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क्रिकेट की हिंदी कमेंट्री पर ये कैसी बहस, हरभजन सिंह ने किया क्या वादा
- Author, प्रियंका
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्रिकेट हो या कोई भी दूसरा खेल, कमेंट्री उसका अहम हिस्सा है. कमेंटेटर का मुख्य काम है कि मैदान में जो कुछ हो रहा है, उसकी अपने शब्दों से ऐसी मंज़रकशी हो कि ऑडियंस आंखें मूंदकर भी खुद को खेल वाली जगह पर महसूस कर ले.
हालांकि, पिछले कुछ समय से भारतीय क्रिकेट प्रेमी हिंदी में हो रही कमेंट्री से नाखुश दिख रहे हैं.
क्रिकेट के इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल की शुरुआत में ही अब कुछ दर्शकों ने ये नाखुशी खुलकर सामने रखी है और इसकी वजहें भी बताई हैं.
ताज़ा बहस एक यूज़र के उस वीडियो के सामने आने के बाद शुरू हुई है जिसमें वह क्रिकेट प्रबंधकों से हिंदी कमेंट्री का स्तर सुधारने की बात कर रहे हैं.
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ये वीडियो इतना वायरल हुआ कि आईपीएल में कमेंट्री करने वाले पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह ने भी इसका संज्ञान लिया.
हरभजन सिंह ने वादा किया कि वह इस पर काम करेंगे.
हिंदी कमेंट्री के बारे में क्या कहा जा रहा है?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक यूज़र ने वीडियो शेयर किया.
इसमें एक शख़्स ये कह रहे हैं कि हिंदी कमेंट्री के साथ मैच देखना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है.
इसमें वो कह रहे हैं, "पहले जब हम बचपन में हिंदी कमेंट्री देखते थे, मनिंदर सिंह, अरुण लाल और सुशील दोशी कमेंट्री करते थे...तब गेम के बारे में सीखने को बहुत कुछ मिलता था. तकनीकी पहलुओं पर बहुत बात होती थी. अब गेम के बारे सीखने को कुछ नहीं मिलता है. अब हिंदी कमेंट्री में या तो शेर ओ शायरी होती है या फिर पुराने क़िस्से सुनाए जाते हैं."
हालांकि, इस यूज़र ने ये भी स्पष्ट किया है कि वह किसी भी कमेंटेटर को टारगेट नहीं कर रहे हैं क्योंकि ये सब लिजेंड हैं, जिन्होंने भारत के लिए बहुत अच्छा खेला है.
यूज़र ने कहा, "मैं इन सबसे विनती कर रहा हूं कि आप लोगों को हमसे ज़्यादा अच्छी क्रिकेट आती है. अगर आप हमें क्रिकेट नहीं सिखाएंगे तो कौन सिखाएगा. ऐसा नहीं है कि आप कर नहीं सकते हैं. मेरा निवेदन है कि कुछ ऐसी बातें भी कीजिए जिससे हम गेम के टेक्निकल पहलू सीख पाएं."
इस वीडियो के वायरल होने के बाद पूर्व क्रिकेटर और राज्यसभा सांसद के साथ ही कमेंट्री कर रहे हरभजन सिंह ने लिखा, "आपके इस इनपुट के लिए शुक्रिया. हम इस पर काम करेंगे."
लेकिन ऐसे भी कुछ लोग हैं जिनका मानना है कि चूंकि दर्शक ऐसी भाषा पसंद करते हैं, इसलिए कमेंट्री इस तरह की जा रही है.
हरभजन सिंह के एक्स पोस्ट पर एक यूज़र ने लिखा, "हम रील्स और शॉर्ट्स के ज़माने में जी रहे हैं जहां क्रिंज कंटेंट को बढ़ावा दिया जाता है क्योंकि उस पर अधिक व्यूज़ आते हैं. अगर लोग इसे देखेंगे नहीं तो कमेंटेटर बोलेंगे नहीं. मौजूदा पीढ़ी शायद खेलों के तकनीकी पहलुओं को सुनने में ज़्यादा रुचि नहीं लेती. बल्कि उन्हें ऐसी ही हंसाने वाली कमेंट्री सुनना पसंद है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है."
क्या सच में हिंदी कमेंट्री में सुधार की ज़रूरत है?
भारत में क्रिकेट से दर्शकों की ऐसी भावनाएं जुड़ी हैं कि इसकी तुलना कई बार धर्म से की जाती है.
लेकिन जब ये खेल भारत में आया तब इसे देखने के लिए लोगों के पास टेलीविज़न या फ़ोन नहीं थे. बल्कि रेडियो एकमात्र ऐसा साधन था जिस पर बॉल बाई बॉल किसी मुक़ाबले की मंज़रकशी होती थी. उस दौर में से सबसे बड़े नामों में थे सुशील दोशी.
इनका ज़िक्र वायरल वीडियो वाले शख़्स ने भी किया है. सुशील दोशी को हिंदी कमेंट्री में उनके योगदान के लिए साल 2016 में भारत के पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया था.
सुशील दोशी से बीबीसी ने ये जानना चाहा कि इस भाषा की कमेंट्री में आख़िर कहां कमी हो रही है?
