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दिल्ली पुलिस हिंसा-आगज़नी के दौरान आख़िर कर क्या रही थी?
- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाक़े में सोमवार को हुई हिंसा की तस्वीरें और वीडियो जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं, क़ानून-व्यवस्था के हवाले से दिल्ली पुलिस की ज़िम्मेदारियों पर उठते सवाल और भी तीखे होते जा रहे हैं.
ये हिंसा-आगज़नी ऐसे समय हुई, जब अगले ही दिन यानी मंगलवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दिल्ली में पूरे दिन का कार्यक्रम पहले से ही तय था.
सोमवार को हुई हिंसा और आगज़नी की तस्वीरों में दिखाई दे रहा है कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पिकेट के साथ में बनी मज़ार में आग लगाई. अन्य तस्वीरों में पेट्रोल पंप, कई गाड़ियां, दुकानें और यहां तक कि कुछ मकान भी जलते हुए नज़र आ रहे हैं.
क्या दिल्ली पुलिस को अंदाज़ा नहीं था कि जाफ़राबाद इलाक़े में पहले से जारी विरोध प्रदर्शन इस अंजाम तक पहुंच सकते हैं?
क्या दिल्ली पुलिस का अपना ख़ुफ़िया तंत्र इस हद तक सुस्त था कि उसे भनक नहीं लगी कि राष्ट्रपति ट्रंप के आने से पहले दिल्ली से हिंसा और आगज़नी से तनाव इतना अधिक बढ़ सकता है?
विपक्ष, ख़ासतौर पर आम आदमी पार्टी का आरोप है कि पुलिस को हरकत में आने के आदेश नहीं मिले थे, वरना भीड़ में कोई दंगाई पिस्तौल लहराने की हिम्मत कैसे जुटा पाता?
दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल इसलिए भी उठे हैं कि क्योंकि जामिया की तरह पुलिस इस बार बल प्रयोग करती नज़र नहीं आई.
इन तमाम सवालों के संदर्भ में हमने पुलिस के कुछ पूर्व आला अधिकारियों से बात की.
अजय राय शर्मा, पूर्व दिल्ली पुलिस कमिश्नर की राय
पुलिस, स्टेट सब्जेक्ट है. इसका मतलब ये है कि केंद्र सरकार इसमें दख़ल नहीं दे सकती. लेकिन दिल्ली पुलिस इसका अपवाद है. दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है. बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री ही राज्य पुलिस के लिए सबकुछ होता है. लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं है.
पुलिस को किसी भी सरकार का 'स्ट्रांग आर्म' माना जाता है. इसलिए पुलिस से उम्मीद की जाती है कि वो सही समय पर कार्रवाई करेगी और दंगे-फ़साद रोक देगी.
पुलिस एक तरह का यंत्र है जो आम तौर पर राज्य सरकार के हाथ में होता है, यहां दिल्ली के मामले में ये यंत्र केंद्र सरकार के हाथ में है. अगर आप उस यंत्र को इस्तेमाल नहीं करें तो वो अपने आप तो कुछ नहीं करेगा.
वैसे तो देश का क़ानून ये कहता है कि कोई भी संज्ञेय-अपराध यदि पुलिस के सामने होता है तो उसे हरकत में आना चाहिए. लेकिन धीरे-धीरे ये प्रथा कम होती जा रही है.
हम जब सर्विस में थे तो पहले एक्शन लेते थे और फिर बताते थे कि हालात ऐसे थे कि एक्शन लेना पड़ा. लेकिन अब पहले सरकार से पूछा जाता है कि हम एक्शन ले या ना लें.
मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि पुलिस हरकत में क्यों नहीं आ पाती. क्या उनको (पुलिस को) रोका गया है, क्या उनके हाथ-पैर बांध दिए गए हैं.
अगर पुलिस पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है और तब वो एक्शन नहीं ले रही है तो ये गंभीर बात है. इसी तरह यदि किसी ने पुलिस को एक्शन लेने से रोका नहीं है और फिर भी वो एक्शन नहीं ले रही है तो ये और भी अधिक गंभीर बात है.
पुलिसिंग दो तरह की होती है- एक होती है रिएक्टिव पुलिसिंग और दूसरी प्रिवेंटिव पुलिसिंग.
रिएक्टिव पुलिसिंग वो होती है जब घटना घटने के बाद आप वहां पहुंचे और मुक़दमा लिखने के बाद कार्रवाई शुरू करते हैं. प्रिवेंटिव पुलिसिंग में आपको इंटेलीजेंस जुटाकर घटना होने से पहले कार्रवाई करनी होती है.
मेरे ख्याल में इस मामले में प्रिवेंटिव पुलिसिंग की कमी है और रिएक्टिव पुलिसिंग भी पूरी नहीं है.
नीरज कुमार, पूर्व दिल्ली पुलिस कमिश्नर
दिल्ली पुलिस के पास हिंसा-आगज़नी होने का इंटेलीजेंस ज़रूर रहा होगा, लेकिन फिर भी कई दफ़ा बड़े पैमाने पर दंगा हो जाता है.
पूरे शहर में एक क़ानून के विरोध का माहौल बना हुआ है, उस माहौल का फ़ायदा कई लोग उठाना चाहेंगे जिनमें विरोधी राजनीतिक दल और भारत विरोधी एजेंसियां भी शामिल हो सकती हैं.
ऐसे में किसी तरह की हिंसा होने पर जगह-जगह तैनाती करके नियंत्रण करना थोड़ा मुश्किल होता है. इसलिए मैं पुलिस को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं मानता हूं.
अब ये सवाल ज़रूर है कि पुलिस ने जितनी जबावी कार्रवाई की, उसमें जितनी सख़्ती होना चाहिए थी, उतनी हुई या नहीं, टीवी फुटेज के आधार पर नहीं कहा जा सकता.
जहां तक पुलिस तंत्र को मज़बूत और बेहतर बनाने की बात है, ये गुंजाइश तो हमेशा रहती है. लेकिन पुलिस यदि हिंसा को क़ाबू नहीं कर पाती है तो ज़रूर ये माना जाएगा कि पुलिस कहीं न कहीं फेल हो गई है.
दिल्ली पुलिस यदि केंद्र सरकार के बजाए दिल्ली सरकार के अधीन होती तो सुधार के लिहाज से कोई फर्क नहीं आता बल्कि कार्यप्रणाली बदतर ही होती.
उदाहरण के लिए आप उत्तर प्रदेश पुलिस या किसी भी राज्य की पुलिस को देख सकते हैं जहां पुलिस का दुरुपयोग किया जा रहा है. दिल्ली के लोगों के लिए ये बड़ी ख़ुशनसीबी है कि यहां कि पुलिस किसी राज्य सरकार के अधीन नहीं बल्कि केंद्र सरकार के अधीन काम करती है.
केंद्र सरकार के पास इतना वक्त नहीं होता कि वो पूरा देश छोड़कर राजधानी की पुलिस पर अपना वक्त ज़ाया करे, जबकि राज्य सरकारों के पास पुलिस का दुरुपयोग करने के लिए कहीं अधिक वक्त होता है.
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