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समान नागरिक संहिता विधेयक पारित होने पर क्या कह रहे हैं उत्तराखंड के कुछ मुसलमान
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया है. इसके साथ ही समान नागरिक संहिता विधेयक पास करने वाला उत्तराखंड भारत का पहला राज्य बन गया है.
छह फरवरी की सुबह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा के पटल पर ये विधेयक रखा था. विपक्षी विधायकों को विधेयक पढ़ने-समझने के लिए समय दिए जाने की मांग के बाद सत्र को दो बजे तक स्थगित किया गया था.
चूंकि कई और सदस्य इस पर विचार करना चाहते थे इसलिए इस विधेयक पर सात फरवरी को भी चर्चा हुई और उसके बाद ये विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया.
माना जा रहा है कि उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता पर उस काम की शुरुआत की है, जो आने वाले समय में देश में सभी धर्मों और पंथों को प्रभावित कर सकता है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है, "ये क़ानून 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की कल्पना को साकार करेगा."
दिलचस्प बात यह है कि राज्य की अनुसूचित जनजातियों को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखा गया है, जिससे सभी नागरिकों के लिए क़ानून में एकरूपता का दावा पूरा नहीं हो पाएगा. माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस क़ानून के दायरे से जनजातीय समुदायों को बाहर रखा गया है.
'एकरूपता' के वादे पर सवाल
समान नागरिक संहिता के तहत महिलाओं को पैतृक संपत्तियों, गोद लेने और तलाक़ में समान अधिकार दिया गया है. माना जा रहा है कि इससे 'हलाला', 'इद्दत' और 'तीन तलाक' जैसे रिवाज अब दंडनीय अपराध की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे और बहुविवाह पर भी प्रतिबंध लग जाएगा.
इस विधेयक को लेकर उत्तराखंड के मुसलमानों की क्या राय है, यही जानने के लिए अलग अलग इलाकों के कई मुस्लिमों से बातचीत की गई है.
राजधानी देहरादून में रह रहे मुस्लिम समाज के एक वरिष्ठ नागरिक और बुद्धिजीवी एसएमए काज़मी ने बताया, "ये विधेयक जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप और उससे संबंधित मामलों में एकरूपता प्रदान करने का वादा करता है, यह किसी भी प्रकार की 'एकरूपता' का वादा करने की तुलना में अधिक प्रश्न उठाता और भ्रम बढ़ाता हुआ दिखाई देता है."
काज़मी कहते हैं, "समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड, 2024 विधेयक में एकरूपता इसकी प्रस्तावना में बिखरी हुई है, जिसके दूसरे पैरे में ही यह लिखा गया है कि यह विधेयक अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर लागू नहीं होगा."
"सवाल यह उठता है कि यदि यह विधेयक राज्य के सभी नागरिकों के लिए फ़ायदेमंद है, तो अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को इस कानून से वंचित क्यों रखा गया है?"
लिव-इन रिलेशनशिप पर प्रावधान
काज़मी कहते हैं, "संघ परिवार और बीजेपी के एजेंडे के अनुसार यह विधेयक विवाह, तलाक़, पुनर्विवाह और उत्तराधिकार के मामलों में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को लक्षित करता है."
"यहाँ पहले ही 1955 के हिंदुओं के क़ानून और 1937 का मुस्लिम पर्सनल लॉ, इन सब पर पहले से क़ानून बने हैं, लिहाज़ा केंद्र के क़ानून चलेंगे ना कि यहाँ के क़ानून चलेंगे."
काज़मी ने बताया, "इस विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकृत कराना अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है और ऐसा न करने पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी."
"आम तौर पर, अधिकांश लोग, विशेष रूप से युवा, अपने लिव-इन रिलेशनशिप को छुपाते हैं और खुद को एक रजिस्टर में पंजीकृत कराने के लिए आगे आने में संकोच करते हैं तो उन पर पेनाल्टी लगाना बड़ा मुश्किल काम होगा. इससे व्यक्तियों की निजता के अधिकार पर आंच आएगी?"
