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डाउन सिंड्रोम से पीड़ित मिली खोपड़ी हमें निएंडरथल के बारे में क्या-क्या बताती है
- Author, क्रिस्टीना जे. ऑर्गाज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
समाज में रहने और एक दूसरे का ख़्याल रखने की वजह से ही मानव प्रजाति न सिर्फ़ अरबों सालों से अपना अस्तित्व बचाए हुए है बल्कि विकसित भी हुई है.
बहुत से वैज्ञानिक इसी सिद्धांत को मानते हैं. हाल ही में एक छोटी सी असामान्य विशेषताओं वाली हड्डी के अध्ययन से मिले साक्ष्य भी इसी बात का समर्थन करते हैं.
1989 में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने स्पेन के शहर वेलेंसिया के पास स्थित एक प्राचीन गुफ़ा कोवा नेग्रा से एक पांच सेंटीमीटर का छोटा हड्डी का टुकड़ा खोजा था, जो निएंडरथल के कान के आंतरिक हिस्से की हड्डी थी.
हालांकि, वो ये नहीं तय कर सके कि यह टुकड़ा लड़की के कान का है या लड़के का? टीम ने हड्डी का विश्षेलण करने के बाद उस लड़की या लड़के का नाम टीना रख दिया था.
निएंडरथल मानव के कान की हड्डी का टुकड़ा मिलना कोई सामान्य बात नहीं थी, आम तौर पर पुरातत्व वैज्ञानिकों को शरीर के बड़े हिस्से जैसे, दांत, खोपड़ी या हाथ-पैर के ही अवशेष मिलते हैं.
खोजकर्ताओं की रुचि खुदाई से मिले दूसरे अवशेषों में अधिक थी पर वह जानते थे कि इस हड्डी का मिलना कितनी महत्वपूर्ण खोज है.
मानव प्रजाति के सबसे निकटतम क़रीबी
40 हजार साल पहले विलुप्त होने तक निएंडरथल हजारों सालों तक यूरोपीय क्षेत्र में रहते थे.
निएंडरथल मानव को आधुनिक मानव प्रजाति के सबसे निकटतम करीबियों में से एक माना जाता है.
होमो सेपियंस (आधुनिक मानव प्रजाति) निएंडरथल ( होमो निएंडरथल) को होमोनिड के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो एक साथ रहते थे और उनके पूर्वज भी एक हैं.
अनुमान के अनुसार यह जीवाश्म उच्च पुरापाषाणकाल का है. जिसका मतलब यह है कि यह जीवाश्म 12,000 से 40,000 साल पुराना हो सकता है.
उत्खनन टीम का नेतृत्व करने वाले वेलेंसिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इमरेट्स वैलेंटीन विलावेर्डे ने बताया “सीटी स्कैन से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह निएंडरथल जन्म से ही डाउन सिंड्रोम से पीड़ित थी, जिसके कारण उसे जीवन भर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा, यह चौंकाने वाली बात थी”
विलावेर्डे बताते हैं कि जीवाश्म में दिख रही क्षति को देखकर यह कहा जा सकता है कि टीना को लगातार कान संबंधी संक्रमण जैसे बहरापन, संतुलन में परेशानी और चलने फिरने की समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा.
विलावेर्डे बताते हैं, “टीना को कई गंभीर परेशानियों और ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा होगा जिससे उभर पाना उसके लिए अकेले संभव नहीं हुआ होगा. जिससे उसके अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हुआ होगा”.
डाउन सिंड्रोम एक अनुवांशिक बीमारी या दशा है, जिसमें मानव में एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) बढ़ जाता है, जिससे इंसान को माासिक दिव्यांगता के साथ-साथ हृदय, पाचन क्रिया और अन्य अंगों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.
इन सब के बाद भी टीना 6 साल तक जीवित रही. जो कि प्रागैतिहासिक काल में डाउन सिंड्रोम के साथ जन्मे बच्चे के लिए उम्मीद से अधिक है.
बीसवीं सदी की शुरुआत में 1920 से 1940 के दशक में डाउन सिंड्रोम के साथ जन्में बच्चे की उम्र 9-12 साल होती थी.
टीना के कान की हड्डी का विश्लेषण करने वाली अल्काल विश्वविद्यालय की टीम ने यह निष्कर्ष निकाला कि ऐसी स्थिति में बच्चे के ज़िंदा रखने के लिए जितनी देखभाल की ज़रूरत होती है, वो मां की क्षमताओं से परे हैं. इसमें सामाजिक समूह और दूसरे लोगों की आवश्यकता रही होगी.
साइंस एडवांस जर्नल के जुलाई एडिशन में उनके निष्कर्ष को प्रकाशित किया गया.
व्यवहार पर असर
निएंडरथल शिकारी थे जो बहुत बड़े क्षेत्र में घूमते रहते थे.
ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या यह देखभाल परोपकार के लिए थी या अपने स्वार्थ के लिए.
विलावेर्डे कहते हैं “अगर उन्होंने अपने बच्चे की विशेष देखभाल नहीं की होती तो बच्चे का 6 साल तक जीवित रहना संभव नहीं था”
यह लंबे समय से मालूम है कि निएंडरथल अक्षम (दिव्यांग) लोगों की देखभाल करते थे पर उसके पीछे के कारणों को लेकर बहस होती रहती है.
लेखकों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का कहना है “कुछ लेखकों का मानना है कि देखभाल लोगों के बीच एक पारस्परिक क्रिया थी, दूसरे इस बात को लेकर बहस करते हैं कि करुणा की भावना से देखभाल करना अत्यधिक आधुनिक सामाजिक क्रिया है.”
एचएम हॉस्पिटल्स और अल्काला विश्वविद्यालय में इवोल्यूशनरी ओटोकॉस्टिक्स और पैलियोएंथ्रोपोलॉजी की अध्यक्ष और शोधकर्ता मर्सिडीज कोंडे वाल्वरडे ने उत्तरी स्पेन के पुरातात्विक स्थल अटापुर्का से बीबीसी की मुंडो सेवा से बात की.
उन्होंने टीना की हड्डी का अध्ययन करने वाली स्पेनिश टीम का नेतृत्व किया था.
वो कहती हैं, “ बीमारी से ग्रसित दूसरे निएंडरथलों के भी जीवाश्म मिले हैं जिन्हें भी लोगों की सहायता की आवश्यकता रही होगी. अपनी ज़िंदगी के दौरान उन्हें बीमारी, घाव, टूटी हड्डियां और ट्रॉमा का सामना करना पड़ा होगा, पर वे सभी वयस्क होने के बाद बीमार हुए थे. किसी को भी जन्म से बीमारी नहीं थी.”
“व्यवहार के आशय में विवाद इस बात को लेकर है कि जब आप वयस्क हैं और कोई आपकी सहायता कर रहा है तो क्या यह परोपकारी व्यवहार है - मुझे लग रहा है कि मुझे तुम्हारी सहायता करनी चाहिए इसलिए मैं कर रहा हूं या यह पारस्परिक व्यवहार है कि तुमने कभी मेरी मदद की थी इसलिए आज मैं तुम्हारी सहायता कर रहा हूं या फिर भविष्य में तुम मेरी सहायता करोगे.”
कितने परोपकारी हैं हम?
टीना का मामला अपवाद है क्योंकि वह इस बीमारी के साथ पैदा हुई थी उसके बाद भी वह 6 साल तक जीवित रही.
शोधकर्ताओं का कहना है कि “टीना का ख़याल रखने में उन्हें उसकी काफी मदद करनी पड़ी होगी, चूंकि टीना एक बच्ची थी इसलिए उन्हें बदले में किसी सहायता की अपेक्षा नहीं रही होगी.
चूंकि बच्चों से बदले में कुछ मिलने की संभावना बहुत कम होती है इसलिए गंभीर बीमारियों के साथ जन्मे बच्चों का अध्ययन काफी महत्वपूर्ण होता है.
हम अपनी प्रजाति के विकास को लेकर यह कह सकते हैं कि हमारी ही तरफ निएंडरथल भी परोपकारी प्रवृत्ति के थे.
डाउन सिंड्रोम के एक ज्ञात मामले में डाउन सिंड्रोम के साथ जन्मा चिपैंजी अपनी मां और बड़ी बहन से मिली देखभाल की मदद से 23 महीने तक जीवित रहा था.
बहन की ओर से देखभाल में हाथ बटाना बंद करने के बाद मां जरूरी देखभाल करने में असमर्थ हो गई जिसके बाद चिपैंजी की मृत्यु हो गई.
कोंडे वाल्वरडे बताती हैं कि शोधकर्ताओं का कहना है कि आधुनिक मानव और निएंडरथल अलग-अलग विकासवादी वंश से आते हैं इसके बावजूद दोनों में करुणा की भावना पायी जाती हैं “इसका मतलब यह है कि दोनों के पूर्वजों में यह भावना रही होगी जिससे हमें यह विरासत में मिली है”.
वो कहती हैं, “हमारा मानना है कि अन्य समूहों के सदस्य टीना की मदद सीधे करते रहे होंगे या उसकी मां की मदद करते रहे होंगे ताकि वह उन कार्यों को कर सकें जिसकी आवश्यकता उसे टीना की देखभाल करने में पड़ती होगी. निएंडरथल प्रजाति काफी हद तक हमारी जैसी ही थी.”
निएंडरथलों के बीच देखभाल की भावना एक बड़े और जटिल सामाजिक दृष्टिकोण का हिस्सा है. बच्चों का अध्ययन कर शोधकर्ताओं के पास यह देखने का मौका है कि क्या देखभाल का सीधा संबंध सहयोगात्मक पैरेंटिग जैसी जटिल सामाजिक प्रक्रिया से है या नहीं.
अध्ययन से मालूम चला है कि पुरा-पाषाणकालीन साक्ष्यों के आधार पर देखभाल के अस्तित्व का अनुमान लगाना संभव नहीं है और जो भी निष्कर्ष निकाले गए हैं वे अनुचित धारणाओं पर आधारित हैं.
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में प्रागैतिहासिक काल में देखभाल के अस्तित्व को लेकर पुरापाषाणकालीन साक्ष्यों को जानकारी का स्रोत माना जा रहा है. इस आधार को मजबूती भी मिल रही है.
जैव-पुरातत्व देखभाल के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जीवाश्म को देखकर यह निर्धारित करना कि आखिर लोग क्यों अपने समुदाय के अस्थायी या स्थायी विकलांग लोगों की देखभाल में अपना समय और प्रयास लगाते हैं.
एचएम हॉस्पिटल्स और अल्काला विश्वविद्यालय में इवोल्यूशनरी ओटोकॉस्टिक्स और पैलियोएंथ्रोपोलॉजी की अध्यक्ष व शोधकर्ता मर्सिडीज कोंडे वाल्वरडे कहती हैं कि यह खोज “मेरे लिए बहुत सुंदर है क्योंकि यह डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों की कहानी बताती है. हम सभी मानव विकास का हिस्सा हैं, हम सभी के पास एक संदर्भ है और हम सभी अपना प्रतिनिधित्व कर सकते हैं. हम वहां हमेशा से रहे हैं, हमने हमेशा से साथ में यात्राएं की हैं.”
“फिर एक और अधिक गहरा, तकनीकी, वैज्ञानिक मुद्दा, एक विकासवादी जैविक समस्या, जो एक सवाल भी है कि समुदायों के अंदर एक दूसरे की देखभाल करने का ख़ास मानवीय व्यवहार कब उत्पन्न हुआ.”
प्रोफेसर अपनी बात खत्म करते हुए कहती हैं, “मुझे पूरा विश्वास है कि दूनिया में दूसरी ऐसी कोई और टीम नहीं है जो कि जीवाश्म को देख कर इस बात का अनुमान लगा सकती थी कि यह क्या है और उस पर शोध करके साइंस एडवांसेस जैसी जर्नल में पब्लिश करा सकती थी.”
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