकता है.
एनडीटीवी की एक ख़बर में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इस एयरबेस के बारे में मोहम्मद यूनुस ने अपनी चीन यात्रा के दौरान चर्चा की थी. इस योजना में पाकिस्तानी भागीदारी होने की खबरें भी आईं.
बुधवार 16 अप्रैल को पाकिस्तान की विदेश सचिव आमना बलोच ढाका पहुंची. पंद्रह साल बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत गुरुवार 17 अप्रैल को शुरू हुई जिसमें व्यापार संबंधों पर ध्यान केंद्रित करते हुए द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की गई.
कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार ढाका की यात्रा पर जाने वाले हैं. साल 2012 के बाद ये पहली बार होगा कि कोई पाकिस्तानी विदेश मंत्री बांग्लादेश की यात्रा पर जा रहा है.
साथ ही बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की भागीदारी का स्वागत करने को भी भारत में चिंता की नज़रों से देखा गया.

ये चर्चा भी ज़ोर पकड़ने लगी कि क्या भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अपने निम्नतर स्तर पर पहुँच गए हैं.
कुछ हफ़्ते पहले बीबीसी बांग्ला से बात करते हुए मोहम्मद यूनुस ने भारत के साथ बांग्लादेश के संबंधों पर बात की थी.
उन्होंने कहा था, "हमारे संबंधों में कोई गिरावट नहीं आई है. हमारे संबंध बढ़िया हैं और भविष्य में भी बढ़िया रहेंगे. हमारे संबंध बेहद क़रीबी हैं. एक-दूसरे पर काफ़ी ज़्यादा निर्भरता है. ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से हमारे संबंध इतने नज़दीकी हैं कि हम उनसे भटक नहीं सकते."
लेकिन साथ ही यूनुस ने टकराव की बात भी मानी थी.
उन्होंने कहा था, "लेकिन बीच में कुछ टकराव पैदा हुआ है. दरअसल दुष्प्रचार के कारण ऐसी स्थिति पैदा हुई है. ये दुष्प्रचार किसने किया इसका फ़ैसला दूसरे लोग करेंगे. लेकिन इसकी वजह से हमारे बीच एक ग़लतफ़हमी पैदा हो गई है. उस ग़लतफहमी से उबरने का हम प्रयास कर रहे हैं."

'बांग्लादेश की वर्तमान सरकार की कोई वैधता नहीं'
वीना सीकरी बांग्लादेश में भारत की पूर्व राजनयिक रही हैं.
उनका कहना है कि शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ हुआ विरोध प्रदर्शन एक सत्ता बदलने का अभियान था.
वह कहती हैं, "बांग्लादेश में वर्तमान सरकार की कोई संवैधानिक वैधता नहीं है, यह समझना बहुत ज़रूरी है. इस सत्ता परिवर्तन के होने के बाद मोहम्मद यूनुस को सामने रख कर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाली सरकार का निश्चित रूप से एक अलग नज़रिया है. वे 1971 से पहले के पुराने संबंधों की ओर लौट रहे हैं, चाहे वह पाकिस्तान के साथ हों या किसी और के. वे 1971 के दौरान हुई हर बात को नकारने की कोशिश कर रहे हैं. साल 1971 में हारने वाली ताक़तें अब सत्ता में वापस आने की कोशिश कर रही हैं. इसलिए यह एक बहुत ही अलग स्थिति है."
बांग्लादेश की चीन से बढ़ती नज़दीकी पर वीना सीकरी कहती हैं, "जहाँ तक चीन के साथ रिश्तों का सवाल है, बांग्लादेश और चीन के बीच अतीत में भी एक ऐसा रिश्ता रहा है, जहाँ बांग्लादेश को अपने सभी सैन्य उपकरण चीन से मिलते रहे हैं और आर्थिक संपर्क भी रहा है. इसमें कुछ भी नया नहीं है. भारत के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की सुरक्षा की सीमा का पालन किया जाना चाहिए."
सीकरी कहती हैं, "मिसाल के तौर पर जब आप पाकिस्तान की मदद से लालमोनिरहाट में इस एयरफ़ोर्स बेस के बारे में बात करते हैं या आप अचानक घोषणा करते हैं कि तीस्ता परियोजना चीन को दी जाएगी, तो भारत ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय सीमा के पास कुछ भी गतिविधि होगी, तो दिक़्क़त होगी. सुरक्षा की सीमा का पालन किया जाना चाहिए. जब आप कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ वे लालमोनिरहाट में अपना एयरफ़ोर्स बेस बनाने जा रहे हैं, तो यह सुरक्षा क्षेत्र में एक ख़तरे की घंटी बजाता है."
'आज बांग्लादेश में पाकिस्तान का ज़्यादा महत्व'
प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का उदाहरण देते हुए प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि अतीत में भी बांग्लादेश में ऐसी सरकारें थीं, जो भारत के बारे में बहुत सकारात्मक नहीं थीं, लेकिन तब भी वे भारत के साथ संबंधों को संतुलित रखने को लेकर सतर्क थीं.
वे कहते हैं, "यह कहना भी ग़लत है कि शेख़ हसीना पूरी तरह से एकतरफ़ा थीं. उनके कार्यकाल के दौरान ही चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार बनकर उभरा था. इसलिए वे भारत और चीन के बीच संतुलन भी बना रहीं थीं. किसी भी द्विपक्षीय संबंध का पालन-पोषण दोनों पक्षों को करना होता है. लेकिन फ़िलहाल ऐसा लगता है कि यूनुस प्रशासन ने भारत के प्रति विशेष रूप से प्रतिकूल रवैया अपनाया है."
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि मौजूदा वक़्त में बांग्लादेश का प्रशासन बहुत से ऐसे लोग चला रहे हैं, जो पाकिस्तान के बारे में ज़्यादा चिंतित हैं.
वे कहते हैं, "चीन को भूल जाइए. आज बांग्लादेश में पाकिस्तान का अधिक महत्व है, जो असाधारण है. भारत के पूर्वोत्तर के बारे में यूनुस ने जिस तरह का बयान दिया, वह भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय स्थिति के बारे में एक तरह की उदासीनता को दर्शाता है."
भारत-बांग्लादेश संबंधों में गिरावट?

