मनमोहन सिंह को शहबाज़ शरीफ़ ने क्यों नहीं दी श्रद्धांजलि, पाकिस्तान के लोग ही बता रहे हैं वजह

शहबाज़ शरीफ़

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मनमोहन सिंह के निधन पर एक शब्द भी कुछ नहीं कहा है

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनूस ने मंगलवार को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि दी.

मनमोहन सिंह का पिछले हफ़्ते निधन हो गया था.

मोहम्मद युनूस ने ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग जाकर मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि दी.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि नहीं दी है. पाकिस्तान के लोग शहबाज़ शरीफ़ के इस रुख़ की आलोचना कर रहे हैं और शरीफ़ परिवार को निशाने पर ले रहे हैं.

हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने मनमोहन सिंह के निधन पर दुख जताया था और उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.

वहीं बाग्लादेश में ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग में श्रद्धांजलि के लिए मनमोहन सिंह की एक तस्वीर रखी गई थी और इसी तस्वीर के सामने मोहम्मद युनूस ने पुष्प अर्पित किया.

मोहम्मद युनूस ने श्रद्धांजलि के बाद एक संदेश भी लिखा. भारत ने मनमोहन सिंह के निधन पर सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है.

बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त प्रणय कुमार वर्मा ने डॉ युनूस की अगवानी की. मोहम्मद युनूस भारतीय उच्चायोग 11:30 बजे पहुँचे थे. बांग्लादेश के मीडिया के अनुसार, मोहम्मद युनूस ने भारतीय उच्चायुक्त प्रणय कुमार वर्मा से बात भी की.

बांग्लादेश की न्यूज़ वेबसाइट प्रथम आलो के अनुसार, मोहम्मद युनूस ने मनमोहन सिंह को लेकर कहा, ''वह बहुत ही सरल और सामान्य थे लेकिन कमाल के बुद्धिमान थे. भारत को दुनिया की आर्थिक ताक़त बनाने में मनमोहन सिंह का बड़ा योगदान है.''

1971 में जब पाकिस्तान से टूटकर अलग बांग्लादेश अस्तित्व में आया तो भारत में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. बांग्लादेश के निर्माण में भारत की तत्कालीन सरकार का बड़ा योगदान था. बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान के परिवार का गांधी नेहरू परिवार से काफ़ी अच्छे संबंध रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद युनूस ने भारतीय उच्चायुक्त प्रणय कुमार वर्मा से बात भी की

पाकिस्तानी पीएम ने नहीं दी श्रद्धांजलि

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दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मनमोहन सिंह को अब तक कोई औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं दी है.

शहबाज़ शरीफ़ के बड़े भाई और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भी मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि नहीं दी है.

हालांकि इस दौरान शहबाज़ शरीफ़ ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के छोटे भाई के निधन पर दुख जताया है. यहां तक कि उन्होंने दक्षिण कोरिया में हुए विमान हादसे को लेकर भी दुख जताया है लेकिन मनमोहन सिंह के मामले में बिल्कुल ख़ामोश रहे.

ऐसा तब है, जब मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था और अब वह इलाक़ा पाकिस्तान के पंजाब में है. मनमोहन सिंह के मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रुख़ पर पाकिस्तान के लोग ही सवाल उठा रहे हैं.

इमरान ख़ान की सरकार में मंत्री रहे चौधरी फ़वाद हुसैन ने शरीफ़ परिवार की आलोचना करते हुए लिखा है, ''शरीफ़ परिवार ने मोदी और अन्य मुस्लिम विरोधी भारतीय नेताओं को अपने निजी कार्यक्रमों में आमंत्रित किया लेकिन मनमोहन सिंह के लिए अब तक एक औपचारिक श्रद्धांजलि तक नहीं दी. मनमोहन सिंह का जन्म इसी मिट्टी में हुआ था. यह बताता है कि सरकार किस हद तक असंवेदनशील हो गई है.''

पाकिस्तानी पत्रकार अमारा अहमद ने शहबाज़ शरीफ़ पर निशाना साधते हुए लिखा है, ''यह बहुत ही ओछी मानसिकता दिखाती है कि पाकिस्तान ने मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि नहीं दी. मनमोहन सिंह का जन्म उस मिट्टी में हुआ था, जहाँ अभी पाकिस्तान है. मनमोहन सिंह ने क्रिकेट डिप्लोमैसी की शुरुआत की थी और 26/11 के बाद एक युद्ध को टालने में उनका बड़ा योगदान था.''

मनमोहन सिंह

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इमेज कैप्शन, 2004 में चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था

पाकिस्तानी पूछ रहे हैं सवाल

थिंक टैंक विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टिट्यूट के निदेशक माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ''न तो शहबाज़ शरीफ़ और न ही नवाज़ शरीफ़ ने मनमोहन सिंह को सार्वजनिक रूप से कोई श्रद्धांजलि दी है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने एक संदेश जारी किया है. यह हैरान करने वाला है. दोनों समकालीन हैं और अर्थव्यवस्था को लेकर दोनों की सोच एक जैसी रही है. दोनों पाकिस्तान और भारत के बीच अच्छे संबंधों की वकालत करते थे.''

माइकल कुगलमैन के इस ट्वीट के जवाब में पाकिस्तान की रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा ने लिखा है, ''ऐसा लगता है कि शरीफ़ परिवार मोदी को नाराज़ नहीं करना चाहता है. या फिर पीएमएलएन का यह पुराना रुख़ रहा है, जो चला गया सो चला गया.''

इसके जवाब में कुगलमैन ने लिखा है, ''मुझे ऐसा नहीं लगता है क्योंकि डार ने तो संदेश जारी किया है. मुझे यह भी नहीं लगता है कि शरीफ़ परिवार मोदी के नाराज़ होने की इतनी फ़िक्र करेगा. मैं इसके लेकर भी निश्चित नहीं हूँ कि शहबाज़ शरीफ़ मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि देते तो मोदी नाराज़ हो जाते.''

माइकल कुगलमैन को जवाब देते हुए पाकिस्तानी पत्रकार आमेर मिर्ज़ा ने लिखा है, ''शरीफ़ परिवार में न तो कोई गंभीर राजनेता है और न ही स्टेट्समैन. हम इनसे कोई मर्यादित व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. मोदी से इनकी क़रीबी हर कोई जानता है.''

पाकिस्तानी पत्रकार मोना फ़ारूक़ अहमद ने लिखा है, ''पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारे पड़ोसी थे और एक स्टेट्समैन भी. वह पाकिस्तान से श्रद्धांजलि के हक़दार थे, भले दोनों देशों के बीच संबंध ठीक नहीं है. शहबाज़ शरीफ़ बाक़ी सारे ट्वीट कर रहे हैं लेकिन मनमोहन सिंह की उपेक्षा कर उन्होंने अपनी तुच्छता दिखाई है. यह बहुत ही शर्मनाक है.''

पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि नहीं दी

पाकिस्तानी पत्रकार की मनमोहन सिंह से मुलाक़ात

मनमोहन सिंह के परिवार को भारत के विभाजन के दौरान अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था. तब मनमोहन सिंह 15 साल के थे और एक शरणार्थी के रूप में सरहद की दूसरी तरफ़ गए थे. पाकिस्तानी पत्रकार नजम सेठी ने अपनी पत्नी जुगनू मोहसिन के साथ मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की थी.

नजम सेठी ने इस मुलाक़ात की यादें साझा करते हुए पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल समा टीवी से कहा, ''मेरी मुलाक़ात 2004 में हुई थी. तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने ही थे. मैं तब इंडिया में था. उस वक़्त इंडिया के नेशनल सिक्यॉरिटी एडवाइजर जेएन दीक्षित थे. जेएन दीक्षित पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे थे और उनसे मेरी अच्छी पहचान थी. उन्हीं से कहा कि मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करवा दीजिए. मेरी मुलाक़ात तय हो गई.''

नजम सेठी ने कहा, ''मनमोहन सिंह ने पूरी बात पंजाबी में की थी. मेरी पत्नी जुगनू ने मनमोहन सिंह से कहा कि पाकिस्तान में आपने स्कूल की पढ़ाई की थी. वहाँ के बारे में बताइए. मनमोहन सिंह ने स्कूल के दिनों की पूरी बात बताई. मनमोहन सिंह ने कहा कि उनके सारे शिक्षक मुसलमान थे.''

नजम सेठी ने कहा, ''मनमोहन सिंह ने पूरी पढ़ाई उर्दू माध्यम में की थी और उन्हें हिन्दी नहीं आती थी. वह हिन्दी पढ़ते भी थे तो फ़ारसी लिपि में. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के पंजाब में स्थित अपना गाँव और स्कूल देखने की इच्छा जताई थी. मैं जब वापस लौटा तो उस वक़्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चौधरी शुजात हुसैन थे.''

''चौधरी साहब से मेरे अच्छे ताल्लुकात थे. मैंने चौधरी शुजात से कहा कि महमोहन सिंह से मिलकर आया हूँ. उनके गाँव के स्कूल को ठीक कर दीजिए क्योंकि मनमोहन सिंह उस स्कूल को देखना चाहते हैं. चौधरी शुजात ने 48 घंटे के अंदर स्कूल को दुरुस्त कर दिया लेकिन मनमोहन सिंह पाकिस्तान नहीं आ पाए.''

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने तो मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए मित्र और भाई कहा है.

अनवर इब्राहिम ने एक्स पर एक लंबी पोस्ट में लिखा है, ''1990 के दशक में मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों के हम गवाह रहे हैं. मैं भी 1990 के दशक में मलेशिया का वित्त मंत्री था. मनमोहन सिंह एक स्टेट्समैन थे और आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरित होती रहेंगी. बहुत कम ही लोगों को पता है कि जब मैं जेल में था तो मनमोहन सिंह ने मेरे बच्चों को स्कॉलरशिप ऑफर किया था. ख़ास कर मेरे बेटे इहसान के लिए. हालांकि मैंने विनम्रता से इसे स्वीकार नहीं किया था लेकिन उनकी उदारता और मानवता के प्रति प्रेम साफ़ झलकता है.''

अलविदा मेरे मित्र, मेरे भाई मनमोहन.

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