ज्ञानवापी मस्जिद बनने से पहले यहाँ एक हिन्दू मंदिर था: एएसआई

    • Author, अनंत झणाणें और उत्पल पाठक
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाराणसी से

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे करने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई ने कहा है कि मौजूदा ढाँचे के निर्माण से पहले वहाँ एक हिंदू मंदिर था.

वाराणसी ज़िला अदालत ने पिछले साल जुलाई में एएसआई को मस्जिद परिसर का सर्वे करने का निर्देश दिया था.

अब सार्वजनिक की गई एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि चार महीने के अपने सर्वे में "वैज्ञानिक अध्ययन/सर्वेक्षण, वास्तुशिल्प अवशेषों, विशेषताओं, कलाकृतियों, शिलालेखों, कला और मूर्तियों के अध्ययन के आधार पर यह आसानी से कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना के निर्माण से पहले यहाँ एक हिंदू मंदिर मौजूद था."

मुस्लिम पक्ष का कहना है कि उन्हें भी देर रात एएसआई की रिपोर्ट की कॉपी मिल गई थी और अभी रिपोर्ट वकीलों के पास है.

ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन देखने वाली अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद के जॉइंट सेक्रेटरी एसएम यासीन ने कहा, "यह एक रिपोर्ट है, फ़ैसला नहीं है. रिपोर्ट लगभग 839 पन्नों की है. इसके अध्ययन विश्लेषण में समय लगेगा. एक्सपर्ट्स से राय ली जाएगी. अदालत में विचार के लिए ले जाया जाएगा."

मस्जिद पक्ष का मानना है कि ज्ञानवापी मस्जिद में बादशाह अकबर से लगभग 150 साल पहले से मुसलमान नमाज़ पढ़ते चले आ रहे हैं. एसएम यासीन कहते हैं, "आगे अल्लाह की मर्ज़ी. हमारी ज़िम्मेदारी मस्जिद को आबाद रखने की है. मायूसी हराम है, सब्र से काम लेना होगा. हमारी अपील है कि बहस से बचा जाए."

बीबीसी को 800 से अधिक पन्नों वाली रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों की कॉपी मुक़दमे में मुख्य वादिनी राखी सिंह के वकील अनुपम द्विवेदी से मिली है.

एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक़, ''एक कमरे के अंदर पाए गए अरबी-फारसी में लिखे शिलालेख में इस बात का ज़िक्र है कि मस्जिद का निर्माण औरंगज़ेब के शासनकाल के 20वें वर्ष (1676-77) में किया गया था. इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि पहले से मौजूद संरचना को 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान नष्ट कर दिया गया था और इसके कुछ हिस्से को बदल कर मौजूदा संरचना में इस्तेमाल किया गया था."

फ़िलहाल इस एएसआई सर्वे में ज्ञानवापी मस्जिद में सील किए गए वज़ूखाने का वैज्ञानिक सर्वे नहीं किया गया.

हिंदू पक्ष का दावा है कि वज़ूखाने में शिवलिंग मौजूद है, जिसे मस्जिद पक्ष फव्वारा बताता है.

वादी राखी सिंह के वकील अनुपम द्विवेदी ने इस रिपोर्ट को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, "एएसआई का यह कहना कि परिसर में औरंगज़ेब के मस्जिद बनाने के पहले एक हिन्दू संरचना हुआ करती थी और मंदिर था, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इससे हमारे मुकदमे को बल मिलेगा. यह एविडेंस के नज़रिये से मुकदमों में बहुत अहम रोल अदा करेगा." 

किन-किन चीज़ों का हुआ सर्वे?

