यूपीएस कैसे ओल्ड पेंशन स्कीम और नेशनल पेंशन सिस्टम से अलग है? क्या कह रहे एक्सपर्ट और कर्मचारी यूनियन?

    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) में सुधारों की लंबे समय से चल रही मांग के बीच शनिवार देर शाम केंद्र सरकार ने यूनिफ़ाइड पेंशन स्कीम यानी यूपीएस योजना को मंज़ूरी दे दी है.

इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह योजना अगले साल एक अप्रैल से लागू होगी और इसका फ़ायदा केंद्र सरकार के 23 लाख कर्मचारियों को मिलेगा.

बीते कुछ सालों से सरकारी कर्मचारी ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली की मांग करते रहे हैं और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा भी बनाया था.

विपक्ष शासित कुछ राज्यों में ओल्ड पेंशन स्कीम को बहाल भी किया गया, जिनमें राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब शामिल हैं.

इस साल के अंत तक चार राज्यों- महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हरियाणा और जम्मू कश्मीर में चुनाव की तारीख़ें भी घोषित हो चुकी हैं.

आइए समझते हैं कि एनपीएस और ओपीएस से यूपीएस किन मायनों में अलग है और एक्सपर्ट और ट्रेड यूनियन नेताओं का इस पर क्या कहना है?

यूपीएस, एनपीएस से किन मायनों में अलग है?

जब 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) की जगह न्यू पेंशन सिस्टम (एनपीएस) लेकर आई तो इसमें निश्चित पेंशन के प्रावधान को हटा दिया गया.

इसके साथ ही इसमें कर्मचारियों का अंशदान अनिवार्य कर दिया गया, इसमें कर्मचारी और सरकार के लिए समान रूप से 10 प्रतिशत का अंशदान करने का प्रावधान बनाया गया.

साल 2019 में इसमें सरकारी अंशदान को बेसिक सैलरी और डीए का 14 प्रतिशत कर दिया गया.

नए प्रावधान के अनुसार रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी जो कुल राशि बनी, उसका 60 प्रतिशत निकाल सकते हैं. बाकी 40 प्रतिशत को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और निजी कंपनियों की ओर प्रमोट किए गए पेंशन फ़ंड मैनेजर्स की विभिन्न स्कीमों में लगाना कर्मचारी के लिए अनिवार्य बना दिया गया.

इन कंपनियों की ओर से पेश की गई स्कीमों का 'निम्नतम' से 'उच्चतम' जोख़िम के आधार पर चुनाव किया जा सकता है.

लेकिन सरकारी कर्मचारी यूनियनों का कहना है कि जब एनपीएस को लागू किया गया तो इसे ओपीएस से बेहतर बताया गया था, लेकिन 2004 के बाद भर्ती होने वाले जो लोग रियाटर हो रहे हैं उन्हें बहुत मामूली पेंशन मिल रही है.

इसके अलावा कर्मचारियों को अपना अंशदान भी देना पड़ रहा है, जबकि ओपीएस में पेंशन सरकार की ओर से मुहैया कराई गई सामाजिक सुरक्षा योजना पर पूरी तरह निर्भर थी.

कर्मचारियों का कहना है कि जो नया यूपीएस लाया गया है उसमें कर्मचारी के अपने अंशदान को निकालने को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.

हालांकि यूपीस में ग्रैच्युटी के अलावा नौकरी छोड़ने पर एकमुश्त रक़म दी जाएगी. इसकी गणना कर्मचारियों के हर छह महीने की सेवा पर मूल वेतन और महंगाई भत्ते का दसवां हिस्से के रूप में होगी.

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शनिवार को यूनिफ़ाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) की जानकारी देते हुए इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया, "प्रधानमंत्री मोदी ने पेंशन से जुड़े मामलों पर डॉ. सोमनाथन (जो उस वक्त फाइनेंस सेक्रेटरी थे) के नेतृत्व में एक कमिटी बनाई थी."

उन्होंने कहा, "देशभर के लेबर संगठनों से बातचीत करने और दुनिया के और देशों में मौजूद सिस्टम को समझने के बाद कमिटी ने यूनिफ़ाइड पेंशन स्कीम की सिफ़ारिश की, जिसे सरकार ने मंज़ूर कर लिया."

लेकिन कई यूनियन नेताओं ने उनके इस दावे को झूठा बताया है. उनका कहना है कि सरकार ने यूपीएस को लेकर उनके साथ कोई बातचीत नहीं की.

