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ग़ज़ा की सरहद पर निगाहबान इसराइली आँखें जिन्होंने भांप ली थी हमास की साज़िश
- Author, एलिस कडी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इसराइल
इनको ग़ज़ा सीमा पर इसराइल की आंख के तौर पर जाना जाता है.
सालों से ये नई भर्ती हुई महिलाओं के लिए एक नौकरी है. ये निगरानी केंद्रों पर घंटों तक बैठती हैं और कुछ भी संदिग्ध हो रहा हो तो उसके बारे में सूचित करती हैं.
7 अक्तूबर को हमास के हमले से कुछ महीनों पहले इन महिला सैनिकों ने कुछ अलग-अलग चीज़ें देखनी शुरू कर दी थीं. ये बाड़ की दूसरी ओर छापेमारी, बंधकों को ले जाने का अभ्यास और किसानों को अजीब तरह से व्यवहार करते देखती थीं.
नोआ (ये उनका असली नाम नहीं है) कहती हैं कि वो जो देख रही थीं उसकी जानकारी ख़ुफ़िया और उच्च अधिकारियों को भेजती थीं लेकिन कुछ और करने में अक्षम थीं. वो कहती हैं, “हम सिर्फ़ आंखें थीं.”
इनमें से कुछ महिलाओं को ये बात साफ़ थी कि हमास कुछ बड़ी योजना बना रहा है. अगर नोआ के शब्दों में कहें तो ‘एक ग़ुब्बारा फूटने जा रहा था.’
बीबीसी ने इन युवा महिलाओं से संदिग्ध गतिविधियों में बढ़ोतरी के बारे में बात की है. उनसे पूछा है कि उन्होंने क्या रिपोर्ट फ़ाइल की थीं और इसराइली सुरक्षा बलों (आईडीएफ़) के अफ़सरों की ओर से किस तरह की कमी देखी गई.
हमने वो व्हाट्सऐप संदेश भी देखे हैं जिनमें इन महिलाओं ने 7 अक्तूबर से पहले के महीनों में बताया था कि सीमा पर क्या घटनाएं घट रही हैं.
सिर्फ़ ये महिलाएं नहीं थीं जो पहले से चेता रही थीं बल्कि ऐसे बहुत से सबूत मिले हैं जो बता रहे हैं कि इन संदिग्ध घटनाओं को लेकर सूचित किया गया था. इसको लेकर इसराइली सरकार पर भी ग़ुस्सा बढ़ रहा है.
बीबीसी ने उन शोकाकुल परिवारों से मुलाक़ात की है जिनकी बेटियां हमले में मारी गई थीं. साथ ही उन विशेषज्ञों से बात की है जो इन महिलाओं को दी गई आईडीएफ़ की प्रतिक्रिया को बॉर्डर इंटेलिजेंस फ़ेलियर के तौर पर देखते हैं.
आईडीएफ़ ने बीबीसी को जवाब दिया है कि वो ‘फ़िलहाल हमास आतंकी संगठन के ख़तरे को ख़त्म करने पर ध्यान लगाए हुए है.’ और उसने बीबीसी के सवालों के जवाब देने से इनकार कर दिया.
बॉर्डर यूनिट के एक पूर्व कमांडर ने बीबीसी से कहा, “समस्या ये है कि वे (सेना) अलग-अलग डॉट्स को जोड़ नहीं पाए.”
वो कहती हैं कि अगर वो ऐसा करते तो उन्हें ये एहसास हो जाता कि हमास कुछ अभूतपूर्व करने की तैयारी कर रहा है.
19 साल की शाई एशराम एक ऐसी ही महिला सैनिक थीं जो 7 अक्तूबर को ड्यूटी कर रही थीं.
अपने परिवार को किए गए कॉल के दौरान उनके पीछे गोलियों की आवाज़ें सुनी जा सकती थीं. वो कह रही थीं कि ‘आतंकी बेस पर हैं और अब बहुत बड़ी घटना होने जा रही है.’
वो उन दर्जनों निगरानी करने वाली सैनिकों में शामिल हैं जो हमले में मारी गई थीं जबकि कइयों का अपहरण कर लिया गया था.
