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यूपी विधानसभा में योगी आदित्यनाथ का काशी और मथुरा वाले बयान के मायने
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को योगी आदित्यनाथ की ओर से सदन में दिए गए भाषण पर आपत्ति दर्ज कराई है.
उन्होंने कहा है कि संविधान की शपथ लेकर मुख्यमंत्री के पद पर बैठने वाले शख़्स को इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए.
लेकिन सवाल ये उठता है कि योगी आदित्यनाथ ने ऐसा क्या कहा है जिस पर अखिलेश यादव की ओर से ऐसी टिप्पणी आई है.
इसका जवाब योगी आदित्यानाथ की ओर से किए गए उस ट्वीट में मिलता है जिसमें उन्होंने सदन में दिए गए अपने भाषण का एक अंश साझा किया है.
इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है - "हमने तो केवल तीन जगह मांगी..."
इस वीडियो में वह कहते नज़र आ रहे हैं, "ये समाज और यहां की आस्था सैकड़ों वर्षों से केवल तीन के लिए बात कर रही है. तीन के लिए भी इसलिए क्योंकि वे विशिष्ट स्थल हैं. ईश्वर के अवतरण की धरती हैं. उन्हें सामान्य जगहों की तरह नहीं देखा जा सकता."
"लेकिन एक ज़िद है. और उस ज़िद में जब राजनीतिक तड़का पड़ने लगता है. वोटबैंक की राजनीति होने लगती है तो विवाद की स्थिति खड़ी होने लगती है. यानी भारत के अंदर लोकआस्था का अपमान हो. बहुसंख्यक समाज गिड़गिड़ाए. ये पहली बार देखने को मिला. स्वतंत्र भारत में ये काम पहले-पहल होना चाहिए था. 1947 में शुरू होना चाहिए था. उस आस्था के लिए बार बार गुहार लगाता रहा. हमने तो केवल तीन जगह मांगी अन्य जगहों के बारे में कोई मुद्दा नहीं था."
काशी – मथुरा वाला बयान
योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में जिन तीन जगहों का ज़िक्र किया है, वो जगहें अयोध्या, काशी और मथुरा हैं. हिंदू पक्ष दशकों से दावा कर रहा है कि इन तीनों जगहों पर स्थित हिंदू मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिद बनाई गयी.
इनमें से एक जगह यानी अयोध्या में पिछले महीने ही श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम हुआ. इस कार्यक्रम के दौरान ही योगी आदित्यनाथ ने कहा कि "मंदिर वहीं बना है जहां बनाने का संकल्प लिया था" उन्होंने इसी भाषण में इस संकल्प की पूर्णता के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का आभार प्रकट किया.
इसके बाद बुधवार को सदन में भी उन्होंने कहा कि मंदिर वहीं बना है. और इसके साथ ही उन्होंने काशी और मथुरा का भी ज़िक्र किया.
विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की ओर से असेंबली में दिया गया बयान एक भड़काऊ भाषण है. वह लोगों को भड़का रहा है कि आप काशी और मथुरा भी उसी तरह ले लीजिए जिस तरह से अयोध्या लिया गया, यानी ज़बरदस्ती."
प्रशांत भूषण मानते हैं कि ये बयान साल 1991 में पारित हुए उपासना स्थल क़ानून का भी उल्लंघन जैसा है.
वह कहते हैं, "उपासना स्थल क़ानून में स्पष्ट रूप से लिखा है कि अयोध्या के बाद कोई नया विवाद नहीं खड़ा किया जाएगा. किसी अन्य मंदिर या मस्जिद को उसी स्थिति में रखा जाएगा जैसा वह 1947 में था. इस आधार पर आप कोई दावा नहीं कर सकते कि उससे पहले वहाँ क्या था. लेकिन ये सब हो रहा है और ये लोगों को भड़का रहे हैं. और उस तरह के हालात बनाते जा रहे हैं जैसे कि अयोध्या में बनाए गए थे."
हालांकि, भारतीय राजनीति को क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर मानते हैं कि योगी आदित्यनाथ के इस बयान को धमकी के स्वरूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
वह कहते हैं, "पहले तो मैं ये स्पष्ट करना चाहता हूं कि ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि संवैधानिक पद पर बैठा शख़्स ऐसे मुद्दे पर बात नहीं रख सकता. वह अपनी बात रख सकते हैं. लेकिन उनके बयान को मौजूदा समय के संदर्भ में देखे जाने की ज़रूरत है. राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने और उसके बाद हुई प्राण प्रतिष्ठा से पहले अलग-अलग मोर्चों पर एक लंबी लड़ाई लड़ी गयी."
"लेकिन अब जब प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है तो सभी पक्षों के बीच एक सहमति सी बनती दिख रही है कि अब दो अन्य स्थानों के लिए अयोध्या जैसी लंबी लड़ाई की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि एएसआई के सर्वे से लेकर तमाम ऐतिहासिक दस्तावेज़ स्पष्ट रूप से कहानी बयां कर रहे हैं."
"ऐसे में मुझे लगता ये है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की ओर से सदन में जो कहा गया है, उसे इस दिशा में सकारात्मक रूप से चर्चा शुरू करने की ओर से संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए. न कि एक धमकी के रूप में देखा जाना चाहिए, जिस रूप में कुछ लोग इस बयान को देखने की कोशिश कर रहे हैं."
