सीएए के तहत क्या किसी ने नागरिकता के लिए आवेदन किया है? मोदी सरकार का जवाब और बीजेपी की रणनीति

    • Author, अमिताभ भट्टसाली
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला, कोलकाता

केंद्र सरकार ने कहा है कि उसके पास इसकी कोई जानकारी नहीं है कि देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के तहत कितने लोगों ने नागरिकता के लिए आवेदन किया है.

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यही जानकारी दी है.

यही वजह है कि नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ मुखर रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी ने इस क़ानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया भी है?

उनका कहना है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में खुद स्वीकार किया है कि संशोधित नागरिकता क़ानून के मुताबिक़ कर्मचारियों की नियुक्ति समेत जो आधारभूत ढांचा तैयार करने की बात कही गई है, वह अब तक नहीं हो सका है.

कुछ दिन पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने एक ट्वीट के जरिए दावा किया था कि बराक घाटी से एक व्यक्ति ने इस कानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है. लेकिन उन्होंने उस व्यक्ति का परिचय सार्वजनिक नहीं किया था. बराक घाटी के पत्रकार भी आज तक उस व्यक्ति की तलाश नहीं कर सके हैं.

मौजूदा परिस्थिति में भाजपा के एक गुट का मानना है कि चुनाव से पहले नागरिकता क़ानून लागू करने के जरिए जिस राजनीतिक फायदे की उम्मीद की जा रही थी, वह शायद नहीं मिलेगा.

अब तक यह पता नहीं चल सका है कि पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से यहां आने वाले शरणार्थियों या मतुआ समुदाय के लोगों में से किसी ने सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है या नहीं.

आवेदकों की संख्या?

सूचना के अधिकार क़ानून (आरटीआई) के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय के फॉरेनर्स डिवीजन के अधीन काम करने वाले नागरिकता विभाग के पास इस बारे में कई पत्र और ईमेल भेजे गए थे. उनमें पूछा गया था कि नागरिकता संशोधन क़ानून लागू होने के बाद अब तक कितने लोगों ने इसके तहत ऑनलाइन आवेदन किया है.

बांग्ला पोखो(बांग्ला पक्ष) नामक एक सामाजिक संगठन की ओर से मोहम्मद शाहीन ने आरटीआई के तहत याचिका दायर की थी. उनके अलावा समाज और क़ानून के क्षेत्र में रिसर्च करने वाले विश्वनाथ गोस्वामी ने भी ऐसी ही याचिका दायर की थी.

नागरिकता विभाग ने इन दोनों को एक ही जवाब दिया है. उस विभाग के निदेशक आरडी मीना ने कहा है कि उनके कार्यालय के पास ऐसी जानकारी नहीं रहती.

शाहीन को भेजे जवाब में कहा गया है कि देश में लागू नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत कितने लोगों ने आवेदन किया है, इसका आंकड़ा रखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है.

इन दोनों सामाजिक कार्यकर्ताओं से कहा है कि अगर वो मुख्य सूचना अधिकारी की ओर से दिए गए इस जवाब से संतुष्ट नहीं हों तो गृह मंत्रालय के 'विदेशी' विभाग के संयुक्त सचिव के पास आवेदन कर सकते हैं.

'किसी ने आवेदन नहीं किया है, जानकारी कहां से दें?'

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल से शायद किसी ने नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन ही नहीं दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार के पास इसकी जानकारी कहां से होगी?

मोहम्मद शाहीन ने जिस संगठन की ओर से आरटीआई के तहत याचिका दायर की थी उस बांग्ला पोखो के प्रमुख प्रोफेसर गर्ग चटर्जी ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "यह कैसे संभव है कि केंद्र सरकार के पास इसकी कोई जानकारी नहीं हो कि ऑनलाइन कितने आवेदन जमा हुए हैं?"

