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राजस्थान की सुशीला मीणा की कहानी, जिनकी गेंदबाज़ी से प्रभावित हुए सचिन तेंदुलकर
- Author, अनघा पाठक और मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, राजस्थान से लौटकर
रामेर तालाब तक जाने वाली कच्ची सड़क डामेर वाले रास्ते से जुड़ती है.
ऐसा लगता है कि हाल ही में इस सड़क को फिर से बनाया गया, साफ-सुथरा कर इसकी मरम्मत की गई ताकि इस सड़क से बड़ी गाड़ियां जा सकें.
सड़क पर पहले से कहीं ज़्यादा ट्रैफिक देखने को मिल रहा है क्योंकि हर कोई इस गांव की तरफ़ आजकल जा रहा है. रास्ते में एक व्यक्ति हमारी कार देखकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाता है.
और एक शख़्स हमसे पूछता है और रास्ता बताते हुए कहता है, ''सुशीला के घर जाना है? वो लड़की ना, जिसका वीडियो वायरल हुआ था? आजकल हर कोई उसके घर जाना चाहता है.''
ये सड़क हमें सुशीला मीणा के घर तक ले जाती है. सुशीला राजस्थान के छोटे से आदिवासी गांव रामेर तालाब की 10 साल की बच्ची है, जिसका वीडियो हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.
सचिन को लेकर क्या बोलीं सुशीला?
इस वीडियो को पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया था.
वैसे ये वीडियो शुरुआत में सुशीला के स्कूल टीचर ने इंस्टाग्राम पर साझा किया था, जो सचिन तेंदुलकर तक पहुंचा और फिर जब सचिन ने अपने अकाउंट से ये वीडियो शेयर किया तो सोशल मीडिया पर वीडियो छा गया.
इस वीडियो के साथ सचिन तेंदुलकर ने लिखा कि सुशीला मीणा के गेंदबाज़ी एक्शन में भारत के पूर्व क्रिकेटर और तेज़ गेंदबाज़ ज़हीर ख़ान की ''झलक'' दिखती है.
इस वीडियो को लाखों लोगों ने देखा और हज़ारों ने साझा किया, लेकिन विडंबना ये है कि सुशीला जानती ही नहीं कि सचिन तेंदुलकर कौन हैं.
वो कहती हैं, ''मुझे नहीं पता वो कौन हैं. अब मैंने सचिन तेंदुलकर का नाम सुना है, लेकिन मैंने उन्हें कभी देखा नहीं. अगर आप उनकी तस्वीर भी दिखाएं, तो मैं उन्हें पहचान नहीं पाऊंगी. मैंने कभी क्रिकेट नहीं देखा क्योंकि, हमारे घर में टीवी नहीं है."
हालांकि, सुशीला सचिन तेंदुलकर की आभारी हैं कि उन्होंने उसे मशहूर बना दिया.
वो कहती हैं, "कई लोग मुझसे मिलने घर आ रहे हैं, मुझे उपहार दे रहे हैं. मुझे अच्छा लग रहा है. मैं सचिन सर का शुक्रिया अदा करती हूं."
बदल गई सुशीला की दुनिया
सुशीला के लिए अब दुनिया बदल सी गई है. लोग उन्हें माला पहना रहे हैं. उनका सम्मान कर रहे हैं और ऐसी चीजें उनके लिए ख़रीद रहे हैं, जिनके बारे में सुशीला शायद सोचती भी न हों.
ऐसा प्रतीत होता है कि सुशीला खुद इन सारी चीजों से चौंकी हुई हैं, इन सब को बयां करने के लिए शब्द उनका साथ छोड़ जाते हैं. कभी-कभी वो कैमरे की तरफ़ देखती हैं.
जब अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के नेता, सरकारी अधिकारी, गांव के नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और रिश्तेदार सुशीला के पास आते हैं और उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने को कहते हैं, तो ऐसा लगता है कि सभी सुशीला की लोकप्रियता में से कुछ हिस्सा अपने नाम कर लेना चाहते हैं.
हालांकि, जैसे ही सुशीला स्कूल के कपड़ों में आती हैं और रबड़ की गेंद के साथ जब स्कूल के मैदान में उतरती हैं तो सुशीला एक नए अवतार में जान पड़ती हैं.
एक लड़की जो निडर है, मज़बूत है और अपने लक्ष्य पर केंद्रित है.
उन्होंने कहा, "जब गेंद मेरे हाथ में हो तो मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ बल्लेबाज़ को आउट करना चाहती हूं. मैं सिर्फ़ यही सोचती हूं कि बल्लेबाज़ को मैदान से कैसे बाहर करूं."
सुशीला की मां क्या सोचती हैं?
सुशीला के साथ क्लास में पढ़ने वाली आशा बल्लेबाज़ी करती हैं.
वो कहती हैं, "बल्लेबाज़ी करते हुए सुशीला का सामना करना मुश्किल है. आपको पता भी नहीं चलेगा और तब तक गेंद टर्न हो चुकी होती है. उसकी (सुशीला) गेंद अंदर की तरफ़ आती है और विकेट चटका देती है."
अब आशा उम्मीद करती हैं कि उनका वीडियो भी सुशीला की तरह वायरल होगा और लोग उनसे भी मिलने आएंगे.
इस बीच, सुशीला की मां शांतिबाई घर आने वाले लोगों के स्वागत सत्कार में लगी हुई हैं.
उन्हें अपनी बेटी पर बहुत गर्व है. वो कहती हैं, "नहीं, अब मैं कभी भी अपनी बेटी को क्रिकेट खेलने से नहीं रोकूंगी." शांतिबाई का फ़ोन रह-रहकर लगातार बज उठता है.
लोग उन्हें फ़ोन कर उनकी बेटी की उपलब्धि के लिए बधाई देते हैं. ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके घर आ रहे हैं और वो चेहरे पर मुस्कुराहट लिए सबका स्वागत कर रही हैं.
सुशीला के घर में बहुत ज़्यादा चीजें नहीं हैं. उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं.
शांतिबाई घर आने वाले लोगों के लिए चाय और जलपान की व्यवस्था करने में व्यस्त नज़र आती हैं. सुशीला के बड़े भाई लोगों को चाय पिला रहे हैं. पूरा माहौल शादी जैसा जान पड़ता है.
शांतिबाई ने कहा, "हमें घर में राशन की पूरी व्यवस्था करनी है ताकि कुछ कम न पड़ जाए. ये अच्छी बात है कि लोग घर आ रहे हैं. वे सब सुशीला के लिए आ रहे हैं. वरना तो लोग अब किसी के मरणी में भी किसी के घर नहीं जाते."
शांतिबाई फ़ोन पर किसी से बातचीत पूरी कर मेरी तरफ़ देखती हैं और कहती हैं, "लोग जूनागढ़, दिल्ली, जयपुर, भरतपुर समेत हर जगह से फ़ोन कर रहे हैं."
शांतिबाई कहती हैं कि भले ही लोग सुशीला की तारीफ़ कर रहे हों, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे हैं जिन्हें उसके खेलने पर भी आपत्ति है.
वो कहती हैं, "कुछ लोग पूछ रहे हैं कि लड़की को क्रिकेट क्यों खेलने दे रहे हो- एक लड़की, क्रिकेट खेलेगी? जब उसे रसोई में होना चाहिए, तो वो मैदान में है?"
वो कुछ देर चुप रहने के बाद फिर कहती हैं, "वे लोग कहते हैं, आपने अपनी बेटी का वीडियो वायरल होने दिया? आपने ऐसा क्यों किया? आपने उसे घर का काम करना नहीं सिखाया? वो पूछते हैं कि वो घर का काम क्यों नहीं कर रही है?"
इसके बाद शांतिबाई कहती हैं कि उन्हें इन सब बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.
"मैं कुछ कहती नहीं हूं और उनकी बातें सुनती भी नहीं हूं. वो खुद ये बातें कह-कह कर थक जाएंगे. उनकी जुबान दर्द करने लगेगी और फिर वो ये सब कहना बंद कर देंगे. मैं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देती."
बच्चों के हुनर के पीछे शिक्षक
सिर्फ़ सुशीला ही नहीं इस प्राइमरी स्कूल में सभी स्टूडेंट्स को क्रिकेट पसंद है. लड़का-लड़की सभी को. इसके पीछे की वजह हैं- ईश्वरलाल मीणा.
ईश्वरलाल कहते हैं, "2017 में जब से मैं आया हूं, तब से मैं स्टूडेंट्स को क्रिकेट खेलने के लिए उत्साहित करता हूं."
"मेरा ये इरादा है कि जो बच्चे स्कूल आते हैं, उनका दिल लगा रहे, बच्चों को खुशी देने वाली गतिविधियां हों ताकि वो स्कूल में रहें, ऐसा नहीं हो तो इन बच्चों को घर पर रहने में ही ज़्यादा अच्छा लगता है."
शुरुआत में ईश्वरलाल और अन्य शिक्षक मिलकर टीम बनाते थे, मैच कराते थे और इस तरह पूरा स्कूल ही क्रिकेट खेलने लगा. और जब उन्होंने बच्चों के टैलेंट को देखा तो उन्होंने नई टेक्निक भी सिखानी शुरू की.
ईश्वरलाल ने खुद से ही क्रिकेट खेलना सीखा है. क्रिकेट के प्रति उनका प्यार स्कूली बच्चों में छलकता है.
ईश्वरलाल यूट्यूब पर वीडियो देखते हैं, पहले खुद नई टेक्निक की प्रैक्टिस करते हैं और फिर बच्चों को सिखाते हैं.
इसके साथ ही साथ वो क्रिकेट खेलते हुए बच्चों के वीडियो भी बनाते हैं. उनका एक इंस्टाग्राम अकाउंट भी है, जहां वो अपने स्टूडेंट्स का कौशल दुनिया के सामने लाते हैं.
वो कहते हैं, "मैंने ऐसा करने के लिए बेहतर फ़ोन ख़रीदा. मैंने वीडियो बनाना और उसे एडिट करना सीखा. मैंने सोशल मीडिया से काफी कुछ सीखा है."
"ख़ासतौर पर लोगों के हमारे वीडियो पर कमेंट करने से. इससे पहले, मुझे पता नहीं था कि ग्रिप क्या होती है? लेकिन, कमेंट में किसी ने मुझे बैटिंग ग्रिप के बारे में बताया, मैंने इस टर्म को सर्च किया और फिर इसके बारे में जानकारी हासिल की."
हालांकि, इस छोटे से गांव में सुविधाओं की कमी है. लगभग सभी बच्चे ग़रीब परिवार से आते हैं.
ईश्वरलाल गहरी सांस भरते हुए कहते हैं, "95 फ़ीसदी हमारे बच्चे नंगे पैर स्कूल आते हैं. ज़्यादातर बच्चों के माता-पिता अहमदाबाद में मजदूरी करते हैं. आपने बच्चों को जो स्वेटर पहने देखा होगा, कल किसी ने ये दान में दिये हैं. उनके पास पिछले साल ये भी नहीं था."
पहले भी वायरल हुए वीडियो
पहली बार इस स्कूल का वीडियो वायरल नहीं हुआ है. ऐसा पहले भी हो चुका है. पिछले साल, इसी स्कूल की रेणुका पारगी का वीडियो बैटिंग की वजह से वायरल हुआ था.
ग्रामीण बताते हैं कि अब वो जयपुर की एक निजी क्रिकेट एकेडमी में ट्रेनिंग ले रही है. एकेडमी ही उसके सारे ख़र्च उठाती है. इस चीज को छोड़ दें, तो गांव वहीं का वहीं है.
ईश्वरलाल निराश होते हुए कहते हैं, "लोग आते हैं, बड़े वादे करते हैं और कुछ भी नहीं बदलता है."
उन्होंने कहा, "आपने सड़क देखी होगी. आप स्कूल की हालत भी देख सकते हैं. कुछ कमरे तो ख़तरनाक स्थिति में पहुंच गए हैं. फर्श से लोहे की छड़ें निकल रही हैं."
"प्राइमरी स्कूल सिर्फ़ पांचवीं तक है. जब ये बच्चे यहां से बाहर जाएंगे, तो भले ही वो कितने भी टैलेंटेड हों, उनका क्रिकेट खेलना बंद हो जाएगा. उनके पास कोई अवसर नहीं है."
इस बीच, यहां सुविधाएं बढ़ाने के बारे में भी कई दावे हुए हैं. सुशीला का घर उपहारों से भरा पड़ा है. सभी ने उन्हें बल्ले गिफ़्ट किए हैं, जबकि वो बल्लेबाज़ी नहीं करती हैं.
उनके शिक्षकों का कहना है कि सुशीला को बल्लेबाज़ी सिखाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो सीख नहीं पाईं, मगर उनकी बॉलिंग स्किल की कहानी अलग है.
हालांकि, हमने नहीं देखा कि किसी ने उन्हें कॉर्क बॉल गिफ़्ट की हो. उन्होंने अब तक कॉर्क बॉल से नहीं खेला है.
गेंद उपहार में नहीं देने के पीछे की वजह शायद ये रही हो कि इसे लोग बड़ा उपहार नहीं मानते हों या कम से कम तस्वीरों में गेंद बड़ा उपहार जैसा नहीं दिखता है.
हम जब उनसे पूछते हैं कि वो इतने बल्ले का क्या करेंगी तो वो मुस्कुराते हुए कहती हैं, "इस्तेमाल करने की कोशिश करूंगी."
प्रशासन क्या बोला?
प्रतापगढ़ के जिला प्रशासन ने कहा है कि वो देखेंगे कि गांव के लिए क्या किया जा सकता है.
वन विभाग ने कुछ अधिकारियों को स्कूल का सर्वे करने के लिए भी भेजा है, ताकि वो स्कूल के मैदान को बढ़ाने पर विचार कर सकें.
इन सब के बीच सवाल ये है कि जब लोगों का आना रुक जाएगा और इंटरनेट पर दूसरे वीडियो वायरल हो रहे होंगे, तब सुशीला अपना भविष्य बनाने के लिए क्या कर रही होंगी?
उनका भविष्य और बॉलिंग कौशल किस मुकाम तक पहुंचेगा, ये अभी सवाल है. हालांकि, गांव के लोगों का कहना है कि हो सकता है कि सुशीला के भाग्य से ही कुछ उनका भला हो जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.