कपिल मिश्रा की 'हेट स्पीच' और क़ानून से जुड़े चार सवाल

    • Author, विभुराज चौधरी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम- जाफ़राबाद और चांद बाग़ की सड़कें खाली करवाइए इसके बाद हमें मत समझाइएगा, हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, सिर्फ तीन दिन."

बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के इस बयान के तीन दिन भी नहीं गुजरे और उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाक़ों में आग जलने लगी.

कई लोगों का ये आरोप है कि कपिल मिश्रा के इस बयान के बाद उत्तर पूर्वी दिल्ली के हालात बिगड़ने लगे.

यहां तक कि बीजेपी के ही नेता और सांसद गौतम गंभीर को ये कहना पड़ गया, "चाहे वो कपिल मिश्रा हों या कोई भी हों, जिसने भी भड़काऊ भाषण दिए हैं, उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए. ये अब किसी पार्टी का मुद्दा नहीं रह गया है, ये पूरी दिल्ली का मुद्दा है. कपिल मिश्रा पर जो भी कार्रवाई होगी मैं उसका समर्थन करता हूं."

कपिल मिश्रा पर भड़काऊ भाषण देने के आरोप कोई पहली बार नहीं लगे हैं. जनवरी की 23 तारीख़ को उन्होंने ट्वीट किया था, "8 फरवरी को दिल्ली की सड़कों पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान का मुकाबला होगा."

इस ट्वीट के लिए चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भी जारी किया था.

एक ऐसे दौर में जहां लोग अपनी खुशी और ग़म सोशल मीडिया पर जता रहे हैं, वहीं 'भड़काऊ भाषणों की फसल' भी इसी फ़ेसबुक और ट्विटर पर 'लहलहाती' हुई दिखती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि इन 'भड़काऊ भाषणों' पर क़ानून क्या कहता है, क्या कर सकता है, क़ानून आख़िर ख़ामोश क्यों है और उसकी क्या मजबूरियां हैं?

क़ानून क्या कहता है?

भारत के किसी भी क़ानून में 'भड़काऊ भाषण' को परिभाषित नहीं किया गया है. हालांकि कुछ क़ानूनों में ऐसे प्रावधान हैं जो ख़ास तरह के भाषणों पर रोक लगाते हैं और इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे से बाहर रखते हैं.

इंडियन पीनल कोड के अलग-अलग प्रावधानों के तहत धर्म, नस्ल, जन्म स्थान, रिहाइश, भाषा आदि के आधार पर समाज में वैमनस्य भड़काना, सौहार्द बिगाड़ना अपराध है. यहां तक कि किसी पर ये लांछन लगाना कि वो किसी धर्म, नस्ल, भाषा, या जाति या समुदाय के लोग भारत के संविधान प्रति सच्ची श्रद्धा या निष्ठा नहीं रख सकते, अपराध है और इसके लिए तीन साल तक की सज़ा हो सकती है.

किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से कही गई बात भी इसी दायरे में आती है. समाज में दो वर्गों या समुदायों के बीच घृणा फैलाना भी आईपीसी के तहत अपराध है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का नाजायज़ इस्तेमाल करने के दिए दोषी करार दिया गया व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाता है.

दंड प्रक्रिया संहिता सरकार और प्रशासन को ये हक़ देती है कि वो किसी को सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने से रोक सकती है.

इसके अलावा प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स ऐक्ट, धार्मिक संस्थाओं के बेजा इस्तेमाल को रोकने वाला क़ानून, केबल टेलीविज़न नेटवर्क रेगुलेशन ऐक्ट और सिनेमाटोग्राफ़ ऐक्ट के तहत 'भड़काऊ भाषण' को रोकने और ऐसा होने पर सज़ा का प्रावधान किया गया है.

पुलिस क्या कर सकती है?

भले ही क़ानून में 'भड़काऊ भाषण' की स्पष्ट परिभाषा मौजूद न हो लेकिन इतने क़ानूनी प्रावधान तो हैं ही कि पुलिस हाथ पर हाथ रखकर बैठे नहीं रह सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विराग गुप्ता कहते हैं, "हेट स्पीच समेत किसी भी मामले में शिकायत दर्ज होने पर ही प्राथमिक जांच के बाद पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करना चाहिए. मामला संगीन हो और गंभीर धाराओं में एफ़आईआर दर्ज हो तो तुरंत गिरफ्तारी भी हो सकती है."

लेकिन उन मामलों में क्या होना चाहिए जहां हेट स्पीच को सोशल मीडिया पर खाद-पानी मिल रहा हो.

विराग गुप्ता कहते हैं, "सोशल मीडिया के माध्यम से हेट स्पीच के अधिकांश मामलों में सरकार के रुख के अनुसार ही पुलिस कार्रवाई करती है जैसा कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों की घटनाओं से जाहिर होता है."