हमास के हमले के बाद ग़ज़ा सीमा से एक किलोमीटर दूर नाहाल ओज़ बेस पर तैनात महिला सैनिकों ने व्हाट्सऐप ग्रुप पर अलविदा संदेश डालने शुरू कर दिए थे.
नोआ उस दिन ड्यूटी पर नहीं थीं और घर से ही इन संदेशों को पढ़ रही थीं. उस वक़्त उन्होंने सोचा कि ‘यही होने वाला था.’ जिस हमले के बारे में सोचकर वो डर रही थीं वो आख़िरकार हो गया था.
उनके बेस के कारण ये वो पहले इसराइली थे जिनका ग़ज़ा सीमा पर हमास से सामना हुआ था. इन महिलाओं की मिलिट्री यूनिट को हिब्रू भाषा में तात्ज़पितानियोत कहते हैं.
'हमारा काम सभी नागरिकों को सुरक्षित रखना है'
सीमा के नज़दीक अपने कमरों में बैठकर ये महिलाएं हर दिन घंटों तक निगरानी कैमरों से सीमा पार नज़र रखे रहती हैं. इनमें हाई टेक बाड़ और ग़ज़ा पर मंडराते ग़ुब्बारे शामिल हैं.
ग़ज़ा से लगी बाड़ पर ऐसी कई यूनिटें हैं और इसराइली सीमा पर अलग-अलग इनकी तैनाती है. इस यूनिट में सभी युवतियां हैं जिनकी आयु 18 से लेकर 23-24 वर्ष तक है. इनके पास बंदूक़ें नहीं होती हैं.
ख़ाली वक़्त में ये युवतियां डांस सीखती हैं, साथ मिलकर खाना बनाती हैं और टीवी कार्यक्रम देखती हैं. कइयों के लिए इनका सेना का वक्त पहली बार परिवार से दूर जाने वाला होता है और वे यहां पर आपस में बहनों की तरह रहती हैं.
लेकिन इनका कहना है कि ये अपनी ज़िम्मेदारियों को बेहद गंभीरता से लेती हैं.
नोआ कहती हैं, “हमारा काम सभी नागरिकों को सुरक्षा देना है. हमारा बेहद मुश्किल काम है, आप शिफ़्ट में बैठते हैं जिसके बाद आपको बिलकुल ईधर-उधर नहीं देखना होता है. आपको हमेशा ध्यान केंद्रित किए रहना होता है.”
सितंबर के आख़िर में आईडीएफ़ ने अपने एक लेख में बताया था कि तात्ज़पितानियोत इसराइल की ख़ास ख़ुफ़िया इकाई है जो ‘दुश्मन के बारे में सबकुछ जानती है.’
जब भी महिलाएं कुछ भी संदेहास्पद देखती हैं तो अपने कमांडर को सूचित करती हैं और अपने कंप्यूटर में उसको दर्ज करती हैं ताकि उसे अन्य वरिष्ठ अफ़सर देख सकें.
आईडीएफ़ के रिटायर्ड मेजर जनरल ईटन डैंगट कहते हैं कि ‘कुछ ग़लत हो रहा है इसके बारे में बताने के लिए’ तात्ज़पितानियोत बड़ी भूमिका निभाती है और ये जो भी चिंताएं कमांडर के सामने उठाती हैं उसको एक ख़ुफ़िया तस्वीर के तौर पर आगे पहुंचाना चाहिए.
वो कहते हैं कि ये किसी भी ख़तरे से निपटने में एक गुत्थी को सुलझाने में काम आते हैं.
हमास के हमले से पहले के महीनों में वरिष्ठ इसराइली अफ़सरों ने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा था कि हमास के ख़तरे को काबू पा लिया गया है.
लेकिन सीमा पर कई ऐसे संकेत मिल रहे थे कि कुछ ग़लत है.
सितंबर के आख़िर में नाहाल ओज़ पर एक नज़र रखने वाले शख़्स ने व्हाट्सऐप ग्रुप में अपनी यूनिट के दोस्तों से कहा, “क्या वहां कोई कार्यक्रम हो रहा है?”
