असम: सीएए विरोधी आंदोलन से आए दल क्या बीजेपी को रोक पाएंगे?

    • Author, सचिन गोगोई
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता (शिवसागर, असम से)

असम में होने वाले विधानसभा चुनावों की एक ख़ास बात यह है कि इसमें ऐसी दो नई पार्टियाँ मैदान में हैं, जो विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून( सीएए) के विरोध में हुए जन आंदोलन से पैदा हुईं हैं.

सीएए असम में बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है, जहाँ पड़ोसी देश बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों का आना वर्षों से एक अहम राजनीतिक मुद्दा रहा है.

असम जातीय परिषद (एजेपी) और रायजोर दल (आरडी) नाम की यह दो नई पार्टियां सिर्फ़ राजनीतिक दल के तौर पर ही नईं हैं, लेकिन राज्य के राजनीतिक माहौल में यह बहुत पहले से सक्रिय रहीं हैं.

एजेपी प्रभावशाली छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) से निकल कर आई है. इसी आसू ने 1985 में असम गण परिषद (एजीपी) को जन्म दिया था. एजीपी अब तक असम में दो बार सरकार बना चुकी है, लेकिन अब उसकी हैसियत बीजेपी की एक जूनियर पार्टनर की रह गई है.

आसू नेतृत्व ने जब यह फ़ैसला किया कि सीएए के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को वो चुनावी राजनीति में ले जाना चाहते हैं, तब उन्होंने एजेपी के नाम से एक दूसरी पार्टी बना दी.

वर्ष 2019-20 में असम राज्य में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों में आसू सबसे आगे थी.

उस समय सीएए का विरोध करने वाले पाँच प्रदर्शनकारियों की पुलिस के हाथों मौत हो गई थी, जिसका राज्यव्यापी असर हुआ था.

नौजवान छात्र नेता लूरिनज्योति गोगोई इस समय असम जातीय परिषद यानी एजेपी का नेतृत्व कर रहे हैं. लूरिनज्योति गोगोई शानदार भाषण देने के लिए जाने जाते हैं.

वे अपने भाषणों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के क़द्दावर नेता हिमंत बिस्व सरमा समेत प्रमुख नेताओं पर निशाना साध रहे हैं,

आरडी का जन्म भी किसानों के संगठन कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) से हुआ है और इस कारण राज्य के किसानों में इसकी अच्छी पकड़ है.

केएमएसएस भूमि सुधारों और किसानों को उनकी पैदावार की सही क़ीमत दिलाने को लेकर अपनी आवाज़ उठाता रहा है. सरकारी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी यह संगठन आंदोलन करता रहा है.

केएमएसएस के प्रमुख अखिल गोगोई दिसंबर 2019 से जेल में बंद हैं. उन पर चरमपंथ फैलाने का आरोप है. अखिल गोगोई जेल से ही चुनाव लड़ेंगे.

गोगोई के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था, इसीलिए सरकार बार-बार उन्हें गिरफ़्तार करके जेल में रखती है, लेकिन सरकार के पास उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है.

पूर्वी असम के शिवसागर सीट से गोगोई चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी माता 80 वर्षीय प्रियदा गोगोई अपने बेटे के लिए चुनाव प्रचार कर रही हैं.

इनका पुराना संगठन वोट दिला सकेगा?

एजेपी और आरडी दोनों ही दावा करते हैं कि उनका मौजूदा संगठन उन्हें चुनावी सफलता दिलाएगा.

लूरिनज्योति गोगोई ने बीबीसी से कहा, "सीएए के ख़िलाफ़ हमारे स्टैंड और नौजवान, शिक्षा और रोज़गार पर केंद्रित हमारे प्रचार का असम के लोगों पर असर हो रहा है. हमलोग राज्य के समग्र विकास की योजना बना रहे हैं, जहाँ नौजवानों पर ख़ास ध्यान दिया जाएगा. हमलोग असम के युवाओं को यूनिवर्सल बेसिक इनकम का वादा कर रहे हैं, जिसके तहत पढ़े-लिखे बेरोज़गार नौजवानों को पाँच से 10 हज़ार का मासिक भत्ता दिया जाएगा."

आरडी के भास्को डे सैकिया पार्टी की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं, क्योंकि पार्टी के प्रमुख अखिल गोगोई इस समय जेल में हैं.

सैकिया का कहना है कि उनके मूल संगठन केएमएसएस के 12 लाख कार्यकर्ताओं का फ़ायदा उन्हें ज़रूर मिलेगा.

सैकिया ने बीबीसी से कहा, "असम की जनता इस बात को समझती है कि बीजेपी की सरकार ने अखिल गोगोई के साथ ग़लत किया है. सालों से उन्हें जेल में रखा जा रहा है. केएमएसएस के सदस्य और असम के लोग अखिल गोगोई और हमारी पार्टी का चुनाव में समर्थन करेंगे."

लेकिन बीजेपी का कहना है कि सीएए का चुनाव पर कोई असर नहीं होगा और इसीलिए उन्हें सीएए के विरोध से निकली पार्टियों से कोई डर नहीं है.

बीजेपी की असम चुनाव प्रबंधन समिति कमेटी के सह-संयोजक पबित्रा मार्ग्रेहेरिता ने कहा, "राज्य में क़रीब 30 हज़ार पोलिंग बूथ हैं. बीजेपी जैसी पार्टी को भी बूथ-लेवल पर अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने में दशको लगे. एजेपी और आरडी के नेता सम्मान समारोह और मीडिया से बातचीत में व्यस्त रहे हैं. उन्होंने बूथ-लेवल पर अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए कोई काम नहीं किया है. उनके पास बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियों से मुक़ाबला करने के लिए सांगठनिक ताक़त नहीं है."

चुनाव से क्या हासिल करना चाहती हैं ये पार्टियाँ?

असम एक ऐसा राज्या है, जहाँ 1985 के चुनाव में विदेशियों के ख़िलाफ़ आंदोलन ने छात्र नेताओं को उनके हॉस्टल से सीधे सरकारी बंगलों में पहुँचा दिया था.

लेकिन एजेपी और आरडी दोनों ही इस बात को जानते हैं कि इस चुनाव में ऐसी कोई संभावना नहीं है.

लूरिनज्योति गोगोई ने कहा, "आज का सियासी माहौल 1985 के जैसा भले ही नहीं है. लेकिन हमलोग सरकार बनाने की पूरी उम्मीदर कर रहे हैं और कम से कम इस स्थिति में ज़रूर होंगे कि हम इस बात का फ़ैसला करेंगे कि सरकार कौन बनाएगा."

आरडी के नेता ज़्यादा संभल कर बात करते हैं. वो सीमित सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं और उनका एक ही मक़सद है कि किसी तरह बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोका जाए.

भास्को डे सैकिया कहते हैं, "हमारा उद्देश्य बीजेपी को राज्य में सांप्रदायिक राजनीति को मज़बूती देने से रोकना है. हमलोग राज्य की 126 सीटों में से केवल 38 पर चुनाव लड़ रहे हैं. एजेपी के साथ मिलकर हम इतनी सीटें लाने की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे कि बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोका जा सके."

क्या उनकी राह आसान होगी?

एजेपी और आरडी भले ही सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन से निकल कर आईं हों, लेकिन सिर्फ़ नागरिकता क़ानून का विरोध करके उनके लिए बीजेपी या कांग्रेस को हराना आसान नहीं होगा.

कांग्रेस गठबंधन में आंचलिक गण मोर्चा, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई-माले और राष्ट्रीय जनता दल शामिल हैं.

एजेपी और आरडी के कांग्रेस गठबंधन में शामिल नहीं होने से सीएए विरोधी राजनीतिक पार्टियों को नुक़सान हो सकता है. सीएए विरोधी वोटों में बँटवारे से बीजेपी को लाभ हो सकता है.

बीजेपी के मार्ग्रहेरिता ने कहा, "गणित बिल्कुल साफ़ है. हमारे वोटरों में कोई बदलाव नहीं आया है. दो विपक्षी गुट हैं, जो एक दूसरे के वोट काटेंगे."

कई लोगों का मानना है कि सीएए के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन उस जोश को बरक़रार रखने में असफल रहे थे और इसका नतीजा यह हुआ कि चुनाव में वो लोग कोई ख़ास असर डालने में नाकाम होंगे.

गुवाहाटी स्थित पत्रकार बिदयुत बरुण सर्मा ने बीबीसी से कहा, "अगर सीएए के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों के समय चुनाव हुए होते तब बीजेपी को काफ़ी नुक़सान होता. लेकिन अब कहानी अलग है. बीजेपी ने कई लुभावनी योजनाओं के ज़रिए और लोगों तक पहुँच कर अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन को दोबारा हासिल कर लिया है. इसलिए सिर्फ़ सीएए का विरोध करके बीजेपी को हराना आसान नहीं होगा."

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