नेशनल मूवमेंट फ़ॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (एनएमओपीएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय कुमार बंधु ने सवाल किया है कि "कमिटी की सिफ़ारिश कब पेश हुई और कब इस पर विमर्श हुआ, ये किसी को पता नहीं. कमिटी की रिपोर्ट क्या है ये भी किसी को नहीं पता."

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "सभी जानते हैं कि हम लोग पूरे देश में ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली का आंदोलन चला रहे हैं, लेकिन सरकार ने यूपीएस लाने से पहले हमसे बात करना उचित नहीं समझा."

वो कहते हैं, "मैंने प्रधानमंत्री मोदी को चार चिट्ठियां लिखी थीं, लेकिन किसी का कोई जवाब नहीं मिला. सरकार का दावा है कि यूपीएस, ओपीएस जैसा ही है, ऐसा है तो ओपीएस को ही लागू करने में क्या दिक्कत है?"

विजय कुमार बंधु ने कहा, "यूपीएस में कहा जा रहा है कि अंतिम सेवा वर्ष की बेसिक सैलरी के औसत का आधा पेंशन के रूप में दिया जाएगा. इसके अलावा एनपीएस के तहत जो कर्मचारियों का 10 प्रतिशत अंशदान होगा वो नहीं मिलेगा. इसका मतलब कर्मचारी को न तो ओपीएस मिल पाया, न ही वो एनपीएस में रहा, वो तो अधर में लटक गया."

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारी एनपीएस और यूपीएस में विकल्प चुन सकते हैं.

'25 साल की सीमा तय कर दी गई'

विजय कुमार बंधु ने यूपीएस में नौकरी की 25 साल की समय सीमा को लेकर कहा, "यूपीएस में फुल पेंशन के लिए 25 साल की सीमा तय कर दी गई है. अर्द्धसैनिक बल के कर्मचारी 20 साल में रिटायर हो जाते हैं. यानी वो इस स्कीम से बाहर हो गए. ऐसे अन्य कई क्षेत्र हैं. इसलिए यूपीएस एक घाटे का सौदा है, सिर्फ नाम बदल दिया गया है."

वहीं नेशनल मिशन फ़ॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (भारत) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंजीत सिंह पटेल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "एनपीएस में दो समस्याएं थीं, पहला, सेवा के दौरान कर्मचारी को अपने पैसे पर अधिकार नहीं था, दूसरा, रिटायरमेंट पर उसे निश्चित प्रतिशत के तौर पर पेंशन की गारंटी नहीं थी और डीए भी शामिल नहीं था."

"लेकिन एनपीएस में एक फायदा था कि कर्मचारी का जमा धन उसे या उसके परिवार को मिल जाता था और एक निश्चित हिस्सा शेयर मार्केट में निवेश हो जाता था. वो पैसा सरकार को नहीं जाता था."

उन्होंने कहा, "हमारी मांग थी कि कर्मचारियों का पैसा उसे वापस कर दिया जाए और सरकार जो अंशदान करती है उसे वो वापस ले ले और उसके एवज़ में पुरानी वाली पेंशन के बराबर पेंशन दे दे."

वो कहते हैं, "यूपीएस तो एनपीएस से भी बुरा हो गया. सबसे बड़ी बात है कि अभी के एनपीएस में नियम है कि अगर सेवा के दौरान कर्मचारी की मौत हो जाती है तो उसके परिजन को पुरानी पेंशन स्कीम के तहत सैलरी का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलता है. लेकिन यूपीएस में तो ये भी प्रावधान नहीं है."

ट्रेड यूनियनों से क्या मशविरा लिया गया?

देश की 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के मंच में शामिल सीटू के जनरल सेक्रेटरी तपन सेन ने भी बीबीसी हिंदी से बातचीत में स्वीकार किया कि सरकार ने इस मामले में उनसे कोई सलाह मशविरा नहीं किया.

उन्होंने कहा, "अधिकांश कर्मचारी संगठनों ने सरकार से ओल्ड पेंशन स्कीम में बिना छेड़छाड़ किए उसे ही बहाल करने पर ज़ोर दिया था. हमने ज़ोर देकर इस पर वार्ता करने को कहा था लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला."

तपन सेन ने कहा, "यूपीएस में कहा गया है कि डीए हटा कर बेसिक सैलरी का आधा पेंशन दिया जाएगा. लेकिन पांच साल के अंतराल में ही डीए का हिस्सा आम तौर पर बेसिक के बराबर या उससे अधिक हो जाता है. यूपीएस के तहत पेंशन भी आधी हो जाएगी."