इस पर तुरंत एक वॉयसनोट आया जिसमें कहा गया था, “लड़की तुम कहां हो? बीते दो हफ़्ते से हम इसे हर रोज़ देख रहे हैं.”
ये बताता है कि 7 अक्तूबर को हमले से पहले ऐसी बहुत सी घटनाएं होते हुए देखी गई थीं. साथ ही इस पर कइयों ने चिंताएं भी ज़ाहिर की थीं कि कोई हमला होने वाला है.
सेना में अभी भी सेवाएं दे रहीं नोआ बीबीसी से कहती हैं, “हम हर दिन उन्हें ये अभ्यास करते देखते थे कि हमला कैसे होगा. उनके पास एक मॉडल टैंक भी था जिसको लेकर वो अभ्यास किया करते थे कि किस तरह क़ब्ज़ा करना है.”
“बाड़ पर उनके पास हथियारों का एक मॉडल था और वो दिखाते थे कि कैसे उसे उड़ाएंगे और साथ में कॉर्डिनेट करते थे कि कैसे सुरक्षाबलों को क़ब्ज़े में करना है, उन्हें मारना है और अपहरण करना है.”
ईडन हादर बेस की एक दूसरे सैनिक हैं जो अपनी सेवा की शुरुआत के बारे में याद करती हैं. वो कहती हैं कि हमास के लड़ाके फ़िटनेस ट्रेनिंग करते थे.
अगस्त में जब वो मिलिट्री छोड़ रही थीं तब उन्होंने ये नोटिस किया कि अब वो एक असली मिलिट्री टेनिंग कर रहे थे.
सीमा पर ही एक दूसरे बेस पर तैनात गाल (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि उन्होंने भी ट्रेनिंग में बढ़ोतरी होते हुए देखी थी.
वो कहती हैं कि उन्होंने निगरानी वाले ग़ुब्बारे के ज़रिए देखा कि ‘ग़ज़ा के दिल में’ एक ऑटोमैटिक इसराइली हथियार का मॉडल बनाया गया है.
कई महिलाएं बताती हैं कि इसराइल की लोहे की दीवार के नाम से पहचाने जाने वाली बाड़ के नज़दीक बम से विस्फोट का अभ्यास किया गया ताकि अपनी मज़बूती को तौला जा सके. 7 अक्तूबर के हमले के वीडियो में हमास लड़ाकों को ऐसे विस्फोट करते देखा गया जिसके बाद लड़ाके मोटरसाइकिलों के ज़रिए इसराइल मे घुस आए.
एक पूर्व निगरानीकर्ता रोनी लिफ़शित्ज़ अभी भी सेना में हैं लेकिन हमास के हमले के समय वो ड्यूटी पर नहीं थीं. वो कहती हैं कि उन्होंने हमले से कुछ हफ़्तों पहले तक हमास लड़ाकों को लगातार पेट्रोलिंग करते देखा था जो गाड़ियों से बाड़ की दूसरी तरफ़ उनकी वॉच पोस्ट्स के पास आकर रुकते थे.
वो उन युवकों को याद करते हुए कहती हैं कि वो ‘बात करते थे, कैमरे और बाड़ को देखते थे और तस्वीरे लेते थे.’
वो कहती हैं कि वो उन लोगों के कपड़ों की वजह से उनको पहचानने में सक्षम हैं कि वो हमास की ख़ास नक़बा फ़ोर्स से थे. इसराइल कह चुका है कि अक्तूबर हमले के पीछे इसी ‘शीर्ष बल’ का हाथा था.
रोनी की बात और बीबीसी से बात करने वाली बेस पर तैनात एक दूसरी युवती की बात मिलती-जुलती है.
सीमा पर अजीब व्यवहार
निगरानी करने वाली कई महिलाएं बताती हैं कि घुसपैठ की कोशिशों की घटनाएं बढ़ी थीं.
एक महिला सैनिक ने हम से एक मैसेज साझा किया जिसमें उन्होंने सीमा पर गाड़ियों की बढ़ती आवाजाही और आईडीएफ़ के इसराइल में लोगों के घुसने की कोशिशों का ज़िक्र था. इस यूनिट के सदस्यों ने ऐसी कोशिशों को रोकने के लिए हार्ट इमोजी और जिफ़ फ़ाइलों से एक दूसरे को शुक्रिया कहा था.
एक अन्य महिला सैनिक शहाफ़ निसानी ने जुलाई में अपनी मां को एक संदेश भेजा था. इसमें उन्होंने लिखा था, “गुड मॉर्निंग ममी. मैंने अभी अपनी शिफ़्ट ख़त्म की है और हमने अभी (सीमा में घुसपैठ का) सामना किया लेकिन ये घटना वाक़ई में रोंगटे खड़ी करने वाली थी. ये ऐसा था जिसका सामना आज तक किसी ने नहीं किया.”
महिलाओं ने एकाएक सीमा पर व्यवहार में अजीब बदलाव देखा था.
वो कहती हैं कि ग़ज़ा के किसान, चिड़ियों को पकड़ने वाले और चरवाहे सीमा के नज़दीक बाड़ के क़रीब घूमने लगे. अब ये माना जा सकता है कि ये पुरुष हमले से पहले ख़ुफ़िया जानकारियां इकट्ठा कर रहे थे.
अविगेल नाम की ऑब्ज़र्वर ने बीबीसी को बताया, "हम सब को पहचानते थे. उनके रूटीन के बारे में जानते थे. लेकिन फिर अचानक हमें ऐसे लोग दिखने लगे जिन्हें हम नहीं जानते थे. नए किसान आने लगे. ये लोग नए इलाक़ों में फैलने लगे. धीरे-धीरे उनका रूटीन बदल गया.”
नोआ को भी याद है कि ये लोग धीरे-धीरे सरहद पर लगी कंटीली बाड़ के करीब आ रहे थे.
नोआ याद करती हैं, "पक्षी पकड़ने वाले ठीक बाड़ के पास अपने पिंजरे रखते थे. ये अजीब बात थी. किसान भी ठीक बाड़ के पास आने लगे थे. ऐसा लगता था कि वे जानकारी एकत्र कर रहे थे. ये सब कुछ संदेहास्पद था. हम हर वक़्त इसी बारे में बात करते थे.”
लेकिन यही मंज़र और भी कई लोग देख रहे थे. और उन्हें इसमें कुछ अजीब नहीं लग रहा था.
उनका कहना है कि हमास तो हमेशा हमले के लिए ट्रेनिंग करता रहता है. इन्हीं में से एक ने हमें बताया कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि सात अक्टूबर जैसा हमला मुमकिन है.
बॉर्डर पर निगाह रखने वाली कई महिलाओं ने बीबीसी को बताया है कि उन्हें साफ़ लग रहा था कि उनकी जानकारी पर कोई ग़ौर नहीं कर रहा है.
रोनी कहती हैं कि जब भी वो बॉर्डर पर मोटर वैन देखतीं तो प्रोटोकोल के तहत कमांडर को सूचित करतीं और तब तक उस पर निगाह बनाए रखतीं जब तक वो आँखों से ओझल न हो जाए. और फिर वो कंप्यूटर पर इस घटना को दर्ज कर देती थीं.
लेकिन रोनी को ये मालूम नहीं था कि उसकी रिपोर्ट पर वास्तव में क्या कार्रवाई हो रही है.
रोनी कहती हैं, "शायद ये सब ख़ुफ़िया तंत्र तक पहुँचता था. पर इसके बारे में कोई कदम उठाया जाता था या नहीं, ये मुझे नहीं मालूम. कभी भी दोबारा हमसे इन रिपोर्टों के बारे में किसी ने सवाल नहीं किया.”
नोआ को याद नहीं कि कितनी बार उन लोगों ने रिपोर्ट वाली फ़ाइल आगे बढ़ाई है. उनका कहना है कि यूनिट के भीतर हर कोई इन्हें गंभीरता से लेता था लेकिन आगे कभी कोई कुछ नहीं करता था.
अविगेल कहती हैं कि जब वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी सैन्य अड्डे पर आते थे तो उनसे कोई बात नहीं करता था. उनसे कोई नहीं पूछता था कि सरहद पर क्या चल रहा है.
वे कहती हैं, “वे आते, हमें कोई टास्क देते और चले जाते."
'हमारी बात कोई सुन क्यों नहीं रहा?’
बतौर यूनिट कमांडर गाल को हर ऑब्ज़र्वर सूचनाएं देते और वे ये जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुँचातीं.
उनका कहना है कि वरिष्ठ अधिकारी इस जानकारी पर कोई कदम नहीं उठाते थे.
कई महिलाओं ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार से भी इस बारे में बात की थी.
शहाफ़ की मां इलाना याद करती हैं, “शहाफ़ कहती थीं कि अगर किसी को उनकी बात नहीं सुननी है तो उनकी तैनाती का क्या औचित्य है? मेरे बेटी ने बताया कि उन्हें लगता था वहां कुछ गड़बड़ है. मैंने पूछा कि क्या तुम लोग शिकायत करोगे? अब मैं तो फौजी कामकाज नहीं जानती पर लगता है कि वरिष्ठ अधिकारियों को कुछ करना चाहिए था.”
शहाफ़ और उसके परिवार की चिंताओं के बावजूद, उन्हें इसराइली सेना पर पूरा भरोसा था. उन्हें यक़ीन था कि अगर हमास कोई योजना बना रहा है तो इसराइली सेना उससे निपटने में सक्षम है.
इलाना गहरी सांस लेते हुए बताती हैं, "आख़िरी महीनों में वो बार-बार कहती थीं कि युद्ध होगा. हम उसकी इस बात पर हंसते थे.”
जब हमास ने नाहाल ओज़ पर हमला किया तो शहाफ़ मरने वालों में पहली सैनिक थीं.
ये इसराइल के इतिहास का सबसे घातक दिन था. कुल 1,300 लोग मारे गए थे और 240 को अग़वा किया गया था.
इसके जवाब में गज़ा पर हवाई और ज़मीनी हमले में अब तक 23,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.
लेकिन हमले की आशंका जताने वालों में सिर्फ़ तात्ज़पितानियोत नहीं थे.
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक लंबी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हमास के हमले का ब्लूप्रिंट एक साल से इसराइली सेना के पास था लेकिन उन्हें लगा था कि ये कर पाना हमास के लिए मुमकिन नहीं है.
अख़बार के अनुसार इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी यूनिट 8200 के एक वरिष्ठ अधिकारी ने तीन महीने पहले ही कह दिया था कि हमास सैन्य अभ्यास कर रहा है जो ब्लूप्रिंट के अनुरूप लगता है लेकिन उनकी बात को अनसुना कर दिया गया था.
हमास के अभ्यास को हमले से पहले सोशल मीडिया पर डाला गया था.
महिलाओं की बातों को नहीं मिली तवज्जो
मेजर जनरल ईटन डैंगट कहते हैं, "संकेत साफ़ थे. जब आप सारे संकेतों को एकत्रित कर लेते हैं तो आपको जल्द से जल्द किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए और इस बारे में कुछ करना चाहिए. दुर्भाग्य कुछ भी नहीं किया गया.”
वो कहते हैं कि अब तक इस मामले की पूरी तफ़्तीश नहीं की गई है लेकिन ऐसा लगता है कि नज़र रख रही महिलाओं की रिपोर्टों को नज़रअंदाज़ किया गया था.
डैंगट कहते हैं, "कई बार बात वरिष्ठ अधिकारियों के आत्मविश्वास पर निर्भर करती है. कई बार वे कह देते हैं - मुझे अधिक अनुभव है और मैं इस विषय के बारे में बेहतर जानता हूँ. मैं आप की हर बात पर यक़ीन नहीं कर सकता.”
"जासूसी की दुनिया में आप जानकारी एकत्र करते हैं और फिर टेबल पर बैठकर पहेली बुझाने का प्रयास करते हैं. इस केस में भी इन महिलाओं की ओर आई जानकारी की ठीक से विवेचना की जानी चाहिए.”
