पीएम मोदी की इसराइल यात्रा में ड्रोन ख़रीद पर हो सकती है सहमति, कैसे बन गया है ड्रोन युद्ध का अहम हथियार

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिनों की इसराइल यात्रा करेंगे. यह यात्रा बुधवार को शुरू हो रही है.

प्रधानमंत्री मोदी 25-26 फ़रवरी को इसराइल की यात्रा पर रहेंगे.

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने रविवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि पीएम मोदी की इसराइल यात्रा को लेकर उन्होंने कैबिनेट की मीटिंग में चर्चा की.

बिन्यामिन नेतन्याहू के इस पोस्ट का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा, "मैं भारत और इसराइल के बीच के संबंधों के मुद्दे पर आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. भारत, इसराइल के साथ पक्की दोस्ती को बहुत महत्व देता है, जो भरोसे, इनोवेशन, शांति और तरक्की के लिए एक जैसे कमिटमेंट पर बनी है."

फ़ोर्ब्स इंडिया के मुताबिक़ साल 2026 में भारत का इसराइल के साथ 8.6 अरब डॉलर का रक्षा समझौता होने जा रहा है. इसमें भारत स्पाइस-1000 प्रिसीजन गाइडेड बॉम्ब्स, रैपेंज एयर टू सरफ़ेस मिसाइल, एयर लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल और आइस ब्रेकर मिसाइल सिस्टम शामिल है.

रक्षा विशेषज्ञ संजीव श्रीवास्तव भी कहते हैं कि पीएम मोदी के दौरे में इसराइल के साथ कई अहम रक्षा समझौते हो सकते है, इनमें आधुनिक ड्रोन भी शामिल हैं.

खास बात यह है कि इसमें मेक इन इंडिया पर जोर हो सकता है, यानी इसराइल तकनीक दे और ड्रोन का निर्माण भारत में हो.

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत इसराइल से अतिरिक्त मात्रा में हेरोन एमके-2 मीडिम एल्टीट्यूड लॉन्ग एन्ड्यूरेंस (मेल) ड्रोन ख़रीदने की योजना बना रहा है.

एयरफ़ोर्स टेक्नॉलॉजी डॉट कॉम के मुताबिक़ ये ड्रोन हवा में एक बार में लगातार 45 घंटे तक उड़ान भर सकता है.

ये क़रीब 470 किलोग्राम का भार ढो सकता है. ये क़रीब 35 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई तक पहुंच सकता है ये सभी तरह के मौसम में उड़ान भरने में सक्षम है.

इस कहानी में जानेंगे कि मौजूदा दौर में 'ड्रोन' रक्षा और युद्ध के क्षेत्र में इतना अहम क्यों होता जा रहा है.

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पीएम मोदी की इसराइल यात्रा को लेकर बिन्यामिन नेतन्याहू ने एक्स पर लिखा, "इसराइल और भारत के बीच का रिश्ता दो ग्लोबल लीडर्स के बीच एक मज़बूत गठबंधन है."

उन्होंने लिखा, "हम इनोवेशन, सिक्योरिटी और एक जैसे स्ट्रेटेजिक विज़न में पार्टनर हैं. हम सब मिलकर स्थायित्व और विकास के लिए समर्पित देशों का एक ग्रुप बना रहे हैं."

किन समझौतों की उम्मीद

अमेरिका और ईरान में जारी तनाव के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह दूसरी इसराइल यात्रा होगी. इससे पहले उन्होंने जुलाई 2017 में इसराइल की यात्रा की थी.

इससे पहले दोनों देशों के मंत्री एक-दूसरे देश की कई यात्राएं कर चुके हैं. पिछले साल इसराइल के कई मंत्री भारत पहुंचे थे और दिसंबर में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी इसराइल की यात्रा की थी.

माना जा रहा है कि पीएम मोदी की दूसरी इसराइल यात्रा में भारत और इसराइल के बीच रक्षा क्षेत्र में कई बड़े समझौते हो सकते हैं. हालाँकि ख़बर लिखे जाने तक इन समझौतों के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है.

लेकिन पिछले साल मई महीने में पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष के अनुभवों के आधार पर भारत, इसराइल के आधुनिक ड्रोन ख़रीदने के लिए भी समझौता कर सकता है.

दरअसल बदलते समय के साथ दुनिया के कई देश रक्षा, दुश्मन के ठिकानों की सूचना और हमले के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह ड्रोन एक अहम हथियार के रूप में उभरा है.

