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अमेरिका के हमले के बाद ईरान कैसे कर सकता है पलटवार?
- Author, सरबस नाज़ारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसराइल और ईरान के बीच संघर्ष दूसरे सप्ताह में पहुंच गया है और अमेरिका ने ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हमले करके उसे अस्थिर कर दिया है. इसमें उसका सबसे सुरक्षित ठिकाना फ़ोर्दो भी शामिल है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के भूमिगत फ़ोर्दो परमाणु ठिकाने पर भारी भरकम मैसिव ऑर्डनेंस पेनिट्रेटर बम (13,600 किलोग्राम) गिराने की इजाज़त दी. इसके साथ ही नतांज़ और इस्फ़हान को भी निशाना बनाया गया.
राष्ट्रपति ट्रंप ने तीनों परमाणु ठिकानों को "पूरी तरह से नष्ट" घोषित करते हुए और चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने जवाबी कार्रवाई की तो "बहुत ज़्यादा ताक़तवर" हमला किया जाएगा.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने पहले ही अमेरिका को चेतावनी दी थी अगर वह युद्ध में शामिल होता है तो उसे "अपूरणीय क्षति" होगी और ईरान सभी विकल्पों पर विचार कर रहा है.
अमेरिकी ठिकानों पर हमला
ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका का कोई भी हमला उसके हितों को ख़तरे में डाल देगा. रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इस हमले के बाद बयान देते हुए कहा है- "अमेरिका अपने किए पर पछताएगा." इसके साथ ही आसानी से हमला किए जाने वाले ठिकानों की सूची जारी की गई है.
अमेरिका के इराक़, बहरीन, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन और सीरिया में अपने सैन्य अड्डे हैं. ये सभी ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज में हैं. इसमें क़तर में विशाल अल-उदैद एयर बेस और बहरीन में नौसैनिक अड्डा शामिल है, जहां अमेरिका का पांचवां बेड़ा तैनात है.
ईरान ने शीर्ष कमांडर क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए इराक़ में स्थित अमेरिकी सेना के ठिकाने अल असद एयरबेस पर हमला किया था. मारने का आदेश भी ट्रंप ने ही जारी किया था.
इस हमले से पहले ईरान ने अमेरिका को पहले ही चेतावनी दे दी थी इसलिए इसमें कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन बेस को काफ़ी नुक़सान पहुंचा. ईरान इस बार भी यह तरीक़ा अपना सकता है.
हालांकि वर्तमान में बढ़े तनाव की स्थिति में अगर ईरान इस स्तर पर पहुंच जाता है कि उसके पास खोने को कुछ नहीं बचता है तो फिर दूतावास से लेकर अमेरिका के ग़ैर सैन्य ठिकानों पर भी हमला हो सकता है. मौजूदा स्थिति में यह ख़तरा काफ़ी बढ़ गया है.
होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करना
ईरान के राजनेता और सैन्य अधिकारी कई वर्षों से होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की धमकी देते रहे हैं. ईरान का पश्चिमी देशों से तनाव बढ़ता है तो यही बात दोहराई जाती है.
फ़ारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज़ स्ट्रेट एक संकरा समुद्री रास्ता है. विश्व में परिवहन होने वाले कुल तेल का पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से जाता है.
होर्मुज़ को बंद करने को लेकर बयानबाज़ी तेज़ हो गई है. कट्टरपंथी तर्क दे रहे हैं कि इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाज़ार और अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
होर्मुज़ को बारूदी सुरंग, क्रूज़ मिसाइल और तटीय सुरक्षा के साथ हमलावर बोट तैनात करके इसे बंद किया जा सकता है. जिनका ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर ने हाल के वर्षों में उत्पादन और निर्माण किया है.
हालांकि, होर्मुज़ को बंद करना ईरान के लिए नुक़सानदायक भी हो सकता है. इससे चीन के साथ उसके व्यापारिक समीकरण जटिल हो सकते हैं जो कि उसके तेल का सबसे बड़ा ग्राहक है.
ईरान लाल सागर और फ़ारस की खाड़ी में पहले भी ड्रोन, मिसाइलों और बारूदी सुरंगों से जहाज़ों और अन्य ठिकानों पर हमला कर चुका है लेकिन इस बार अमेरिकी कार्रवाई के बाद वह सऊदी अरब, यूएई जैसे आस-पास के देशों में टैंकरों, बंदरगाहों और तेल ठिकानों पर ताक़तवर हमला कर सकता है. इससे वैश्विक तेल जगत प्रभावित हो सकता है.