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

बिज़नेस स्टैंडर्ड की कंसल्टिंग एडिटर अदिति फडनीस ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा कि न्यू पेंशन स्कीम को लाया इसीलिए गया था कि केंद्र सरकार के पेंशन बिल को संतुलित किया जा सके.

वो कहती हैं, "एनपीएस में कर्मचारियों की बचत का एक हिस्सा शेयर मार्केट में लगाए जाने का प्रावधान बनाया गया. यानी शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव के आधार पर जो रिटर्न मिलेगा उसी अनुपात में पेंशन बनेगी. यह फ़िक्स भी हो सकती है और 'परिवर्तनीय' भी."

जिन लोगों ने एनपीएस को चुना था, हाल के सालों में वे रियाटर होने लगे हैं और उन्हें पेंशन मिलना शुरू हो गई है.

अदिति कहती हैं, "इन लोगों की शिकायत है कि उनकी पेंशन किसी महीने 100 रुपये होती है, कभी 120 रुपये होती है, ऐसे में वो अपनी ज़िंदगी कैसे बिताएंगे."

विजय कुमार बंधु ने भी एनपीएस के तहत मामूली पेंशन मिलने का मुद्दा उठाया, "बनारस में एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे. जब वो रिटायर हुए उनकी सैलरी क़रीब डेढ़ लाख थी और जब पेंशन आना शुरू हुई तो वो क़रीब 4,044 रुपये थी. उनके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया."

यही वजह है कि कर्मचारी इसे रद्द करने और ओल्ड पेंशन स्कीम को बहाल करने की मांग कर रहे हैं.

देश में सरकारी कर्मचारियों की अच्छी ख़ासी संख्या है और वो एक बड़ा वोट बैंक भी है, जो लगातार सरकार पर दबाव बनाए हुए है.

ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली की मांग

हिमाचल प्रदेश पहली राज्य सरकार थी जिसने ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली की. 2022 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इसे मंज़ूर किया था.

अदिति फडनीस कहती हैं, "ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली को लेकर भले ही लोग खुश हों लेकिन आने वाले समय में लगातार बढ़ते कर्मचारियों के पेंशन का बिल बाद की सरकारों को भुगतना पड़ेगा, जिसमें हिमाचल प्रदेश की सरकार भी शामिल है."

यूपीएस के तहत सरकार ने अपनी ओर से अंशदान को बढ़ाकर 18.5 प्रतिशत करने का प्रावधान किया है.

इंडियन एक्सप्रेस ने पूर्व वित्त सचिव टीवी सोमनाथन के हवाले से कहा कि एरियर के रूप में सरकार पर 800 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा और इसके लागू करने के पहले साल सरकारी खजाने पर 6,250 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, केंद्र के लिए पेंशन बिल 1990-1991 में 3,272 करोड़ रुपये और राज्यों का पेंशन बिल 3,131 करोड़ रुपये था.

2020-2021 केंद्र का बिल 58 गुना बढ़कर 1,90,886 करोड़ रुपये और राज्यों का बिल 125 गुना बढ़कर 3,86,001 करोड़ रुपये हो गया.

सरकार का क्या कहना है?

इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस योजना को कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा के लिए उनकी सरकार की प्रतिबद्धता का उदाहरण बताया.

उन्होंने एक पोस्ट में लिखा, "राज्य सरकारों के वे 90 लाख कर्मचारी भी लाभान्वित होंगे, जिन्होंने एनपीएस चुन रखा है. मौजूदा और भविष्य कर्मचारी एनपीएस और यूपीएस में विकल्प चुन सकते हैं."

इसके अलावा यूपीएस में न्यूनतम 10 साल की सेवा के बाद 10,000 रुपये पेंशन की गारंटी की गई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक्स पर लिखा, "देश की प्रगति के लिए कठिन परिश्रम करने वाले सभी सरकारी कर्मचारियों पर हमें गर्व है."

उन्होंने लिखा, "यूनिफ़ाइड पेंशन स्कीम इन कर्मचारियों की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली है. यह कदम उनके कल्याण और सुरक्षित भविष्य के लिए हमारी सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है."

केंद्रीय गृह मंत्री ने इस स्कीम को लाने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का धन्यवाद देते हुए, कर्मचारियों के सुरक्षित भविष्य के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दुहराया.