ड्रोन से गुप्त जानकारी जुटाना, निगरानी करना, टोह लेना, किसी ठिकाने का पता लगाना, सटीक निशाना लगाकर हमला करना, मुश्किल इलाक़ों में मदद पहुंचाना, सेना या अन्य काम के लिए सप्लाई करना, दुश्मन के सिग्नल को प्रभावित करना, रेस्क्यू मिशन चलाना, जैसे काम में मदद मिलती है.

इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ड्रोन मानवरहित वायु यान (यूएवी) होते हैं, इसलिए इसके ऑपरेशन में इंसानी क्षति की आशंका नहीं होती है और विशेषज्ञ मानते हैं कि दुश्मन को नुक़सान पहुंचाने के मामले में यह लड़ाकू विमानों से बहुत पीछे नहीं है.

यह इतना सटीक निशाना लगा सकता है कि अमरीका ने 3 जनवरी, 2020 को बगद़ाद हवाई अड्डे के पास ड्रोन से एक हवाई हमला कर ईरान के अल-क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को मार डाला था और अमेरिका के इस ऑपरेशन की किसी को भनक तक नहीं लग पाई.

ड्रोन अहम हथियार क्यों बन गया?

बीते कुछ साल में दुनियाभर में युद्ध और इसका तरीका काफ़ी तेज़ी से बदला है. इसमें ड्रोन की काफ़ी अहम भूमिका है.

मौजूदा रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इससे पहले आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच हुई लड़ाई, इनमें ड्रोन का खूब इस्तेमाल देखा गया है.

पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों ने ड्रोन का इस्तेमाल किया.

पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल और आर्मी एयर डिफ़ेंस के पूर्व महानिदेशक वीके सक्सेना बताते हैं, "वर्तमान समय में ड्रोन बेहद ही महत्वपूर्ण हो गया है. ड्रोन के दो बड़े फ़ायदे यह हैं कि इसे परंपरागत रडार सिस्टम से पकड़ा नहीं जा सकता है और दूसरा कि इससे सटीक निशाना लगाया जा सकता है."

उनका कहना है, "यह स्टार (एसटीएआर) का काम करता है. यानी रियल टाइम इंटेलिजेंस, सर्विलांस, टारगेट एक्वैजिशन (टारगेट का पता लगाना) और रिकनेसेंस (टोह लेना) के लिए इस्तेमाल होता है. हालाँकि यह परंपरागत एयर फ़ोर्स को रिप्लेस नहीं कर सकता, लेकिन इससे ज़मीन पर मौजूद दुश्मन सेना को प्रभावित किया जा सकता है."

ड्रोन का इस्तेमाल न केवल देश कर रहे हैं बल्कि कई हथियारबंद समूह भी इसका इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उनके पास किसी देश की तरह बड़ा फंड नहीं होता है.

एयर डिफ़ेंस के एक्सपर्ट और पूर्व मेजर जनरल अशोक कुमार कहते हैं, "बड़े देशों के अलावा छोटे देश भी ड्रोन ख़रीद सकते हैं क्योंकि यह लड़ाकू विमान की तुलना में काफ़ी सस्ता होता है. ड्रोन ने युद्ध क्षेत्र का लोकतांत्रिकरण कर दिया है. हालाँकि यह बात सही है कि ताक़तवर देश के पास ज़्यादा ड्रोन होगा, लेकिन कमज़ोर देश भी इसके सहारे लड़ सकते हैं."

ड्रोन ने कैसे बदल दी युद्ध की तस्वीर

रूस और यूक्रेन के बीच फ़रवरी 2022 में बड़े पैमाने पर युद्ध शुरू हुआ था. रूस की तुलना में यूक्रेन काफ़ी छोटा देश है और उसकी सैन्य ताक़त भी रूस के मुक़ाबले काफ़ी कम है.

लेकिन चार साल गुज़र जाने के बाद भी दोनों देशों के बीच चल रहे इस युद्ध का फ़ैसला नहीं हो पाया है. इसके पीछे इस युद्ध में दोनों देशों की तरफ से ड्रोन का इस्तेमाल बड़ी वजह माना जाता है. ड्रोन की मारक क्षमता या दुश्मन को नुक़सान पहुंचाने की क्षमता काफ़ी ज़्यादा होती है, लेकिन नुक़सान हो जाए तो किसी देश को बड़ा आर्थिक नुक़सान नहीं होता है.

