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बांग्लादेश में हिंसा पर वहां के मीडिया में ग़ुस्सा, हिन्दू युवक की हत्या पर जमात-ए-इस्लामी ने क्या कहा?
बांग्लादेश में छात्र नेता उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा से भारत विरोधी भावना वहाँ और बढ़ती दिख रही है.
पिछले साल शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ छात्र आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले इंक़लाब मंच के उस्मान हादी को पिछले हफ़्ते गोली मार दी गई थी और इस हफ़्ते गुरुवार को उनकी मौत हो गई.
इसके बाद ढाका में बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए. गुरुवार को दो अख़बारों प्रथम आलो और डेली स्टार के दफ़्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी हुई.
बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान के घर और सांस्कृतिक केंद्र छायानौत को एक बार फिर निशाना बनाया गया.
ढाका के भारतीय उच्चायोग के बाहर भी प्रदर्शनकारी इकट्ठा हो गए और पत्थरबाज़ी की गई.
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गुरुवार को ही एक हिन्दू युवक की पीट पीट कर हत्या कर दी गई, जिसके बारे में शुक्रवार को पूरे दिन भारतीय मीडिया में ख़बरें चलीं.
अंतरिम सरकार को समर्थन दे रही बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने इस घटना की कड़ी निंदा की और सरकार के निष्पक्ष जांच कराए जाने और अपराधियों को सज़ा देने की मांग की है.
जिस पैमाने पर ढाका में हिंसा हुई और अख़बारों को निशाना बनाया गया, उसे लेकर बांग्लादेश के मीडिया में व्यापक कवरेज किया गया है और सरकार की विफलता पर सवाल खड़े किए गए हैं.
हिंदू युवक की लिंचिंग पर बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने क्या कहा?
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के महासचिव ने एक्स पर बयान जारी कर हिंदू युवक की लिंचिंग की निंदा की है.
बयान में कहा गया है, "मैं मैमनसिंह के भालुका उपज़िला में हुई उस घटना की कड़ी निंदा करता हूं, जिसमें इस्लाम का अपमान करने और हज़रत मुहम्मद के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में दीपू चंद्र दास नाम के एक हिन्दू युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया.''
उन्होंने कहा, "इस तरह की हत्या को बांग्लादेश के मौजूदा क़ानून किसी भी तरह से समर्थन नहीं देते. इस्लाम कभी भी ग़ैर-क़ानूनी हत्या, भीड़ की हिंसा या किसी भी तरह की हिंसा की इजाज़त नहीं देता. अगर कोई आरोप हैं, तो उनका निपटारा अदालतों के ज़रिए ही होना चाहिए. यह क़ानून के शासन का एक बुनियादी सिद्धांत है."
हिन्दू युवक की हत्या पर बांग्लादेश के अख़बारों में संपादकीय
अंग्रेज़ी अख़बार न्यू एज ने शनिवार के अपने संपादकीय में 'विजिलांटिज़्म' (खुद क़ानून हाथ में ले लेना) पर गहरी चिंता जताई गई है.
संपादकीय में हिंदू युवक की हत्या और फिर जला देने की घटना को 'सरकार की चिंताजनक विफलता' क़रार दिया और लिखा, "19 दिसंबर तक इस मामले में किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया. यह अकेली घटना नहीं है...इससे पहले की घटनाओं में अपराधियों को कटघरे में खड़ा करने में सरकार की विफलता को और संपूर्ण रूप से क़ानून व्यवस्था के नाकाम होने को दर्शाता है."
संपादकीय में पाँच सितंबर को एक सूफ़ीवादी व्यक्ति को ज़िंदा जलाए जाने की घटना का ज़िक्र किया और बांग्लादेश में बढ़ते धार्मिक कट्टरपंथ का नतीजा बताया.
धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के नाम पर दूसरे धर्म के व्यक्तियों, समूहों पर हमले की घटना को आम बताते हुए अख़बार ने लिखा है कि 'बढ़ती धार्मिक कट्टरता विनाशकारी और अव्यवस्था पैदा करने वाली बन चुकी है.'
अख़बार ने लिखा है कि 'सरकार को अपनी विफलता स्वीकार करनी चाहिए और अपने रुख़ में सुधार करना चाहिए.'
गुरुवार रात क्या हुआ, डेली स्टार ने बताया
हिंसा की वजह से द डेली स्टार और प्रथम आलो का प्रकाशन शुक्रवार को बंद रहा.
शनिवार को डेली स्टार ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें हमले की डरावनी रात क्या-क्या हुआ इसको विस्तार से बताया गया है. अख़बार ने कहा कि उसके दफ़्तर पर हमला 'सुनियोजित साज़िश' का हिस्सा था.
इस लेख में ही बताया गया है कि आगज़नी के दौरान जब सारे पत्रकार छत पर थे तो सेना ने उन्हें वहाँ से सुरक्षित बाहर निकाला.