  • मौजूदा संरचना में केंद्रीय कक्ष और पहले से मौजूद संरचना के मुख्य प्रवेश द्वार
  • पश्चिमी कक्ष और पश्चिमी दीवार
  • मौजूदा संरचना में पहले से मौजूद संरचना के स्तंभों और भित्ति स्तंभों के फिर से इस्तेमाल पर
  • बरामद हुए पत्थर पर अरबी और फ़ारसी शिलालेख
  • तहखाने में मूर्तिकला अवशेषों का

'ढाँचे का स्वरूप 'हिंदू मंदिर' जैसा'

ज्ञानवापी के मौजूदा ढाँचे के स्वरूप और उसकी समय के बारे में एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया है,"मौजूदा वास्तुशिल्प अवशेष, दीवारों पर सजाए गए सांचे, केंद्रीय कक्ष के कर्ण रथ और प्रति रथ, पश्चिमी कक्ष की पश्चिमी दीवार पर तोरण के साथ एक बड़ा सजाया हुआ प्रवेश द्वार, ललाट बिम्ब पर छवि वाला एक छोटा प्रवेशद्वार, पक्षियों और जानवरों की नक्काशी अंदर और बाहर की सजावट से पता चलता है कि पश्चिमी दीवार किसी हिंदू मंदिर का बचा हुआ हिस्सा है."

''कला और वास्तुकला के आधार पर, इस पूर्व-मौजूदा संरचना को एक हिंदू मंदिर के रूप में पहचाना जा सकता है."

वैज्ञानिक अध्ययन और अवलोकन के बाद यह कहा गया है कि मौजूदा संरचना के निर्माण से पहले, वहाँ एक बड़ा हिंदू मंदिर मौजूद था.

'पत्थर पर दर्ज थी मस्जिद निर्माण की तारीख़'

एएसआई का कहना है कि उसके रिकार्ड्स में यह बात दर्ज है कि एक पत्थर पर एक शिलालेख था जिसमें यह लिखा था कि मस्जिद का निर्माण मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के शासनकाल में (1676-77) में किया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक़ पत्थर पर यह भी लिखा था कि मस्जिद की सहन (आँगन) की मरम्मत भी की गई थी. इस पत्थर की तस्वीर एएसआई के 1965-66 के रिकॉर्ड में मौजूद है.

लेकिन एएसआई का कहना है कि यह पत्थर सर्वे में मस्जिद के एक कमरे से बरामद हुआ लेकिन मस्जिद के निर्माण और उसके विस्तार से जुड़ी जानकारी को खरोंच कर मिटा दिया गया था.

एएसआई का कहना है कि औरंगज़ेब की जीवनी मासीर-ए-आलमगीरी में लिखा है कि औरंगज़ेब ने अपने सभी प्रांतों के गवर्नरों को काफ़िरों के स्कूलों और मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था.

एएसआई के मुताबिक़ इसका ज़िक्र जदुनाथ सरकार की 1947 में मासिर-ए-आलमगीरी के अंग्रेज़ी अनुवाद में भी है.

जदुनाथ सरकार के मासीर-ए-आलमगीरी के अंग्रेज़ी अनुवाद के हवाले से एएसआई अपनी रिपोर्ट में लिखता है, "2 सितंबर 1669 को यह बात दर्ज की गई कि शहंशाह औरंगज़ेब के आदेश के बाद उनके अधिकारियों ने काशी में विश्वनाथ का मंदिर तोड़ दिया.''

ढाँचे में मौजूद शिलालेख

इस बारे में एएसआई की रिपोर्ट कहती हैं कि मस्जिद के ढाँचे में कुल 34 शिलालेख और 32 स्टम्पिंग पाए गए और दर्ज किए गए.

एएसआई कहता है कि यह शिलालेख हिंदू मंदिर के पत्थरों पर पहले से मौजूद थे जिनका मस्जिद के निर्माण और मरम्मत में इस्तेमाल हुआ.

यह शिलालेख देवनागरी, तेलुगू और कन्नड़ भाषाओं में है.

इससे एएसआई इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि पहले से मौजूद संरचनाओं को तोड़ कर उनके हिस्सों का मौजूदा संरचना के निर्माण और मरम्मत में इस्तेमाल हुआ है.

एएसआई ने कहा है कि इन शिलालेखों में उसने तीन भगवान - जनार्दन, रूद्र और उमेश्वरा के नाम भी पाए हैं.

एएसआई ने "महामुक्तिमंडप" के तीन शिलालेखों के पाए जाने को बहुत महत्वपूर्ण बताया है.

तहखानों में क्या मिला?

