काशी तमिल संगमम: बनारस का तमिल कनेक्शन

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    • Author, प्रमिला कृष्णन
    • पदनाम, बीबीसी तमिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में 'काशी तमिल संगमम' का उद्घाटन किया है. इसका आयोजन केंद्रीय शिक्षा मंंत्रालय कर रहा है. काशी तमिल संगमम को ऐसे प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है जो तमिलनाडु और वाराणसी के बीच प्राचीन संबंधों को ना केवल जोड़े बल्कि उसे युवा पीढ़ी तक भी पहुंचाए. 

सरकार की इस योजना को लेकर अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बहस देखने को मिल रही है. ऐसे में इस पूरे आयोजन से जुड़े सवालों को बीबीसी तमिल ने समझने की कोशिश की है.

भारत आज़ादी की 75वीं जयंती मना रहा है. शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह आयोजन एक भारत, श्रेष्ठ भारत के विज़न को मज़बूती देने वाला है, साथ ही यह तमिल जैसी प्राचीन भाषा के विकास में मदद पहुंचाने वाला है. 

वहीं आलोचकों के मुताबिक यह कार्यक्रम तमिल भाषा के विकास के लिए नहीं है, बल्कि संस्कृत भाषा को प्रभुत्व देने वाला है.

काशी तमिल संगम क्या है?

शिक्षा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़, इस आयोजन में विशेषज्ञों की बैठक और चर्चाएं आयोजित होंगी, साथ ही वाराणसी के धार्मिक और व्यापारिक केंद्रों को भी दिखाया जाएगा.

इस दौरान दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम और लोक कला से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन भी होगा. 

काशी और तमिलनाडु के संबंधों को लेकर विभिन्न क्षेत्र के एक्सपर्ट व्याख्यान देंगे, परिचर्चा भी आयोजित होगी. दोनों क्षेत्रों की परंपरागत जानकारी, कला और व्यापार को लेकर भी चर्चा होगी. 

शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि संगम के समाप्त होने तक तमिलनाडु के लोगों को काशी के बारे में ढेर सारी जानकारी मिल जाएगी और काशी के लोगों को तमिलनाडु की सांस्कृतिक समृद्धि का पता चल जाएगा.

इस कार्यक्रम का आयोजन कौन कर रहा है?

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और आईआईटी मद्रास, इस आयोजन के नॉलेज पार्टनर हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय आज़ादी के अमृत महोत्सव के मौके पर इसका आयोजन कर रहा है.

कौन लोग इसमें शामिल होंगे?

इस आयोजन में शामिल होने के लिए आपको इसकी वेबसाइट पर पंजीयन कराना होगा.

इसमें भाग लेने के लिए तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों से 210 लोगों के समूह को आठ दिनों के लिए काशी लाया जाएगा.

इसके अलावा करीब 2500-2500 लोगों का 12 समूह आयोजन में हिस्सा लेने के लिए काशी में मौजूद होगा.

करीब 2500 लोगों का चयन वेबसाइट में पंजीकृत लोगों में किया जाएगा और उन्हें भी प्रतिभागी माना जाएगा. सरकार इन लोगों को लाने और वापस ले जाने और ठहराने इत्यादि का इंतज़ाम करेगी.

जिन लोगों का चयन होगा उन्हें रामेश्वरम, चेन्नई और कोयम्बटूर से नियमित ट्रेनों में बने विशेष कोचों के ज़रिए लाया जाएगा.

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काशी और तमिलनाडु में क्या संबंध है?

काशी और तमिलनाडु के आपसी संबंधों के बारे में जानने के लिए हमने भूरातत्ववेत्ता पद्मावती से बात की. उनके मुताबिक दोनों जगहों के बीच दसवीं शताब्दी से ही संबंध रहे हैं. 

पद्मावती ने बताया, “हमारे पास चोल काल के समय के शिलालेख हैं जिनमें वाराणसी का ज़िक्र है. तमिलनाडु में कई जगहों पर काशी विश्वनाथ और विशालाक्षी मंदिर मौजूद हैं. तमिलनाडु में काशी नाम का शहर भी है."

वो कहती हैं, "काशी में अब भी तमिल लोग रहते हैं और वे काशी विश्वनाथ मंदिर से भी जुड़े हुए हैं. आज भी काशी के लोग धार्मिक कारणों से रामेश्वरम जाते हैं और दक्षिण भारतीय लोग काशी आते हैं."

"यह प्राचीन काल से चला आ रहा है. 17वीं शताब्दी में शैव कवि कुमारागुरूपरार तमिलनाडु से काशी गए और वहां मठ स्थापित किया."

वो बताती हैं, "यह मठ बाद में थानजावुर ज़िले में आ गए लेकिन लोग उसे आज भी काशी मठ ही कहते हैं.”

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आयोजन का विरोध क्यों हो रहा है?

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प्रोफेसर अरुनन काशी तमिल संगम के आयोजन की आलोचना करते हैं.

