आलू की एक नई किस्म जिस पर सूखे का नहीं पड़ेगा असर

    • Author, क्रिस्टीन रो
    • पदनाम, तकनीकी मामलों की रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़

"लेट ब्लाइट" नाम की बीमारी मानव जाति का पुराना दुश्मन है. 1845 में आयरलैंड में आलू की पूरी फसल के नष्ट के होने के पीछे इस फ़सल में होने वाली यही बीमारी थी.

फ़ाइटोप्थोरा इन्फेस्टेन्स नाम के एक फंगस (एक तरह का जीवाणु) से होने वाली ये बीमारी आलू के पौधे को ख़त्म कर देती है. ये आलू के गूदे को ख़राब कर देती है जिससे वो खाने योग्य नहीं रह जाता.

बीते साल दिसंबर में पंजाब के कुछ हस्सों में इस बीमारी ने कहर मचाया था, कुछ इलाकों में इसने आलू की 80 फ़ीसदी फसल को बर्बाद कर दिया था.

ये जीवाणु गर्म मौसम पाकर तेज़ी से फैलता है. बीते वक्त में पेरू में एन्डीज़ के ऊंचाई वाले इलाक़ों में मौसम के गर्म होने के साथ-साथ इस जीवाणु ने वहां आलू की फसल को बुरी तरह तबाह किया है.

पेरू में आलू के उत्पादन पर शोध कर रहे रिसर्च इंस्टिट्यूट इंटरनेशनल पोटैटो सेन्टर (सीआईपी) के वैज्ञानिक आलू की ऐसी किस्में तैयार करने की कोशिश कर रहे थे जो अपने आप लेट ब्लाइट की बीमारी से जूझ सके.

आलू की किस्म 'माटिल्डे'

इसके लिए वैज्ञानिक इस विशेषता की तलाश आलू के कुछ जंगली किस्मों में कर रहे थे, ऐसा किस्में जिनकी खेती नहीं की जाती.

आलू की कुछ जंगली किस्मों में इस बीमारी के प्रति प्रतिरोधक गुण पाने के बाद उन्होंने जंगली किस्म और खेती किए जाने किस्म के बीच क्रॉसब्रीडिंग की और इसके ज़रिए इसकी कुछ अलग-अलग किस्में बनाईं.

अब इन किस्मों की टेस्टिंग के लिए स्थानीय किसानों की मदद ली गई जिन्होंने सीमित तरीके से कई बार इसकी खेती की. इसके बाद किसानों ने ये बताया कि वो किस किस्म की खेती करना और खाना पसंद करेंगे.

वैज्ञानिकों के इस शोध का नतीजा है- माटिल्डे. आलू की एक किस्म जिसे वैज्ञानिकों ने साल 2021 में रिलीज़ किया. इसकी खेती के लिए किसानों को अब अलग से कीटनाशक की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि ये किस्म लेट ब्लाइट बीमारी से प्रभावित नहीं होती.

जर्मनी के बॉन में मौजूद क्रॉप ट्रस्ट में बतौर वरिष्ठ वैज्ञानिक काम कर रहे बेन्जामिन किलियन कहते हैं, "किसी ख़ास बीमारी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना आमतौर पर आसान होता है."

नई किस्मों की टेस्टिंग

क्रॉप ट्रस्ट माटिल्डे आलू की किस्म बनाने की कोशिश में पेरू के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम कर रही थी. इसके अलावा ये संगठन कई अन्य फसल की किस्मों पर भी काम कर रही है.

किसी एक बीमारी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का मामला अमूमन एक जीन से जुड़ा होता है. लेकिन सूखा, ज़मीन में अधिक खारापन होना जैसी मुश्किलों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों को सौ से अधिक जीन्स से जूझना पड़ सकता है.

पौधा सूखे से लड़ सके इसके लिए वैज्ञानिक अलग-अलग तरीके अपनाने के बारे में सोचते हैं, जैसे सूखे की मार से बचने के लिए पौधे में फूल का जल्दी आना, पेड़ की पत्तियों से पानी के वाष्पीकरण को रोकना, लंबी जड़ होना ताकि पेड़ अधिक फैल सके और पानी तक पहुंच सकें.

बेन्जामिन किलियन अंतरराष्ट्रीय रिसर्च सेन्टर्स से लेकर सामुदायिक सीड बैंकों और किसानों के साथ काम करते हैं, जो किसी फसल को लेकर अपनी पसंद के बारे में राय देते हैं और नई किस्मों की टेस्टिंग में मदद करते हैं.

किलियन कहते हैं, "हम अलग-अलग तरह के किसानों की बातें सुनते हैं. कभी-कभी एक ही परिवार में लोगों को फसल की अलग-अलग विशेषता पसंद आती है."

फूड सिस्टम

जहां महिलाएं स्वाद और पोषण में बारे में अधिक चिंतित होती हैं, पुरुष फसल की उपज पर अधिक ध्यान देते हैं. खेती से जुड़ी बातचीत में अक्सर एक बड़ा विषय पैदावार (प्रति यूनिट ज़मीन से मिली फसल की मात्रा) होता है.

किलियन कहते हैं कि हर हाल में पैदावार बढ़ाने की कोशिशों के कारण फूड सिस्टम अधिक नीरस होता जा रहा है. इसमें अधिक पैदावार वाली फसलों की किस्मों की संख्या अधिक हो गई है.