"हमारी याचिका का मक़सद यह पता लगाना था कि अब तक कितने लोगों ने नागरिकता के लिए ऑनलाइन आवेदन किया है. इसी वजह से कई याचिकाएं दायर की गई थी. लेकिन इसका जवाब क्या मिला? यह कि हम इसका रिकॉर्ड नहीं रखते."

उन्होंने कहा, "डिजिटल ऐप बनाने के बावजूद उनके पास रिकॉर्ड नहीं है. उन लोगों को यह भी नहीं पता कि आवेदन जमा हुए हैं या नहीं. हालांकि जवाब में यह नहीं कहा गया है कि हमें ऐसी सूचना मांगने या जानने का कोई अधिकार नहीं है."

मतुआ समुदाय के एक गुट के नेता और लेखक-सामाजिक कार्यकर्ता सुकृति रंजन विश्वास कहते हैं, "केंद्र सरकार जानकारी तो तभी दे सकती है जब किसी ने इस कानून के तहत आवेदन किया हो. मेरी जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल से अब तक एक भी आवेदन जमा नहीं हुआ है. इसलिए उनके पास कोई जानकारी नहीं है. तो जवाब कहां से देंगे?"

'आधारभूत ढांचा ही तैयार नहीं'

सुकृति विश्वास बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत अगर कोई नागरिकता के लिए आवेदन करता है तो उसकी जांच के बाद फैसला लेने के लिए एक आधारभूत ढांचा होना जरूरी है. इसके तहत कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी है. लेकिन सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि वह अब तक यह काम पूरा नहीं कर सकी है."

चटर्जी और विश्वास दोनों का कहना है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फायदे के लिए इस क़ानून को लागू कर दिया था. लेकिन यह सबको पता है कि बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल आने वाले किसी शरणार्थी या मतुआ समुदाय के किसी व्यक्ति को इस क़ानून के जरिए नागरिकता नहीं मिलेगी.

हालांकि इस क़ानून के लागू होने के बाद भाजपा समर्थक समझे जाने वाले मतुआ गुट ने खुशियां मनाई थी. उस गुट के प्रमुख और भाजपा के निवर्तमान सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर भी इसके लागू होने से बेहद उत्साहित थे.

बीबीसी ने ऐसे कई लोगों से बात की है जो बांग्लादेश से आकर पश्चिम बंगाल में बस गए हैं. उनमें से भी कोई व्यक्ति फिलहाल इस क़ानून के तहत नागरिकता हासिल करने के बारे में नहीं सोच रहा है.

इनमें से एक भाजपा समर्थक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "मैं नए सिरे से नागरिकता पाने के लिए आवेदन क्यों करूंगा? मेरे पास तो पहचान पत्र समेत तमाम दस्तावेज़ मौजूद हैं."

शरणार्थी और मतुआ नेताओं के अनुमान के मुताबिक, बांग्लादेश से यहां आने वाले करीब दो करोड़ लोगों के पास अब भी भारतीय नागरिकता नहीं है.

हालांकि वो यह बात भी मानते हैं कि क़ानूनी तौर पर नागरिकता से संबंधित कोई दस्तावेज़ नहीं होने के बावजूद इन सब ने किसी न किसी तरीके से वोटर कार्ड, राशन कार्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज़ों का इंतजाम कर लिया है. इसी वजह से ऐसे लोगों में नए सिरे से नागरिकता के लिए आवेदन करने का कोई उत्साह नहीं है.

'इस कानून के तहत नागरिकता मिलना संभव ही नहीं है'

सुकृति रंजन विश्वास कहते हैं, "हम शरणार्थी और मतुआ समुदाय को यही बात बार-बार समझा रहे हैं कि इस क़ानून के तहत नागरिकता हासिल करना संभव ही नहीं है. इसके तहत आवेदन करने के लिए जिन कागज़ात की ज़रूरत है, उनका इंतज़ाम करना किसी के लिए भी संभव नहीं है."

"इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर आप नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं तो आप पहले ही मान लेते हैं कि आप भारतीय नागरिक नहीं हैं, बांग्लादेश से आकर यहां बसे हैं. लेकिन इनमें से लगभग सबके पास आधार कार्ड और वोटर कार्ड हैं. कई लोग सरकारी नौकरी भी कर रहे हैं."

विश्वास का कहना था, "अगर नागरिकता के लिए आवेदन करने वाले लोगों ने खुद स्वीकार कर लिया कि वो भारतीय नागरिक नहीं हैं तो इसका मतलब यह होगा कि उनके पास जितनी तरह के पहचान पत्र और कार्ड हैं, वह सब रद्द हो जाएंगे. उसके बाद भी उनका आवेदन स्वीकार होगा और उनको भारतीय नागरिकता मिलेगी ही, इस बात की क्या गारंटी है?"

क्या चुनावी फायदे के लिए लागू हुआ क़ानून?

राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे थे कि लोकसभा चुनाव के एलान से ठीक पहले नागरिकता संशोधन क़ानून लागू करने से पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा को राजनीतिक फायदा होगा.

असम के पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी मानते हैं कि भाजपा के चुनावी समीकरणों के लिहाज से नागरिकता क़ानून या सीएए लागू करने का यही उचित समय है.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "अबकी बार चार सौ पार के नारे से मैदान में उतरी भाजपा, दक्षिण भारत से ओडिशा के बीजू जनता दल तक तमाम राजनीतिक दलों को अपने गठबंधन में शामिल करने का प्रयास कर रही थी. इससे साफ है कि भाजपा एक भी सीट हाथ से नहीं निकलने देना चाहती. यही वजह है कि सीएए के जरिए बंगाल के मतुआ समुदाय और असम के हिंदू बंगालियों के वोटों को एकजुट रखने का प्रयास किया गया है."

यह ध्यान में रखना होगा कि एनआरसी में लाखों हिंदू बंगालियों के नाम कट गए हैं.

गोस्वामी का कहना था, "एनआरसी से जिनके नाम कट गए थे उनको फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे लोग भाजपा से नाराज थे. अब चुनाव में सीएए के जरिए इन सबको नागरिकता देने की बात कही जा रही है."

पश्चिम बंगाल में तमाम दलों के लिए मतुआ वोटरों का समर्थन एक अहम मुद्दा है. इस तबके के लोग लोकसभा की दो और विधानसभा की करीब 30 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं. उसके अलावा कई अन्य इलाकों में भी उनकी खासी आबादी रहती है.

क्या भाजपा का कोई फायदा होगा?

भाजपा में अब इस बात पर चिंता बढ़ रही है कि चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल और असम में संशोधित नागरिकता कानून लागू करने के जरिए वोटरों को अपने पाले में खींचने की जो रणनीति बनाई गई थी, उसे अब कहां तक हकीकत में बदला जा सकेगा.

पश्चिम बंगाल भाजपा के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी बांगला से कहते हैं, "हमने सोचा था कि सीएए लागू होने पर हमें इसका चुनावी फायदा मिलेगा. लेकिन इसके तहत लोग आवेदन ही नहीं कर रहे हैं. ऐसे में हमें चुनाव में इसका फायदा कैसे मिलेगा? दरअसल, नागरिकता क़ानून के तहत आवेदन में जिन शर्तों को पूरा करने की बात कही गई है और जो प्रमाण मांगे गए हैं, वह ज़्यादातर लोगों के गले के नीचे नहीं उतर रही है."

निजी बातचीत के दौरान ऐसी आशंका जताने के बावजूद भाजपा के तमाम नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक बार-बार अपने बंगाल दौरे में नागरिकता संशोधन कानून लागू करने का श्रेय ले रहे हैं. उनका दावा है कि इससे मतुआ और शरणार्थी लोगों को नागरिकता देने का रास्ता खुल गया है.

लेकिन इस सवाल का कहीं कोई जवाब नहीं मिल रहा है कि अगर सचमुच ऐसा है तो लोग इस क़ानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन क्यों नहीं कर रहे हैं?

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