एएसआई के मुताबिक़, मस्जिद में इबादत के लिए उसके पूर्वी हिस्से में तहखाने बनाए गए और मस्जिद में चबूतरे और ज़्यादा जगह भी बनाई गई ताकि इसमें अधिक से अधिक लोग नमाज़ पढ़ सकें.

एएसआई कहता है कि पूर्वी हिस्से में तहखाने बनाने के लिए मंदिर के स्तंभों का इस्तेमाल किया गया.

एन2 (N2) नाम के एक तहखाने में एक स्तंभ का इस्तेमाल किया हुआ जिस पर घंटियाँ, दीपक रखने की जगह और समवत के शिलालेख मौजूद हैं.

एस -2 ( S2) नाम के तहखाने में मिट्टी के नीचे दबी हुई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियाँ भी बरामद हुईं.

स्तंभ और भित्ति स्तंभ

एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ मस्जिद को बड़ा करने के लिए और उसके सहन (आँगन) को बनाने के लिए पहले से मौजूद मंदिर के खंभों को थोड़ा मॉडिफाई करके बनाया गया था.

एएसआई के मस्जिद के गलियारों के मुताबिक़ खंभों की गहनता से जाँच से यह बात सामने आई है कि वो मूल रूप से पहले से मौजूद हिंदू मंदिर का हिस्सा थे.

इन स्तम्भों को मस्जिद बनाने के लिए इस्तेमाल में लाने के लिए इनमे मौजूद कमल के पदक के बगल में बने व्याला फिगर्स को को हटा कर फूलों का डिज़ाइन बनाया गया.

पश्चिमी कक्ष और पश्चिमी दीवार

एएसआई का कहना है कि मौजूदा संरचना (मस्जिद) की पश्चिमी दीवार का शेष भाग पहले से मौजूद हिंदू मंदिर है.

एएसआई के मुताबिक़ यह पश्चिमी दीवार,"पत्थरों से बनी है और इसे क्षैतिज साँचों से सजाया गया है. यह पश्चिमी दीवार पश्चिमी कक्षों के बचे के हिस्सों, केंद्रीय कक्ष के पश्चिमी प्रोजेक्शन्स और उत्तर और दक्षिण में दो कक्षों की पश्चिमी दीवारों से बनी है. दीवार से जुड़ा केंद्रीय कक्ष अब भी पहले जैसा मौजूद है और बगल के दोनों कक्षों में बदलाव किए गए हैं.''

मंदिर के उत्तर और दक्षिण के प्रवेश द्वारों को सीढ़ियों में तब्दील कर दिया था और उत्तरी हॉल के प्रवेश द्वार में बनी हुई सीढ़ियाँ आज भी इस्तेमाल में हैं.

केंद्रीय कक्ष और मुख्य प्रवेश द्वार

एएसआई की रिपोर्ट कहती है कि मंदिर में एक बड़ा केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल चैम्बर) हुआ करता था और उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में एक-एक कक्ष थे.

एएसआई के मुताबिक़ पूर्व की संरचना (मंदिर) का जो केंद्र कक्ष था, वो अब मौजूदा संरचना (मस्जिद) का केंद्रीय कक्ष है.

एएसआई का मानना है कि मंदिर के केंद्रीय कक्ष का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम से था जिसे पत्थर की चिनाई से ब्लॉक कर दिया गया था. और पत्थर से ब्लॉक किए गए मुख्य प्रवेश द्वार के दूसरी ओर किबला बनाया गया.

चुनौतीपूर्ण था ज्ञानवापी का सर्वे: एएसआई

पिछले साल चार अगस्त को एएसआई ने कड़ी सुरक्षा के बीच में अपना सर्वे शुरू किया.

एएसआई की टीम में एएसआई के प्रोफ़ेसर आलोक त्रिपाठी, डॉ. गौतमी भट्टाचार्य, डॉ. शुभा मजूमदार, डॉ. राज कुमार पटेल, डॉ. अविनाश मोहंती, डॉ. इज़हर आलम हाशमी, डॉ. आफताब हुसैन, डॉ. नीरज कुमार मिश्रा और डॉ. विनय कुमार रॉय जैसे एक्सपर्ट्स शामिल थे.

सर्वे की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने सर्वे के दौरान मीडिया की रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी थी.

अदालत ने ढाँचे को बिना नुक़सान पहुँचाए सर्वे करने के आदेश दिए थे लेकिन मिट्टी और मलबे को देखते हुए सभी पक्षों की सहमति से सभी सावधानी बरतते हुए मलबा हटाया गया.

ज्ञानवापी के चारों तरफ केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों का घेरा है जिसकी वजह से बार-बार मस्जिद से अंदर बाहर जाना मुश्किल होता है.

चार महीने चले इस सर्वे में एएसआई की टीम और मज़दूरों ने गर्मी और उमस भरे मॉनसून के दिनों में लगतार काम किया.

कुछ तहखानों में बिजली नहीं थी और शुरुआती दिनों में टॉर्च और रिफ्लेक्टर की रोशनी से सर्वे किया गया.

तहखानों में काम करते हुए एएसआई की टीम को हवा की कमी भी महसूस हुई और बाद में लाइट और पंखे लगा कर काम किया गया.

बारिश के मौसम में तिरपाल लगा कर खुदे हुए हिस्से को ढँका गया और सर्वे का एक कैंप कार्यालय बनाया गया.

एएसआई की टीम को बंदरों ने भी परेशान किया और वो अक्सर लगे हुए तिरपाल को फाड़ देते थे और सर्वे के एरिया को डिस्टर्ब कर देते थे.

सर्वे का अदालती आदेश

एएसआई सर्वे का आदेश देते हुए वाराणसी के ज़िला जज ने अपने आदेश में लिखा था, "अगर प्लॉट और ढाँचे का सर्वे और वैज्ञानिक जाँच होती है तो उससे अदालत के सामने सही तथ्य आएँगे, जिससे मामले का अदालत में न्यायसंगत और उचित तरीक़े से निपटारा हो सकेगा."

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एएसआई के सारनाथ सर्किल के सुपरिन्टेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट को सेटलमेंट प्लॉट नंबर 9130 (मौजूदा ज्ञानवापी परिसर) के भू-भाग और भवन (मस्जिद की इमारत) का सर्वे करने का आदेश दिया था.

कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि एएसआई ऐसे तरीक़े से सर्वे करेगी, जिससे कोई टूट-फूट न हो. केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया कि सर्वे में न ही खुदाई की जाएगी और ना ढाँचे को तोड़ा जाएगा.

सर्वे की टीम में: आर्कियोलॉजिस्ट, आर्कियोलॉजिकल केमिस्ट, एपीग्राफिस्ट, सर्वेयर, फोटोग्राफर और अन्य टेक्निकल एक्सपर्ट्स को इन्वेस्टिगेशन और डॉक्यूमेंटेशन में लगाया गया. विशेषज्ञों के दल ने जीपीआर (ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार) सर्वे किया.

एएसआई की वैज्ञानिक जाँच का दायरा

एएसआई को सर्वे करके यह बताना था कि मौजूदा ढाँचा क्या किसी पहले से मौजूद मंदिर के ऊपर बनाया गया है.

ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार की उम्र और निर्माण के स्वरूप का पता करने के लिए वैज्ञानिक जाँच करनी थी.

ज़रूरत पड़ने पर एएसआई को पश्चिमी दीवार के नीचे जाँच के लिए ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल करना था.

एएसआई को ज्ञानवापी के तीन गुंबदों के नीचे और ज्ञानवापी के सभी तहखानों की जाँच करनी थी.

एएसआई को अपनी जाँच में बरामद की गई सभी कलाकृतियों की एक सूची बनानी थी और यह भी दर्ज करना था कि कौन सी कलाकृति कहाँ से बरामद हुई और डेटिंग के ज़रिए उन कलाकृतियों की उम्र और स्वरूप जानने की कोशिश करनी थी.

एएसआई को ज्ञानवापी परिसर में मिलने वाले सभी खंभों और चबूतरों की वैज्ञानिक जाँच कर उसकी उम्र, स्वरूप और निर्माण की शैली की पहचान करना था.

डेटिंग, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और अन्य वैज्ञानिक तरीक़ों से ज्ञानवापी के ढांचे के निर्माण की उम्र, और निर्माण के स्वरूप की पहचान करना था.

उसे जाँच में बरामद कलाकृतियों और ढाँचे में और उसके नीचे पाई गई ऐतिहासिक और धार्मिक वस्तुओं की भी जाँच करनी थी.

और यह सुनिश्चित करना था कि ढाँचे को किसी भी तरह का नुक़सान नहीं हो और वो सुरक्षित रहे.

सर्वे के विरोध में मस्जिद पक्ष

मस्जिद पक्ष का मानना था कि सर्वे तभी हो सकता है जब अदालत के समक्ष पेश किए गए लिखित और मौखिक साक्ष्यों से कोर्ट किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा है.

कोर्ट में हिंदू पक्ष ने कहा था कि निर्माण की शैली को देखते हुए उनके पास ढाँचे की आर्टिफिशियल दीवारों के पीछे कुछ वस्तुओं के छिपे होने का कोई सबूत नहीं है.

लेकिन मुस्लिम (मस्जिद) पक्ष का मानना था कि क़ानून एएसआई को हिंदू पक्ष के दावे से जुड़े सबूत इकठ्ठा करने की इजाज़त नहीं देता है.

मस्जिद पक्ष का कहना था कि एएसआई का सर्वे 1991 के उपासना स्थल अधिनियम का उल्लंघन है, जो आज़ादी से पहले मौजूद धार्मिक स्थलों के धार्मिक चरित्र बदलने की इजाज़त नहीं देता है.

मस्जिद पक्ष का ये भी कहना था कि ज्ञानवापी की ज़मीन के स्वामित्व से जुड़े मामले में पहले से ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एएसआई सर्वे पर रोक लगा रखी है. तो फिर किसी अन्य मामले में सर्वे की इजाज़त कैसे दी जा सकती है.

जबकि मंदिर पक्ष (हिंदू पक्ष) मानता था कि एएसआई सर्वे अदालत में इस विवाद का हल तय करने में मदद करेगा.

वो कहते हैं कि दोनों पक्षों यानी हिंदू और मुस्लिम पक्षों को एएसआई के सर्वे के नतीजों को अदालत में विरोध करने और बहस कर चुनौती देने का मौक़ा मिलेगा.

मंदिर पक्ष सर्वे कराने में 1991 उपासना स्थल अधिनियम को बाधक नहीं मानता और दावा करता है कि आज़ादी के पूर्व से और बाद भी वहाँ पर हिंदू पूजा करते आ रहे हैं.

मंदिर पक्ष का मानना है कि एएसआई का काम ऐतिहासिक ढाँचों का संरक्षण और हिफ़ाज़त करना है. लिहाजा सर्वे में ज्ञानवापी को नुक़सान पहुँचाने की मुस्लिम पक्ष की आशंका निराधार है.

अयोध्या की तर्ज़ पर ज्ञानवापी का एएसआई सर्वे जायज़?

इस बारे में मस्जिद पक्ष के वकील एसएफए नक़वी कहते हैं, "पूजा स्थल अधिनियम 1991 कहता है कि 15 अगस्त 1947 को बाबरी मस्जिद मालिकाना हक़ का मुक़दमा लंबित था. पूजा स्थल अधिनियम में ज्ञानवापी या किसी अन्य मामले का उल्लेख नहीं है और अयोध्या भूमि स्वामित्व मामले में अदालत ने पूजा स्थल अधिनियम की वैधता स्थापित की है."

नक़वी कहते हैं, "अयोध्या में एएसआई सर्वे अलग परिस्थितियों में हुआ. अयोध्या में एएसआई सर्वे विध्वंस के बाद हुआ, उससे पहले नहीं. सर्वे 1992 के बाद हुआ था, उससे पहले नहीं.”

इस रिपोर्ट की छपने तक मस्जिद पक्ष से एएसआई की इस सर्वे रिपोर्ट के परिणामों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी.

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