मथुरा मंदिर-मस्जिद विवादः अदालत ने मांगी अमीन रिपोर्ट, मुसलमान पक्ष देगा चुनौती

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह को लेकर चल रहे विवाद में शनिवार को एक नया मोड़ आ गया है.

आठ दिसंबर को एक हिंदू संगठन की तरफ़ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मथुरा की एक स्थानीय अदालत ने संपत्ति की अमीन रिपोर्ट मांगी है.

अदालत ने आठ दिसंबर को ही इस याचिका पर आदेश दिया था जिसकी जानकारी 24 दिसंबर यानी शनिवार को सार्वजनिक हुई.

हिंदू पक्ष दावा कर रहा है कि ये एक तरह से 'मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश है.'

वहीं इस विवाद से जुड़े मुसलिम पक्ष का दावा है कि ये 'एकतरफा आदेश है' जो उनका पक्ष सुने बिना ही पारित किया गया है.

हालांकि मुसलिम पक्ष का दावा है कि आदेश सर्वे का नहीं है बल्कि अदालत ने मौके की अमीन रिपोर्ट (मौके पर क्या-क्या मौजूद है और उसका मालिकाना हक़ किसके पास है) मांगी है.

मथुरा ये कुल 13.77 एकड़ ज़मीन का मामला है. इसके एक हिस्से में ईदगाह बनी है. इससे जुड़े कई मामले अदालत में चल रहे हैं.

20 जनवरी को अगली सुनवाई

मथुरा की सीनियर सिविल जज सोनिका वर्मा ने ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अमीन (राजस्व विभाग के अधिकारी) को मौके का मुआयना करने और 20 जनवरी तक अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश करने के लिए कहा है. अब इस मामले में अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी.

अदालत ने ये आदेश हिंदूवादी संगठन 'हिंदू सेना' की तरफ़ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दी है. हिंदू सेना ने देव बालकृष्ण की तरफ़ से याचिका दायर की है और हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्ता को उनकी तरफ से अधिकृत बताया गया है.

बीबीसी से बात करते हुए विष्णु गुप्ता कहते हैं, "मथुरा विवाद में ये हिंदू पक्ष की पहली जीत है. लंबे समय बाद यहां सर्वे का आदेश हुआ है. हमने अदालत से कहा है कि ये मस्जिद औरंगज़ेब ने मंदिर तोड़कर बनवाई है, इसका सर्वे होना चाहिए."

विष्णु गुप्ता कहते हैं, "हमारा अंतिम लक्ष्य यहां भगवान श्रीकृष्ण का भव्य मंदिर बनाना है. जल्द से जल्द सर्वे हो, कानूनी प्रक्रिया पूरी हो और अवैध मस्जिद को हटाया जाए और भव्य मंदिर बनें, हम इसके लिए प्रयास कर रहे हैं और करते रहेंगे."

मुसलमान पक्ष ने क्या कहा?

इस मामले में मुस्लिम पक्ष का दावा है कि अदालत ने उसे सुने बिना ही एकपक्षीय फ़ैसला दिया है.

मस्जिद-ईदगाह की इंतेजामिया समिति के अधिवक्ता तनवीर अहमद कहते हैं, "मस्जिद-मंदिर को लेकर एक दर्जन से अधिक मुक़दमे हैं, पांच मुक़दमे रद्द हो चुके हैं. अभी तक मथुरा की किसी अदालत ने कोई आदेश नहीं दिया है. एक वादी पक्ष ने आठ दिसंबर को एक नया मुक़दमा दायर किया था. हम उसमें एक पक्ष थे, लेकिन अदालत ने हमें सुने बिना ही एकतरफ़ा आदेश देते हुए कहा है कि मौके की अमीन रिपोर्ट दायर की जाए. ये सर्वे का आदेश नहीं है बल्कि अमीन रिपोर्ट मांगी गई है. इसका मतलब ये है कि मौक़े की स्थिति कोर्ट को बताई जाए की वहां क्या-क्या बना हुआ है."

ये मुक़दमा आठ दिसंबर को दायर हुआ था और उसी दिन आदेश पारित हुआ जिसके बारे में जानकारी 24 दिसंबर को सार्वजनिक हुई.

समझौते को चुनौती

तनवीर अहमद कहते हैं, "अब अदालत बंद हो गई है और दो जनवरी को हम इसे चुनौती देंगे. ये कोई पहला मुक़दमा नहीं है, इसे लेकर कई मुक़दमे पहले भी खारिज हो चुके हैं. अब सवाल ये है कि ये मुक़दमा अलग किस तरह से है कि इस पर आदेश दिया गया. जहां तक स्थिति का सवाल है, सबकुछ शांत है, यथास्थिति है."

1968 में मस्जिद की इंतेजामिया समिति और श्रीकृष्ण सेवा संस्थान के बीच विवाद को लेकर समझौता हुआ था.

हिंदू सेना 1968 के इस समझौतों को भी चुनौती दे रही है. विष्णु गुप्ता कहते हैं, "हमने एक याचिका और दी है कि 1968 के समझौते को रद्द किया जाए, वो समझौता गलत है. श्रीकृष्ण सेवा संस्था के पास ये समझौता करने का अधिकार नहीं था क्योंकि उसके पास मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं है."

