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इसराइल-ईरान संघर्ष में भारत किसके साथ रहेगा, मोदी सरकार की क्या बढ़ेगी चुनौती?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसराइल और ईरान के बीच शुरू हुए संघर्ष में भारत का क्या रुख़ होगा? क्या भारत के लिए इतना आसान है कि वह इसराइल या ईरान में किसी एक के साथ खड़ा दिखे?
ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि इसराइल और ईरान पूरी तरह से युद्ध में जाते हैं तो भारत पर इसका क्या असर होगा?
थिंक टैंक ओआरएफ़ में स्ट्रैटिजिक स्टडीज के फेलो कबीर तनेजा ने लिखा है, ''इसराइल और ईरान के बीच टकराव में भारत का रुख़ संतुलनवादी होगा. बाक़ी दुनिया की तरह भारत परमाणु शक्ति संपन्न ईरान के पक्ष में नहीं है.''
इंडो-पैसिफिक एनलिस्ट डेरेक ग्रॉसमैन मानते हैं कि, "भारत इसराइल का समर्थन करेगा लेकिन ये बिना शर्त नहीं होगा. निश्चित तौर पर भारत ईरान पर इसराइली हमले का समर्थन नहीं करेगा.''
पिछले महीने जब भारत ने पाकिस्तान के भीतर हमला किया था तो इसराइल ने खुलकर भारत का समर्थन किया था. इसराइल ने कहा था कि भारत के पास आत्मरक्षा का अधिकार है. वहीं ईरान ने भी दोनों देशों के बीच तनाव ख़त्म करने के लिए मध्यस्थता की कोशिश की थी लेकिन किसी का खुलकर पक्ष नहीं लिया था. ईरान ने ख़ुद को तटस्थ रखा था.
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दोनों देशों को डिप्लोमैसी के ज़रिए विवाद को सुलझाना चाहिए और टकराव से बचना चाहिए. भारत ने कहा, ''ईरान इसराइल दोनों से भारत के दोस्ताना संबंध हैं और हम हर तरह की मदद के लिए तैयार हैं.''
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के वेस्ट एशिया स्टडी सेंटर में प्रोफ़ेसर रहे आफ़ताब कमाल पाशा ने कहते हैं कि यह युद्ध अब थमेगा नहीं बल्कि आने वाले दिनों में इसका दायरा और बढ़ेगा.
भारत किसके साथ रहेगा?
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''संभव है कि ईरान अभी हमला न करे लेकिन वो बदला तो लेगा. यह सिलसिला थमेगा नहीं. अमेरिका भले कह रहा है कि वह इस युद्ध में शामिल नहीं है लेकिन इसराइली बॉम्बर क़तर में स्थित अमेरिकी एयर फोर्स बेस से ईंधन ले रहे हैं.''
''ज़ाहिर है कि इसमें अमेरिका का हाथ है. जो ड्रोन ईरान ने इसराइल में हमले के लिए भेजे थे, उन्हें अमेरिका ने मारकर गिरा दिया. अमेरिका ने ईरानी ड्रोन को इसराइल पहुँचने ही नहीं दिया. इसके अलावा सऊदी अरब और जॉर्डन ने भी अमेरिका के दबाव में इसराइल को अपना एयर स्पेस इस्तेमाल करने दिया. मेरा कहना है कि यह जंग ईरान और इसराइल तक सीमित नहीं है.''
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''सऊदी, क़तर, बहरीन और यूएई तो अमेरिका के पिछलग्गू हैं. जो अमेरिका कहेगा, ये करेंगे.''
इसराइल और ईरान को लेकर क्या भारत के लिए कोई दुविधा की स्थिति है? प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता है कि कोई दुविधा है. इसराइल एकमात्र मुल्क था, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में भारत का समर्थन किया था. ऐसे में भारत इसराइल के साथ ही रहेगा. ईरान से तो हमने पहले ही सारे संबंध सीमित कर लिए हैं.ना तेल ख़रीद रहे हैं और ना गैस. चाबाहार का भी हम ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. हम भी वही करेंगे जो अमेरिका चाहेगा.''
ईरान पर हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत एक दिन में 13 प्रतिशत बढ़ गई. आशंका है कि इस इलाक़े में युद्ध का दायरा बढ़ेगा. यह वही इलाक़ा है, जिसकी हिस्सेदारी वैश्विक तेल उत्पादन में एक तिहाई है. कच्चे तेल की क़ीमत 78 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गई है. मार्च 2022 के बाद एक दिन में सबसे ज़्यादा आज कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ी है.
चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है. ऐतिहासिक रूप से गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल यानी जीसीसी के छह देश बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर, सऊदी अरब और यूएई के अलावा ईरान के साथ इराक़ भारत के प्राथमिक तेल और गैस आपूर्तिकर्ता देश हैं.
भारत के कुल तेल और गैस आयात में जीसीसी का योगदान 50 से 60 फ़ीसदी है. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, 2023-24 में शीर्ष के 10 पेट्रोलियम आपूर्तिकर्ता देशों में इराक़ दूसरे नंबर पर, सऊदी अरब तीसरे नंबर पर, यूएई चौथे नंबर पर, क़तर सातवें नंबर पर और कुवैत नौवें नंबर पर था. रूस पहले नंबर पर था. 1980 के दशक से खाड़ी के देशों पर भारत कच्चे तेल के मामले में निर्भर रहा है.
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
अगर युद्ध का दायरा बढ़ता है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर प्रभावित होगी. तेल महंगा होगा तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर पड़ेगा और अर्थव्यवस्था की गति धीमी होगी. गल्फ़ और पश्चिम एशिया से भारत के आर्थिक संबंध भी काफ़ी गहरे हैं. इस इलाक़े के कई देश भारत के बड़े कारोबारी पार्टनर हैं.