तो क्या ये कहना सही होगा कि भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में गिरावट आई है?
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का मानना है कि दोनों देशों के रिश्तों में गिरावट आई है.
वे कहते हैं, "बांग्लादेश में नए प्रशासन ने जिस तरह से भारत के साथ अपने संबंधों को संभाला है, उससे निश्चित रूप से संबंधों में बहुत नकारात्मकता आई है और दुर्भाग्य से इस नज़रिए को बदलने की इच्छा भी नहीं दिखती. मुझे नहीं लगता कि हम आने वाले वक़्त में कोई नाटकीय बदलाव देखेंगे."
प्रोफ़ेसर पंत के मुताबिक़ चूंकि भारत के शेख़ हसीना से संबंध बहुत अच्छे थे, इसलिए शेख़ हसीना के हटने के बाद संबंधों में एक नया संतुलन तो आना ही था.
वे कहते हैं, "संबंध स्थिर थे और शेख़ हसीना के लिए भारत का समर्थन इतना मज़बूत था कि उनकी जगह आने वाला कोई भी अन्य प्रशासन रिश्तों में एक नया संतुलन बनाता और इस नए संतुलन की वजह से शायद भारत के साथ रिश्ते में बदलाव आता. लेकिन मुझे लगता है कि जो हुआ है, वह यह है कि यूनुस प्रशासन निश्चित रूप से एक ऐसी राह पर चल रहा है, जिसमें भारत के साथ रिश्ते को लेकर कोई व्यावहारिकता नहीं है."
वीना सीकरी भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं कि दोनों देशों के संबंध बिगड़े हैं.
वीना कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि इस वक़्त अच्छे संबंध हैं. यह बांग्लादेश की सरकार नहीं है. यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसने बिना किसी वैधता के असंवैधानिक रूप से ख़ुद को सत्ता पर काबिज़ किया है. यह बात हर वक़्त याद रखना बहुत ज़रूरी है."
उनके मुताबिक़ भारत निश्चित रूप से ज़रूरत के मुताबिक़ स्थिति से निपट रहा है.
वे कहती हैं, "हाल ही में बैंकॉक में प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस के साथ हुई बैठकों के दौरान मुझे लगता है कि सीमाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई थीं. भारत के विदेश सचिव पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश गए थे. अगर उन सीमाओं का सम्मान नहीं किया जा रहा है, तो यह एक अलग मामला है. फिर भारत को देखना होगा कि और क्या करना है."
भारत के लिए कितनी बड़ी चिंता?

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बांग्लादेश के साथ बिगड़ते रिश्ते क्या आने वाले समय में भारत के लिए एक नया सिरदर्द बन जाएंगे?
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "जब आपके पास एक ऐसा साझेदार हो, जिसे आपने इतने लंबे समय तक पोषित किया हो तो यह निश्चित रूप से भारत के लिए एक चुनौती है. शेख़ हसीना के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध बहुत आगे की ओर बढ़ रहे थे, चाहे वह कनेक्टिविटी हो, व्यापार हो, रणनीतिक संबंध हों या सीमा मुद्दे हों. ये सभी मुद्दे भले ही हल न हुए हों, लेकिन एक ऐसी जगह पर थे, जहाँ वे संबंधों की दिशा को नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं कर रहे थे. लेकिन आज अचानक सब कुछ एक समस्या जैसा लग रहा है."
पंत के मुताबिक़ अभी का वक़्त बांग्लादेश के लिए भी अनुकूल नहीं है.
वे कहते हैं कि अगर आज के बांग्लादेश को देखा जाए और कुछ महीने पहले के बांग्लादेश से उसकी तुलना की जाए जब शेख़ हसीना प्रधानमंत्री थीं, तो दिखेगा कि हसीना ने बांग्लादेश को एक निश्चित स्थिरता और आर्थिक जीवंतता दी थी.
वे कहते हैं, "कुछ ही महीनों में आप देख रहे हैं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था कहाँ से कहाँ चली गई. बांग्लादेश का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन अस्थिर है. बांग्लादेश में चरमपंथियों का उदय एक वास्तविकता है. इसलिए आप एक ऐसे बांग्लादेश को देख रहे हैं जो एक सफल कहानी से वापस उस सभी नकारात्मकता की ओर जा रहा है, जो दीर्घकालिक समस्याएँ पैदा करेगी. भारत एक बड़ा देश है, यह कुछ तरह की लागतों को सह सकता है, लेकिन एक धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी इस्लामी राज्य के रूप में बांग्लादेश का भविष्य जीवित रहेगा या नहीं, यह इस वक़्त का अहम सवाल है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















