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जब जमैका की पिच से भारतीय खिलाड़ी पहुंचने लगे थे अस्पताल - विवेचना
- Author, रेहान फज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वैसे तो क्रिकेट को 'जेंटलमेंस गेम' कहा जाता है लेकिन ऐसे कई मौके आए हैं जब क्रिकेट से जुड़े इस विशेषण को कड़ी परीक्षा से गुज़रना पड़ा है. इनमें से एक थी 1932 की इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच खेली गई बदनाम 'बॉडीलाइन सीरीज़'.
तब इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डीन ने डॉन ब्रेडमेन पर पार पाने के लिए ख़तरनाक गेंदबाज़ी का सहारा लिया था. जार्डीन के सबसे बड़े हथियार थे उस समय के दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ हैरल्ड लारवुड.
इस सीरिज़ के बाद ऑस्ट्रेलिया के कप्तान बिल वुडफ़ुल ने टिप्पणी की थी, ‘ये क्रिकेट नहीं युद्ध था.’
इस सीरीज़ के 44 साल बाद भारत की क्रिकेट टीम को भी क्लाइव लॉयड की वेस्टइंडीज़ टीम के ख़िलाफ़ इस तरह की ख़तरनाक गेंदबाज़ी का सामना करना पड़ा था.
पोर्ट ऑफ़ स्पेन टेस्ट में भारत के खिलाफ़ चौथी पारी में 403 रनों का लक्ष्य रखने के बावजूद वेस्टइंडीज़ की टीम वो टेस्ट मैच हार गई थी.
मैच के बाद क्लाइव लॉयड ने अपने स्पिनरों से वो मशहूर जुमला कहा था, "मैंने तुमको भारत को आउट करने के लिए 400 से ऊपर रन दिए लेकिन तुम उन्हें आउट नहीं कर पाए. भविष्य में मैं तुम्हें कितने रन दूँ कि तुम विपक्षी टीम को आउट कर पाओ?"
सीमेंट की सतह की तरह सख़्त थी पिच
जब जमैका की राजधानी किंग्स्टन के सबाइना पार्क में चौथा टेस्ट शुरू हुआ तो बहुत कुछ दाँव पर था. उसमें से एक थी लॉयड की कप्तानी. अफवाहें थीं कि उन्हें वेस्टइंडीज़ की कप्तानी से हटाया जाने वाला है.
पोर्ट ऑफ़ स्पेन टेस्ट में वेस्टइंडीज़ ने जो तीन स्पिनर खिलाए थे, उनमें से सिर्फ़ एक रफ़ीक जुमादीन को किंग्स्टन टेस्ट की टीम में शामिल किया गया. एल्बर्ट पैडमोर और इम्तियाज़ अली को ड्रॉप कर दिया गया.
तेज़ गेंदबाज वैनबर्न होल्डर की टीम में वापसी हुई और वेन डैनियल को पहली बार वेस्टइंडीज़ की टेस्ट टीम में शामिल किया गया. इस तरह वेस्टइंडीज़ की टीम चार तेज़ गेंदबाज़ों माइकल होल्डिंग, वेन डेनियल, होल्डर और बर्नार्ड जूलियन के साथ मैदान में उतरी.
लॉयड ने टॉस जीता और भारत से पहले खेलने के लिए कहा. पिच पर इतने क्रैक थे कि एक सिक्का आसानी से पिच के अंदर जा सकता था.
हाल ही में प्रकाशित अंशुमान गायकवाड़ की जीवनी ‘गट्स अमिड्स्ट ब्लडबाथ’ में आदित्य भूषण लिखते हैं, "सबाइना पार्क की पिच इतनी सख़्त थी कि उस पर स्पाइक वाले जूते पहनकर चलने पर लगता था कि सीमेंट की सतह पर चल रहे हों. इसके बावजूद भारतीय ओपनर सुनील गावस्कर और अंशुमान गायकवाड़ लंच तक बिना आउट हुए स्कोर 60 तक ले गए."