योगी आदित्यनाथ क्या संकेत दे रहे हैं?
लेकिन योगी आदित्यनाथ की ओर से विधानसभा के अंदर 'मंदिर वहीं बनाने' और न्यायालय में विचाराधीन विषयों पर इस तरह टिप्पणी करने के मायने क्या हैं.
इसका जवाब राम जन्मभूमि आंदोलन और इसके इर्द-गिर्द हुई राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी देते हैं.
वह कहते हैं, "ये संभवत: पहला मौक़ा है जब संवैधानिक पद पर बैठे किसी शख़्स ने विधानसभा के अंदर खड़े होकर इस अंदाज़ में काशी और मथुरा वाले जुमले का ज़िक्र किया हो. पहले ऐसे पदों पर बैठे नेता बातचीत और न्यायालय के रास्ते इन विवादों को सुलझाने की बात किया करते थे."
"लेकिन अब जब सत्ता से जुड़ी मजबूरियां उतनी मज़बूत नहीं रहीं जितनी वाजपेयी जी के ज़माने में थीं. अब जब दक्षिण पंथ की ताक़त बढ़ रही है. समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है तो शायद यह अपने असली स्वरूप में सामने आ रहा है. वह पर्दा अब हटता नज़र आ रहा है जो पहले रखा जाता था. ऐसे में खुलकर वो सब कहा जा रहा है, जो साल 1991 में पास हुए उपासना स्थल क़ानून का उल्लंघन है."
वे इसकी राजनीतिक वजहों को भी गिनाते हैं.
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ हिंदू समाज के मुद्दों को लेकर पीएम मोदी से एक क़दम आगे खड़े दिखना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "ये कोशिश शायद ख़ुद उनकी ओर से हो रही हो. या पार्टी की ओर से उन्हें आगे बढ़ने का संकेत दिया जा रहा हो. कहा जा रहा हो कि अब अयोध्या हो गया – आप यूपी के नेता हैं, वहीं के ये दोनों मुद्दे हैं. ऐसे में आप आगे बढ़कर आएं. और इस बारे में बात करें."
योगी ये सब बार-बार क्यों कह रहे हैं?
योगी आदित्यनाथ अयोध्या और विधानसभा से पहले रायबरेली में आयोजित जनसभा और एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू के दौरान भी इस तरह के नारों को दोहरा चुके हैं.
लेकिन योगी आदित्यनाथ की ओर से 'मंदिर वहीं बनाया है...' से लेकर काशी – मथुरा पर बार-बार टिप्पणी करने की वजह क्या है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान मानते हैं कि योगी आदित्यनाथ की ओर से ऐसा करने की वजह अपने आपको आगे रखने की कोशिश है.
वह कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ की ओर से बार-बार ये बातें करने की एक वजह ये है कि वह खुद को आगे रखना चाहते है. वह साल 2019 से वहां दीपोत्सव आदि कार्यक्रम का आयोजन करवा रहे हैं. रह-रहकर वे इसका ज़िक्र भी करते हैं और इस बहाने ये भी कहने की कोशिश करते हैं कि वह बढ़-चढ़कर हिंदू समाज के लिए काम कर रहे हैं."
"अब जब मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ तो उसमें पीएम मोदी की मौजूदगी होने की वजह से वह लाइम लाइट हासिल करने में हमेशा की तरह सफल नहीं हो पाए. ऐसे में विधानसभा में इस मुद्दे का ज़िक्र करके वो ये बताना चाहते हैं कि वह आगे बढ़कर काम कर रहे हैं. और वह उन तमाम मुद्दों को लेकर बेहद गंभीर हैं जिनका हिन्दू समाज से संबंध है."
क्या है काशी मथुरा विवाद
हिन्दू पक्ष की पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश के अयोध्या और मथुरा में राम और कृष्ण का जन्म हुआ था. वहीं, वाराणसी के बारे में मान्यता है कि वहां पौराणिक काल से भगवान शिव का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग मौजूद है जिन्हें भगवान विश्वेश्वर के नाम से जाना जाता है.
मंदिर पक्ष का मानना है कि भगवान विश्वेश्वर का मंदिर अब से तकरीबन 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था. यह मंदिर भारत में मुस्लिम शासकों के शासनकाल के पहले अस्तित्व में था. मंदिर पक्ष के मुताबिक़ यह ज्योतिर्लिंग देश भर में मौजूद 12 ज्योतिर्लिंगों में से सबसे पवित्र माना जाता है.
हिन्दू पक्ष दावा करते हैं कि इन तीनों जगहों पर मौजूद बाबरी, ज्ञानवापी और शाही ईदगाह मस्जिद को मुस्लिम आक्रांताओं की ओर से हिन्दू तीर्थ स्थानों को तोड़कर बनाया गया था.
मुस्लिम पक्ष की ओर से इन दावों का खंडन किया जाता है. इनमें से अयोध्या से जुड़े विवाद का हल सुप्रीम कोर्ट की ओर से निकाला जा चुका है.
वहीं, काशी और मथुरा में मौजूद ज्ञानवापी और शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़े मामले अदालत में लंबित हैं.
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