You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जर्मनी ने यूक्रेन के मामले में अमेरिकी रुख़ से अलग फ़ैसला क्यों लिया, आख़िर क्या है 'डर'
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूक्रेन और रूस की जंग के अब क़रीब एक हज़ार दिन हो चुके हैं.
अब हमले का रुख़ बदलता दिख रहा है. अमेरिका ने यूक्रेन को अनुमति दे दी है कि वो उसकी लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से रूस के भीतर हमले कर सकता है.
रूस ने मंगलवार को कहा कि यूक्रेन ने अमेरिका की लंबी दूरी वाली मिसाइलों से रूस के भीतर हमला किया है.
अमेरिका की इस इजाज़त को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.
कहा जा रहा है कि अमेरिका यूरोप के देशों पर भी दबाव बना रहा है कि वे भी यूक्रेन को अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों से रूस के भीतर हमले की इजाज़त दें.
हालांकि जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शोल्त्ज़ इस मूड में नहीं हैं.
यूक्रेन और रूस की जंग में पश्चिम के देश खुलकर यूक्रेन के साथ हैं. लेकिन निकट भविष्य में युद्ध का कोई समाधान होता नहीं दिख रहा है और यूक्रेन को मिलने वाली मदद पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. ख़ास कर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद से.
ट्रंप चाहते हैं कि रूस और यूक्रेन की जंग जल्द से जल्द ख़त्म हो. हालांकि युद्ध कैसे ख़त्म होगा, इस सवाल का जवाब नहीं है.
जर्मनी का फ़ैसला अमेरिका से अलग क्यों?
जर्मन थिंक टैंक कीएल इंस्टिट्यूट के आँकड़े बताते हैं कि यूक्रेन को अमेरिका अब तक 61 अरब डॉलर की मदद कर चुका है.
वहीं जर्मनी भी यूक्रेन को 11 अरब डॉलर की युद्ध सामग्री दे चुका है. इनमें सैनिकों के लिए ट्रेनिंग, टैंक, मिसाइल, तोप और गोला-बारूद शामिल हैं.
रूस अमेरिका के रुख़ से नाराज़ है और उसने कहा है कि अमेरिकी मिसाइलें रूस के भीतर आएंगी तो यह रूस पर उसका सीधा हमला माना जाएगा.
रविवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने परमाणु डॉक्ट्रिन में बदलाव की घोषणा की थी.
रूस ने कहा है कि किसी परमाणु शक्ति संपन्न देश के समर्थन से यूक्रेन हमला करता है तो इसे साझे हमले के रूप में देखा जाएगा और रूस प्रतिक्रिया में परमाणु हमले पर भी विचार कर सकता है.
इस बीच जर्मन चांसलर ने कहा है कि वह यूक्रेन को लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें देने के पक्ष में नहीं हैं, जिनसे यूक्रेन रूस के भीतर हमला कर सके.
जर्मन चांसलर का मानना है कि इससे समाधान नहीं मिलेगा बल्कि समस्या और बढ़ेगी.
जर्मन चांसलर के रुख़ को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं. यूक्रेन को लेकर अमेरिका और जर्मनी में इस तरह के मतभेद ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद सामने आए हैं.
ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति की वकालत करते हैं.
इस नीति के तहत ट्रंप अमेरिकी संसाधन किसी दूसरे देश की मदद में लगाने से सहमत नहीं हैं.
यहाँ तक कि ट्रंप नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो को लेकर भी बहुत उत्साहित नहीं रहते हैं.
यूक्रेन का साथ कब तक?
यूक्रेन को पश्चिमी देशों का साथ मिल रहा है लेकिन ये साथ अंतहीन नहीं हो सकता है.
अगले साल फ़रवरी यानी क़रीब चार महीने में यूक्रेन और रूस की जंग के तीन साल हो जाएंगे.
यूक्रेन दबी ज़ुबान में शिकायत करता रहा है कि उसे पश्चिम से जितनी मदद मिलनी चाहिए थी, उतनी मिल नहीं रही है.
जर्मनी से यूक्रेन चाहता है कि वह उसे तॉरस मिसाइल दे. तौरस मिसाइल फाइटर जेट से दागी जाती है और यह 500 किलोमीटर तक मार कर सकती है.
इसे प्रीसिशन स्ट्राइक भी कहा जाता है. जर्मनी के अलावा इस मिसाइल का इस्तेमाल स्पेन और दक्षिण कोरिया करते हैं.
यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद से चाह रहा है कि जर्मनी उसे ये मिसाइल दे लेकिन अब तक कामयाबी नहीं मिली.
जर्मनी को डर है कि अगर उसने यूक्रेन को ये मिसाइल दी तो रूस के भीतर वो हमले शुरू करेगा.
जवाब में रूस भी आक्रामक होगा और युद्ध की चपेट में पूरा यूरोप आ सकता है.
जर्मनी नहीं चाहता है कि आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहा यूरोप किसी युद्ध की चपेट में आए.
अमेरिका ने लंबी दूरी की अपनी मिसाइलों से रूस में हमले की इजाज़त भले यूक्रेन को दे दी है लेकिन इससे बढ़ने वाली जटिलता का अंदाज़ा जर्मनी को है.
यूक्रेन में रूस अगर भारी हथियारों का इस्तेमाल करेगा तो इसके असर से यूरोप अछूता नहीं रहेगा लेकिन अमेरिका पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा.
भारतीय सेना में आर्टिलरी के पूर्व डायरेक्टर जनरल लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) पी शंकर कहते हैं, ''जर्मनी का यूक्रेन को तॉरस मिसाइल सिस्टम देने से इनकार करना, उसके मूल्यों को दिखाता है. यह कुछ हद तक जापान की तरह है. जर्मनी के लिए मसला यह नहीं है कि वह अमेरिका की तरह नहीं सोच रहा है और यूक्रेन को मदद नहीं दे रहा है.''
हालांकि अमेरिकी थिंक टैंक स्टडी ऑफ वॉर का कहना है कि यूक्रेन को लंबी दूरी की मिसाइल के इस्तेमाल की इजाज़त देना कोई बड़ी बात नहीं है और इससे युद्ध के दायरे का विस्तार नहीं होगा.
रूस ने भी यूक्रेन के ख़िलाफ़ उत्तर कोरिया के सैनिकों को उतारा है. ईरान से भी रूस को मदद मिल रही है. बेलारूस पहले से ही साथ है.
अमेरिका में नई सरकार जनवरी में कमान संभालने वाली है तो दूसरी तरफ़ जर्मनी की घरेलू राजनीति में उथल-पुथल है. ओलाफ़ शोल्त्ज़ के पास बहुमत नहीं है. ऐसे में जर्मनी कोई अहम फ़ैसला नहीं लेना चाहता है. जर्मनी में जल्द ही चुनाव हो सकते हैं.
भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक बताते हैं, ''मुझे नहीं लगता है कि जर्मनी के फ़ैसले से ज़मीन पर कोई बड़ा बदलाव आएगा. जर्मनी का यह राजनीतिक फ़ैसला है. वहीं अमेरिका की बाइडन सरकार ने फ़ैसला लिया है. जनवरी में ट्रंप क्या करेंगे, इसे लेकर कुछ भी कहा नहीं जा सकता है. जर्मनी की सतर्कता समझ में आती है. जर्मनी नहीं चाहता है कि आने वाले वक़्त में वह किसी तरह से असहज महसूस करे.''
वहीं जनरल पी शंकर कहते हैं कि अमेरिकी मिसाइलों से यूक्रेन में संघर्ष का रुख़ नहीं बदलेगा. वह कहते हैं, ''इससे तनाव ज़रूर बढ़ेगा और रूस को शायद ज़्यादा नुक़सान हो सकता है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)