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पशुपति पारस: रामविलास पासवान के वफ़ादार भाई से लेकर 'बाग़ी' चाचा तक
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद पशुपति कुमार पारस ने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. पशुपति पारस ने बीजेपी पर ख़ुद के साथ अन्याय करने का आरोप भी लगाया है.
पारस का इस्तीफ़ा बिहार में एनडीए में सीटों के बँटवारे के ठीक एक दिन बाद आया है.
सोमवार को बिहार में एनडीए में सीटों की साझेदारी में पशुपति कुमार पारस के दल को कोई भी सीट नहीं दी गई थी.
पारस ख़ुद हाजीपुर से लोकसभा सांसद हैं और एलजेपी में टूट होने के बाद पार्टी के अन्य चार सांसद भी उनके साथ ही थे.
पशुपति पारस का कहना है, “मैंने इमानदारी से एनडीए की सेवा की. नरेंद्र मोदी बड़े नेता हैं, सम्मानित नेता भी हैं लेकिन हमारी पार्टी के साथ और व्यक्तिगत रूप से मेरे साथ नाइंसाफ़ी हुई है. इसलिए मैं भारत सरकार के केबिनेट मंत्री पद से त्यागपत्र देता हूँ."
पशुपति कुमार पारस लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के भाई हैं. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाया गया था.
उन चुनावों में एलजेपी को छह सीटों पर जीत मिली थी. इनमें हाजीपुर, जमुई, समस्तीपुर, नवादा, खगड़िया और वैशाली सीट शामिल है.
सीटों की साझेदारी में बिहार में एलजेपी के चिराग पासवान गुट को पाँच सीट दी गई है. नवादा सीट बीजेपी ने अपने पास रख ली है.
इस साझेदारी में पशुपति पारस की सीट भी छीन ली गई है और रामविलास के भतीजे और समस्तीपुर सीट से सांसद प्रिंस राज को भी कोई हिस्सा नहीं दिया गया है.
‘यह अन्याय और अपमान है’
बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के कार्यालय में एक सन्नाटा पसरा है. एलजेपी का यह कार्यालय रामविलास पासवान के राजनीतिक सफ़र का गवाह रहा है.
महज़ तीन साल पहले एलजेपी में मची सियासी उठापटक में यह कार्यालय और रामविलास के सियासी विरासत का बड़ा हिस्सा उनके भाई पशुपति कुमार पारस के कब्ज़े में आ गया था.
इस कार्यालय में कुछ कार्यकर्ता ज़रूर मौजूद हैं, जो अपने नेता पशुपति पारस के अगले क़दम का इंतज़ार कर रहे हैं.
पशुपति कुमार पारस अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ख़ुद को ‘मोदी का परिवार’ बता रहे थे. लेकिन हिस्सेदारी में परिवार से कुछ नहीं मिलने पर पारस की पार्टी के समर्थक और कार्यकर्ता नाराज़ हैं.
आरएलजेपी के प्रवक्ता चंदन कुमार कहते हैं, “हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि हमारे साथ इस तरह का विश्वसघात, अपमान और अन्याय होगा. हमारे सांसदों की अपने इलाक़े में बड़ी लोकप्रियता है, पर ऐसा लगता है कि किसी ने इनको (बीजेपी) को भ्रमित किया है.”
चंदन कुमार के मुताबिक़ हाल के दिनों में चिराग पासवान प्रधानमंत्री मोदी की सभा तक में नहीं गए, जबकि हम एनडीए के साथ इमानदारी से जुड़े हुए थे, हम लड़ेंगे और जहाँ-जहाँ हमारे सांसद थे वहाँ-वहाँ से लड़ेंगे.
पशुपति पारस का सियासी सफर
रामविलास पासवान के बारे में कहा जाता है कि राजनीति में उनको सबसे ज़्यादा भरोसा अपने परिवार पर ही था.
इसलिए उन्होंने अपने भाइयों, बेटे और भतीजे को भी राजनीति में आगे बढ़ाया, ताकि भविष्य में उनके साथ कोई धोखाधड़ी न हो.
राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, तेंदुलकर का बेटा क्रिकेटर, वकील का बेटा वकील बनता है, डॉक्टर भी चाहता कि उसका बेटा डॉक्टर बने. इसलिए राजनीति में जो लोग हैं, उनका परिवार राजनीति में आगे आता है तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है.
शिवानंद तिवारी याद करते हैं, “साल 1966 में पटना में दलितों पर पुरी के शंकराचार्य के एक बयान के ख़िलाफ़ मैंने केस किया था. इसमें रामविलास पासवान मेरे गवाह बने थे. शंकाराचार्य पर केस होना उस वक़्त इतना बड़ा मामला था कि इसकी ख़बर ऑल इंडिया रेडियो पर आई थी और मामला संसद तक पहुँच गया था. इससे रामविलास भी रातोंरात मशहूर हो गए थे.”
रामविलास पासवान इस घटना के बाद पासवानों के बीच भी काफ़ी चर्चा में रहे थे और माना जाता है कि इस घटना ने उनकी सियासत को बड़ी ताक़त दी थी.
