रूस का मून मिशन क्यों रहा नाकाम, क्या यह चीन के लिए भी है बड़ा झटका?

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रूस की स्पेस एजेंसी रोस्कोस्मोस ने 11 अगस्त को जब लूना-25 को लॉन्च किया तो उसका सपना था कि वो 10 दिन में चांद पहुँच जाए.
मगर ये सपना नौवें दिन तब टूट गया, जब 20 अगस्त को लूना-25 चांद की सतह पर पहुँचने से पहले ही क्रैश हो गया.
रूस को ये झटका ऐसे वक़्त में लगा है, जब भारत चंद्रयान-3 के ज़रिए 23 अगस्त को चांद पर पहुँचने ही वाला है.
चंद्रयान-3 की सफलता से दुनिया के अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत अपनी नई और बेहतर जगह बना सकता है.
मगर रूस के हाथ लगी असफलता कई मायनों में अहम है.
इस कहानी में हम आपको रूस के लूना-25 के क्रैश होने की वजहों और चीन पर इसके असर के बारे में बताएंगे.
साथ ही ये समझने की भी कोशिश होगी कि कभी चांद पर सबसे पहले पहुँचने वाला रूस (सोवियत संघ) पीछे कैसे रह गया और क्या इसमें भारत की कोई भूमिका है?

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लूना-25 को लॉन्च क्यों किया गया?
नासा की वेबसाइट के मुताबिक, लूना 25 का नाम लूना ग्लोब लैंडर भी है.
हालांकि रूस ने इसे लूना-25 ही कहा ताकि वो चांद पर भेजे अपने पुराने मिशन की सिरीज़ में इसे रख सके.
नासा लिखता है कि लूना-25 को लॉन्च करने के दो मक़सद थे.
- मुख्य मक़सद चांद की सतह का अध्ययन करना और ये पता करना कि ये किससे बना है.
- चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जाकर ये देखना कि वहाँ प्लाज़्मा और डस्ट तत्व कैसे हैं और उनका अध्ययन करना.

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चीन और रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम
रूस और चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की साझेदारी इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन कहलाती है. ये अमेरिका के नेतृत्व वाले अर्टमिस अकॉर्ड से अलग है और माना जाता है कि ये नासा के साथ प्रतिस्पर्धा में है.
साल 2021 में रूस और चीन ने इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन बनाने का एलान किया था.
दोनों देशों ने इसे चांद की सतह पर बनाने की बात कही थी.
अंतरिक्ष कार्यक्रमों में पारदर्शिता बरतने के लिए अमेरिका ने एक नियमावली बनाई है. इसमें सूचनाओं को सार्वजनिक करने जैसे नियम हैं. इस समझौते पर भारत समेत 30 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं.
रूस और चीन इस समझौते से दूर रहे हैं और यही वजह है कि दोनों देशों के अंतरिक्ष से जुड़े इरादों पर संदेह किया जाता रहा है.
ऐसे में जब रूस यूक्रेन के साथ डेढ़ साल से ज़्यादा वक़्त से युद्ध में है, तब उसे लूना-25 को लॉन्च करने की क्या ज़रूरत थी?
कुछ जानकारों का कहना है कि इसका मक़सद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उन इरादों से जुड़ा है, जिसमें वो दुनिया को ये संदेश देना चाहते थे कि देश अब भी सक्षम है और वो चांद तक जा सकता है.
जानकार बताते हैं कि ये युद्ध रूस की उम्मीदों से काफ़ी महंगा और मुश्किल साबित हो रहा है.

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लूना-25 क्रैश होने के कारण
रोस्कोस्मोस ने लूना-25 के क्रैश होने की वजहों का पता लगाने के लिए जांच कमिटी बनाई है.
फ़िलहाल क्रैश होने के बाद रूसी स्पेस एजेंसी ने कहा है कि तकनीकी कारणों से ऐसा हुआ था.
रोस्कोस्मोस प्रमुख यूरी बोरिसोफ़ ने कहा, ''लूना-25 को लैंडिंग से पहले की कक्षा में स्थापित करने वाला इंजन तय 84 सेकंड की बजाय 127 सेकंड तक काम करता रहा. जांच में हमने पाया कि दुर्घटनाग्रस्त होने का ये मुख्य तकनीकी कारण था."
रूस का लूना-25 से संपर्क भी टूट गया था.
यूरी बोरिसोफ़ बोले, ''लगभग 50 सालों तक चांद मिशन को रोक देना मिशन के फेल होने का मुख्य कारण है. हमारे पूर्वजों ने 1960 और 1970 के दशक में जो बेशकीमती अनुभव हासिल किए थे, वो अनुभव हम खो चुके हैं.''
यूरी ने कहा कि इस क्रैश के बाद भी हमें चांद पर पहुंचने की कोशिशों को जारी रखना चाहिए.
जानकारों ने कहा कि रूस अगर लूना-25 के क्रैश के बाद रुक गया तो वो सबसे बड़ी ग़लती कहलाएगी.