अख़बार के मुताबिक़, गुरुवार आधी रात को द डेली स्टार का दफ़्तर पूरी क्षमता में काम कर रहा था. पहले एडिशन की डेडलाइन क़रीब थी और रिपोर्टर अंतिम पलों का अपडेट लिख रहे थे. इसी समय रिपोर्टरों को संदेश आने लगे थे कि पास ही एक अन्य अख़बार के दफ़्तर पर हमला करने के बाद भीड़ उनके दफ़्तर की ओर आ रही है.
न्यूज़रूम में सभी पत्रकारों को अलर्ट कर दिया गया और सभी लोग अपने कम्प्यूटर बंद कर उतने की तैयारी करने लगे. जैसे ही सभी लोग सीढ़ियों से दूसरे माले पर पहुंचे तभी इमारत के पास ज़ोर का धमाका सुनाई दिया.
कांच टूटने और फ़र्नीचर तोड़े जाने की आवाज़ से लगा कि भीड़ दफ़्तर में घुस गई है. इसके बाद सभी लोग दूसरे फ्लोर लौट गए. हालात बिगड़ रहे थे और इमारत में धुआं भरने लगा. धुआं इतना गहरा था कि लोग सांस नहीं ले पा रहे थे और बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. बचने के लिए सभी लोग छत पर पहुंच गए.
फ़ायर बिग्रेड ने उन्हें बचाने के लिए एक क्रेन तैनात किया लेकिन भीड़ नीचे थी और लोगों ने उतरने से मना कर दिया. जब क्रेन दूर चली गई इसके बाद छत पर दरवाज़े को खटखटाने की आवाज़ आई. पता चला कि वे सेना के जवान थे.
सेना के आने की पुष्टि होने के बाद दरवाज़ा खोला गया और सभी लोग सीढ़ियों के रास्ते इमारत से चुपचाप बाहर निकले.
बांग्लादेश के मीडिया में ग़ुस्सा
बांग्लादेश के प्रमुख अख़बारों और मीडिया संस्थानों ने ढाका में हिंसा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और प्रेस पर हमले को लेकर चिंता व्यक्त की है.
शुक्रवार को ढाका ट्रिब्यून के एक लेख में कहा गया है कि 'जब द डेली स्टार के दफ़्तर पर हमला हुआ तो उस समय 30 पत्रकार मौजूद थे और वे इमारत की छत पर थे.'
लेख में सवाल उठाया गया है, "क्या इमारत ही निशाना थी या भीड़ इमारत के अंदर लोगों को जलाने की कोशिश कर रही थी?"
लेख में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर हिंसा काबू करने में बुरी तरह विफल होने का आरोप लगाया गया है,
कहा गया है, "सरकार को कम से कम इतना तो करना ही चाहिए: जांच करे, वायरल वीडियो में जिन लोगों के चेहरे पहले से दिख रहे हैं, उनकी पहचान करे और उन्हें क़ानून के सामने पेश करे. अगर सरकार इतना भी करने में नाकाम रहती है, तो यह वही पुष्टि होगी, जो आज रात की आग पहले ही इशारा कर रही है: कि वह उन चीज़ों की सुरक्षा नहीं कर सकी, जिन्हें सबसे ज्यादा सुरक्षा की ज़रूरत थी."
शनिवार को ढाका ट्रिब्यून के एक दूसरे लेख में कहा गया, "हमारा भविष्य आम राजनीतिक तौर तरीक़ों पर निर्भर नहीं रह सकता." लेख में देश में एक ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया भरोसे पैदा करे और लोगों को जोड़े.
एक अन्य लेख में ढाका ट्रिब्यून ने लिखा, 'क्या यही इंसाफ़ है?' और पूछा- 'सरकार कहां थी?'
इसमें लिखा गया है, "देश इस समय जिस ग़ुस्से, हताशा और सबसे बढ़कर सामूहिक शोक से गुज़र रहा है, उसे समझा जा सकता है. लेकिन इसके बावजूद, देशभर में भड़की हिंसा, जिसमें द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों के साथ-साथ धाननमंडी स्थित छायानट जैसे सांस्कृतिक संस्थानों में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई, जिसे केवल एक हिंसक भीड़ का कृत्य कहा जा सकता है, न सिर्फ चौंकाने वाली और दुखद घटना थी बल्कि बेहद निराशाजनक भी है."
अख़बार ने पूछा, "देश यह जानने का हक़दार है कि कैसे और क्यों भीड़ को इकट्ठा होने, संगठित होने और कुछ ही मिनटों में इतनी क्रूरता के साथ तबाही मचाने की इजाज़त मिल गई. ऐसे हमले जिन्हें हम पिछले एक साल या उससे अधिक समय में कई बार देख चुके हैं, को भांपने और रोकने में नाकामी शासन व्यवस्था में एक हैरान करने वाली और ख़तरनाक विफलता को दर्शाती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.