बाउंसर्स और बीमर्स की झड़ी
लंच के बाद खेल तब बदलना शुरू हुआ जब माइक होल्डिंग ने राउंड द विकेट गेंदबाज़ी शुरू की. बीमर गेंदें भी फेंकी जानी लगीं. वेन डेनियल ये जताते रहे कि गेंद उनके हाथ से फिसल गई है. फ़ील्ड सेटिंग से ये साफ़ लग गया कि अब तेज़ गेंदबाज़ सिर्फ़ बाउंसर्स ही फेकेंगे जिससे रन बनाना बहुत मुश्किल हो जाएगा.
अभी तक सीरीज़ में राउंट द विकेट गेंद फेंककर शरीर को निशाना बनाने की रणनीति वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ों ने नहीं दिखाई थी.
सुनील गावस्कर ने अपनी आत्मकथा ‘सनी डेज़’ में लिखा, "इस डर से कि उन्हें कप्तानी से हटाया जा सकता है लॉयड ने हम पर तेज़ गेंदबाज़ों से हमला बोला, लेकिन हम बिना विकेट खोए स्कोर 98 रनों तक ले गए."
"लॉयड बहुत निराशा महसूस कर रहे थे, इसलिए उन्होंने होल्डिंग को बाउंसर्स की झड़ी लगाने से नहीं रोका. हो सकता है कि उन्होंने ही होल्डिंग से कहा भी हो कि वो हम पर एक ओवर में चार बाउंसर और एक बीमर फेंके. ऐसा लग रहा था कि उन्होंने सोच रखा था कि अगर तुम उन्हें आउट न कर पाओ तो उन्हें घायल करके मैदान से बाहर कर दो."
अंपायरों ने गावस्कर की शिकायत की अनदेखी की
होल्डिंग के एक ओवर में कई बाउंसर झेलने के बाद गावस्कर ने अंपायर राल्फ़ गोसाईं और डगलस सैंग ह्यू से गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़ शिकायत की. लेकिन बदले में उनको उनकी मुस्कराहट भर मिली. उस समय तक विश्व स्तर के बल्लेबाज़ बन चुके गावस्कर इससे इतने निराश हुए कि उन्होंने गुस्से में अपना बल्ला ज़मीन पर फेंक दिया.
गायकवाड़ उन्हें शांत कराने उनके पास पहुँचे. गावस्कर ने कहा, "मैं इस गेंदबाज़ी से मरना नहीं चाहता. मैं अपने घर सुरक्षित वापस लौटना चाहता हूँ ताकि मैं अपने नवजात बेटे रोहन को देख सकूँ."
ये हेल्मेट से पहले का ज़माना था. तब तेज़ गेंदबाज़ी से शरीर को बचाने के लिए न तो पर्याप्त साधन उपलब्ध होते थे और न ही एक ओवर में बाउंसरों की संख्या पर कोई रोक-टोक थी. उन दिनों इस्तेमाल किए जाने वाले पैड्स और ग्लव्स की गुणवत्ता भी आज के दिनों की तरह नहीं होती थी.
ड्रेसिंग रूम में रखी नैप्किंस को थाई गार्ड के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था. बल्लेबाज़ के पास सिर्फ़ एक बल्ला और उसका जीवट होता था. इस स्थिति मे बल्लेबाज़ न सिर्फ़ अपना विकेट बल्कि अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए भी खेल रहा होता था.
गायकवाड़ ने इस पर बाद में एक टिप्पणी की थी, अगर आप ग़लत समय पर पलक झपकाएं, तो आपके इतिहास बनने में देर नहीं लगती थी.
गेंदबाज़ों को दर्शकों का समर्थन
होल्डिंग इस गति से गेंदबाज़ी कर रहे थे कि उनकी कई गेंदें बल्लेबाज़ों के साथ-साथ बहुत अनुभवी विकेटकीपर डेरेक मरे को भी बीट कर रही थीं. कई बार तो गेंदें साइट स्क्रीन से टकरा कर विकेटकीपर के पास वापस आ रही थीं. जैसे-जैसे होल्डिंग और डेनियल की गेंदों की गति बढ़ती गईं, वहाँ मौजूद दर्शकों का समर्थन भी उनके लिए बढ़ता गया.