मिसाल के तौर पर 2023-24 में भारत का कुल विदेशी व्यापार 1.11 ट्रिलियन डॉलर था. इनमें से 208.48 अरब डॉलर गल्फ़ और पश्चिम एशिया से हुआ था. यानी भारत के विदेशी व्यापार में गल्फ़ और पश्चिम एशिया का योगदान 18.17 फ़ीसदी था.
इनमें से 14.28 प्रतिशत जीसीसी के छह देशों से हुआ था. इसी से पता चलता है कि भारत के लिए गल्फ कितना अहम है. यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और सऊदी अरब चौथा. लेकिन बात केवल ऊर्जा तक ही सीमित नहीं है.
खाड़ी के देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं. विदेशों में रहने वाले भारतीय कमाकर जो पैसे भेजते हैं यानी भारत के कुल रेमिटेंस में जीसीसी में काम करने वाले भारतीयों का योगदान क़रीब 40 प्रतिशत है.
इसराइल और ईरान की जंग से पूरा गल्फ़ प्रभावित हो सकता है, ऐसे में भारत के हितों पर सीधा असर पड़ने की आशंका है. ट्रंप के ईरान पर प्रतिबंध से पहले ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता देश था.
पश्चिम एशिया से तेल स्ट्रेट ऑफ होरमुज़ के ज़रिए भारत आता है और इस पर नियंत्रण ईरान का भी है. भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुरक्षित रूप से तभी चलेगा, जब ट्रेड रूट सुरक्षित रहेंगे. भारत अपना आयात यूरोप, उत्तरी अफ़्रीका, भूमध्यसागर और उत्तरी अमेरिका के बाज़ार में ओमान की खाड़ी, फारस की खाड़ी और लाल सागर के ज़रिए भी करता है. अगर ईरान पूरी तरह से युद्ध की चपेट में आता है तो ये ट्रेड रूट भी प्रभावित हो सकते हैं.
यूएई और मिस्र में भारत के राजदूत रहे नवदीप सूरी कहते हैं कि खाड़ी के देशों में 90 लाख भारतीय रहते हैं और 50 प्रतिशत से ज़्यादा ऊर्जा आयात इसी इलाक़े से होता है, ऐसे में इस इलाक़े में अशांति होगी तो भारत के लिए किसी भी लिहाज़ से ठीक नहीं होगा.
खाड़ी के देशों को लेकर सवाल
नवदीप सूरी कहते हैं, ''यु्द्ध का दायरा कितना बढ़ेगा, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान इसराइल तक ही सीमित रहता है या मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाने पर लेगा. अमेरिका के यूएई, क़तर और बहरीन में मिलिटरी बेस हैं. अगर ईरान इस तरह का कोई फ़ैसला करेगा तो फिर पक्का ही जंग का दायरा बढ़ेगा. इस क्षेत्र में क़तर में अमेरिका का सबसे बड़ा एयर फोर्स बेस है.''
''ज़ाहिर है कि इस पर अमेरिका का कंट्रोल है. इसराइल ने इस इलाक़े के कई देशों का हवाई क्षेत्र भी इस्तेमाल किया होगा. किसी ने रोकने की कोशिश इसलिए नहीं की होगी कि उन्हें जंग में क्यों उलझना है. या तो फिर इनके पास रोकने की क्षमता नहीं है. सऊदी, ओमान, इराक़ या जॉर्डन ने यही सोचकर इसराइल को अपना एयर स्पेस इस्तेमाल करने से नहीं रोका होगा. हर कोई अपना हित देखता है.''
नवदीप सूरी कहते हैं, ''अभी भारत के हित में यही है कि युद्ध से बाहर रहे. कठिन परिस्थिति में इसराइल ही आगे बढ़कर भारत की मदद करता है. भारत के हित में अभी यही है कि इसराइल की निंदा ना करे. भारत ये ज़रूर चाहेगा कि इसराइल अपनी आक्रामकता कम करे.''
सूरी कहते हैं, ''अब तो ओपन वॉर शुरू हो गया है. जहाँ तक चाबाहार की बात है तो इसमें लंबी अवधि का निवेश है. संभव है कि आज जो हो रहा है, वो कुछ महीने बाद ना हो. ईरान के साथ भारत के संबंध बहुत जटिल रहे हैं. चीज़ें सामान्य रहती हैं तो ईरान के साथ अरबों डॉलर में ट्रेड होता है. भारत को भी ईरान का बड़ा बाज़ार मिलता है. ईरान के साथ हमारे सिविलाइजेशनल संबंध हैं.''
ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के वक़्त इराक़ के ज़्यादा क़रीब था. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध रहे हैं.
भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे.
भारत भी ईरान से दोस्ती को मुकाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमेरिका से संबंध बढ़े तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.
1990 में भारत के आर्थिक संकट की कुछ वजहें अंतरराष्ट्रीय भी थीं. 1990 में गल्फ़ वॉर शुरू हुआ और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा. वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें बढ़ गईं और इसकी चपेट में भारत भी आ गया. 1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया. ऐसा तेल की क़ीमतें बढ़ने और आयात के वॉल्यूम में वृद्धि के कारण हुआ.
इसका सीधा असर भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ा. इसके अलावा खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीयों की कमाई भी बुरी तरह से प्रभावित हुई और इससे विदेशों से आने वाला रेमिटेंस प्रभावित हुआ. भारत में उस वक़्त राजनीतिक अनिश्चितता भी बढ़ गई थी. 1990 से 91 के बीच राजनीतिक अस्थिरता चरम पर रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित