ट्रंप ने पुतिन के साथ वार्ता के लिए सऊदी अरब का सुझाव क्यों दिया?

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- Author, मनल खलील
- पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते दिनों कहा कि वो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ यूक्रेन में जंग ख़त्म करने को लेकर वार्ता करेंगे.
उनके इस बयान के बाद कई लोगों के जहन में ये सवाल आया कि उन्होंने इस अहम वार्ता के लिए सऊदी अरब को ही क्यों चुना?
वार्ता कब होगी, इसे लेकर ट्रंप ने कोई तारीख नहीं बताई लेकिन कहा यह बैठक निकट भविष्य में हो सकती है. साथ ही उन्होंने कहा कि इसके लिए दोनों नेताओं की मुलाक़ात सऊदी अरब में हो सकती है.
उन्होंने ये भी बताया कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी इस वार्ता का हिस्सा हो सकते हैं. सऊदी अरब ने भी इस संभावित पहल का स्वागत किया है.

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ट्रंप ने रूस-यूक्रेन जंग रोकने के मौके़ तलाशने के मद्देनजर इसी सप्ताह बुधवार को पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के साथ फ़ोन पर अलग-अलग चर्चा की, जिसके कुछ देर बाद उन्होंने पुतिन से संभावित मुलाक़ात की बात कही.
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अमेरिका और रूस के प्रनितिधियों की टीमें इसके लिए तुरंत चर्चा शुरू करेंगी.
ट्रंप का बयान आने के बाद शुक्रवार को सऊदी अरब ने भी एक बयान जारी किया और कहा कि ट्रंप और पुतिन के बीच फ़ोन कॉल पर हुई बात और "सऊदी अरब में वार्ता होने की संभावना की हम सराहना करते हैं."
बयान में कहा गया, "रूस और यूक्रेन के बीच शांति के प्रयासों में सऊदी अरब अपना सहयोग देना जारी रखेगा."
तटस्थ स्थान
ट्रंप और पुतिन की संभावित वार्ता के लिए चीन और संयुक्त अरब अमीरात ने भी मेज़बानी की पेशकश की है.
वॉशिंगटन में मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष पॉल सलीम तर्क देते हैं, "ट्रंप और पुतिन की मुलाक़ात के लिए सऊदी अरब बेहतर विकल्प है क्योंकि यह तटस्थ स्थान है."
सलीम कहते हैं कि किसी यूरोपियन देश में बैठक करना काम नहीं करेगा क्योंकि यूरोप ने यूक्रेन जंग में एक मज़बूत पक्ष रखा है.
वहीं इंटरनेशनल रिलेशन्स के प्रोफे़सर डॉ खत्तर अबायू दायिब कहते हैं, "वार्ता के लिए जेनेवा जैसे तटस्थ जगहों को चुना जाता है. लेकिन रूस के स्विट्जरलैंड और यूरोप के दूसरे देशों के साथ बिगड़ते संबंधों की वजह ये यह विकल्प बना है."
वो कहते हैं कि सऊदी अरब ने पुतिन के साथ विश्वास बनाया है और वो इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) के लिए हुई संधि का सिग्नेटरी भी नहीं है.
2023 में आईसीसी ने पुतिन को यूक्रेन के साथ जंग के संबंध में युद्ध अपराधों के लिए ज़िम्मेदार मानते हुए अरेस्ट वारंट जारी किया था.
लेकिन पुतिन बिना गिरफ्तारी के डर से सऊदी अरब की यात्रा कर सकते हैं.
मध्यस्थ की भूमिका

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रूस और यूक्रेन का भरोसा हासिल करते हुए सऊदी अरब ने रूस की जेल में बंद अमेरिकी नागरिकों की रिहाई में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है.
हाल ही में हुई एक व्यक्ति की रिहाई सऊदी अरब की अगुवाई में ही हुई. रूस ने एक अमेरिकी टीचर मार्क फोगल को तीन साल तक डिटेन रखने के बाद छोड़ा.
अमेरिका के मध्य पूर्व मामलों के प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ़ के मुताबिक सऊदी के क्राउन प्रिंस ने मार्क की रिहाई में अहम भूमिका निभाई.
सऊदी अरब ने कई बार पुतिन और जेलेंस्की को शांति समझौते की संभावना के मद्देनजर न्यौता दिया है.
इसके अलावा कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ सऊदी अरब ने जेद्दा में एक अंतरराष्ट्रीय सभा का आयोजन भी किया.
2023 में पुतिन की रियाद यात्रा के दौरान मोहम्मद बिन सलमान ने उन्हें सऊदी अरब की सरकार और जनता का विशेष मेहमान बताया.
गल्फ मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल्लाह बाबुद मानते हैं कि सऊदी अरब मध्यस्थ की वैसी ही भूमिका निभाना चाहता है जैसी ओमान, क़तर और यूएई निभाते हैं.
बाबुद कहते हैं कि ट्रंप-पुतिन की वार्ता सऊदी अरब के लिए राजनयिक तौर पर फायदेमंद भी साबित हो सकती है जिनमें अब्राहम एकॉर्ड्स समझौते पर हस्ताक्षर भी शामिल है. यह समझौता चार अरब देशों और इसराइल के बीच द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य कर सकता है.
पॉल सलीम मानते हैं कि ट्रंप, अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को आर्थिक और निवेश के मद्देनज़र मज़बूत करना चाहते हैं. ट्रंप की रुचि भविष्य में अमेरिका-सऊदी-इसराइली एग्रीमेंट बनाने पर भी है.
स्ट्रैटेजिक कम्यूनिकेशन के प्रोफे़सर डॉक्टर निदाल चौकेर कहते हैं कि सऊदी अरब को लेकर ट्रंप की मध्य-पूर्व रणनीति खासकर इसराइल-फलस्तीन तनाव की वजह अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है.
निदाल सऊदी अरब पर अमेरिका के हालिया दबाव की ओर भी इशारा करते हैं.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने हाल ही में ग़ज़ा के लोगों को सऊदी अरब में जगह देने के लिए कहा, जिसे सऊदी अरब ने नकार दिया.
तेल भी है अहम फैक्टर

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अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, इस लिस्ट में उसके बाद सऊदी अरब और रूस का नंबर आता है.
रूस-यूक्रेन की जंग के चलते वैश्विक उर्जा बाज़ार प्रभावित हुआ है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस दौरान तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने में सऊदी अरब ने अहम भूमिका निभाई है.
ओपेक प्लस गठबंधन के 8 सदस्यों जिनमें रूस और सऊदी अरब भी शामिल हैं, उन्होंने दिसंबर 2024 में मांग में कमी के बाद अतिरिक्त तेल उत्पादन पर रोक लगाई.
बाबुद मानते हैं कि बड़े तेल उत्पादक होने की वजह से रूस और सऊदी अरब के हित एक जैसे हैं. वो कहते हैं कि ट्रंप-पुतिन वार्ता का फोकस सिर्फ यूक्रेन के साथ जंग का अंत करने पर नहीं होगा बल्कि इसमें आर्थिक साझेदारी के मद्देनज़र तेल की वैश्विक कीमतों पर भी बात होगी.
वो कहते हैं, "ट्रंप अमेरिका की उर्जा कंपनियों के लिए कच्चे तेल की बेहतर कीमतें सुरक्षित कर सकते हैं. खासकर तब जब वो अतीत में कम कीमतों की बात कर चुके हैं."
बाबुद कहते हैं ट्रंप की प्राथमिकता क्लीन एनर्जी के बजाय जीवाश्म ईंधन का उत्पादन है और सऊदी अरब बड़ा तेल निर्यातक है.
अमेरिका के अलग हित भी हैं

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2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने अपनी की पहली यात्रा के लिए सऊदी अरब को चुना. इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर सऊदी अरब के राजनयिक कद में इजाफा हुआ.
ट्रंप ने इशारा किया है कि दूसरे कार्यकाल में भी उनकी पहली विदेशी यात्रा सऊदी अरब की ही हो सकती है. इसके लिए उन्होंने प्राइस टैग भी लगाया है.
पिछले महीने पत्रकारों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर सऊदी अरब 450 या फिर 500 अरब अमेरिकी डॉलर की कीमत प्रोडक्ट अमेरिका से खरीदना चाहते हैं तो वो ज़रूर सऊदी अरब जाएंगे."
इसके कुछ दिन बाद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने कहा कि वो अमेरिका में अगले चार साल में क़रीब 500 अरब डॉलर का निवेश करना चाहते हैं.
इस बात के कुछ दिन बीत जाने के बाद ट्रंप ने कहा, "क्राउन प्रिंस शानदार व्यक्ति हैं और मैं उनसे आग्रह करूंगा की वो इस आंकड़ें को एक लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचा दें."
डॉक्टर निदाल मानते हैं कि ट्रंप सऊदी अरब को अमेरिका के रणनीतिक और आर्थिक साझेदार के रूप में देखते हैं.
वो कहते हैं कि वो खाड़ी देशों में अमेरिका की स्थिति को मज़बूत होते हुए देखना चाहते हैं खासकर तब जब बाइडन का झुकाव एशिया की ओर रहा.
डॉक्टर अबायू दायिब कहते हैं, "ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका की चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता के बीच, सऊदी अरब में अमेरिका अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है."
सऊदी अरब के ह्यूमन राइट्स के मामलों में ख़राब रिकॉर्ड के बावजूद अबायू और डॉक्टर निदाल चौकेर मानते हैं कि धार्मिक पुलिस को ख़त्म करने और महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति देने जैसे हालिया सुधारों के चलते सऊदी अरब की वैश्विक छवि में सुधार हुआ है.
वो मानते हैं कि इससे ट्रंप प्रशासन पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव भी कम हो गया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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