बाद में रामविलास पासवान का क़द इतना बड़ा हो गया कि चालीस साल के सियासी सफर के बाद भी पशुपति कुमार पारस को आमतौर पर रामविलास पासवान के भाई के तौर पर ही पहचाना जाता है.
पशुपति कुमार पारस सबसे पहले जनता पार्टी के टिकट पर साल 1977 के बिहार विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे.
बिहार के खगड़िया ज़िले की एससी के लिए सुरक्षित अलौली सीट से साल 1969 के विधानसभा चुनावों में रामविलास संयुक्ति सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जीतकर विधायक बने थे.
साल 1974 में जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ने के बाद रामविलास पासवान हाजीपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और अलौली विधानसभा सीट से अपने भाई पशुपति कुमार को खड़ा किया था.
पशुपति पारस 7 बार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे हैं. वो बिहार विधान परिषद के सदस्य और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे हैं.
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में रामविलास पासवान ने चुनावी राजनीति को छोड़कर एक बार फिर अपने भाई को अपनी ही सीट से चुनाव लड़वाया. इस बार बारी हाजीपुर लोकसभा सीट की थी.
पशुपति पारस हाजीपुर सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने. उनको नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री भी बनाया गया. पशुपति पारस को भी फ़ूड प्रोसेसिंग मिनिस्ट्री मिली थी, जो पहले रामविलास पासवान के पास थी.
इस तरह के रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत में पशुपति पारस को जगह मिलने लगी. लेकिन रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके परिवार में मची सियासी खींच-तान में उनकी पार्टी के दो टुकड़े हो गए.
विवाद की शुरुआत
साल 2020 में रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी में एक तरफ बॉम्बे की फ़िल्मी दुनिया से राजनीति में आए उनके बेटे चिराग पासवान थे.
दूसरी तरफ उनके राजनीतिक सहयोगी के तौर पर साथ रहे भाई पशुपति कुमार पारस थे.
उस वक़्त पशुपति पारस को रामविलास के छोटे भाई रामचंद्र पासवान के बेटे और समस्तीपुर से एलजेपी सांसद प्रिंस राज का भी साथ मिला.
इस संघर्ष में साल 2021 में रामविलास की लोक जनशक्ति पार्टी दो हिस्सों में टूट गई. एलजेपी को साल 2019 से चुनावों में बिहार की 6 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी, जिनमें 5 पशुपति पारस के साथ आ गए.
इस तरह से बिहार में चाचा-भतीजे की लड़ाई में पशुपति पारस ने बाज़ी मार ली और चिराग पासवान अलग-थलग पड़ गए.
पशुपति पारस ने एलजेपी के अपने धड़े को राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का नाम दिया, जबकि चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख बने.
पशुपति के सामने क्या रास्ता बचा है?
पारस अब क़रीब 72 साल के हो चुके हैं और माना जाता है कि उम्र की वजह से उनकी राजनीतिक सक्रियता पर भी असर पड़ा है.
जबकि चिराग पासवान लोगों तक यह संदेश पहुँचाने क़ामयाब रहे कि वो ही रामविलास पासवान के असली सियासी उत्तराधिकारी हैं. चिराग ने कई मौक़ों पर इसे साबित भी किया है.
पिछले साल हुए नगालैंड विधानसभा चुनाव में पहली बार एलजेपी (रामविलास) को दो सीटों पर जीत मिली थी और वो 8 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी.
चिराग पासवान ने साल 2020 के बिहार विधानसभा में एलजेपी को बिना किसी गठबंधन के चुनाव मैदान में उतारा था. उन चुनावों में पार्टी को क़रीब सात फ़ीसदी वोट मिले थे.
पार्टी में टूट के बाद से चिराग पासवान के गुट ने साल 2021 के अंत में बिहार में दो सीटों पर विधानसभा उपचुनाव में अपने उम्मीदवार को निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतारा था और उन्हें क़रीब 6 फ़ीसदी वोट मिले थे.
वहीं बीजेपी के साथ गठबंधन में होने की वजह से पशुपति पारस को अब तक अपनी पार्टी की ताक़त दिखाने का मौक़ा पहले नहीं मिला है.
पारस के बयानों के स्पष्ट है कि उन्हें एनडीए में अपने भविष्य को लेकर आशंका कुछ दिन पहले ही हो गई थी, वो बस इसकी आधिकारिक घोषणा का इंतज़ार कर रहे थे.
पशुपति पारस लगातार हाजीपुर सीट से चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं.
बिहार में चर्चा यह भी है कि पशुपति पारस राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव से भी बात कर सकते हैं. हालाँकि उन्हें महागठबंधन शामिल करने से विपक्ष को कितना फ़ायदा होगा, यह कह पाना मुश्किल है.
लेकिन अगर पशुपति कुमार पारस अपने उम्मीदवारों को बिना किसी गठबंधन के भी चुनाव मैदान में उतारते हैं तो विपक्ष को पारस के बहाने एनडीए पर हमला करने का एक मौक़ा ज़रूर मिल सकता है.
माना जा रहा है कि पशुपति कुमार पारस बुधवार को पटना में अपने आगे की योजना तैयार कर सकते हैं.
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