सारे दर्शक पोर्ट ऑफ़ स्पेन मे हुई हार का बदला लेना चाहते थे. सुनील गावस्कर अपनी आत्मकथा ‘सनी डेज़’ में लिखते हैं, "जमैका के दर्शकों को क्राउड की जगह मॉब कहा जाए तो बेहतर होगा. वो चिल्ला रहे थे, ‘किल हिम मान’, ‘हिट हिम मान’, ‘नॉक हिज़ हेड ऑफ़ माइक."
गावस्कर लिखते हैं, "उन्होंने हमारे एक भी शॉट पर ताली नहीं बजाई. एक बार जब मैंने डैनियल की गेंद पर चौका लगाया जमैका के दर्शकों से ताली की उम्मीद कर रहे थे, मैंने माँग की कि वो उस पर ताली बजाएं. उन्होंने इसका जवाब मुझ पर हँस कर दिया. अगले दिन टोनी कोज़ियर ने मुझसे मज़ाक किया, ‘तो आप जमैका के दर्शकों से तालियों की उम्मीद कर रहे थे.’"
भारत के दोनों सलामी बल्लेबाज़ों ने और अधिक एकाग्र होने की कोशिश की जिसमें वो बहुत हद तक सफल भी रहे. हर ओवर के अंत में दोनों एक दूसरे के पास जाते और कहते ‘डटे रहो’.
पहले दिन का खेल समाप्त होने पर भारत ने 1 विकेट खोकर 178 रन बना लिए थे. गायकवाड़ 58 और महेंद्र अमरनाथ 25 रन बनाकर नाबाद थे. उस दिन वेस्टइंडीज़ ने पूरे दिन में सिर्फ़ 65 ओवर फेंके थे.
उनके तेज़ गेंदबाज़ों का रन अप इतना लंबा था कि एक दिन में निर्धारित 90 ओवर फेंके जाने का सवाल ही नहीं उठता था. बाद में उस दिन पसलियों, सीने, उंगलियों और जाँघों पर लगी चोटों को याद करते हुए गायकवाड़ ने हँसते हुए कहा था, "मेरे सीने पर माइकल होल्डिंग ने अपनी सील लगा दी थी. मेरी चोटों पर बर्फ़ रखी गई थी ताकि दर्द और सूजन कम हो सके और मैं अगले दिन बल्लेबाज़ी कर सकूँ."
विश्वनाथ की टूटी उंगली
दूसरे दिन का जब खेल शुरू हुआ तो होल्डर की एक गेंद टखने के जोड़ पर लगी. ये आने वाली गेदों का एक तरह से ट्रेलर था. बाद में गायकवाड़ ने याद किया, "होल्डर भी लगभग उसी गति से गेंद फेंक रहे थे जितनी होल्डिंग. अमरनाथ अपने स्कोर में सिर्फ़ 14 रन जोड़ सके. वो एक ऐसी गेंद से बचाव करते हुए आउट हुए जिसे अगर उन्होंने नहीं खेला होता तो वो उनका सिर उड़ा ले जाती."
बाद में अमरनाथ ने भी याद किया, "मैंने इससे पहले इतनी तेज़ गेंदबाज़ी का सामना नहीं किया था. गेंद हर जगह उड़ रही थी और उसका सामना करना आसान नहीं था."
अमरनाथ के आउट होने के बाद विश्वनाथ क्रीज़ पर आए. उन्हें भी लगा कि वो अपने जीवन की सबसे तेज़ गेंदों को खेल रहे हैं. थोड़े समय बाद उनको भी एक गेंद आकर लगी. होल्डिंग की एक शॉर्ट गेंद से बचने के चक्कर में न सिर्फ़ उनकी उंगली टूटी बल्कि उन्होंने कैच भी दे दिया.
इधर ये सब हो रहा था, दूसरे छोर पर गायकवाड़ चट्टान की तरह डटे हुए थे. पिछले दिन की चोटों की वजह से अंशुमान गायकवाड़ दर्द में खेल रहे थे. ख़ासतौर से उनके शरीर के बाएँ हिस्से में बहुत दर्द था जिसकी वजह से उन्हें क्रीज़ पर मूव कर पाने में बहुत दिक्कत हो रही थी. उस समय बल्ला पकड़ना तो दूर पिच पर साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था.
