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अर्जेंटीना: मूलनिवासी जब 'सफ़ेद सोना' खनन की होड़ के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए
- Author, बर्टा रेवेंटोस
- पदनाम, पुरमामार्का, अर्जेंटीना
"हमारी ज़मीन सूख रही है और हमारा पानी प्रदूषित हो रहा है."
एंडीज़ पहाड़ों में बसे पुरमामार्का गाँव में खनन के ख़िलाफ़ सड़क जाम किए हुए प्रदर्शनकारियों में से एक नाटी मछाका ने ये बात कही.
वो, उत्तरी अर्जेंटीना के प्रांत हुहोई में रहने वाले मूल निवासी समुदायों की प्रवक्ता हैं.
हुहोई प्रांत एंडीज़ पहाड़ों पर अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली की त्रिकोणीय सीमा पर बसा है, जिसे ‘लिथियम ट्राएंगल’ के नाम से जाना जाता है, जहाँ दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम भंडार मौजूद है.
लिथियम का इस्तेमाल स्मार्टफ़ोन से लेकर लैपटॉप में रीचार्जेबिल बैटरियों को बनाने में होता है.
जब से इलेक्ट्रिक कारें लोकप्रिय होना शुरू हुई हैं, लिथियम की मांग बढ़ गई है क्योंकि इन कारों की बैटरियों में भी इसी का इस्तेमाल होता है.
अर्जेंटीना दुनिया का चौथा सबसे बड़ा लिथियम उत्पादक देश है, लेकिन हुहोई के कुछ निवासियों का कहना है कि इस उद्योग से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है बल्कि इसकी वजह से उनके जीने के तौर तरीकों पर ख़तरा मंडराने लगा है.
लिथियम के शोधन में बहुत अधिक पानी की ज़रूरत होती है- आम तौर पर प्रति टन पर 20 लाख लीटर पानी.
और नाटी माचाका जैसे स्थानीय लोग, जो यहां की ज़मीन पर रहते हैं और इस ग्रामीण इलाक़े में अपने पशुओं को पालते हैं. उन्हें डर है कि इससे ज़मीन सूख रही है और पानी प्रदूषित हो रहा है.
वो चेतावनी देती हैं, “अगर ये चलता रहा तो हम जल्द ही भूखे मरेंगे और बीमार पड़ेंगे.”
इन पहाड़ों में 400 मूल निवासी समुदाय रहते हैं लेकिन क़ानूनी अधिकार को लेकर उनकी स्थिति बहुत जटिल है.
क्योंकि 14वीं सदी में स्पैनिश आक्रमणकारियों के आने से कई सदियों पहले से ये जनजातियां इस इलाक़े में रहती आई हैं, लेकिन इमें बहुतों के पास ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार नहीं है.
मचाका को ही ले लीजिए. जिस ज़मीन पर वो रहती हैं, उसे उनके दादा ने उस ज़मीन मालिक से ख़रीदी थी, जहां वो काम करते थे.
वो कहती हैं, “उस ज़माने में ये ज़ुबानी समझौता था, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं है.”
वो और उनके जैसे ही कई लोग, जिनके पास अपनी ज़मीन के दावे के पक्ष में कोई क़ानूनी दस्तावेज नहीं हैं, उन पर अपनी ज़मीन से बेदख़ल होने का ख़तरा पैदा हो गया है क्योंकि हुहोई के गवर्नर हेरार्डो मोरालेस ने बीते जून में एक विवादित संवैधानिक सुधार को मंज़ूरी दी थी.
मचाका कहती हैं, “मोरालेस इस ज़मीन के पीछे इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि वो जानते हैं कि यहां लिथियम का भंडार मौजूद है.”
नए संविधान सुधारों में विरोध प्रदर्शन के अधिकारों में कटौती की गई है लेकिन इससे मूल जनजाति समुदायों के हौसलों पर फर्क नहीं पड़ा है. उन्होंने लिथियम खदानों को जाने वाली सड़कों को जाम कर दिया.
उन्हें हटाने के लिए पुलिस को लगाया गया लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इसने उन्हें और एकजुट और दृढ़ बना दिया है.
प्रदर्शनकारियों ने कहा, “हम यहां से नहीं जा रहे. ये ज़मीन हमारी है और लिथियम पर हमारा हक़ है.”
उत्तरी अर्जेंटीना में लिथियम के कुल 38 खनन प्रोजेक्ट हैं, जिनमें तीन में पहले से ही खनन चल रहा है.
इस इलाक़े में अधिकांश लिथियम, नमक की परतों के नीचे लिथियम युक्त खारे पानी के रूप में होता है.
ज़मीन के अंदर मौजूद लिथियम पाने के लिए कंपनियों को छेद करना पड़ता है. इसके बाद खारे पानी को पम्प के सहारे ज़मीन के ऊपर बनाए गए छोटे छोटे तलाबों में इकट्ठा किया जाता है.