तनवीर अहमद कहते हैं कि हिंदू संगठनों का 1968 के समझौतों को रद्द करने का तर्क मान्य नहीं है.

वो कहते हैं, "1968 का समझौता उनके साथ नहीं हुआ है. ये समझौता श्रीकृष्ण सेवासंस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच हुआ है. हम पहले भी ये सवाल उठा चुके हैं कि उस समझौते से उनका कोई मतलब नहीं है."

तनवीर अहमद दावा करते हैं कि बाबरी मस्जिद विवाद में अदालत के फ़ैसले के बाद से ही हिंदू संगठन मस्जिद को लेकर याचिकाएं दायर कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "हम अदालत में पहले ही अपना ये पक्ष रख चुके हैं कि किसी भी मुक़दमे को स्वीकार करने से पहले ये तय किया जाए कि मुक़दमा चलने लायक है या नहीं."

"कई मुक़दमे पहले से चल रहे हैं, उनमें भी अमीन रिपोर्ट और सर्वे कराने की मांग की गई है. अब सवाल ये है कि इस मुक़दमे में ऐसा क्या अलग है कि हमारा पक्ष सुने बिना ही अदालत ने एकतरफ़ा आदेश दे दिया, हम ये सवाल अदालत में उठाएंगे."

तनवीर अहमद कहते हैं, "मस्जिद में अभी पांचों वक्त की नमाज़ जारी है, किसी तरह की पाबंदी ना पहले थी ना अब है. ईदगाह में भी सभी नमाज़ें होती हैं. वादी पक्ष का ये दावा ग़लत है कि 1968 से पहले यहां नमाज़ नही होती थी. यहां जब से मस्जिद है तब से लगातार नमाज़ हो रही है, सदियों से ये सिलसिला चला आ रहा है. यहां कोई विवाद था ही नहीं, बाबरी मस्जिद के फैसले को जब सबने स्वीकार कर लिया, तब बाहरी लोगों ने यहां आकर नया विवाद शुरू करने के लिए मुक़दमे दायर करने शुरू कर दिए. पहले तो ये मुक़दमा स्वीकार ही नहीं होते थे."

क्या कह रहे हैं स्थानीय लोग?

अहमद कहते हैं, "2020 में हरिशंकर जैन ने मुक़दमा दायर किया था, जो स्वीकार नहीं किया गया था. उसके बाद से अलग-अलग हिंदू संगठन यहां विवाद पैदा करने के लिए मुक़दमे दायर कर रहे हैं."

मस्जिद विवाद में सर्वे का आदेश होने की रिपोर्ट आने के बाद मथुरा में गहमागहमी है और पत्रकार यहां पहुंच रहे हैं.

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि इस विवाद का मथुरा के माहौल पर कोई ख़ास असर नहीं होगा

स्थानी कारोबारी मोहम्मद यासीन कहते हैं, "जनता को परेशानी होगी अगर विवाद होगा. यहां धार्मिक स्थल हैं और अभी तक हिंदू-मुसलमानों के बीच भाईचारा रहा है. अगर किसी भी तरह का विवाद होगा तो लोग परेशान होगा. सर्वे की बात हमने अख़बार में पढ़ी है, लेकिन अभी लगता है कि इसका कोई ख़ास असर माहौल पर नहीं पड़ेगा.

व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि कोर्ट का ये आदेश सही नहीं है."

हिंदू कारोबारी राकेश कुमार की राय भी मोहम्मद यासीन जैसी ही है. वो कहते हैं, "मथुरा में हिंदू-मुसलमान मिलकर रहते हैं, आम लोगों पर इसका असर नहीं होगा, लोगों का आपस में कोई विवाद नहीं है. मथुरा में अयोध्या या वाराणासी जैसा माहौल नहीं होगा. अभी भी मथुरा में हालात सामान्य है. जहां तक अदालत का सवाल है, अदालत का आदेश सबके लिए मान्य है, सभी उसका सम्मान करेंगे."

वहीं मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार अनंत स्वरूप बाजपेई कहते है कि यहां अभी कोर्ट ने आदेश दिया है जिसके बाद मुस्लिम समाज इस आदेश पर हाईकोर्ट या अन्य किसी कोर्ट से स्टे ऑर्डर भी ला सकता है.

बाजपेई कहते हैं, "मथुरा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद या वाराणासी की ज्ञानव्यापी मस्जिद जैसा कुछ नही लगता है फिर भी कुछ भी हो सकता है."

वो कहते हैं, "कोर्ट ने पहली ही तारीख पर ये सर्वे का आदेश दिया है जिसके बारे में दूसरे पक्ष को जानकारी तक नही और बिना दूसरे पक्ष के कोर्ट का आदेश हुआ है जिसे बड़ी कार्रवाई नहीं कहा जा सकता है."

बाजपेई कहते हैं, "अदालत की इस कार्रवाई का मथुरा के माहौल पर कोई असर नज़र नहीं आ रहा है. यहां शांति बनी हुई है और शहर के इतिहास को देखकर ये कहा जा सकता है कि यहां शांति बनीं रहेगी."

(इस रिपोर्ट में मथुरा से सुरेश सैनी ने सहयोग किया)

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