वैसे अन मामलों में कुछ जिम्मेदारी तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भी बनती है.

विराग गुप्ता का कहना है, "सोशल मीडिया के माध्यम से हेट स्पीच पर आईपीसी के अलावा दो अन्य प्रावधान हैं. सोशल मीडिया की कंपनी भी अपने नियम और अनुबंध के तहत हेट स्पीच के लिए आरोपी के अकाउंट को निलंबित कर सकती है. भारत में आईपीसी के अलावा आईटी एक्ट में हेट स्पीच को अपराध करार दिया गया है. यदि सोशल मीडिया अकाउंट वेरीफाई नहीं है या कोई वीडियो अपलोड किया गया है तो ऐसे मामलों में साइबर कानून के तहत जांच और पंचनामा के विशेष प्रावधान भी हैं."

पुलिस की ख़ामोशी और मजबूरियां?

क़ानून है, पुलिस को पावर है तो फिर उन्हें कदम उठाने से कौन रोक रहा है?

उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजी (महानिदेशक) रह चुके पूर्व आईपीएस अधिकारी ब्रजमोहन सारस्वत कहते हैं, "पुलिस अगर लोगों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करेगी तो लोग आएंगे. अगर हतोत्साहित करेगी तो मुश्किल हो जाएगी. इस समय जो दिल्ली में हो रहा है वो आईपीसी के सेक्शन 153ए के तहत आता है. इन मामलों में चार्जशीट दायर करने के लिए आला अधिकारियों की मंजूरी लेनी होती है."

तो क्या उनके हाथ बंध जाने की यही वजह है?

ब्रजमोहन सारस्वत आगे कहते हैं, "पुलिस को इस समय उनके राजनीतिक आका स्वतंत्र नहीं करना चाहते हैं. पुलिस का इस समय जो ढांचा है, उसमें कुछ नहीं हो सकता है. ट्रांसफर-पोस्टिंग राजनेताओं के हाथ में हैं. सरकारें कोई भी हों, वो पुलिस का इस्तेमाल अपने अनुसार करना चाहती हैं. अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन की लालच में पुलिस अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करना चाहते हैं."

कपिल मिश्रा जिस विवादास्पद वीडियो में पुलिस को अल्टिमेटम देते हुए दिख रहे हैं, उसमें भी उनके बगल में दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी रैंक के अधिकारी भी मौजूद थे. सारस्वत का कहना है कि इस मामले में उस अधिकारी को कार्रवाई करनी चाहिए थी और कमिश्नर को इसकी रिपोर्ट भी करना चाहिए था.

क्या सोशल मीडिया पर हेट स्पीच के मामले हैंडल करने के लिए पुलिस उतनी प्रशिक्षित है?

ब्रजमोहन सारस्वत कहते हैं, "इंफ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी ऐक्ट के जिस प्रावधान के तहत पुलिस पहले कार्रवाई करती थी, उसके दुरुपयोग के मामले बढ़ रहे थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने आईटी ऐक्ट की धारा 66ए खारिज कर दी. लेकिन ये चीज़ें आईपीसी के तहत अभी भी अपराध हैं. पुलिस इन मामलों में आईपीसी की धाराएं लगा सकती है."

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़?

चूंकि क़ानून 'हेट स्पीच' की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं देता, इसलिए इसके बचाव में 'अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार' की दलील भी दी जाती है. यहां तक कि आईटी ऐक्ट की धारा 66ए को खारिज किए जाने का फ़ैसला भी इसी आधार पर किया गया था.

'हेट स्पीच' और 'अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता' के बीच की लक्ष्मण रेखा क्या होनी चाहिए?

हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का अधिकार कुछ शर्तों के साथ लागू होता है. संविधान इस अधिकार पर आठ तरह के प्रतिबंध लगाता है जिसमें 'पब्लिक ऑर्डर' और 'किसी को अपराध के उकसाना' अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे से बाहर है."

तो कपिल मिश्रा ने जो कहा, वो क्या था?

चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "कपिल मिश्रा का बयान 'अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार' के दायरे में कभी नहीं आता है. उन्होंने जो कहा, उससे 'पब्लिक ऑर्डर' यानी सार्वजनिक अमन-चैन को ख़तरा पहुंचता है."

"पब्लिक ऑर्डर मेनटेन करना, जाफ़राबाद और चांद बाग़ की सड़कें खाली करवा सरकार और पुलिस का काम है न कि उनका. अगर आपका रास्ता भी किसी ने रोका है तो उन्हें कोर्ट या पुलिस के पास जाना चाहिए था. कोई क़ानून अपने हाथ में नहीं ले सकता."

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