आदित्य भूषण लिखते हैं, "पसलियों में दर्द के कारण गायकवाड़ के लिए ज़रा भी पैर हिलाना मुश्किल हो रहा था. एक बहादुर मुक्केबाज़ की तरह जितनी तेज़ी से उन्हें गेंद लगती उतने ही दृढ़ निश्चय से वो अगली गेंद खेलने के लिए तैयार होते. शारीरिक तकलीफ़ के बावजूद वो अपना स्कोर 81 तक खींच कर ले गए थे. वो क्रीज़ पर जम गए थे लेकिन उन्हें मालूम था कि वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ जिस तरह की गेंदबाज़ी कर रहे थे, उन्हें भी एक ऐसी गेंद मिलने वाली है जो उनको घायल करेगी.’
और यही हुआ. लंच से ठीक पहले होल्डिंग की एक गेंद उनके सीने में ठीक उसी जगह पर लगी जिस पर एक दिन पहले भी उनकी गेंद आकर लगी थी. उनको बहुत दर्द हुआ लेकिन गायकवाड़ ने उसे दिखाया नहीं.
इसकी सीख उन्हें उनके साथी खिलाड़ी एकनाथ सोलकर ने दी थी. एक बार जब उनको इसी तरह एक गेंद लगी थी और वो कराह उठे थे तो फॉर्वर्ड शॉर्ट लेग पर फ़ील्ड कर रहे सोलकर ने उनके पास आकर कहा था, ‘क्या तुम लड़की हो ? तुम दिखा रहे हो कि तुम्हें चोट लगी है. अपनी भावनाओं का कभी प्रदर्शन मत करो. इससे विपक्षी खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ता है.’
उस ओवर की अगली गेंद गायकवाड़ के गल्व्स में लगी. उन्हें कुछ ख़ास महसूस नहीं हुआ लेकिन कुछ ही पल बाद उन्होंने देखा कि उनके गल्व्स से ख़ून बहकर उनके पैड्स पर गिर रहा है. जब उन्होंने अपना बैट नीचे रखकर अपना ग्लव उतारा तो उन्होंने देखा कि उनकी बीच की उंगली का नाख़ून टूट गया है और उसमें से ख़ून निकल रहा है. विव रिचर्ड्स और डेरेक मरे उनका हालचाल पूछने आए लेकिन गायकवाड़ ने गुस्से में उन्हें दूर जाने के लिए कहा.
गायकवाड़ के कान पर होल्डिंग की गेंद लगी
दर्द के बावजूद गायकवाड़ अपना साहस जुटा कर होल्डिंग की अगली गेंद खेलने के लिए तैयार हुए. इससे पहले कि वो जान पाते कि क्या हुआ था वो ज़मीन पर गिरे पड़े थे.
बाद में गायकवाड़ ने याद किया, ‘मेरा चश्मा उड़कर न जाने कहाँ गया. मुझे लगा कि मेरे सिर में भूचाल आ गया हो. उसमें घंटियाँ बज रही थीं. तुरंत ही लॉयड, रिचर्ड्स और मरे उनकी तरफ़ दौड़ कर आए.’
तब तक गायकवाड़ ज़मीन से उठ कर बैठ चुके थे. लॉयड ने उन्हें फिर लिटाने की कोशिश की लेकिन अंशुमान उनकी मदद नहीं चाहते थे. उन्होंने उनसे कहा कि वो उन्हें छुए नहीं. इस तरह विपरीत परिस्थितियों में खेली गई उस पारी का अंत हुआ. अंशुमान गायकवाड़ पूरे 450 मिनटों तक सबाइना पार्क की उस ख़तरनाक पिच पर डटे रहे.
वेस्टइंडीज़ के नामी कमेंट्रेटर टोनी कोज़ियर ने इस पारी की तुलना 1960 में उसी मैदान पर खेली गई कोलिन काउड्रे की पारी से की जिन्होंने उस समय के सबसे तेज़ गेंदबाज़ वेस हॉल का सामना किया था.
इस गेंद के बाद ही समय से थोड़ा पहले अंपायर ने लंच की घोषणा कर दी. रिज़र्व खिलाड़ी पोचैय्या कृष्णामूर्ति गायकवाड़ को ड्रेसिंग रूम तक पहुंचाने में मदद करने पिच पर पहुंचे, लेकिन गायकवाड़ ने कहा कि वो खुद चलकर ड्रेसिंग रूम जाएंगे.
आदित्य भूषण लिखते हैं, ‘पिच से ड्रेसिंग रूम के रास्ते में कृष्णामूर्ति ने ये जाँचने के लिए कि गायकवाड़ होश में हैं या नहीं, उनसे पूछा कि क्या वो जितनी उंगलियाँ उन्हें दिखा रहे हैं, उन्हें गिन सकते हैं? इस पर गायकवाड़ नाराज़ हो गए. तब तक ख़ून उनके कान से निकल कर उनकी कमीज़ पर फैल चुका था, ड्रेसिंग रूम में वो पैड को अपने सिर के नीचे लगा कर लकड़ी की एक बेंच पर लेट गए. उस समय गायकवाड़ के देखने के लिए वहाँ कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं था.’
एक के बाद एक तीन भारतीय खिलाड़ी घायल होकर अस्पताल पहुंचे
भारतीय खिलाड़ियों और आयोजकों के बीच लंबी बहस के बाद ये तय हुआ कि गायकवाड़ को अस्पताल ले जाया जाए. गायकवाड़ के साथ सुनील गावस्कर और टीम के ट्रेज़रर बालू अलगनन अस्पताल गए.
जब वो लोग अस्पताल पहुंचे तो वहाँ टीम के मैनेजर पॉली उमरीगर पहले से मौजूद थे जो विश्वनाथ के हाथ पर प्लास्टर बँधवाने वहाँ आए हुए थे. उमरीगर को गायकवाड़ के बारे में बहुत चिंता थी. 14 साल पहले इसी तरह उनकी टीम के सदस्य नारी कॉन्ट्रेक्टर के सिर पर चार्ली ग्रिफ़िथ की गेंद लगी थी और वे छह दिन तक बेहोश रहे थे. इसके बाद वो कभी क्रिकेट नहीं खेल सके थे.
तभी गायकवाड़ को अस्पताल के डाक्टरों का ठहाका सुनाई दिया. वो कह रहे थे ‘वन मोर कमिंग.. हा हा हा.’ इस बीच सबाइना पार्क में एक और भारतीय खिलाड़ी ब्रजेश पटेल भी घायल हो गए थे. उनके ऊपरी होंठ पर वेनबर्न होल्डर की उठती हुई गेंद लगी थी.
बेदी ने छह विकेट खोने के बाद ही पारी समाप्ति की घोषणा कर दी क्योंकि चार खिलाड़ी घायल होकर खेल से बाहर हो गए थे.
गायकवाड़ के दर्द को कम करने के लिए डाक्टरों ने उन्हें पेनकिलर इंजेक्शन दिए. करीब 24 घंटे बाद गायकवाड़ की हालत में थोड़ा सुधार हुआ. जब मैनेजर उमरीगर उन्हें देखने पहुंचे तो गायकवाड़ ने उनसे कहा, ‘पॉली काका, मुझे पिच पर जाकर बैटिंग करने दीजिए.’ उमरीगर ने इसकी अनुमति नहीं दी.
आधिकारिक रूप से भारत की पारी 6 विकेट पर 306 रन पर समाप्त हुई क्योंकि भारत के पास खेलने के लिए कोई बल्लेबाज़ बचा नहीं था. कप्तान बेदी ने इसी स्कोर पर पारी समाप्त की घोषणा कर दी.
भारतीय खिलाड़ियों की हालत का अदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आठवें नंबर पर बैटिंग करने आए वेंकटराघवन ने वहाँ मौजूद एक पुलिसवाले से बैंटिंग के लिए उसका हेलमेट माँगा. उसने बहुत ज़ोर का ठहाका लगाया लेकिन अपना हेलमेट देने से साफ़ इनकार कर दिया.
लॉयड और अंपायरों की आलोचना
भारत के 306 रनों के जवाब में वेस्टइंडीज़ ने 391 रन बनाकर 85 रनों की बढ़त हासिल की. दूसरी पारी शुरू होने से पहले भारत के तीन चोटी के बल्लेबाज़ गायकवाड़, विश्वनाथ और ब्रजेश पटेल बल्लेबाज़ी करने की स्थिति में नहीं थे.
इस पारी में गावस्कर दो रन बनाकर आउट हो गए, कप्तान बिशन सिंह बेदी ने भारत की दूसरी पारी भी 5 विकेट पर 97 रन पर समाप्त घोषित कर दी. वेस्ट इंडीज़ ने बहुत आसानी से 13 रन बनाकर वो मैच भारत से जीत लिया.
मैच के बाद जब लॉयड का संवाददाताओं से सामना हुआ तो उन्होंने कहा, ‘क्या भारतीय हमसे हाफ़ वॉली फेंकने की उम्मीद कर रहे थे’? कमेंटेटर टोनी कोज़ियर को लॉयड की ये दलील पसंद नहीं आई.
उन्होंने लिखा, ‘अंपायर गोसाईं को ख़तरनाक गेंदबाज़ी से संबंधित क्रिकेट का नियम 46 लागू करना चाहिए था. उनके पास गेंदबाज़ों को चेतावनी देने के कई कारण थे लेकिन उन्होंने ऐसा न करने का फ़ैसला किया.
होल्डिंग और कालीचरण ने ख़तरनाक गेंदबाज़ी की बात मानी
इसके कई दशक बाद माइकल होल्डिंग ने अपनी आत्मकथा ‘नो होल्डिंग बैक’ में लिखा, ‘बहुत से लोगों ने कहा कि भारतीय खिलाड़ियों के घायल होने की वजह पिच थी लेकिन सच ये था कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा शॉर्ट गेंदें फेंकीं. जिस तरह से हमें गेंदबाज़ी करने के लिए कहा गया, उससे मैं सहज नहीं था. लेकिन अगर आपका कप्तान आपसे ऐसा करने के लिए कहता है तो इसके लिए आप कुछ कर नहीं सकते.’
उस वेस्ट इंडियन टीम के एक और खिलाड़ी एल्विन कालीचरण ने बाद में लिखा, ‘ये शर्म की बात थी. उस दौरान क्या कुछ हुआ वो सब मैं आपको नहीं बता सकता. गायकवाड़ ने जिस तरह तेज़ गेंदबाज़ी का सामना कर 81 रन बनाए उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. मुझे याद है करीब-करीब हर गेंद उनके कान के पास से होकर जा रही थी. स्लिप में खड़े हम लोगों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा और अपने कंधे उचका दिए. हम इससे ज़्यादा कर भी क्या सकते थे.’
गायकवाड़ का बायाँ कान बेकार
भारत लौटने पर कई दिनों तक गायकवाड़ को अपने कान में अजीब सी आवाज़ें सुनाई देती रहीं. उनके बाँए कान का पर्दा पूरी तरह से फट गया था. उनके कान का दो बार आपरेशन किया गया.
अब भी उनको अपने बाँए कान से सुनने में दिक्कत होती है. सबाइना पार्क की उस तेज़ पिच पर उनके बिताए साढ़े सात घंटों को क्रिकेट इतिहास की सबसे साहसिक पारियों में गिना जाता है.
विवियन रिचर्ड्स ने बिल्कुल सही कहा था, ‘किसी खिलाड़ी का आकलन करते समय लोग देखते हैं कि उसने कितने शतक बनाए हैं. लेकिन उस दिन गायकवाड़ के बनाए 81 रन कई शतकों पर भारी थे. वो आखिरी दम तक लड़ते रहे और हम सब को दिखाया कि बहादुरी क्या होती है.’
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