मनमोहन सिंह के किस साहस की चर्चा विदेशी मीडिया में ख़ूब हो रही है?

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का गुरुवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया.
1991 में भारत की अर्थव्यवस्था जब मुद्रा संकट से जूझ रही थी, तब वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था को लाइसेंस राज से मुक्त करना शुरू किया था.
इसका नतीजा यह हुआ कि भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आई और वृद्धि दर भी तेज़ हुई.
मनमोहन सिंह के निधन की ख़बर को विदेशी मीडिया में भी अच्छी ख़ासी जगह मिली है.
ख़ास कर पश्चिम के मीडिया में मनमोहन सिंह के योगदान और उनकी विशेषज्ञता पर काफ़ी कुछ कहा जा रहा है.
ब्रितानी अख़बार फाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, "1991 से 1996 तक वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए, भारतीय अर्थव्यवस्था को दशकों के अलगाव और ठहराव को दूर करने के लिए कई अहम फ़ैसले किए थे. मनमोहन सिंह ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निजी निवेश के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था का दरवाज़ा खोला था."
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने आगे लिखा है, ''ऑक्सफोर्ड ट्रेंड अर्थशास्त्री अपनी सौम्यता, विनम्रता और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे. 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को जीत मिली तो प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह को चुना. मनमोहन सिंह को गांधी परिवार ने इसलिए भी चुना था कि वह राहुल गांधी के लिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बनते.''
''तब राहुल गांधी राजनीति में नए थे और चीज़ों को समझने की कोशिश कर रहे थे. 2009 में मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल को बड़े सुधार के अवसर के रूप में देखा जा रहा था लेकिन इसी कार्यकाल में उनकी राजनीति का अंत एक कमज़ोर नेता के रूप में हुआ. यहाँ तक कि अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ गए थे और सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे.''
मनमोहन सिंह का जन्म 1932 में जिस गाँव में हुआ था, वो अविभाजित भारत का हिस्सा था. अब ये गाँव पाकिस्तान में है. पाकिस्तान बनने के बाद मनमोहन सिंह का परिवार भारत आ गया था.
कैंब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़ाई के बाद मनमोहन सिंह ने कुछ सालों तक संयुक्त राष्ट्र में काम किया और फिर 1969 में भारत लौटे थे.

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प्रेरणादायी सफ़र
1971 में मनमोहन सिंह वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार बने और इसके बाद उन्होंने सरकार में कई अहम पदों की ज़िम्मेदारी संभाली.
लेकिन मनमोहन सिंह को मुख्य रूप से 1991 के आर्थिक सुधार के लिए याद किया जाता है.
भारत तब घोर आर्थिक संकट से गुज़र रहा था. विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली हो गया था. भारत को तब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ में सोना गिरवी रखना पड़ा था.
तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ख़ाली हो चुका था. एक अरब डॉलर से भी कम बचा था. ये डॉलर महज़ 20 दिनों के तेल और फ़ूड बिल के भुगतान में ख़त्म हो जाते.
भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा भी नहीं थी कि बाक़ी दुनिया से कारोबार कर सके. भारत का विदेशी क़र्ज़ 72 अरब डॉलर पहुँच चुका था.
ब्राज़ील और मेक्सिको के बाद भारत तब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश था. देश की अर्थव्यवस्था और सरकार से लोगों का भरोसा ख़त्म होने लगा था.
महंगाई, राजस्व घाटा और चालू खाता घाटा दोहरे अंक में पहुँच गए थे.

1990 में भारत के आर्थिक संकट में समाने की कुछ वजहें अंतरराष्ट्रीय भी थीं. 1990 में गल्फ़ वॉर शुरू हुआ और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा.
वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें बढ़ गईं और इसकी चपेट में भारत भी आ गया. 1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया. ऐसा तेल की क़ीमतें बढ़ने और आयात के वॉल्यूम में वृद्धि के कारण हुआ.
इसका सीधा असर भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ा. इसके अलावा खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीयों की कमाई भी बुरी तरह से प्रभावित हुई और इससे विदेशों से आने वाला रेमिटेंस प्रभावित हुआ.
भारत में उस वक़्त राजनीतिक अनिश्चितता भी बढ़ गई थी. 1990 से 91 के बीच राजनीतिक अस्थिरता चरम पर रही.
1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने गठबंधन सरकार बनाने से इनकार कर दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई.
लेकिन यह गठबंधन सरकार जाति और मज़हब की लड़ाई में फँस गई. देश भर में दंगे हुए. दिसंबर, 1990 में वीपी सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
मई 1991 में आम चुनाव होने तक कार्यवाहक सरकार रही. इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई.

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मनमोहन सिंह के फ़ैसले
ऐसी स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था घुटने टेक चुकी थी. एनआरआई अपना पैसा निकालने लगे थे और निर्यातकों को लगने लगा था कि भारत उनका उधार नहीं चुका पाएगा.
महंगाई सातवें आसमान पर थी. तेल की क़ीमतें बढ़ाई गईं, आयात रोका गया, सरकारी खर्चों में कटौती की गई और रुपए में 20 फ़ीसदी तक का अवमूल्यन किया गया. बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की.
आईएमएफ़ ने भारत को 1.27 अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया. लेकिन इससे हालात नहीं सुधरे. वित्तीय वर्ष 1991 के अंत तक चंद्रशेखर की सरकार 20 टन सोना गिरवी रखने पर मजबूर हुई.
जब पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ऐसा लग रहा था कि भारत विदेशी क़र्ज़ तय तारीख़ पर नहीं चुका पाएगा और डिफ़ॉल्टर घोषित हो जाएगा. लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के ज़रिए कई सुधारों को अंजाम दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनागत बदलाव की बदौलत चीज़ें नियंत्रित हो पाईं.
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''मनमोहन सिंह ने इसे मौक़े की तरह लिया और भारत के लाइसेंस राज को ख़त्म करना शुरू किया. इसके साथ ही भारत की नियंत्रित अर्थव्यवस्था का एक युग ख़त्म हुआ. इसे ख़त्म करने में तब मनमोहन सिंह को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का पूरा सहयोग मिला था. भारत की अर्थव्यवस्था जो दो और तीन फ़ीसदी की वृद्धि दर से बढ़ रही थी, वो क़रीब 9 प्रतिशत की दर से बढ़ने लगी.
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल किसानों को क़र्ज़ माफ़ी, मनरेगा और आरटीआई के लिए जाना जाता है. लेकिन इसी कार्यकाल में सिंह ने अमेरिका से संबंधों को नया आयाम दिया. इससे पहले अमेरिका ने भारत पर परमाणु परीक्षण के कारण कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे थे. अमेरिका से परमाणु क़रार के लिए मनमोहन सिंह ने 2008 में अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था. इस क़रार को अंजाम देकर मनमोहन सिंह शीत युद्ध के दौर से दोनों देशों के बीच चले आ रहे अविश्वास को ख़त्म किया था.''
मनमोहन सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल के आख़िरी महीने में कहा था, इतिहास उनके प्रति वर्तमान मीडिया की तुलना में ज़्यादा उदार होगा.

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'मनमोहन सिंह ने सपनों को पीछा करना सिखाया'
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने लिखा है कि मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत कहानी लोगों को आत्मविश्वास से भर देती है. 15 साल का सिख शरणार्थी लड़का, जिसके परिवार को 1947 में भारत के विभाजन के बाद अपना घर-बार छोड़ना पड़ा. बाद में यही लड़का ऑक्सफ़र्ड और कैंब्रिज में पढ़ने जाता है और टॉप का टेक्नोक्रेट बनता है.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''मनमोहन सिंह हमें यह आश्वस्त करने में कामयाब रहे कि समाजवादी व्यवस्था के बाद बाज़ार उन्मुख अर्थव्यवस्था में हम अपने सपनों का पीछा कर सकते हैं. शिक्षा और कड़ी मेहनत के ज़रिए हमारी ज़िंदगी हमारे माता-पिता की ज़िंदगी से बेहतर हो सकती है. कामयाबी केवल विशेषाधिकार हासिल लोगों तक ही सीमित नहीं रह सकती है.''
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''1990 के दशक का आर्थिक सुधार भारत में सरकारें बदलने के बावजूद जारी रहा. लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल बुरी तरह से घिरा हुआ था. एक तरफ़ क्रोनी कैपिटलिस्ट सरकारी बैंकों से क़र्ज़ लेकर स्विस बैंक के अकाउंट में ट्रांसफ़र कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ विपक्ष उन पर अनिर्णय की स्थिति में होने और भ्रष्टाचार में डूबे होने का आरोप लगा रहा था. महंगाई आसमान छू रही थी और रुपया कमज़ोर हो रहा था.''
मनमोहन सिंह ने अपनी आख़िरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''मुझे नहीं लगता है कि मैं कमज़ोर प्रधानमंत्री हूँ.'' इसके कुछ महीने बाद ही नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनाव में जबर्दस्त जीत मिली.

ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''नवंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की और इसके तहत प्रचलन में रही भारत की 86 प्रतिशत मुद्रा अवैध हो गई. मनमोहन सिंह ने तब इसे विनाशकारी क़दम बताते हुए कहा था कि इससे संगठित लूट को बढ़ावा मिलेगा. मनमोहन सिंह की यह भविष्यवाणी सही साबित हुई थी.''
''मनमोहन सिंह का निधन तब हुआ है, जब भारत में योग्य लोगों की कमी दिख रही है, विकास समावेशी नहीं है, ज़्यादातर उद्योगपतियों को लग रहा है कि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण हो रहा है, मध्य वर्ग टैक्स से परेशान है और ग़रीब व्यवस्था से बाहर हो रहा है. भारत में धार्मिक बखेड़ा बढ़ रहा है और नीति निर्माता किसी भी तरह सत्ता हासिल करने में लगे हैं. ''
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''भारत दुनिया की पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और संभव है कि कुछ सालों में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाए. लेकिन मुख्य रूप से यह आँकड़ों का खेल है. भारत में विकास विषमताओं से भरा है. 1.4 अरब की आबादी में एक छोटा सा तबका धनकुबेर है. अब भी भारत में प्रति व्यक्ति आय 2500 डॉलर प्रति वर्ष है जबकि दक्षिण कोरिया में प्रति व्यक्ति आय 35 हज़ार डॉलर है.''
अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''मनमोहन सिंह सिख समुदाय से थे और पहली बार कोई सिख भारत का प्रधानमंत्री बना था. सोनिया गांधी ने 2018 में कहा था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तब बने थे, जब भारत की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में थी. कुछ ही महीनों में मनमोहन सिंह ने साबित कर दिया था कि जो शीर्ष पर बैठा शख़्स है, वह विभाजनकारी नहीं है. किसी भी समूह या व्यक्ति को डरने की ज़रूरत नहीं है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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