यूपीएस में क्या अच्छा है?

आर्थिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अगर ओल्ड पेंशन स्कीम चलती तो ये बिल ऐसे ही बढ़ता रहता. यूपीएस में अच्छी बात ये है कि कर्मचारी अंशदान को जारी रखा गया है. जो पचास साल पहले हो जाना चाहिए था."

आलोक जोशी कहते हैं, "यूपीएस में कर्मचारी से 10 प्रतिशत का अंशदान लेकर सरकार ने अपना भार कम किया है. एक तरह से एनपीएस को नया चोला पहनाया गया है."

"लेकिन अच्छी बात ये है कि इसमें शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव से कर्मचारियों को कवर दिया गया है. अभी तक एनपीएस के निवेश पर अच्छा रिटर्न आ रहा है. लेकिन भविष्य में किसी प्राकृतिक आपदा या मंदी के चलते अगर बाज़ार गिर जाता है तो उस स्थिति में सरकार एक निश्चित पेंशन की गारंटी देगी."

उन्होंने कहा, "ओल्ड पेंशन स्कीम में कर्मचारी से अंशदान नहीं लिया जाता था इसलिए वो सरकार पर एक बड़ा भार था. हालांकि यूपीएस में रिटायरमेंट के बाद पैसे निकालने को लेकर प्रावधानों पर अभी स्पष्टता नहीं है."

लेकिन आलोक जोशी कहते हैं, "पहले भी पेंशन में 'कम्युटिंग' का प्रावधान था यानी ओपीएस में अपनी पेंशन का एक हिस्सा कर्मचारी बेच सकता था. अगर मांग होती है तो सरकार ये प्रावधान शामिल कर सकती है और करना भी चाहिए."

इस वक़्त यूपीएस आने के मायने

वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस का कहना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अकेले दम पर बहुमत से दूर रहने के कई कारणों में से एक पेंशन स्कीम का मुद्दा भी रहा है.

वो कहती हैं, "आम चुनावों से पहले विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बनाया था. ज़मीन पर इसे लेकर काफ़ी चिंता थी. कई विपक्षी दलों ने ये भी दावा किया कि सत्ता में आने के बाद वो ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करेंगे. इनमें कई बीजेपी की सरकारें भी थीं जैसे महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस सरकार."

उनके अनुसार, "अभी चार राज्यों के चुनाव होने वाले हैं और हरियाणा और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनावों की तारीख़ घोषित हो गई है. सरकार का ये कदम उसके मद्देनज़र भी है."

वहीं आलोक जोशी का कहना है कि जम्मू कश्मीर में भी सरकारी कर्मचारी भारी संख्या में हैं, हरियाणा में भले ही सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम हो लेकिन महाराष्ट्र में भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है. इसमें कोई शक नहीं कि चुनाव को देखते हुए इस स्कीम की घोषणा की गई है.

युवाओं को अपरेंटिस भत्ता देना

वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी ने बीबीसी से कहा कि मोदी सरकार ने पिछले कुछ दिनों में विपक्षी दलों के मुद्दों को आत्मसात करके उसे कुंद करने की कोशिश की है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है बजट में पहली बार नौकरी पाने वाले युवाओं को अपरेंटिस भत्ता देने की व्यवस्था लागू करना.

वो कहते हैं, "युवाओं को भत्ता देने का वादा कांग्रेस ने आम चुनावों के दौरान अपने घोषणा पत्र में किया था. ओल्ड पेंशन स्कीम को नाकाम करने के लिए भी यूपीएस को लाया गया है."

इसी साल हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि डिप्लोमा धारकों या 25 से कम उम्र के ग्रैजुएट कर चुके युवाओं के लिए एक साल की अपरेंटिसशिप मुहैया करवाई जाएगी.

और पिछले बजट में निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में अगले पांच साल में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप देने की घोषणा की. इसके अलावा पांच साल में 20 लाख युवाओं को ट्रेनिंग देने की बात कही.

विजय कुमार बंधु का कहना है कि सरकारी कर्मचारी ओल्ड पेंशन स्कीम के लिए आंदोलन कर रहे थे और उन्हें वही चाहिए.

वो कहते हैं, "आम चुनावों में वोट फ़ॉर ओपीएस का हमने अभियान चलाया था और नतीजा ये रहा कि बीजेपी बहुमत से पीछे रह गई. सरकार अभी एनपीएस से यूपीएस पर आई है, आगे उसे ओपीएस पर आना ही होगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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