यहां पानी को वाष्पीकृत होने के लिए कुछ समय तक छोड़ दिया जाता है, इसके बाद कई तरह की रासायनिक प्रक्रियाओं केबाद लिथियम निकाला जाता है.
स्थानीय समुदायों ने चेताया है कि दो वजहों से पर्यावरण पर लिथियम खनन का भारी असर हो रहा है, एक तो इस पूरी प्रक्रिया में पड़े पैमाने पर पानी की ज़रूरत है और दूसरे शोधन में इस्तमाल होने वाले रसायनों की वजह से हवा और पानी दूषित हो रहा है.
हालांकि मैरी-पियेर लुचेसोली का कहना है कि कंपनियां पानी के इस्तेमाल को सुसंगत बनाने की भरपूर कोशिश कर रही हैं और साथ ही जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम करने की भी कोशिश कर रही हैं.
उनके मुताबिक़, लगभग सभी लिथियम खनन प्लांटों को सौर ऊर्जा से चलने वाला बनाया जा रहा है.
लुचेसोली पड़ोसी प्रांत साल्टा में चैंबर ऑफ़ माइनिंग की मैनेजर हैं. यह राज्य भी लिथियम का धनी है.
वो इस को दृढ़ता से मानती हैं कि लिथियम हासिल करने की प्रक्रिया ‘अधिक से अधिक टिकाऊ होने के लक्ष्य के साथ रह रोज़ विकसित’ हो रही है.
लेकिन ओक्लोया जनजाति के प्रमुख नेस्तोर जेरेज़ मौजूदा लिथियम खनन और भविष्य के प्रोजेक्टों से पड़ने वाले प्रभावों से चिंतित हैं.
ओक्लोया जैसे मूल निवासी समुदाय पचमामा (पृथ्वी मां) के साथ शांति से रहने के आदी हैं और उसकी पूजा करते हैं.
नेस्तोर जेरेज़ कहते हैं कि खनन प्रोजेक्ट का विरोध करने की ताक़त उन्हें पचमामा से ही मिलती है, “वही हमारी ज़िंदगी की गारंटी देने वाली है, इसलिए हम उसकी हर क़ीमत पर रक्षा करेंगे.”
वो लुचेसोली के तर्क से सहमत नहीं हैं, जो दावा करती हैं कि लिथियम खनन स्थानीय लोगों को रोज़गार देगा और इससे शिक्षा और ट्रेनिंग के मौके आएंगे.
मचाका कहती हैं, “संपन्नता का मतलब सिर्फ़ लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार से ही नहीं है बल्कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार से भी है, जिसका असर कई पीढ़ियों तक चलता है.”
जब उन्होंने महसूस किया कि उनकी चिंताओं पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है, मूल निवासी समूहों ने राजधानी ब्यूनस आयर्स में राष्ट्रीय सरकार तक अपनी मांग पहुँचाने के लिए एक मार्च का आयोजन किया.
1946 और 2006 में हुए मूल निवासियों के विरोध प्रदर्शन की तर्ज़ पर इस मार्च को ‘मैलोन डी ला पाज़’ (शांति के लिए छापेमारी) नाम दिया गया.
इस तीसरे ‘मैलोन डी ला पाज़’ में हिस्सा लेने वालों का कहना है कि जबतक गवर्र मोरालेस का लाया हुआ संवैधानिक सुधार रद्द नहीं होता वे किसी भी क़ीमत पर पीछे नहीं हटेंगे.
लेकिन वे ज़ोर देते हैं कि उनकी लड़ाई ज़मीन के सवाल से कहीं व्यापाक है.
राजधानी की ओर मार्च कर रहे लोगों ने कहा, “खनन जैव विविधता का नाश कर रहा है और पर्यावरणीय संकट को बढ़ा रहा है.”
इस बीच लुचेसोली का तर्क है कि लिथियम जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में योगदान देगा, क्योंकि यह पेट्रोल और डीज़ल कारों से इलेक्ट्रिक कारों की ओर जाने के लिए ज़रूरी बैटरियों के उत्पादन का अहम हिस्सा है.
उनके लिए, "यह दुनिया को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करने की ओर ऊर्जा रूपांतरण है."
हालाँकि वो मानती हैं कि लिथियम खनन का विरोध करने वाले लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यावसायों को स्थानीय समुदायों को और अधिक जानकारी मुहैया कराने की ज़रूरत है.
लेकिन जो लोग खनन के ख़िलाफ़ हुहोई में सड़क जाम किए हुए हैं और जो ब्यूनस आयर्स की ओर मार्च कर रहे हैं, वे अपना प्रतिरोध नहीं छोड़ने वाले.
“ये केवल हमारे अपने लिए नहीं है. ये आने वाली पीढ़ियों के लिए और पूरे मानवीय सभ्यता के लिए है.”
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