क्या टूट सकता है आपके रिटायर होने का ख्वाब?- दुनिया जहान

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

स्टेनली कॉलिन्स दक्षिणी इंग्लैंड के गिल्डफर्ड में रहते हैं और एक हार्डवेयर स्टोर में काम करते हैं.

स्टोर के बाकी कर्मचारियों की ही तरह उन्हें कई काम करने होते हैं. मसलन ग्राहकों की मदद करना. स्टॉक का हिसाब-किताब रखना और ग्राहकों को सलाह देना कि वो अपने घर को बेहतर कैसे बना सकते हैं.

लेकिन, जो बात कॉलिन्स को बाकी कर्मचारियों से अलग करती है, वो ये है कि उनकी उम्र 91 साल है.

हो सकता है कि आप कॉलिन्स को खुशकिस्मत मानें. लेकिन ज़रा सोचिए कि क्या आप इस उम्र तक काम करना चाहेंगे?

दुनिया के करीब हर देश में लोग चाहते हैं कि एक ख़ास उम्र तक काम करने के बाद वो रिटायर हो जाएं. लेकिन जैसे-जैसे इंसानों की औसत आयु बढ़ रही है और पेंशन पाने वालों की संख्या घट रही है, बड़ी संभावना इस बात की है कि बहुत सारे लोगों की रिटायर होने की चाहत कभी पूरी न हो सके और उन्हें पूरी ज़िंदगी काम करना पड़े.

ऐसी स्थिति को लेकर ब्रिटेन की वॉरिक यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नोएल व्हाइटसाइड कहती हैं, " ऐसा नहीं है कि रिटायर होने का अधिकार हमें भगवान से मिला हो."

कैसे हुई पेंशन की शुरुआत

नोएल इस बात का अध्ययन करती हैं कि दुनिया के अलग-अलग देश अपने बुजुर्गों की देखभाल कैसे करते हैं

अगर आप इंसानी सभ्यता पर नज़र डालें तो जानकारी मिलेगी कि हज़ारों- हज़ार साल तक लोग तब तक काम करते रहते थे जब तक उनका शरीर जवाब नहीं दे देता था.

नोएल व्हाइटसाइड बताती हैं, " औद्योगिकीकरण और शहरीकरण से पुराने ताने-बाने पर असर हुआ. आप पाएंगे कि इसी दौरान दुनिया के कई देशों ने गरीब बुजुर्गों की समस्या को सुलझाने की दिशा में काम शुरू किया."

18 वीं सदी के आखिर में यूरोप में एक राजा ने एक नए साम्राज्य की बागडोर संभाली. इस राज्य का नाम था जर्मनी और इसके एकीकरण की पटकथा राजा के चांसलर ऑटो वान बिस्मार्क ने लिखी थी. एकीकरण के बाद की स्थितियों को लेकर वो थोड़ा घबराए हुए थे. नए राज्य के संविधान का काफी विरोध हो रहा था. सोशलिस्ट समूह विरोध को लेकर ज़्यादा मुखर थे. बिस्मार्क जानते थे कि साम्राज्य को एकजुट रखने के लिए उन्हें कुछ करना होगा.

नोएल व्हाइटसाइड बताती हैं, " बिस्मार्क इन समूहों को साथ लेना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने पेंशन का विचार सामने रखा. इरादा साफ था, जो विरोध करते उन्हें पेंशन के फायदों से हाथ धोना पड़ता."

पेंशन की तब लागू योजना के मुताबिक कर्मचारियों को वेतन का एक छोटा हिस्सा सरकार को देना था और जब वो काम करना बंद कर देते, उसके बाद सरकार उन्हें ताउम्र नियमित भुगतान करती. इस तरह से पहली बार पेंशन की शुरुआत हुई. ये कम ही लोगों के लिए फायदे का सौदा था. उस वक़्त पेंशन का हक़ 70 साल की उम्र के बाद मिलता था और लोगों की औसत उम्र 50 साल थी.

हालांकि, ये योजना राजनीति के मोर्चे पर एक ज़बरदस्त चाल थी. ब्रिटेन के नेताओं का भी इस पर ध्यान गया और वो भी लोगों को बुढ़ापे में आय मुहैया कराने की संभावना पर चर्चा करने लगे. दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी नेताओं को पेंशन का वादा फायदेमंद दिखने लगा.

नोएल व्हाइटसाइड की राय है, " इसका मकसद राजनीतिक ही था. शायद ही कहीं ऐसा था कि पेंशन की बात सिर्फ बुजुर्गों की मदद के लिए की गई हो. डेनमार्क में पेंशन की शुरुआत हुई ताकि युवा कर्मचारी अमेरिका न जाएं. न्यूज़ीलैंड में भी इसी मकसद से पेंशन लागू की गई."