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पश्चिम से लगे प्रतिबंध और चांद के भरोसे रूस
रूस की विफलता को कुछ लोग पश्चिमी देशों की ओर से लगे प्रतिबंधों से भी जोड़कर देख रहे हैं.
यूक्रेन पर किए आक्रमण के बाद रूस को पश्चिमी देशों से प्रतिबंध का सामना भी करना पड़ रहा है, जिसके कारण पश्चिमी देशों से मिलने वाली तकनीक पर भी रोक लगी है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी चंद्रयान-3 के मामले में इसरो की मदद कर रही हैं.
इन विदेशी स्पेस एजेंसियों का एंटीना 23 अगस्त को सॉफ्ट लैंडिंग के वक़्त विक्रम लैंडर के संपर्क में रहेगा.
मगर रूस के मामले में ऐसा नहीं हो सका.
इन प्रतिबंधों का बड़ा नुकसान ये हुआ कि रूस दुनिया के दूसरे देशों की उन सैटेलाइट का इस्तेमाल नहीं कर पाया, जिसके कारण रूस लूना-25 से संपर्क किया जा सकता था.
द हिंदू के मुताबिक़, लूना-25 से संपर्क करने के रूस के पास जो तरीक़े थे, वो सीमित थे. जैसे स्पेसक्राफ्ट से मिले सिग्नल, जो सिर्फ़ तीन स्टेशनों पर मिल रहे थे. दो स्टेशन रूस में थे और एक क्रीमिया में था.
अगर इसे आसान भाषा में समझना है तो यूं समझिए कि रूस लूना-25 से सिर्फ़ तब संपर्क कर पाया, जब चांद रूस के ऊपर था. ऐसे में वैज्ञानिकों के पास तकनीकी दिक़्क़तों को दूर करने के लिए बहुत कम समय था.
इतने कम समय में रूसी वैज्ञानिकों ने ऐसा करने की कोशिश की मगर सफलता हाथ नहीं लगी. नतीजा- लूना-25 क्रैश.

रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम ढलान पर है?
जब लूना-25 क्रैश हुआ तो लोगों का ध्यान रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सुनहरे इतिहास की ओर भी गया.
सोवियत संघ (रूस) पहला वो देश था, जिसने 1957 में पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए पहली सैटेलाइट स्पूतनिक 1 लॉन्च की थी.
साल 1961 में सोवियत संघ के यूरी गैगरिन वो पहले इंसान थे, जो अंतरिक्ष गए थे.
सोवियत संघ के नाम ही 1966 में चांद पर सबसे पहले पहुंचने का रिकॉर्ड भी दर्ज है.
सोवियत संघ (रूस) के चांद पर पहुँचने के तीन साल बाद अमेरिका चांद पर जा सका था.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, रूस लूना-25 के लिए साल 2010 से तैयारी कर रहा था.
ये तैयारी 2023 में पूरी हुई और लगभग 50 साल बाद रूस ने अंतरिक्ष कार्यक्रम की ओर फिर से कदम रखना शुरू ही किया था और विफलता हाथ लगी.
कई वैज्ञानिकों और स्पेस एक्सपर्ट ने कहा है कि ये साफ़ है कि चांद पर जाने के मामले में पिछड़ रहा है.
लंबे वक़्त तक रूस की अंतरिक्ष कार्यक्रमों के प्रति निष्क्रियता को भी इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है.

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क्या भारत की स्पेस एंट्री से रूस हुआ कमज़ोर?
द हिंदू के मुताबिक़, रूस ने इंटरनेशनल लूनर स्पेस स्टेशन को लेकर जो 2021 में जो फ़ैसले किए, उससे उसकी भूमिका सीमित हो गई.
रूस ने लूना 26 और लूना 27 के लिए योजना बना रखी थी. पर जब लूना 25 क्रैश हो गया है तो इससे रूस के इरादे आगे के लिए टल सकते हैं.
संभव है कि रूस 2027 और 2028 तक के लिए अपनी अंतरिक्ष योजनाओं को टाल दे.
पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण भी रूस की राह आसान नहीं रहने वाली है.
हालांकि स्पेस रिव्यू वेबसाइट पर लिखे एक लेख में डैनियल डकहैन कहते हैं कि ये कहना ग़लत है कि रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम ढलान पर है.
वो लिखते हैं, ''1990 से 2012 तक रूस वाक़ई अंतरिक्ष कार्यक्रम के मामले में ढलान पर था. नई वैज्ञानिक उपलब्धियों को हासिल करने के मामले में भी रूस पीछे रहा. इसी की नतीजा रहा कि 1990 के दौर में अमेरिका रूस से आगे निकल गया. अंतरिक्ष कार्यक्रमों में यूरोप, चीन और जापान के आने से भी रूस की हिस्सेदारी कम हो गई.''
डैनियल ने कहा कि बीते एक दशक को अगर देखें तो रूस की स्थिति स्थिर है. 2010 तक रूस की हिस्सेदारी बढ़ रही थी, फिर भारत की एंट्री हुई और रूस की रफ्तार धीमी हुई.
अपने लेख में वो कहते हैं- 2022 में रूस की अंतरिक्ष कार्यक्रमों में हिस्सेदारी 26.7 फ़ीसदी है. ये साल 2007 की 26.8 फ़ीसदी हिस्सेदारी जितनी ही है.
डैनियल लिखते हैं- किसी एक अंतरिक्ष कार्यक्रम की विफलता से किसी एक देश की क्षमता का आकलन नहीं करना चाहिए. रूस को कमतर नहीं आंकना चाहिए और ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि रूस अपने मिलिट्री स्पेस सिस्टम को फिर से मज़बूत करने के लिए काम कर रहा है.

