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पाकिस्तान में दुनिया के सबसे ज़हरीले लिक्विड की तलाश
- Author, उमर दराज़ नंगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
वैन से बाहर निकलते ही घुप्प अंधेरे की चादर ने मुझे पूरी तरह लपेट लिया. हालांकि इस अंधेरे में मैं पहाड़ की साफ ताज़ा हवा को महसूस कर पा रहा हूं.
चलते हुए मेरे पांव तले ज़मीन कभी पथरीली और कभी नर्म महसूस हो रही है. सावधानी से आगे बढ़ते मेरे आगे चल रहे तीन लोगों ने अपने-अपने टॉर्च जला लिए हैं.
इनकी अल्ट्रा वॉयलेट रोशनी आसपास पसरी गई. इनसे पैदा हुए बैंगनी रंग के तीन बड़े छल्लों के सहारे के हमने आसपास की बंजर ज़मीन का मुआयना शुरू कर दिया
आगे चल रहे तीन लोगों में से हरेक के हाथ में बड़े-बड़े चिमटे हैं.
घुटनों तक बूट और लंबी बांहों की टी-शर्ट पहने ये लोग अल्ट्रा वॉयलेट रोशनी से बचने के लिए धूप का चश्मा लगाए हुए हैं.
दरअसल ये लाहौर यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों का एक दल है और हम उनके साथ दक्षिणी पाकिस्तान के कोह–ए-सुलेमान पर्वत श्रृंखला के नीचे मौजूद हैं. ये जगह तौंसा शहर के नज़दीक मौजूद है.
बिच्छुओं और ज़हरीले सांपों की तलाश की लिहाज से ये बिल्कुल मुफ़ीद जगह है.
पाकिस्तान में जहरीले बिच्छुओं की तलाश
धीमी गति से आगे बढ़ते हुए डॉ. मोहसिन अहसान ने मुझसे कहा,''यहां बड़ी तादाद में बिच्छू और जहरीले सांप हैं. यही वजह है कि हम यहां आए हैं.''
डॉ. अहसान और उनकी टीम यहां पाकिस्तान में पाए जाने वाले सबसे ख़तरनाक बिच्छुओं की तलाश में आई है. इन बिच्छुओं के ज़हर का इस्तेमाल मेडिकल रिसर्च में होगा.
यहां बिच्छुओं और सांपों की तलाश करने वाले ज़्यादातर लोग काफी अनुभवी हैं. ये वैज्ञानिक पिछले दस साल से भी ज्यादा समय से जिंदा बिच्छुओं को पकड़ रहे हैं.
चिलचिलाती गर्मी, सांपों के काटने का ख़तरा या फिर काले मोटी पूंछ वाले बिच्छुओं के डंक के डर के बावजूद ये लोग ये काम कर रहे हैं.
दरअसल ज़हरीले बिच्छुओं का डंक के जरिये ज़हर सीधे लोगों के नर्वस सिस्टम में पहुंच जाता है. इससे कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को लकवा मार जाता है और उनकी श्वसन प्रणाली भी नाकाम हो जाती है.
लेकिन डॉ.अहसान बताते हैं, ''लेकिन हमारे लिए ये बिच्छुओं की सबसे अहम प्रजाति है. इसके ज़हर की गुणवत्ता काफी अच्छी होती है.''
वो कहते हैं, आज चांद की रोशनी नहीं है. चांद की रोशनी न होना इन बिच्छुओं को पकड़ने के लिए आदर्श स्थिति होती है.
सूरज ढलने के बाद ये बिच्छू अपने बिलों से बाहर निकल कर तीन चार घंटे तक कीट-पतंगों और दूसरी छोटी चीजों का शिकार करते हैं.
ज़हर पर रिसर्च
कुछ मिनटों के बाद इनमें से एक वैज्ञानिक ने एक इशारा किया. उनके साथ के सारे लोग एक जगह जमा हो गए.
डॉ.अहसान बताते हैं, '' ये मोटी पूंछ वाला काला बिच्छू है."
वो थोड़ा आगे झुक कर इसे देखते हैं.