ट्रंप के आदेश पर हुए इस हमले के बाद ईरान के अति-रूढ़िवादी नेताओं ने सऊदी अरब के ऊर्जा संयंत्रों को विशेष रूप से निशाना बनाने की बात कही है.
प्रॉक्सी कार्ड
इसराइल के साथ युद्ध और अमेरिका के दख़ल के बाद ईरान के लिए लड़ाकों के समूह मुसीबत के समय काम आने वाले दोस्त साबित हो सकते हैं.
ये ईरान के साथ मिलकर अगर अमेरिकी ठिकानों और आपूर्ति के रास्तों पर हमला करते हैं तो हमला छोटा भले ही हो लेकिन अमेरिका के लिए स्थिति चिंताजनक हो जाएगी.
ईरान ने इन समूहों को कई सालों से पैसे और हथियार दिए हैं लेकिन इस समय ये इस स्थिति में नहीं दिखाई दे रहे हैं कि किसी गंभीर लड़ाई में शामिल हो सकें.
इसराइल के साथ अक्तूबर 2023 से नवंबर 2024 तक हुई लड़ाई में हिज़्बुल्लाह कमज़ोर हो चुका है. वह सिर्फ़ स्थिति पर नज़र बनाए हुए है और उसने ईरानी सेना को सीधी मदद देने का कोई वादा नहीं किया है.
हिज़्बुल्लाह पर लेबनान सरकार और मीडिया का दबाव है कि वह हथियार छोड़े और देश के पुनर्निर्माण और आर्थिक संकट सुलझाने में सहयोग करे.
यमन के हूती विद्रोहियों ने भी इस युद्ध के दौरान इसराइल पर हमलों में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं की है. हालांकि अमेरिका के हालिया हमलों से पहले और बाद में उन्होंने लाल सागर में अमेरिकी जहाज़ों को निशाना बनाने की धमकी दी थी. अगर वह ऐसा करते हैं, तो यह मई में अमेरिका के साथ हुए समझौते का उल्लंघन होगा.
इराक़ ने भी अब तक अमेरिका को चेतावनियां देकर ही ईरान का समर्थन किया है. ईरान के सहयोगी बशर अल-असद की सत्ता ख़त्म होने के बाद सीरिया में भी दमिश्क सरकार और प्रॉक्सी (सहयोगी) गुटों से समर्थन में कमी देखने को मिल रही है.
फिर भी, अगर कोई बड़ा संघर्ष होता है जो ईरान की 46 साल पुरानी सत्ता को ख़तरे में डालता है, तो ईरान अपने क्षेत्रीय सहयोगी गुटों से किसी न किसी स्तर पर सक्रियता की उम्मीद करेगा. यह उनकी ताक़त और संसाधनों पर निर्भर करेगा.
जोखिम का आंकलन
ईरान ने इसराइल के साथ संघर्ष में इसराइली शहर और सैन्य ठिकानों पर जमकर मिसाइलें दागीं लेकिन इस बात का पूरा ख़याल रखा कि कोई ऐसा क़दम न उठे जिससे अमेरिका सीधे हमला करे.
यह युद्ध अगर यूं ही चलता रहा तो ईरान को इसराइल पर दागी जाने वाली मिसाइलों की संख्या कम करनी पड़ सकती है. पहले दिन उसने 150 मिसाइलें दागी थीं लेकिन अब यह घटकर प्रति दिन क़रीब 30 रह गई हैं.
मिसाइलों की घटती संख्या यह दिखाती है कि अगर युद्ध लंबा चला तो ईरान की ताक़त कम हो जाएगी. जवाबी कार्रवाई से ईरान दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध में फंस सकता है- एक तरफ़ इसराइल और दूसरी तरफ़ अमेरिका. इसमें अमेरिका का हमला काफ़ी ज़ोरदार हो सकता है और इससे ईरान की सरकार गंभीर संकट में पड़ सकती है.
अब जब ईरान विकल्पों पर विचार कर रहा है, तो यह भी सोच रहा है कि अमेरिका से सीधी लड़ाई उसके लिए काफ़ी गंभीर और अस्तित्व के लिए ख़तरनाक हो सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित