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बांग्लादेश में रसेल वाइपर सांपों को मारने की होड़ क्यों लगी
बांग्लादेश में बीते कुछ महीनों से रसेल वाइपर या चंद्रबोड़ा सांप का आतंक फैल रहा है.
बीते कुछ दिनों से देश के विभिन्न स्थानों पर रसेल वाइपर समझ कर तमाम किस्म के सांपों को पीट-पीट कर मार डाला जा रहा है. इस बारे में तरह-तरह की अफ़वाहें भी फैलाई जा रही हैं.
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बांग्लादेश में पाए जाने वाले सांपों में से 85 प्रतिशत से ज़्यादा में जहर नहीं होता. रसेल वाइपर या चंद्रबोड़ा सांप भी जहरीले सांपों की सूची में नौवें स्थान पर है.
इस समय लोग आतंक की वजह से जिन सांपों को मार रहे हैं, उनमें से ज़्यादातर विषहीन और पर्यावरण के लिए उपयोगी हैं.
जीव विशेषज्ञों का कहना है कि सांप जैव विविधता के एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे जीवों की तरह सांप भी काफ़ी अहम हैं.
अब सवाल उठ रहा है कि सांपों को जिस तरह बिना सोचे-समझे मारा जा रहा है उसका पर्वारण पर क्या असर पड़ सकता है?
अचानक रसेल वाइपर सांपों का प्रकोप
बीते कुछ सप्ताह से मीडिया में जिन मुद्दों ने सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, उनमें रसेल वाइपर सांप भी प्रमुख है. सांप की इस प्रजाति को बांग्लादेश में चंद्रबोड़ा या उलूबोड़ा कहा जाता है.
इस सांप को कभी बांग्लादेश में विलुप्त माना लिया गया था. लेकिन कोई 10-12 साल पहले इसके डँसने से लोगों की मौत की घटना हुई. सांप पर शोध करने वालों का कहना है कि वर्ष 2013 से देश में यह सांप ज़्यादा नज़र आने लगे.
वर्ष 2021 में देश के उत्तर-पश्चिम के कुछ इलाक़ों ख़ासकर पद्मा के तटवर्ती कुछ ज़िलों में चंद्रबोड़ा या रसेल वाइपर के काटने से दो लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य बीमार हो गए थे. उस समय इस घटना ने काफ़ी सुर्खियां बटोरी थीं.
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस साल मानिकगंज में इस सांप के काटने से बीते तीन महीने के दौरान पांच लोगों की मौत हो चुकी है. उनमें से ज़्यादातर किसान थे. इस समय धान काटने का सीजन चल रहा है. फसलों से भरे खेतों में सांप का उपद्रव स्वाभाविक माना जाता है.
चटगांव विश्वविद्यालय के प्राणिविज्ञान विभाग के प्रोफेसर फरीद अहसान ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "रसेल वाइपर पद्मा बेसिन के किनारे-किनारे मानिकगंज के तटवर्ती इलाकों में पहुंच गए हैं."
दूसरी ओर, राजशाही में इसी सप्ताह सांप के काटने से राजशाही विश्वविद्यालय के एक छात्र समेत दो लोगों की मौत की ख़बर मिली है.
धान काटने के इस सीजन में रसेल वाइपर के प्रकोप के कारण पद्मा नदी के तटवर्ती इलाकों के किसानों में सबसे ज्यादा आतंक फैल गया है.
रविवार को राजशाही के चारघाट उपजिला के सारदा में पद्मा के तट पर स्थित पुलिस अकादमी परिसर से रसेल वाइपर के आठ संपोलों को बरामद किया गया था. लेकिन मीडिया में छपी खबरों में कहा गया है कि पुलिस के जवानों ने उनको पीट-पीट कर मार डाला.
फरीदपुर के एक राजनेता ने तो सार्वजनिक तौर पर एलान कर दिया था कि रसेल वाइपर सांपों को मारने वालो को प्रति सांप 50 हजार टका का इनाम दिया जाएगा. हालांकि उन्होंने रविवार को अपना एलान वापस ले लिया.
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि रसेल वाइपर के आतंक के कारण जिन सांपों को पीट-पीट कर मारा जा रहा है, उनमें शंखिनी, अजगर, घरगिन्नी, दाराज, ढोंढ़ा सांप और गुईसांप समेत विभिन्न प्रजाति के सांप शामिल हैं.
यही लोग रसेल वाइपर सांप को निगल कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखते हैं. लेकिन इन उपयोगी सांपों को मार दिया जा रहा है.
अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर रसेल वाइपर सांपों के बारे में बड़े पैमाने पर नकारात्मक प्रचार की वजह से लोग आतंकित होकर बिना जाने-समझे प्रकृति के मित्र समझे जाने वाले विभिन्न प्रजाति के विषहीन सांपों और सरीसृप जीवों को मार दे रहे हैं. लोग कोई भी सांप देखते ही उसे मार दे रहे हैं.
मुख्य वन संरक्षक मोहम्मद अमीर हुसैन चौधरी बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "रसेल वाइपर कोई आक्रामक सांप नहीं है. उसे चोट पहुंचाने पर ही वह पलट कर हमला करता है. सांप मारने की कोई ज़रूरत नहीं है. लोगों को सतर्क रहना होगा. हम लोगों को जागरूक करने की दिशा में काम कर रहे हैं."
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मेडिकल सर्विस के आंकड़ों को मुताबिक़ देश में हर साल सांप काटने से क़रीब साढ़े सात हजार लोगों की मौत हो जाती है. इनमें से 120 की मौत रसेल वाइपर के काटने से होती है.
हुसैन कहते हैं, "जिन खेतों में फसल लगी होती है, वहां काफ़ी तादाद में सांप रहते हैं. इसलिए स्थानीय जन प्रतिनिधि, प्रशासन और स्वयंसेवक सांपों को मारने से रोकने और किसानों को जागरूक करने के लिए काम कर रहे हैं. लोगों में जागरूकता बढ़ने और सोशल मीडिया पर नकारात्मक प्रचार कम होने की स्थिति में कुछ दिनों में ही यह आतंक काफी कम हो जाएगा."
साँप पर्यावरण के लिए क्यों लाभदायक है?
विशेषज्ञों का कहना है कि जैव-विविधता की रक्षा करने में सांपों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. दरअसल, सांप प्रकृति के मित्र हैं और पर्यावरण का अभिन्न और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. सांप पारिस्थितिकी तंत्र में शीर्ष मांसाहारियों में से एक हैं.
'बांग्लादेश में साँप और साँप के काटने की रोकथाम और उपचार' नामक पुस्तक में कहा गया है कि सांप बेहद आलसी और निरीह जीव है. सांप इंसानों से डरते हैं. यही वजह है कि वो इंसानों को देखते ही भाग कर अपने प्राण की रक्षा करना चाहता है. लेकिन उस पर हमले की स्थिति में वह आत्मरक्षा के लिए पलट कर लोगों को काट लेता है. पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में सांप एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
मोहम्मद अबू सईद और मोहम्मद फरीद अहसान ने संयुक्त रूप से यह पुस्तक लिखी है.
इस पुस्तक के लेखक और चटगांव विश्वविद्यालय के प्राणिविद्या विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद फरीद अहसान बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "इस चक्र में सांप शिकारी भी हो सकता है और शिकार भी. इसकी वजह यह है कि सांप जिस तरह दूसरे जीवों को खाकर पर्यावरण संतुलन कायम रखता है, उसी तरह वह भी दूसरे जीवों का खाद्य बन कर पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाता है."
इस चक्र में सांप कीट नियंत्रण का एक प्राकृतिक तरीक़ा हैं. एक शिकारी के रूप में उन जीवों को खा कर सांप पर्यावरण संतुलन बनाए रखता है.
प्राणिविज्ञानियों का कहना है कि इस इलाक़े में क़रीब सौ साल पहले रसेल वाइपर सांपों की मौजूदगी थी. पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव के कारण ही अब इस प्रजाति के सांपों की संख्या बढ़ गई है. यानी गुई सांप, बेजि, चील और बाज जैसे जो जीव इस प्रजाति के सांपों को खा लेते थे उनकी संख्या कम हो गई है. रसेल वाइपर की संख्या बढ़ने की यह सबसे अहम वजह है.
अहसान कहते हैं, "रसेल वाइपर सांपों की संख्या बढ़ने की वजह यह है कि ईको सिस्टम में बदलाव आया है. इनको खाने वाले जीवों की संख्या कम हो गई है. यही वजह है कि इस प्रजाति के सांप बढ़ रहे हैं."
सांप को मारने का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकृति का हिस्सा रहे इन सांपों को मारने का असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा.फसली खेतों में सांपों को मार देने की स्थिति में चूहों का प्रकोप बढ़ जाएगा.
चूहे आमतौर पर हर साल 10 से 20 प्रतिशत फसलों को नष्ट कर देते हैं. बिना सोचे-समझे सांपों को मार देने की स्थिति में चूहों की तादाद बढ़ जाएगा. इसके कारण फसलों के उत्पादन में गिरावट आ जाएगी.
मुख्य वन संरक्षक हुसैन कहते हैं, "सांप चूहों और मेंढकों को खा जाते हैं. बेजी, बागदास, गंधोगोकुल और जंगली बिल्लियाँ सांप खाती हैं. उधर, शंखचूड़ और कोबरा समेत कुछ सांप रसेल वाइपर समेत दूसरी प्रजाति सांपों को खा जाते हैं. जिन खेतों में फसलें लगी होती हैं वहां सांप चूहों को खा जाते हैं. चूहों को खा कर वह फसलों की रक्षा करते हैं और किसानों की भलाई करते हैं. लेकिन अगर इन सांपों को इतने बड़े पैमाने पर मारने का सिलसिला जारी रहा तो शिकारी जीवों की एक श्रेणी कम हो जाएगी."
उनका कहना था, "यह सिलसिला नहीं थमा तो भविष्य में चूहों का संख्या काफी बढ़ जाएगी. वो फसलों को नष्ट कर देंगे. उसकी वजह से उत्पादन में गिरावट आएगी और उसका प्रतिकूल असर भोजन चक्र पर पड़ेगा. इससे साफ है कि अगर सांपों को मारा जाता रहा तो इससे भविष्य में काफी नुकसान होगा."
ढाका विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के प्रो. मो. अमीनुल इस्लाम भुइयां कहते हैं कि बांग्लादेश में सांपों के प्रति नकारात्मक नजरिए के कारण ऐसे जीवों को बिना सोचे-समझे मार दिया जाता है. लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में सांपों की भूमिका की भरपाई दूसरा कोई जीव नहीं कर सकता.
उन्होंने बीबीसी बांगला से कहा, "ईको सिस्टम में सांप की जो भूमिका है उसे दूसरे किसी जीव से रिप्लेस यानी बदला नहीं जा सकता. इस प्रणाली में प्रत्येक जीव दूसरे को प्रभावित करता है. ऐसे में सांपों की कमी से समूची खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) प्रभावित होगी."
वन्यजीव अधिनियम 2012 के मुताबिक, रसेल वाइपर सांप को संरक्षित प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. इस कानून के तहत रसेल वाइपर सांप को मारना, पकड़ना या उसे एक से दूसरी जगह ले जाना दंडनीय अपराध है.
इस बीच, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी एक बयान जारी कर आम लोगों सांपों को नहीं मारने की अपील की है.