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भारत के चावल निर्यात पर पाबंदी से नेपाल में भारी परेशानी
- Author, संजय ढकाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ नेपाली
20 जुलाई को भारत ने ग़ैर बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की और इसके तुरंत बाद ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी क़ीमतों में 15 फ़ीसदी के उछाल की चर्चा होने लगी.
इसका असर नेपाल में भी खुदरा दुकानों पर दिखना शुरू हो गया है.
किराना दुकानदार रामशरण श्रेष्ठ ने बताया कि 25 किलो के पैकेट की क़ीमत 300 रुपए से ज़्यादा हो गई है.
रीटेल ट्रेड एसोसिएशन के सचिव राजू मास्के के मुताबिक़, जैसे ही भारत ने प्रतिबंध का एलान किया, थोक विक्रेताओं ने भी क़ीमतें बढ़ा दीं.
उन्होंने कहा, ''डेढ़ हफ़्ते पहले तक स्टिम जिरामसिनो चावल 1,900 रुपये प्रति बोरी से बढ़कर 2,000 रुपये और 2,100 रुपये प्रति बोरी हो गया है.''
हालांकि उत्पादकों ने कहा है कि उन्होंने चावल की क़ीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है.
नेपाल चावल, दाल, तेल उत्पादक संघ के महासचिव दीपक कुमार पौडेल ने कहा, ''हमने क़ीमत नहीं बढ़ाई है. असल में तीन महीने तक का स्टॉक अभी है.''
उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्री रमेश रिजाल के मुताबिक़, बाज़ार में चावल की क़ीमत बढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है.
मंत्री रिजाल ने बीबीसी को बताया, ''सरकार बाज़ार में क़ीमतें बढ़ने की अफ़वाहों पर नज़र बनाए हुए है. ये सिर्फ़ अफ़वाहें हैं. सरकार क़ीमतें नहीं बढ़ने देगी.”
साथ ही उन्होंने कहा कि ‘सप्लाई बाधित होने की स्थिति में सरकार पूरी कोशिश करेगी कि क़ीमतें न बढ़ने पाएं.’ इस संबंध में वो भारत से बातचीत करने के लिए तैयार हैं.
उन्होंने कहा, ''हमने भारत के साथ बातचीत शुरू कर दी है. जो लोग पहले ही मांग कर चुके हैं, उनके मामले में उन्होंने कुछ रियायतें भी दी हैं. अतीत में, उन्होंने हमारे अनुरोध को स्वीकार किया है.”
उनके मुताबिक़, “हम आकलन करेंगे कि कितना आयात करने की ज़रूरत है और फिर हम भारत से बात करेंगे. वे हमें देने के लिए तैयार हैं. यह एक कठिन बातचीत रही है."
नेपाल में कितना होता है चावल?
कृषि विभाग के उप महानिदेशक और विभाग के प्रवक्ता जानुका पंडित ने कहा कि नेपाल का वार्षिक धान उत्पादन 55 लाख मीट्रिक टन है.
उन्होंने कहा, "उसके अलावा 6 से 7 लाख मीट्रिक टन आयात किया जाता है."
जानुका के मुताबिक, "हमारे देश में पैदा होने वाले मोटे चावल को न खाने और बारीक और सफेद चावल की खपत के कारण इसका बहुत अधिक आयात हो रहा है."
नेपाल चावल, दाल और तेल उत्पादक संघ के अनुसार, "भारत से सालाना लगभग 15 लाख मीट्रिक टन धान या 10 लाख मीट्रिक टन धान और 2.5 लाख मीट्रिक टन चावल आयात करने की ज़रूरत है."
संघ के महासचिव दीपक कुमार पौडेल ने कहा, "चावल लाने के बाद, उनमें से कुछ का उपयोग टूटे हुए चावल, भूसी आदि के उत्पादन में भी किया जाता है."
नेपाल राष्ट्र बैंक के आँकडो के अनुसार, जून में समाप्त वित्तीय वर्ष के 11 महीनों में लगभग 33 अरब रुपये मूल्य के धान और चावल का आयात किया गया था.
जानुका पंडित का कहना है कि ये स्पष्ट नहीं है कि जो चावल आयात किया जाता है, उसका कुछ और इस्तेमाल किया जाता है या नहीं.
मौजूदा समय में देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 24% यानी लगभग एक चौथाई है और घरेलू कृषि उत्पादन में चावल का योगदान 15% है.
यानी देश की अर्थव्यवस्था में चावल उत्पादन की बड़ी हिस्सेदारी है और खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी ये सबसे अहम है.
पिछले साल नेपाल में 14 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान लगाया गया था और उत्पादन करीब 55 लाख मीट्रिक टन हुआ था.
नेपाल में घरेलू चावल उत्पादन पर संकट
भारत के चावल निर्यात पर प्रतिबंध के फ़ैसले के अलावा बारिश की कमी के चलते चावल उत्पादन को लेकर काफ़ी चिंता है.
ऐसी ख़बरें हैं कि तराई क्षेत्र में पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण समय पर धान की रोपाई नहीं हो सकी, वहीं दूसरी ओर लम्पी स्किन रोग के कारण किसानों के लगभग 50,000 मवेशियों की मौत हो गई है.
जबसे ये बीमारी फैली है, तबसे 10 लाख से ज़्यादा मवेशी संक्रमित हो चुके हैं.
नतीजन कई किसानों को धान रोपाई में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
ख़बरें हैं कि जुलाई के मध्य तक एक तिहाई खेतों में धान की रोपाई नहीं हो पाई है.
अगर बरसात की बची अवधि में भी पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका सीधा असर चावल के उत्पादन पर पड़ेगा.
कारोबारी और सरकारी अधिकारी इस बात पर एकमत हैं कि भारत के ताजा फ़ैसले का नेपाल पर असर होना तय है.
जानुका पंडित का कहना है, “ये असर कितना और कैसा होगा, इसका कोई निश्चित विश्लेषण नहीं है.''
भारत दुनिया में अग्रणी चावल निर्यातक देशों में से एक है. वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है.
पिछले साल भारत ने 140 देशों को 25 लाख टन चावल निर्यात किया था.
इस साल भारत में भी खाद्यान्नों की क़ीमत में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इस पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार ने बासमती को छोड़कर चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है.
साथ ही यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध के कारण यूक्रेन के खाद्य निर्यात पर भी काफ़ी असर पड़ा है.
इन्हीं कारणों से दुनिया भर में खाद्य क़ीमतें बढ़ती जा रही हैं.
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