"ये काफ़ी बड़ा है, लगभग 10 सेंटीमीटर लंबा. विशाल डंक और मोटी पूंछ का बिच्छू. और जैसा कि नाम से ही जाहिर है. इसके डंक के ठीक नीचे जहर एक छोटी सी पोटली होती है."
रोशनी में दिख रहा था कि ये अपने डंक से एक पतंगे को पकड़े हुए है. उसके डंक से इस पतंगे की जान निकल चुकी है.
पतंगे को पकड़े हुए ये बिच्छू अपने बिल में लौट गया. ये सब कुछ पलों भीतर ही हो गया था.
डॉ. अहसान बताते हैं कि सभी बिच्छू अल्ट्रा वॉयलेट रोशनी में चमकते हैं. इनके बाहरी कंकाल में हायालिन नाम का तत्व पाया जाता है. इसी वजह से ये चमकता है.
डॉ. अहसान बिच्छू के बिल में अंदर तक खोदते हैं और फिर अपने चिमटे से एक बिच्छू को निकाल कर कंटेनर में रख लेते हैं. अब भी बिच्छू ने पतंगे को दबोच रखा था.
आधी रात तक बिच्छुओं का 'शिकार' चलता रहा. इस दौरान पूरी टीम ने मिल कर एक दर्जन से अधिक बिच्छुओं को पकड़ा है. इनमें मोटी पूंछ वाले काले बिच्छुओं के साथ ही इंडियन रेड और अरबी प्रजाति के बिच्छू भी शामिल हैं.
इस बार कोई हादसा नहीं हुआ. इस प्रोग्राम की शुरुआत से अभी तक एक ही गंभीर हादसा हुआ है. एंड्रोक्टोनस परिवार के एक पीले बिच्छू ने एक पीएचडी स्टूडेंट को डंक मार दिया था. ये मोटी पूंछ वाले काले बिच्छू की प्रजाति का ही बिच्छू था.
बेहद बेशकीमती जहर
यूनिवर्सिटी के जंतु विज्ञान विभाग के डॉ. मोहम्मद ताहिर ने बताया कि इस स्टूडेंट को इलाज के लिए अस्पताल में ले जाना पड़ा था.
उन्होंने बताया कि इस किस्म के बिच्छूओं का ज़हर दुनिया की सबसे बेशकीमती लिक्विड में से एक है.
उन्होंने कहा, ''कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिच्छू का एक लीटर ज़हर करोड़ों डॉलर में बिकता है.''
शायद इसकी एक वजह ये हो सकती है कि इसे हासिल करना बेहद मुश्किल होता है.
पकड़े गए बिच्छुओं को पाकिस्तान के फ़ैसलाबाद कैंपस में अलग-अलग कंटेनर में रखा गया है क्योंकि ये स्वभक्षी होता है. यानी ये अपनी ही प्रजाति के बिच्छुओं को खाने लगते हैं.
वहां उन्हें माहौल में ढलने के लिए कुछ वक़्त दिया जाता है. इसके बाद उनका ज़हर निकाला जाता है. एक बार में उनसे ज़हर की एक छोटी बूंद ही निकाला जाता है.
कई बार दर्जनों बिच्छुओं का ज़हर निकाले जाने के बाद कुछ ही माइक्रोग्राम ज़हर जमा हो पाता है. इन्हें शून्य से 86 डिग्री से कम तापमान पर ख़ास फ्रिज में रखा जाता है.
ज़ाहिर है ये बेहद बेशकीमती ज़हर बिक्री के लिए नहीं है. यूनिवर्सिटी का ये प्रोजेक्ट सरकार की अनुमति से चल रहा है. इस ज़हर का इस्तेमाल ये अपने रिसर्च के लिए होता है. इसके अलावा यूनिवर्सिटी पाकिस्तान या विदेश में अपने सहयोगी संस्थानों के साथ इसे साझा करती है.
ज़हरीले बिच्छुओं की तस्करी
पाकिस्तान में बिच्छुओं का शिकार करने वाले और भी लोग हैं. ज़हर के लिए कई तस्कर गांव वालों से चालाकी से ये काम लेते हैं.