उनका मानना है कि 'हिंदी बेल्ट के कमेंटेटर और ख़ासकर के क्रिकेटरों से शिकायत इसलिए है क्योंकि वो जब कमेंट्री करते हैं, तो क्रिकेट से जुड़ी जानकारी में काफ़ी बढ़ोतरी कर सकते हैं क्योंकि उनको मालूम रहता है कि ड्रेसिंग रूम में क्या हो रहा है, कप्तान क्या सोच रहा होगा, कोई फ़ील्डर अगर कवर में खड़ा किया गया है तो क्यों किया गया होगा. अगर कोई फ़ील्डर स्क्वेयर लेग पर डीप में बाउंड्री के पास खड़ा किया है तो क्यों ये सब वो बता सकते हैं, लेकिन वो ऐसा बता नहीं रहे हैं.'
सुशील दोशी कहते हैं, "पुराने क़िस्से-कहानियां जो आज के खेल से जुड़ते हों उनकी तो बात करिए लेकिन जिसका आज के खेल से कोई संदर्भ नहीं है. उनकी बातें कर कर के.. कोई फ़ायदा नहीं है. लोगों को आपकी किसी खिलाड़ी से करीबी में दिलचस्पी नहीं है, बल्कि दिलचस्पी इसमें है कि आप खेल का किस तरह से बखान करते हैं."
उनका मानना है कि इन कमेंटेटर्स में काबिलियत है लेकिन इनकी भाषा में वो बात नहीं है.
एक उदाहरण देते हुए वह समझाते हैं, "एक खिलाड़ी कभी घायल हुआ और वो लंगड़ाने लगा. मुझे याद है कि एक क्रिकेट खिलाड़ी ने ही कमेंट्री करते वक्त ये कहा था कि उनका चाल-चलन खराब हो गया है. चलने के तरीके को उन्होंने चाल-चलन कहा. इस तरह की चीज़ों से बाज़ आना चाहिए."
वो कहते हैं "क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने क्रिकेट के अधिकार बेचे हैं लेकिन देश की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा को ख़राब करने का अधिकार नहीं सौंपा है. खासतौर पर जब बड़े क्रिकेटर कमेंट्री करते हैं तो उनकी ज़िम्मेदारी हम लोगों से भी ज़्यादा बड़ी हो जाती है क्योंकि आज मेरा बेटा भी कमेंट्री सुन रहा है तो उसको भी लगेगा कि इतना बड़ा आदमी है, वो गलत थोड़े ही बोलेगा."
सुधार के लिए क्या किया जा सकता है?
आईपीएल का मौजूदा सीज़न 22 मार्च से शुरू हुआ है. साथ ही हिंदी कमेंट्री पर पिछले काफ़ी समय से चली आ रही बहस भी तेज़ हुई.
एक यूज़र ने इस बारे में लिखा, "आईपीएल की हिंदी कमेंट्री अब केवल शोर भर है. कोई असल विश्लेषण नहीं, सिर्फ़ हाईलाइट्स, बेतुकी शायरी और ग़ैर ज़रूरी शब्दों का इस्तेमाल. किसी एक टीम के प्रति फ़ेवरटिज़म तो इतना ज़्यादा है कि ये ब्रॉडकास्ट कम और फ़ैन क्लब अधिक लगता है. पहले कम से कम कुछ असल क्रिकेट से जुड़ी बातें होती थीं."
उन्होंने इसके बाद एक और पोस्ट में लिखा कि सुशील दोशी, रवि चतुर्वेदी, अतुल वासन और यहां तक कि जतिन सपरू भी एक समय पर रोमांच और विश्लेषण का संतुलन बनाए रखते थे. उन्होंने प्रसारक को टैग करते हुए इसका संज्ञान लेने की बात कही.
बहुत से यूज़र्स ऐसे भी हैं जिन्होंने नवजोत सिंह सिद्धू, आकाश चोपड़ा और हरभजन सिंह को खराब हिंदी कमेंट्री के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.
मगर वो कौन सा तरीका है जिससे हिंदी कमेंट्री से उखड़ते जा रहे दर्शकों की शिकायत थोड़ी कम हो सकती है.
सुशील दोशी कहते हैं, "इसको वर्कशॉप आयोजित करके दूर किया जा सकता है. उस वर्कशॉप में ऐसे लोग बुलाए जाएं जो हिंदी भी जानते हों और क्रिकेट भी. अभी हो क्या रहा है कि ऐसी वर्कशॉप्स में सिर्फ़ भाषा वाले लोगों को ज़्यादा बुलाया जाता है. अगर क्रिकेट नहीं आता और केवल भाषा आती हो तो कमेंट्री किताबी हो जाएगी. सही क्रिकेटिंग भाषा के साथ ये अन्याय होगा. जब स्वाभाविक रूप से हिंदी में कमेंट्री करेंगे तो ये हो जाएगा.. अगर अंग्रेज़ी में सोचकर हिंदी में बोलेंगे तो नहीं होगा."
वह कहते हैं, "अंग्रेज़ी और हिंदी की बराबरी नहीं हो सकती. अंग्रेज़ी तो सभी सही ही बोलते हैं. वहां आप आई इज़ गोइंग कहेंगे तो लोग प्राण ले लेंगे आपके. क्योंकि उन्हें अपनी भाषा से प्यार है. लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं है. जो भाषा आपको जीवनयापन का सहारा दे रही है, जो आपको इतना धन दे रही है...लोगों के साथ जुड़ने की आज़ादी प्रदान कर रही है उस भाषा का सम्मान करना चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित