'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट, क्या हैं सिफ़ारिशें और उसपर विपक्ष की प्रतिक्रिया?

वन नेशन वन इलेक्शन समिति की रिपोर्ट

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'वन नेशन वन इलेक्शन' यानी 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की संभावना पर विचार करने के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है.

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली इस समिति का कहना है कि सभी पक्षों, जानकारों और शोधकर्ताओं से बातचीत के बाद ये रिपोर्ट तैयार की गई है.

रिपोर्ट में आने वाले वक्त में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ नगरपालिकाओं और पंचायत चुनाव करवाने के मुद्दे से जुड़ी सिफारिशें दी गई हैं.

191 दिनों में तैयार इस 18,626 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया है कि 47 राजनीतिक दलों ने अपने विचार समिति के साथ साझा किए थे जिनमें से 32 राजनीतिक दल 'वन नेशन वन इलेक्शन' के समर्थन में थे.

रिपोर्ट में कहा गया है, "केवल 15 राजनीतिक दलों को छोड़कर शेष 32 दलों ने न केवल साथ-साथ चुनाव प्रणाली का समर्थन किया बल्कि सीमित संसाधनों की बचत, सामाजिक तालमेल बनाए रखने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए ये विकल्प अपनाने की ज़ोरदार वकालत की."

रिपोर्ट में कहा गया है कि 'वन नेशन वन इलेक्शन' का विरोध करने वालों की दलील है कि "इसे अपनाना संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होगा. ये अलोकतांत्रिक, संघीय ढांचे के विपरीत, क्षेत्रीय दलों को अलग-अलग करने वाला और राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व बढ़ाने वाला होगा."

रिपोर्ट के अनुसार इसका विरोध करने वालों का कहना है कि "ये व्यवस्था राष्ट्रपति शासन की ओर ले जाएगी."

इस समिति में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, कांग्रेस के पूर्व नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद, 15वें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और चीफ़ विजिलेंस कमिश्नर संजय कोठारी शामिल थे. इसके अलावा विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर क़ानून राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल और डॉ. नितेन चंद्रा समिति में शामिल थे.

वन नेशन वन इलेक्शन समिति की रिपोर्ट

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रिपोर्ट में समिति ने क्या-क्या कहा है, क्या सिफारिश की है?

  • आजादी के बाद पहले दो दशकों तक साथ में चुनाव न कराने का नकारात्मक असर अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज पर पड़ा है. पहले हर दस साल में दो चुनाव होते थे, अब हर साल कई चुनाव होने लगे हैं. इसलिए सरकार को साथ-साथ चुनाव के चक्र को बहाल करने के लिए क़ानूनी रूप से तंत्र बनाना करना चाहिए.
  • चुनाव दो चरणों में कराए जाएं. पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव कराए जाएं. दूसरे चरण में नगरपालिकाओं और पंचायतों के चुनाव हों. इन्हें पहले चरण के चुनावों के साथ इस तरह कोऑर्डिनेट किया जाए कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव के सौ दिनों के भीतर इन्हें पूरा किया जाए.
  • इसके लिए एक मतदाता सूची और एक मतदाता फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था की जाए. इसके लिए संविधान में ज़रूरी संशोधन किए जाएं. इसे निर्वाचन आयोग की सलाह से तैयार किया जाए.
साथ-साथ चुनाव करवाने को लेकर समिति की सिफारिशें

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त्रिशंकु सदन या सरकार गिरने पर क्या हो?

  • समिति की सिफ़ारिश के अनुसार त्रिशंकु सदन या अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति में नए सदन के गठन के लिए फिर से चुनाव कराए जा सकते हैं. इस स्थिति में नए लोकसभा (या विधानसभा) का कार्यकाल, पहले की लोकसभा (या विधानसभा) की बाकी बची अवधि के लिए ही होगा. इसके बाद सदन को भंग माना जाएगा. इन चुनावों को 'मध्यावधि चुनाव' कहा जाएगा, वहीं पांच साल के कार्यकाल के ख़त्म होने के बाद होने वाले चुनावों को 'आम चुनाव' कहा जाएगा.

कैसे कराए जाएं चुनाव?

  • आम चुनावों के बाद लोकसभा की पहली बैठक के दिन राष्ट्रपति एक अधिसूचना के ज़रिए इस अनुछेद के प्रावधान को लागू कर सकते हैं. इस दिन को "निर्धारित तिथि" कहा जाएगा.
  • इस तिथि के बाद, लोकसभा का कार्यकाल ख़त्म होने से पहले विधानसभाओं का कार्यकाल बाद की लोकसभा के आम चुनावों तक ख़त्म होने वाली अवधि के लिए ही होगा. इसके बाद लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के सभी एक साथ चुनाव कराए जा सकेंगे.
  • एक समूह बनाया जाए जो समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन पर ध्यान दे.
  • लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए ज़रूरी लॉजिस्टिक्स, जैसे ईवीएम मशीनों और वीवीपीएटी खरीद, मतदान कर्मियों और सुरक्षा बलों की तैनाती और अन्य व्यवस्था करने के लिए निर्वाचन आयोग पहले से योजना और अनुमान तैयार करे. वहीं नगरपालिकाओं और पंचायतों के चुनावों के लिए ये काम राज्य निर्वाचन आयोग करे.
एक राष्ट्र एक चुनाव

विपक्ष ने क्या कहा?

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख और हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इसके फायदे तो हैं लेकिन नुक़सान भी हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा, "जल्दी-जल्दी चुनाव होने से सरकारों को भी परेशानी होती है. वन नेशन वन इलेक्शन से कई तरह से संवैधानिक मुद्दे जुड़े हैं. लेकिन सबसे बुरा ये होगा कि सरकार को पांच साल तक लोगों की नाराज़गी की कोई चिंता नहीं रहेगी. ये भारत के संघीय ढांचे के लिए मौत की घंटी के समान होगा. ये भारत को एक पार्टी सिस्टम में बदल कर रख देगा."

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कांग्रेस नेता और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है, "एक देश, एक चुनाव कैसे हो सकता है जब मौजूदा सरकार (बीजेपी) जनादेश को स्वीकार ही नहीं कर रही? क्या पूर्व राष्ट्रपति और समिति के अन्य सदस्यों ने इस साठ-गांठ से पाए गए बहुमत पर भी कोई सिफ़ारिश की है?"

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