पाकिस्तान में एक थाने पर हमले के बाद फ़ौज से इतना नाराज़ क्यों हैं पुलिसवाले?

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- Author, तुरहब असग़र
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, लाहौर
“हमें थाने में नंगा कर हमारे साथ मारपीट की गई. हमें ज़लील किया गया. इसके जवाब में आईजी साहब ने अपने वीडियो संदेश में पुलिस पर किए गए अहसानों को गिनवाया. कितना अच्छा होता कि वह इस घटना के बाद अपनी पुलिस फ़ोर्स के साथ खड़े होते.”
“मेरे साथ ही कोई भी यहां ड्यूटी नहीं करना चाहता. इतनी मार खाते देखकर और ज़िल्लत के बाद तो जनता में भी पुलिस का डर बाक़ी नहीं रहा होगा. हमारे नेतृत्व ने हमें बहुत निराश किया है.”
ये बातें उन पुलिस अधिकारियों में से एक ने कही हैं, जिन्हें ज़िला बहावलनगर के ‘थाना डिवीज़न ए’ में पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों की ओर से कथित तौर पर हिंसा का निशाना बनाया गया.
पंजाब के शहर बहावलनगर में एक थाने पर फ़ौजियों के धावा बोलने और वहां पुलिस अधिकारियों से मारपीट की घटना हुए एक हफ़्ता होने को है. मगर इसकी गूंज अभी तक पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर सुनाई दे रही है.
नाम उजागर ना करने की शर्त पर बीबीसी से पंजाब पुलिस के कई जवानों और अधिकारियों ने बात की है.
इन अधिकारियों के अनुसार बहावलनगर घटना ने पुलिस फ़ोर्स के मनोबल को काफ़ी प्रभावित किया है.
ईद के दिन सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियोज़ शेयर किए गए, जिनमें वर्दी पहने सेना के अधिकारियों को थाने में पुलिस अधिकारियों को पीटते हुए देखा गया था.
इस घटना के दो दिन बाद पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग ‘आईएसपीआर’, पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस की ओर से इस घटना की ‘पारदर्शी और संयुक्त जांच’ की बात कही गई.
कहा गया कि जांच के ज़रिए सच्चाई सामने लाने की कोशिश होगी ताकि क़ानून का उल्लंघन और अधिकारों का ग़लत इस्तेमाल करने वालों की पहचान की जा सके. इस काम के लिए जॉइंट इन्वेस्टिगेशन टीम भी बनाई गई.
इस मामले पर गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने सोमवार को लाहौर में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान एक बार फिर कहा, “यह कोई बड़ी समस्या नहीं है. कुछ लोग इस मामले को उछाल रहे हैं.”
पुलिस के मनोबल के बारे में उन्होंने कहा कि एक घटना से ‘मोराल डाउन’ नहीं होता और पुलिस के हौसले बुलंद हैं.
उन्होंने दावा किया कि भारत में बिल्कुल इसी तरह की घटना हुई थी मगर वहां प्रतिक्रिया ऐसी नहीं थी जैसी यहां देखी गई.
पुलिस का मनोबल गिरने और पुलिस अधिकारियों की दूसरी आशंकाओं के बारे में जब बीबीसी ने आईजी पंजाब डॉक्टर उस्मान अनवर से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, “जेआईटी बना दी गई है लेकिन मैं दूसरे सवालों और बातों पर कोई राय नहीं देना चाहता हूं.”
'किसकी हिम्मत है कि फ़ौज को कसूरवार कहे'

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सुलह, स्पष्टीकरण और जेआईटी के गठन के बावजूद अभी तक इस मामले पर बहुत से लोग आशंका जता रहे हैं.
इनमें आम लोगों के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों और जवानों की बड़ी संख्या शामिल है. कई पुलिस अधिकारियों ने यह दावा भी किया कि बहावलनगर पुलिस उस घटना के विरोध में ड्यूटी करने को तैयार नहीं थी.
नाम छिपाने की शर्त पर बीबीसी से एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “बहावलनगर घटना ने पुलिस को कमज़ोर किया है. इससे भी अधिक नुक़सान पुलिस को आईजी साहब के वीडियो मैसेज से हुआ है. हम जानते हैं कि फ़ौज को अपनी ताक़त दिखाना अच्छा लगता है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि वह देश की दूसरी संस्थाओं का सम्मान ना करे. क़ानून तो सबके लिए बराबर है.”
उन्होंने कहा, “मैं जिस पद पर हूं, मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि मैं कैसे अपने जूनियर को उत्साह से काम करने के लिए कहूं. इसमें कोई शक नहीं कि इस घटना के बाद पुलिस में बेचैनी, ग़ुस्सा और अविश्वास की स्थिति है. इन हालात को उच्च स्तर पर नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की जा रही है.”
एक और अधिकारी ने पुलिस के मनोबल के बारे में कहा कि ‘सब अच्छा है, हम भाई-भाई हैं’ का राग सुनाने से सब ठीक नहीं हो जाएगा. “नारे तो लगवा दिए थे लेकिन आईजी साहब को चाहिए था कि अपनी फ़ोर्स के लिए डटकर खड़े होते. अगर वह ऐसा करते तो सारी पुलिस फ़ोर्स उनके पीछे खड़ी होती.”
इस बारे में एक एसएचओ का कहना था, “हमें यह बताया गया है कि हमारी क्या हैसियत है. पिछले एक साल से यही फ़ौज और पुलिस मिलकर काम कर रहे थे. जब पुलिस की ज़रूरत कम हो गई तो फ़ौज ने कहा कि हमें याद करवा दें कि इस देश में वो जो चाहें... कर सकते हैं.”
उन्होंने यह दावा भी किया कि जो जेआईटी बनाई गई है उसकी जांच में दोषी पुलिस ही निकलेगी. “किसकी हिम्मत है कि कोई फ़ौज को कसूरवार कहे, चाहे वह हमारे आईजी ही क्यों न हों.”
बीबीसी से एक बड़े अधिकारी का कहना था कि डॉक्टर उस्मान (आईजी) ने पुलिस फ़ोर्स के लिए बहुत काम किए हैं, इसलिए उनसे यह उम्मीद नहीं थी कि वह ऐसे मामले पर झुक जाएंगे.
उन्होंने कहा, “हमने पिछले दो वर्षों में देखा है कि पुलिस फ़ोर्स के मनोबल में इज़ाफ़ा हुआ और इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि पुलिस की लीडरशिप फ़ोर्स के साथ खड़ी थी. फ़ोर्स को जो कमांड दी गई उन्होंने वह पूरा करके दिखाया. इसके बाद भी आईजी का अपनी फ़ोर्स के साथ खड़ा होने की बजाय उन्हें कसूरवार कहना सबके लिए निराशाजनक है.”
'ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जिनमें कुछ ही सामने आती हैं'

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बहावलनगर इस तरह की पहली घटना नहीं है. इससे पहले भी इससे मिलती-जुलती घटनाएं हो चुकी हैं.
साल 2020 में रेंजर्स पर आईजी सिंध को कथित तौर पर अग़वा करने का इल्ज़ाम लगा था. उसी साल पुलिस पर मुस्लिम लीग (नवाज़) की नेता मरियम नवाज़ के पति कैप्टन सफ़दर के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करके गिरफ़्तार करने का दबाव डालने का आरोप सामने आया था.
इस घटना के बाद आईजी समेत पुलिस के दूसरे अधिकारियों ने दस दिन छुट्टी पर जाने का आवेदन दे दिया था.
पुलिस की प्रतिक्रिया, राजनीतिक और जनता के दबाव के बाद उस समय के सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने इस मामले में शामिल रेंजर्स के अधिकारियों की जांच का आदेश दिया था. उन्होंने उन अधिकारियों को जांच पूरी होने तक उनके पद से हटाने का आदेश दिया था.
इस बारे में पूर्व आईजी एहसान ग़नी का कहना था कि ऐसी घटनाएं होती रहती है.
वो बोले, “इनमें से कुछ सामने आ जाती हैं. जब मैं आईजी था तो मुझे याद है कि इस तरह की एक घटना हमारे एएसआई और सेना के बीच हुई थी. मैं एएसआई के लिए खड़ा हो गया था. मुझ पर प्रेशर आया था लेकिन मैंने फिर भी फ़ौज की बात न मानते हुए क़ानून के अनुसार एफ़आईआर दर्ज की थी.”
क्या ऐसी घटनाओं का पुलिस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?

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पूर्व आईजी एहसान ग़नी ने इस मामले पर बीबीसी से कहा, “यह सच है कि पुलिस फ़ोर्स का मनोबल ऐसी घटनाओं से गिरता है. मैं अलग-अलग रैंक के पुलिस अधिकारियों को एकेडमी में लेक्चर देता हूं. इस घटना के बाद उनकी ओर से भी ऐसे सवाल किए जा रहे हैं और आशंकाएं जताई जा रही हैं. इससे पता चलता है कि पुलिस पर कितना असर पड़ा है.”
उन्होंने कहा, “जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो इससे फ़ोर्स के आत्मविश्वास पर ग़लत असर पड़ता है. यही नहीं बल्कि जनता भी पुलिस को गंभीरता से नहीं लेती. इससे क़ानून लागू करवाने में समस्याएं आती हैं.”
“परेशानी उस समय होती है जब कोई भी संस्था या फ़ोर्स अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर कोई काम करती है. जैसा कि बहावलनगर की घटना में हुआ. देखा जाए तो इस घटना में अगर पुलिस की ग़लती निकाली जा रही है तो इसी तरह जो फ़ौज ने किया वह भी क़ानूनी तौर पर ग़लत था.”
उन्होंने कहा कि कहने को तो इस मामले पर जेआईटी बना दी गई है लेकिन सब जानते हैं कि इस देश में जेआईटी उस वक़्त बनाई जाती है जब किसी मामले को दबाना हो.
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