उन्होंने कहा, “तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन अभी थमा नहीं है. ऐसे में बीजेपी ऐसी छवि बनाना चाहती है कि वह तमिल को सेलिब्रेट कर रही है. भारतीय भाषा समिति का काम भारतीय भाषाओं का विकास करना है. अगर यह समिति तमिल भाषा और उसकी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहती तो इसका आयोजन तमिलनाडु में किया जाता.”

वे सवाल उठाते हैं कि इसका आयोजन वाराणसी में क्यों हो रहा है, जिसे संस्कृत का मठ कहा जाता है.

उनके अनुसार,''हिंदुत्व के मुख्यालय के तौर पर पहचाने जाने वाले वाराणसी के बदले तमिलनाडु में इसका आयोजन होता तो हमें ज़्यादा फ़ायदा होता. तमिल भाषा और उसकी संस्कृति के महत्व को बताने के लिए वाराणसी का चुनाव किया जा रहा है, यह पूरी तरह से बीजेपी के राजनीतिक उद्देश्य के चलते किया गया है.” 

अरुनन कहते हैं, “इसका आयोजन भारतीय आयकर दाताओं के पैसे से हो रहा है. इसका आयोजन हिंदू शहर समझे जाने वाले वाराणसी में हो रहा है. अगर उन्हें ऐसा आयोजन करना ही था तो उन्हें तमिलनाडु और वेटिकन सिटी के रिश्तों के बारे में पता लगाना चाहिए या फिर तमिलनाडु और मक्का के संबंधों की पड़ताल करनी चाहिए?''

वे कहते हैं,'' क्या हमें इन शहरों पर तमिल असर के बारे में नहीं जानना चाहिए? अगर वे तमिल की अहमियत पर बात करना चाहते हैं तो केंद्र सरकार कीलाडी और आदिचनल्लूर में हुई खुदाई की रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए और घोषणा करनी चाहिए कि भारतीय सभ्यता हड़प्पा, मोहनजोदड़ो में शुरू ना होकर तमिलनाडु में शुरू हुई थी.”

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का क्या कहना है?

शिक्षा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि काशी तमिल संगम में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की भूमिका होगी. यह भूमिका क्या होगी, इसके बारे में हमने भारतीय भाषा विभाग के प्रोफेसरों से बात की. 

नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त के साथ एक प्रोफेसर ने बताया, “अभी तक हमें कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है. हमारी भूमिका क्या होगी, इसके बारे में हम नहीं जानते हैं. हमें एक महीने तक चलने वाले कार्यक्रम के आयोजन की जानकारी प्रेस विज्ञप्ति से मिली है. हम लोगों से कैसी भूमिका अपेक्षित है, ये हम नहीं जानते हैं. यह पूरी तरह से सरकारी आयोजन नहीं है. बल्कि यह राजनीतिक कार्यक्रम ज़्यादा है.” 

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इमेज कैप्शन, तमिलनाडु में बीजेपी प्रवक्ता नारायण तिरूपति

क्या यह एक राजनीतिक कार्यक्रम है?

इस कार्यक्रम के आयोजन और हो रही आलोचना के मुद्दे पर बीबीसी तमिल ने तमिलनाडु में बीजेपी प्रवक्ता नारायण तिरूपति से बात की.

उन्होंने कहा, “आज़ादी के अमृत महोत्सव के मौके पर हम लोगों की एकता को प्रदर्शित करने के लिए यह आयोजन हो रहा है. यह दर्शाता है कि हम भले अलग अलग भाषा बोलते हों, लेकिन हम भारतीय हैं.” 

उन्होंने यह भी बताया, “2500 भागीदार इसमें एकता के दूत के तौर पर शामिल होंगे. काशी के लोगों को तमिल संस्कृति की महानता का पता चलेगा. तमिलनाडु के लोग सीधे काशी जा रहे हैं तो उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर जानकारी मिलेगी. दोनों क्षेत्रों के लोग एक दूसरे के क़रीब आएंगे, एकता अनुभव करेंगे. इस आयोजन से तमिल भाषा और संस्कृति की महानता को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी.”

लेकिन इसका आयोजन काशी में ही क्यों हो रहा है?

इस सवाल के जवाब में बीजेपी प्रवक्ता नारायण तिरूपति ने कहा, “हम युवा पीढ़ी को काशी और तमिलनाडु के संबंधों के बारे में बताना चाहते हैं. तमिलनाडु के लोग खुद को काशी के क़रीब पाते रहे हैं. हमलोग कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं. ''

उनके अनुसार, ''धार्मिक लोग ही नहीं नास्तिक पेरियार ने भी कुछ महीने काशी में बिताए थे. जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह मालूम होना चाहिए. हम लोग राजनीतिक उद्देश्य वाले नहीं हैं, डीएमके पार्टी भाषा के आधार पर राजनीति करती है.”

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