उत्तराखंड में मुसलमानों की आबादी
उत्तराखंड में मुसलमानों की आबादी लगभग दस से 12 फीसदी है. कई मुसलमान निजी बातचीत में विधेयक से बहुत सहमत नहीं दिखते हैं.
लेकिन राज्य प्रशासन ने इन लोगों को विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति भी नहीं दी है.
मुसलमानों के एक समूह ने शांतिपूर्ण तरीके़ से इस विधेयक का विरोध करने का फ़ैसला लिया था.
इसमें शामिल लोगों को शांति भंग करने के लिए आईपीसी की धारा 107/51 का नोटिस दिया गया है और उन्हें अपने संबंधित पुलिस स्टेशनों से जमानत लेने के लिए कहा गया है.
उत्तराखंड बार काउंसिल की पूर्व अध्यक्ष और वकील रज़िया बेग़ ने बताया, "मुझे ऐसा नोटिस मिला है और मैं क़तई इसकी ज़मानत नहीं कराऊँगी. मैं ज़मानत इसलिए नहीं कराऊँगी, क्योंकि हमने अपना विरोध दर्ज कराया है और अब विरोध दर्ज कराने के लिए भी ज़मानत करानी पड़ेगी. यह कैसा क़ानून है हमारे उत्तराखंड में, क्या विरोध जताने पर नोटिस भेज दिया जाएगा!"
एडवोकेट रज़िया बेग़ कहती हैं कि, "यह विधेयक पढ़ने के बाद कहीं से भी नज़र नहीं आता कि यह समान नगरिकता संहिता की बात हो रही है. अगर कोई भी क़ानून बनाना है तो समाज के साथ बैठना होगा, चाहे वह कोई भी समाज हो. अगर सरकार ने इस क़ानून में जनजाति को छोड़ दिया तो यह क़ानून किसके लिए लाया जा रहा है?"
रज़िया बेग इस विधेयक में विवाह और लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े पहलुओं को लेकर विरोध जताती हैं.
उन्होंने कहा, "विवाह पर तो पहले से ही क़ानून बने हुए हैं. इसके अलावा रजिस्ट्रेशन भी पहले से ही होते हैं, तो इसमें कोई नई बात नहीं की गई है. लेकिन इससे बढ़कर क्या बात होगी कि देवभूमि में लिव इन रिलेशनशिप की भी अब अनुमति दी जा रही है."
"लिव इन रिलेशनशिप हिंदू क्या और मुसलमान क्या, पूरे समाज के लिए घातक है. इस तरह के रिश्तों के बाद जो बच्चे होंगे तो उनके क्या क़ानूनी अधिकार होंगे, इस बात का कोई ख़ुलासा नहीं किया गया है."
रज़िया कहती हैं, "हलाला के नाम पर मुसलमानों को बदनाम किया जा रहा है. कितने लोगों ने अभी तक हलाला कराया है? कितने लोगों के हलाला का डाटा सरकार के पास मौजूद है?"
'फ़ैसले मुसलमानों पर थोपे जा रहे हैं...'
स्थानीय नागरिक मोहम्मद हाशिम उमर ने सरकार के इस क़दम पर कहा, "हमें यूसीसी से कोई परेशानी नहीं हैं मगर सरकार से असल सवाल यह है कि जब इस तरह का क़ानून लाना ही था तो इस्लाम के जानकारों को शामिल करते और राय लेते. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जो संविधान तैयार किया था उसमें हर मज़हब का ख़्याल रखा गया था."
हाशिम ये भी कहते हैं कि मुस्लिम लोगों की यही चाहत है कि क़ुरान, हदीस और शरीयत के तहत मुस्लिमों को मिले क़ानूनों को इस नये क़ानून के अंदर नहीं लाना चाहिए.
वे कहते हैं, "अगर हमारे क़ानून बदले गये तो हम इसका विरोध करेंगे लेकिन सवाल यह है कि हम अपना विरोध और दर्द कहाँ बयान करें? आख़िर कहाँ जाएं? बड़ा अफ़सोस होता है. पुलिस प्रशासन ने बड़ी सख़्ती के साथ विरोध करने के लिए मना किया है और फ़ैसले हम मुसलमानों पर थोपे जा रहे हैं."