शुरुआती चुनौती

सरकार की ओर से लोगों को बुढ़ापे में मामूली आय मुहैया कराए जाने के विचार ने मजबूती के साथ जड़ें जमा लीं. लेकिन शुरुआती दौर की पेंशन की रकम बहुत कम थी. उसके भरोसे गुजारा मुश्किल था. ये प्रयोग शुरू ही हुआ था कि पहला विश्व युद्ध छिड़ गया. युद्ध के बाद सरकारें अलग तरह के सामाजिक दबाव का सामना कर रही थीं. अस्थिर अर्थव्यवस्था, शरणार्थी संकट और 1930 के दशक की महामंदी. इसी के साए तले दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई. ये जंग छह साल के बाद ख़त्म हुई. तब सरकारें एक बार फिर ऐसे दौर का सामना नहीं करना चाहती थीं जहां बढ़ी बेरोजगारी और मंदी हो. उन्हें जंग से लौटे युवाओं के लिए नौकरियों का इंतजाम करना था.

नोएल व्हाइटसाइड बताती हैं, " व्यापक बेरोजगारी की समस्या के समाधान एक तरीका ये था कि ज़्यादा काम नहीं कर पाने वाले बुजुर्ग नौकरियों से हट जाएं. हटाने का बेहतर तरीका उनको पेंशन की पेशकश था."

इसी के साथ शुरु हुआ रिटायरमेंट का दौर. तब पहली बार इतनी पेंशन दी जा रही थी कि 65 साल की उम्र में नौकरी छोड़ने वाला व्यक्ति बाकी की ज़िंदगी आराम से रहे. औद्योगिकीकरण और दो विश्व युद्धों के बाद ऐसा वक्त आया था, जब दुनिया को विदा कहने के पहले एक कामकाजी व्यक्ति थोड़ा वक्त आराम कर सके. लेकिन इसे गढ़ने वाले राजनेताओं, समाज सुधारकों और कंपनियों के अधिकारियों को अंदाज़ा ही नहीं था कि आगे क्या होने वाला है.

पेंशनरों के सुनहरे दिन

अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में बतौर रिसर्च डॉयरेक्टर काम करने वाले टॉमस जंकोस्की कहते हैं, "तब मेडिकल साइंस की तरक्की को लेकर अनुमान नहीं लगाया गया था."

टॉमस कहते हैं कि पेंशन की शुरुआत करने वालों ने एंटीबॉयोटिक्स के बारे में नहीं सोचा था. ये भी नहीं सोचा था कि आगे सर्जरी से दिल की बीमारियां दूर हो पाएंगी. तब उन बातों के बारे में नहीं सोचा गया था जिनसे लोगों को लंबे वक्त तक स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिलती है. मेडिकल साइंस की तरक्की से लोगों की औसत उम्र बढ़ने लगी. बड़े बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी. पेंशन पाने वाले स्वास्थ्य और दौलत, दोनों ही मोर्चों पर धनी दिखने लगे. ये ज़िंदगी एशो आराम से भरी थी.

टॉमस जंकोस्की कहते हैं, " रिटायर्ड लोग काफी ऊंचे दर्जे की ज़िंदगी जी रहे थे. उनकी भरपूर आय हो रही थी. उनके पास ख़ासी फुर्सत थी. वो लंबे वक्त तक अपने पसंद की गतिविधियां कर पा रहे थे."

रिटायर होने वाले लोग औद्योगिक शहरों से दूर उन इलाकों का रुख करने लगे जहां मौसम ज़्यादा बेहतर था. पेंशनर खाली वक़्त में पेंटिंग और म्यूजिक जैसे शौक पूरे करने लगे.

टॉमस जंकोस्की बताते हैं, " मार्केट ने भी जल्दी भांप लिया कि उपभोक्ताओं का नया समूह खड़ा हो गया है जिसकी भरपूर आय हो रही है. कंपनियों के बीच उस आमदनी को हासिल करने को मुक़ाबला होने लगा."

इससे ट्रैवल इंडस्ट्री में उछाल आया. उस दौरान क्रूज इंडस्ट्री की भी खूब तरक्की हुई.

लेकिन टॉमस जंकोस्की कहते हैं कि रिटायरमेंट का ये दौर सुनहरा था लेकिन टिकाऊ नहीं था.

फट न जाए गुब्बारा!

उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए लंदन में पेंशन इंस्टीट्यूट के डॉयरेक्टर डेविड ब्लैक कहते हैं, "ट्रेन दूर थी, तब से आप लोगों को आगाह कर रहे हैं लेकिन जब तक ट्रेन सामने नहीं आ गई तब तक कोई नहीं हिला."

डेविड ब्लैक कहते हैं कि पेंशन की देनदारियों का गुब्बारा दिनों दिन बड़ा होता जा रहा है. अब डर है कि एक दिन ये फट जाएगा. वो आगाह करते हैं कि रिटायरमेंट का सुनहरा दौर जल्दी ही ख़त्म होने को है.

तमाम कंपनियां गुणा-गणित कर चुकी हैं और अब सोच रही हैं कि उन्होंने बहुत सारे लोगों को बहुत कुछ देने का वादा कर लिया है. ये लोग अब बहुत लंबी ज़िंदगी जी रहे हैं.

डेविड ब्लैक के मुताबिक, " जिन कंपनियों ने इसे सबसे पहले महसूस किया, वो बैंक थे. 1990 के दशक के आखिर में बैंकों के प्रमुखों ने महसूस किया कि उनके रिस्क मैनेजर ब्याज़ दर और करेंसी से जुड़े रिस्क संभालते हैं. जबकि कमरे के एक कोने में बैठे रहने वाले पेंशन मैनेजर बैंक की कुल कीमत से ज़्यादा जोखिम लिए बैठे हैं. ये उनके लिए आँख खोल देने वाली स्थिति थी और तब बैंकों ने झटपट पेंशन स्कीम बंद करनी शुरू कर दी."

दूसरी कंपनियों ने भी यही किया. अगर आप सिर्फ़ ब्रिटेन के आंकड़ों पर ही नज़र डालें तो पायेंगे ये आंकडे हैरान करने वाले हैं.

डेविड ब्लैक कहते हैं, " पेंशन स्कीम की परिसंपत्तियां 14 खरब की हैं जबकि देनदारी 24 खरब की है. कुल घाटे की भरपाई मुमकिन नहीं."

बाद के दिनों में कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के सामने अलग तरह के पेंशन प्लान की पेशकश की. डेविड ब्लैक की राय है कि अगर कंपनियां अपने कर्मचारियों के वेतन में तीस फ़ीसदी की कटौती की बात करतीं तो वहां दंगे की स्थिति हो जाती. लेकिन उन्होंने कटौती उस जगह की जहां कर्मचारियों को समझ ही नहीं आया कि उन्होंने क्या गंवा दिया है. उन्होंने कोई विरोध नहीं किया. नई स्कीम में आपको कितनी पेंशन मिलेगी, ये बहुत हद तक शेयर बाज़ार के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. रिटायरमेंट के सुनहरे दौर के मुक़ाबले अब वहां कहीं ज़्यादा अस्थिरता है.

इसका एक आसान निदान ये है कि लोग अपने पेंशन फंड में ज़्यादा रकम जमा करें.

लेकिन डेविड ब्लैक को ऐसा होना मुमकिन नहीं दिखता है.

दिक्कत भरे दिन

वो कहते हैं, " युवा बचत नहीं करते. बल्कि वो उधार लेते हैं. क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करते हैं. वो छोटी बचत तक नहीं कर सकते. मसलन, गर्मी की छुट्टियों में कहीं घूमने जाने के लिए तक पैसे नहीं जोड़ सकते. ऐसे लोगों से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो अपने रिटायरमेंट के लिए लंबे वक़्त तक बचत करें."

और अगर आप ये सोच रहे हैं कि आपके बच्चों और उनके बच्चों को रिटायरमेंट के बाद सरकार की ओर से कोई बेसिक इनकम मिल सकती है तो डेविड ब्लैक की बात पर गौर कीजिए, वो कहते हैं कि ऐसा नहीं होने वाला है.

आमतौर पर पेंशन सिस्टम युवाओं और बुजुर्गों की संख्या के बीच अच्छे संतुलन पर निर्भर करता है. लेकिन, कई देशों में लोग छोटे परिवारों की नीति का पालन कर रहे हैं और वहां बच्चे पैदा होने की दर घटी है. अब बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है और युवाओं की संख्या कम हो रही है.

कैसे बदलेंगे हालात?

डेविड ब्लैक कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने अपने नागरिकों से जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने की स्थिति में वो दीवालिया होने के करीब पहुंच जाएंगे. ऐसे में या तो दुनिया के बाज़ारों और अर्थव्यवस्था में लंबे वक्त तक तरक्की बनी रहे या फिर जन्मदर में अच्छा इजाफा हो, नहीं तो लोगों को पेंशन हासिल करने के लिए पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा योगदान करना होगा.

और अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें काम करते रहना होगा. वो रिटायर नहीं हो पाएंगे. डेविड ब्लैक कहते हैं कि बीती कुछ पीढ़ियों को छोड़ दें तो इंसानों के इतिहास में हज़ारों पीढ़ियां यही करती रही हैं. ऐसे में ये भी कहा जा सकता है कि रिटायरमेंट वो आनंद था जो कुछ वक़्त के लिए आया और जिसका लाभ कुछ खुशकिस्मत पीढ़ियों को मिला.

आने वाली चुनौतियों को लेकर अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर एंड्रयू स्कॉट कहते हैं, "अनुमान है कि अब की पीढ़ी अपने माता-पिता के मुकाबले छह से नौ साल ज़्यादा जिएगी. कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा. इसका नतीजा ये होगा कि अमीर देशों में जो बच्चे आज पैदा हुए हैं, वो सौ साल से लंबी ज़िंदगी जिएं. इसकी 50 फीसदी संभावना है."

करनी होगी नई पहल

एंड्रयू स्कॉट आगे कहते हैं, " फिक्र की बात ये है कि हममें से तमाम लोग अपने माता-पिता को रोल मॉडल के रूप में देखते हैं. लेकिन उनके तरीके हमारे काम नहीं आएंगे. हमें खुद को बदलना होगा."

ये साफ है कि आने वाली पीढ़ियों की ज़िंदगी लंबी होगी और अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए धन का इंतजाम भी खुद ही करना होगा. एंड्रयू कहते हैं कि लंबे समय तक काम करना कोई अच्छा समाधान नहीं है. 20 साल की उम्र से लेकर 80 साल तक नौकरी करना. यानी कुल 60 साल का करियर. ये सुनने में ही बहुत बुरा लगता है.

एंड्रयू स्कॉट कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई पढ़ाई है जो साठ साल तक मदद करे. तंदरुस्ती पर भी असर होगा. निश्चित ही रिश्ते भी प्रभावित होंगे. ज़िंदगी के इस ढर्रे के बारे में हमें दोबारा सोचने की जरूरत होगी."

एंड्यू स्कॉट कहते हैं कि अगर आप तीन चरण वाली ज़िंदगी की बात करें यानी पढ़ाई, काम और फिर रिटायरमेंट तो उसमें क्रम यही होता है. पहले आप कॉलेज जाते हैं. फिर नौकरी हासिल करते हैं और फिर रिटायर हो जाते हैं. अगर ज़िदगी के कई चरण हों तो आप उसके क्रम अपनी पसंद के मुताबिक तय कर सकते हैं. यानी कब पढ़ाई करनी है और हुनरमंद बनना है और कब कमाई करनी है.

हालांकि, ये भी एक कठिन काम लगता है. इसमें आपको खुद को हर दस साल में नई खूबियों से लैस करना होगा फिर भी ये अविश्वसनीय नहीं है. अमीर देशों में कुछ लोग अभी भी ऐसे ही ज़िंदगी जी रहे हैं.

हालांकि, इसमें जोखिम हैं. क्या कोई नौकरी देने वाला हाल में स्नातक की डिग्री लेने वाले किसी ऐसे व्यक्ति चुनेगा जिनकी उम्र सत्तर बरस हो. वो भी उस स्थिति में जब उनके पास किसी 20 साल के व्यक्ति या फिर एक रोबोट को चुनने का मौका हो. इसमें कई लोग पिछड़ सकते हैं. खासकर वो जो कम हुनरमंद हैं.

एंड्रयू स्कॉट कहते हैं, "मैं एक बात को लेकर फिक्रमंद रहता हूं कि यहां अवसर तो बहुत हैं लेकिन काफी जोखिम भी है."

दुनिया के अमीर मुल्कों में अब भी लाखों लोग संपन्नता के साथ रिटायर्ड ज़िंदगी का मज़ा ले रहे हैं लेकिन आने वाली पीढ़ियों की मुट्ठी से ऐसी ज़िंदगी फिसलती दिख रही है.

तो क्या रिटायरमेंट का दौर बीत चुका है और रिटायर होने का अपका ख्वाब टूट सकता है? शायद अभी नहीं लेकिन इस सदी के जाते-जाते बहुत से लोगों के पास शायद रिटायर होने का विकल्प नहीं होगा. हो सकता है कि रिटायरमेंट इतिहास में खुशी की ऐसी परिघटना बनकर रह जाए जिसका अस्तित्व कुछ ही वक्त के लिए था.

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