ब्रिगेडियर जनरल अमीर अवीवी ग़ज़ा डिविज़न के पूर्व डिप्टी कमांडर थे.
वे मानते हैं कि महिलाओं द्वारा उठाए गए सवालों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था.
"मैं ये तो नहीं बता सकता कि हुआ क्या था पर ये कह सकता हूँ कि क्या किया जाना चाहिए था.”
अमीर अवीवी कहते हैं, "ये उम्मीद की जाती है कि सरहद पर तैनात लोग जब अपना काम करें और चिंताएं ज़ाहिर करें तो उन पर ग़ौर किया जाना चाहिए. क्यों वे पेशेवर लोग हैं. ये लोग सेना की आंख और कान हैं.”
अवीवी के अनुसार सबसे बड़ी विफलता ये सोच थी की हमास के लोग डरे हुए हैं. विचार शायद ये था कि "हां वो ट्रेनिंग कर रहे हैं, कुछ योजना बन रही है लेकिन वो इस योजना को अमलीजामा नहीं पहना पाएंगे.”
इसराइली सेना ने बीबीसी को बताया है कि वो इस सारे मामले की भविष्य में जांच करेगी.
ख़ुफ़िया रिपोर्टों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई इस बारे में विश्लेषकों की राय अलग-अलग है.
लेकिन अविगेल कहती हैं कि इसका कारण था, “हम सेना का सबसे निचला तबका हैं. हमारे काम को पेशेवर नहीं समझा जाता. सब हमें सिर्फ़ बॉर्डर पर नज़र रखने वाला समझते हैं. कोई हमें सैनिक नहीं मानता.”
हमले के तीन महीने बाद जीवित बचे तात्ज़पितानियोत के सैनिक मारे गए साथियों के परिवारों का ढांढस बंधा रहे हैं.
शाई एशराम के बेडरूम में फौजी टोपियां टंगी हुई हैं. साथ ही टेबल पर यूनिफॉर्म में उनकी तस्वीरें सजी हुई हैं.
उनके पिता कभी कभी इस कमरे में आते हैं और ख़ूब रोते हैं.
"उसे अपना काम बहुत पसंद था. उसे सेना से प्यार था और सैनिक होने पर फ़ख़्र था.”
"मैं टैक्सी ड्राइवर हूँ. मैं जब ट्रेन स्टेशन पर किसी पिता को अपने सैनिक बेटे या बेटी के साथ देखता हूँ तो बहुत दुख होता है.”
'वो लोग हर पल मेरे साथ हैं’
घर पर नोआ रोज़ सोशल मीडिया पर अपने पुराने वीडियो देखती रहती हैं. इन वीडियोज़ में वे अपने सैन्य ठिकाने पर नाचते-गाते दिख रहे थे. वे अब अपने सोफ़े पर ही सोती हैं क्योंकि बेडरूम में सोने से डर लगता है.
नोआ कहती हैं, "वो ख़्याल हर पल मेरे साथ रहते हैं…एक बुरे ख़्वाब की तरह…मुझे ठीक से नींद नहीं आती न ही भूख लगती है. मैं अब वो व्यक्ति ही नहीं हूं जो पहले थी.”
फोन पर अपनी चैट दिखाते हुए वो बताती हैं कि इन लोगों में कुछ मारे गए हैं और कुछ अग़वा हो चुके हैं.
नाहाल ओज़ सैन्य अड्डा, जहाँ तात्ज़पितानियोत काम करते थे वो अब खंडहर बन चुका है. हमास के लड़ाकों ने वहां पहुंचने के बाद किसी को नहीं छोड़ा.
मरने वालों में वो महिलाएं भी थीं जो लगातार बॉर्डर पर निगाह बनाए रखती थीं. ये वो महिलाएं थीं जिन्होंने इसराइल की ताक़त का अंदाज़ा होने के बावजूद इस बात का संदेह जताया था कि हमास एक दिन ऐसा कुछ कर सकता है.
अतिरिक्त रिपोर्टिंग - इदाह बेन अरी
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