वहीं एक अन्य नागरिक मोहम्मद सईद कहते हैं, "सरकार ना तो हमारी सुन रही है और ना ही विरोध करने दे रही है. यह सही है कि हम जिस देश में रहते हैं हमें वहां का क़ानून मानना भी चाहिए पर सरकार को भी तो हमारी शरीयत में दख़ल नहीं देना चाहिए. हम इसका विरोध करने के साथ साथ क़ानूनी लड़ाईं भी लड़ेंगे. हमारे दिलों पर सख़्त ठेस पहुँची है."
वहीं, युवा आसिफ़ हुसैन ने बताया, "अभी चंद रोज़ पहले ही हमने बड़े हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया गया. ये दिवस इसलिए मनाते हैं कि उसी दिन हमारा संविधान लागू हुआ था. उसी संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि हर किसी को अपने मज़हब पर चलने की आज़ादी है मगर ये क़ानून लाने के बाद क्या अनुच्छेद 25 प्रभावी रहेगा?"
"देश का क़ानून यह कहता है कि केंद्र सरकार अगर कोई क़ानून लेकर आती है तो उसे राज्य सरकार को मानना बाध्य होगा मगर राज्य सरकार कोई क़ानून लाती है तो केंद्र सरकार उसको मानने के लिए बाध्य नहीं है. जब संविधान के अनुच्छेद 25 में सभी धर्म के लोगों को आज़ादी है कि कोई भी अपने मज़हब पर चल सकता है तो क्या वह आपस में नहीं टकराएंगे?
आसिफ़ ने बताया, "हमलोग गवर्नर के पास जायेंगे. उनको इस क़ानून को पास और रद्द करने का अधिकार है. गवर्नर ख़ुद अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं लिहाज़ा हमें उम्मीद है कि वह हमारी बात को समझेंगे."
हालांकि संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत समान नागरिक संहिता की बात कही गई है. इसके अनुसार, राज्य से ये अपेक्षा की गई है कि वो सभी नागरिकों के लिए एक समान क़ानून का लक्ष्य हासिल करेगा.
सुप्रीम कोट के एडवोकेट महमूद प्राचा का कहना है, "सरकार की और से प्रस्तावित समान नागरिक संहिता विधेयक खामियों से भरा है, जिस का हम पुरजोर विरोध करते हैं. तमाम धर्म में बेटियों को संपत्ति में धार्मिक परंपराओं के अनुसार हिस्सेदारी की व्यवस्था सदियों से चली आ रही थी. यूसीसी में बेटियों की हिस्सेदारी को क़ानूनी स्वरूप देना सामाजिक ताने-बाने को बिखेरने का काम करेगा."
इस विधेयक का विरोध नुमाइंदा ग्रुप उत्तराखंड भी कर रहा है, इसके संयोजक याकूब सिद्दिक़ी का कहना है, "बहुत सारे धार्मिक और सामाजिक पहलू हैं, जिस पर गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता है. यह कह देना कि ये पहलू महिलाओं पर अत्याचार हैं, सरासर ग़लत है."
वहीं, अखिल भारतीय मुस्लिम जमात के राज्य अध्यक्ष सैयद अशरफ हुसैन कादरी ने एक बयान में कहा कि मुस्लिम समुदाय यूसीसी का विरोध करेगा.
क्या कहना है विपक्षी कांग्रेस पार्टी का
उत्तराखंड में कांग्रेस और वामपंथी दल इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं.
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार लोकतंत्र को नहीं समझ रही है और संवैधानिक मूल्यों की हत्या कर रही है.
यशपाल आर्य ने सदन में कहा, "172 पेज का यह विधेयक है. जो ड्राफ़्ट कमेटी थी उसमें क्या यह नहीं हो सकता था कि धर्म गुरु भी होते, उन्हें भी शामिल किया जाता. मगर ऐसा नहीं हुआ."
उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि 2024 के चुनाव के चलते राज्य सरकार ने इस विधेयक को पारित कराया है.
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