मेजर जनरल अशोक कुमार कहते हैं, "इस युद्ध में ड्रोन ने काफ़ी बड़ी भूमिका निभाई है. दोनों ही देशों ने इसमें ड्रोन का इस्तेमाल किया है. यूक्रेन के पास नेटो देशों के ड्रोन हैं और इसकी क्षमता देखकर यूक्रेन ख़ुद भी ड्रोन में काफ़ी निवेश कर रहा है."

मेजर जनरल अशोक कुमार ड्रोन की क्षमता के बारे में आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच क़रीब चार साल हुए युद्ध का ज़िक्र करते हैं.

उनका कहना है, "ड्रोन युद्ध क्षेत्र को पूरी तरह बदल रहे हैं और भविष्य में यह और आगे बढ़ेगा. अज़रबैजान दो बार आर्मीनिया से हार गया लेकिन फिर उसे तुर्की ने ड्रोन दिए और उसने पूरी तरह जीत हासिल कर ली."

मेजर जनरल अशोक कुमार के मुताबिक़, "हालिया संघर्ष में पाकिस्तान ने भी हमारे ख़िलाफ़ ड्रोन का इस्तेमाल किया, लेकिन भारत का वेस्टर्न फ्रंट काफ़ी मज़बूत है इसलिए इसका ज़्यादा असर नहीं हुआ."

पिछले साल अप्रैल महीने में पहलगाम हमले के बाद छह और सात मई की दरमियानी रात भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में "ऑपरेशन सिंदूर" चलाया था.

इसके बाद संघर्षविराम होने के पहले चार दिनों तक दोनों देशों की सेना आमने-सामने थी. इस दौरान दोनों ही देशों ने एक-दूसरे को बड़ा नुक़सान पहुंचाने का दावा किया था.

रक्षा विशेषज्ञ संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक़, "ड्रोन्स और फ़ाइटर जेट या मिसाइल में तुलना नहीं हो सकती है लेकिन ड्रोन भी मीडियम रेंज, शॉर्ट रेंज और लॉन्ग रेंज के होते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों देशों ने इनका इस्तेमाल किया है और काफ़ी अंदर तक पहुंचकर हमला किया है और शत्रु देश को नुक़सान पहुंचाया है."

किस देश के पास ड्रोन की ज़्यादा ताक़त

ड्रोन एक लो कॉस्ट वेपन है और इसका प्रोडक्शन भी आसान है. इसलिए इस क्षेत्र में निवेश की संभावना भी काफ़ी ज़़्यादा है.

संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत के पास साल 2009 से इसराइल से मिला हारोप ड्रोन है, जिसे 'सुसाइड ड्रोन' भी कहते हैं. यह ठिकाने पर पहुंचकर ख़ुद को ब्लास्ट कर लेता है. इसके अलावा साल 2002 से भारत के पास इसराइल का ही हेरान ड्रोन है. भारत में डीआरडीओ भी ड्रोन को डेवलप कर रहा है."

"इसके अलावा भारत को अमेरिका से 30 रिपर ड्रोन (MQ9) मिलने वाले हैं जो कि कॉम्बैट ड्रोन हैं."

मेजर जनरल अशोक कुमार बताते हैं कि इसराइल उन शीर्ष देशों में शामिल है, जिनके पास ड्रोन्स की बेहतरीन तकनीक है.

इन देशों में अमेरिका, इसराइल, रूस, चीन, यूक्रेन और तुर्की शामिल हैं. हालाँकि ड्रोन के अलग-अलग कंपोनेंट्स के मामले में अलग-अलग देश आगे हैं, इसलिए यह पक्के तौर पर बता पाना आसान नहीं है कि इस तकनीक में कौन से देश सबसे आगे हैं.

मेजर जनरल अशोक कुमार बताते हैं, "युद्ध में ड्रोन के इस्तेमाल के साथ एक ख़ास बात यह भी है इस मामले में किसी देश के हवाई क्षेत्र के अतिक्रमण का मसला नहीं होता है. ड्रोन्स लड़ाकू विमान के लगभग बराबर नुक़सान पहुंचा सकते हैं और यह काफ़ी सस्ता होता है तो इसे ज़्यादा संख्या में रखा भी जा सकता है."

ड्रोन के साथ एक सीमा यह है कि इसे दूर किसी दुश्मन के ठिकाने पर हमले के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. हालांकि दुनिया भर में ज़्यादातर मामलों में संघर्ष या युद्ध पड़ोसियों के बीच ही देखा जा रहा है, इस लिहाज से भविष्य में ड्रोन की अहमियत बढ़ती हुई दिखती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.