वो कहते हैं, "बेहतर परिस्थितियों में और बेहतर लागत के साथ अच्छी पैदावार हासिल की सकती है लेकिन फिर इसमें पूरी की पूरी फसल को खो देने का भी जोखिम होता है. अधिकांश किसानों के लिए ये ज़रूरी है कि वो स्थिर और भरोसेमंद पैदावार वाली फसलें उगाएं जो हर तरह के माहौल में उग सकें."

किलियन कहते हैं कि वो जिस प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं, उसमें उन्होंने ग्रास पी की एक नई किस्म बनाई है जो जलभराव और सूखे जैसी मुश्किल परिस्थिति में भी जीवित रह सकती है.

किलियन समझाते हैं कि ग्रास पी में एक तरह का एसिड होता है जिसका अधिक मात्रा में सेवन इंसानों में बीमारी पैदा कर सकता है. इसी तरह एक और पौधा अज़ोला (वाटर फर्न) बिना पानी के तेज़ी से बढ़ता है. लेकिन इस तरह के पौधों की क्षमता की तरफ से लोगों का ध्यान हट गया है.

जलवायु परिवर्तन

पारंपरिक फसलों को उगाने में अधिक वक्त लग सकता है और अधिक मेहनत भी लग सकती है.

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में इंस्टिट्यूट फ़ॉर जीनोमिक इनोवेशन (आईजीआई) के कार्यकारी निदेशक ब्रैड रिंगिसन कहते हैं कि ऐसे में अच्छी किस्मों के लिए जीन एडिटिंग एक कारगर तरीका हो सकता है.

वो कहते हैं, "बड़ी संख्या में बीमारियां उभर रही हैं और जलवायु परिवर्तन से भी कोई ख़ास मदद नहीं मिल पा रही है."

वो कहते हैं कि फसलें बीमारियों से लड़ सकें इसके लिए पौधों पर अधिक कीटनाशक छिड़कने की तुलना में जीन एडिटिंग एक बेहतर तरीका है.

पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के अलावा आईजीआई ने सूखे के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पर भी काम कर रही है.

जीन एडिटिंग से बनाई गई धान की कुछ किस्मों की टेस्टिंग कोलंबिया में चल रही है. इन किस्मों में पत्तों में छिद्रों की संख्या कम की गई थी ताकि अधिक से अधिक पानी पौधे मे रहे.

जीन एडिटिंग के बनने वाली किस्मों के कोई प्रतिकूल प्रभाव न हों इसके लिए इनकी टेस्टिंग बेहद ज़रूरी होती है.

जीन एडिटिंग

आईजीआई धान की ऐसी किस्में तैयार करने की कोशिश में है जो अधिक पानी होने या कम पानी होने से प्रभावित न हो. फ़िलिपींस में संगठन ने धान की एक ऐसी किस्म बनाई है जो कई सप्ताह तक पानी में डूबे रहने पर भी ख़राब नहीं होती.

लेकिन यूरोपीय संघ में जीन एडिटिंग पर काफी प्रतिबंध लगाए गए हैं जो इस तरह से पैदा की गई किस्मों के विस्तार के लिए बड़ी चुनौती है. हालांकि इंग्लैंड और कीनिया जैसे देशों ने अब जीन एडिटिंग को वैध करार दिया है.

जीन एडिटिंग तेज़ी से अपने पैर फैला रही है. लेकिन अमेरिका के मैसाचुसेट्स की एक कंपनी इस तकनीक को और आगे ले जाना चाहती है. ये कंपनी है इनारी.

इस कंपनी की कोशिश है कि एक वक्त में एक जीन नहीं, बल्कि कई जीन्स की एडिटिंग की जा सकती है. इससे जलवायु परिवर्तन जैसी मुश्किलों से निपटने में मदद मिलेगी क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण एक वक्त में फसल पर एक से अधिक तनाव पड़ सकता है.

ये कंपनी फिलहाल मक्का, सोयबीन और गेंहू की फसलों को लेकर शोध कर रही है.

बीज प्रबंधन

हालांकि इस तरह के जेनेटिकली एडिटेड फसलों की किस्मों में एक समस्या किसानों की भी है. कुछ लोगों को चिंता है कि इसके लिए क़ानूनी बदलाव किए जाने पर वो बीज रख नहीं सकेंगे और उन्हें बीजों के लिए बाज़ार पर निर्भर करना पड़ेगा.

अफ्रीकन सेंटर फ़ॉर बायोडायवर्सिटी जैसे संगठनों की मांग है कि बीज प्रबंधन कंपनियों के हाथों की बजाय किसानों के हाथों में रहे क्योंकि कंपनियां तकनीक के बहाने बीजों को पेटेन्ट करा सकती हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले वक्त में कई लोगों को अपने खाने के तरीकों में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. कोको और केले जैसी फसलें पहले से ही जलवायु परिवर्तन के दबाव के प्रति संवेदनशील साबित हो रही हैं.

ऐसे में अलग-अलग तरह के फसलों और फसलों की अलग-अलग किस्मों का फायदाल उठाने से मदद मिल सकती है.

बेन्जामिन किलियन कहते हैं, "मुझे लगता है कि हम सभी को फसलों की विविधता को महत्व देना चाहिए. हम केवल कुछ महत्वपूर्ण फसलों पर निर्भर नहीं रह सकते."

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