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रूस की विफलता चीन के लिए झटका क्यों है?
रूस और चीन ने 2030 तक चांद के दक्षिणी ध्रुव पर स्टेशन बनाने की योजना बनाई थी.
ऐसे में सवाल ये है कि लूना-25 के क्रैश होने के बाद भी दोनों देश साथ में काम करते रहेंगे?
इस सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा, ''इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) सभी इच्छुक पक्षों के लिए खुला था. चीन हमेशा अंतरराष्ट्रीय व्यापक सहयोग पर ज़ोर देता रहा है.''
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़, लूना-25 का क्रैश होना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए भी शर्मिंदगी वाली स्थिति है.
चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े बड़े नाम और चीफ डिजाइनर वु यान्हुआ रूस गए थे ताकि वो लूना 25 के लॉन्च में शामिल हो सकें और दोनों देशों के बीच जारी अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े समझौतों पर बात कर सकें.
ऐसे में जब लूना-25 क्रैश हुआ तो चीन में भी इस बारे में विस्तार से बात नहीं की गई.
ग्लोबल टाइम्स के पूर्व संपादकर हु शिंजिन ने कहा कि सिर्फ़ इस विफलता के कारण रूस को कम नहीं आकना चाहिए.
स्पेस पॉलिसी से जुड़े पेवल लुज़िन ने ब्लूमबर्ग से कहा- चीन रूस का सहयोग नहीं करेगा क्योंकि ऐसा करने से चीन को कुछ हासिल नहीं होगा.
जानकारों का ये भी कहना है कि चंद्रयान-3 के ज़रिए चांद के दक्षिणी ध्रुव पर भारत का पहुंचना भी चीन के लिए झटके की तरह ही है. अगर लूना-25 ऐसा पहले कर पाता तो ये चीन के लिए ज़्यादा बेहतर स्थिति होती.
चीन और भारत के बीच लंबे वक़्त से सीमा विवाद रहा है.
स्पेस एक्सपर्ट कहते हैं कि इसकी संभावनाएं भी कम ही हैं कि रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर बहुत दूरी आएगी.
ऐसा इसलिए भी क्योंकि वॉर्निंग सिस्टम से संबंधित सैटेलाइट बनाने में चीन को रूस से मदद मिल सकती है.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बात करते हुए स्पेस पॉलिसी की स्कॉलर नम्रता गोस्वामी ने कहा, ''लूना-25 की विफलता चीन और रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े रिश्तों को प्रभावित नहीं करेगा. इन दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी है. शी जिनपिंग ने पुतिन को अपना बड़ा साझेदार बताया है. लूनर तकनीक के मामले में चीन काफ़ी आगे है और उसे रूस की मदद करनी ही होगी.''
गोस्वामी ने कहा, ''1960 के दौर से हालात बदल गए हैं. तब सोवियत संघ हीरो था और चीन पीछे था. लेकिन अब खेल बदल गया है.''

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क्या चंद्रयान-3 रूस संग वाक़ई रेस में था?
लूना-25 जब क्रैश हुआ तो ये कहा गया कि रूस भारत से रेस में पिछड़ गया है.
23 अगस्त को शाम छह बजे चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी है.
द हिंदू ने एक रिपोर्ट में रेस की ख़बरों पर कुछ जानकारियां दी हैं.
अखबार लिखता है कि ये सही है कि दोनों देशों ने चांद पर उतरने के लिए एक सा समय चुना. मगर इसकी वजह कोई रेस नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण हैं.
मिशन कब लॉन्च करना है, ये कुछ बातों पर निर्भर करता है. जैसे- लैंडिंग के लिए किस वक़्त पर सूरज की उचित रौशनी चांद पर रहती है, स्पेसक्राफ्ट का वजन क्या है...
चंद्रयान-3 के लिए तैयारी साल 2019 में शुरू हो गई थी. वहीं लूना-25 पर रूस साल 2010 से काम कर रहा है.
कोरोना के कारण दोनों देशों को चांद की यात्रा शुरू करने में देरी हुई.
यहां ये बात याद रखनी चाहिए कि रूस और भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम के मामले में भी सहयोगी रहे हैं.
गगनयान मिशन पर जाने वाले भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को रूस की स्पेस एजेंसी ने ट्रेनिंग दी थी.
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