डॉ. अहसान बताते हैं, ''ये तस्कर गांव वालों से कहते हैं कि अगर उन्होंने 80 से 100 ग्राम वजन तक का बिच्छू पकड़ लिया तो उन्हें दसियों लाख रुपये मिलेंगे.''
वो कहते हैं, ''दरअसल इतने वजन के बिच्छू होते ही नहीं है. लेकिन ज्यादातर ग्रामीणों को इस बारे में पता नहीं होता है.''
आसानी से पैसा कमाने के लालच में जो भी बिच्छू मिलता है उसे पकड़ लेते हैं. चूंकि ये बिच्छू तस्करों के बताए गए बिच्छुओं से कम वजन के होते हैं इसलिए ग्रामीणों कुछ सौ रुपये ही मिल पाते हैं.
डॉ. अहसान कहते हैं, ''लेकिन ये तस्कर इन बिच्छुओं को अपने पास रख कर पाकिस्तान के बाहर ब्लैक मार्केट में बेच देते हैं. वहां दवा कंपनियां, रिसर्च करने और पेट्स की तरह रखने के शौकीन लोग इन्हें खरीद लेते हैं.''
ये विडंबना ही है कि बिच्छू का ज़हर काफी विषैला होता है लेकिन समझा जाता है कि दवा के तौर पर इसके इस्तेमाल की संभावना काफी अधिक है.
डॉ. अहसान ने बताया कि यूनिवर्सिटी ने अलबीनो चूहों पर इसका परीक्षण किया था. इस अध्ययन के दौरान पता चला कि इस जगह में मौजूद यौगिक (कंपाउंड) कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने में मदद कर सकते हैं. वो उनकी बढ़ने की गति को मोड़ कर कोशिकाओं को मारने में मदद कर सकते हैं.
इस अध्ययन के पूरा होने पर इसका अंतरराष्ट्रीय जर्नल में छापा जा सकता है.
ज़हर से दर्द का इलाज
डॉ. ताहिर बताते हैं कि ये ज़हर दर्द के इलाज में भी कारगर साबित हो सकता है.
वो बताते हैं, ''कुछ ज़हर ऐसे हैं, जिनमें पेप्टाइड्स पाया जाता है. ये नर्वस सिस्टम को मिलने वाले दर्द के संकेत को रोक देता है. यही वजह है बेहद घातक दर्द को रोकने के लिए ये कारगर साबित हो सकता है.''
ज़हर में पाया जाने वाला पेप्टाइड्स सूजन भी घटा सकते हैं.
जीसी लाहौर यूनिवर्सिटी की एक टीम ने जहर से इन पेप्साइड्स को अलग किया और ये देखने के लिए ट्रायल किया कि ये कितने कारगर हैं.
डॉ. ताहिर बताते हैं कि उन्हें काफी अच्छे नतीजे मिले हैं. उन्हें उम्मीद है कि इनसे भविष्य में सूजन कम करने की दवा बन सकती है.
रिर्सचरों की एक टीम उनकी देखरेख में काम कर रही है. वो बिच्छुओं के काटने का एंटीडॉट्स (प्रतिरोधक दवा) विकसित कर रही है.
ये लोग पाकिस्तान के किसी खास इलाके में पाए जाने वाले बिच्छुओं की प्रजातियों की जियोटैगिंग और पहचान करते हैं.
फिर इनके ज़हर का टीका दूसरे जानवरों का निकालते हैं ताकि ये पता किया जा सके ये कितना घातक है.
डॉ. ताहिर कहते हैं, ''एक बार किसी ख़ास प्रजाति के बिच्छू के ज़हर के विषैलापन तय कर लेने के बाद हम उस इलाके के कुछ खास पौधों और खर-पतवारों को जमा कर उन प्रजातियों के बिच्छुओं के लिए एंटी डॉट्स बनाते हैं.''
संभावित एंटी डॉट्स का फिर ये देखने के लिए परीक्षण किया जाता है कि ये कितना प्रभावी है.
इस काम में लगी टीमों को उम्मीद है कि एक दिन वो पाकिस्तान में जीवनरक्षक प्रतिरोधी दवाएं विकसित करने में कामयाब हो जाएंगे.