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मसूरी के होटल में वो मर्डर जिसपर अगाथा क्रिस्टी ने लिखा पहला उपन्यास
- Author, चेरिलैन मोल्लान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
कुछ चीज़ें पारिवारिक झड़गे से अधिक दिलचस्प होती हैं, ख़ासकर जब हत्या एक साज़िश के तहत की गई हो.
‘क्वीन ऑफ़ क्राइम’ के नाम से मशहूर अगाथा क्रिस्टी इसे बेहतर समझती थीं और उनका पहला उपन्यास ‘द मिस्टीरियस अफ़ेयर एट स्टाइल्स’ पाठक को पारिवारिक कलह की वजह से हुई हत्या की एक दिलचस्प कहानी से परिचित कराता है.
साल 1920 में छपा यह उपन्यास एक अमीर महिला एमिली इंग्लेथॉर्प की हत्या पर केंद्रित है जिनका दूसरा पति उनसे 20 साल छोटा है, और एमिली का पूरा खानदान, दोस्त और क़रीबी एवलिन हॉवर्ड को पति पर शक है.
किताब क्रिस्टी के सबसे चिर परिचित क़िरदारों में से एक विचित्र जासूस हरकिली पॉयरोट से मिलवाती है और उनकी बाद की किताबों की तरह ही, इसमें भी कई संदिग्ध हैं, चौंकाने वाली घटनाएं हैं, आंखों के सामने ही छिपे सुराग हैं और अंत में बड़ा खुलासा है, जहां अपराधी से पर्दा उठता है.
लेकिन उपन्यास का अनोखापन ये है कि आम तौर पर इसे एक वास्तविक हत्या से प्रेरित माना जाता है, जो उत्तर भारत के हिल स्टेशन मसूरी में एक शताब्दी पहले हुआ था.
सितम्बर 1911 में 49 साल की फ़्रांसिस गार्नेट ओर्म, मसूरी के सेवॉय होटल के एक कमरे में मृत पाई गईं. यह होटल एक आइरिश बैरिस्टर ने बनवाया था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि फ़्रांसिस को साइनाइड मिला ज़हर, प्रूसिक एसिड, दिया गया था. 36 साल की उनकी दोस्त इवा माउंट स्टीफ़ेंस पर हत्या का आरोप लगा.
मशहूर मसूरी मर्डर ट्रायल...
जिन ‘ख़ास हालात’ में ये मर्डर हुआ था, इसकी वजह से उस समय यह पूरी दुनिया में सुर्खी बना, जैसा कि 1912 में एक ऑस्ट्रेलियाई अख़बार ने दावा किया था. एक ब्रिटिश अख़बार ने इस मुकदमे की हर जिरह को विस्तार से प्रकाशित किया और ‘मसूरी मर्डर ट्रायल’, ‘होटल मिस्ट्री’ और ‘क्रिस्टल गेज़िंग ट्रायल’ जैसे शीर्षक दिए.
मसूरी में ही रहने वाले और यहां की प्राकृतिक सुंदरता पर काफ़ी कुछ लिखने वाले भारतीय लेखक रस्किन बांड ने अपने एक लेख में इस मर्डर और क्रिस्टी की पहली किताब के बीच संबंध पर लिखा.
वो कहते हैं कि क्रिस्टी ने ‘अपराध की परिस्थिति’ का इस्तेमाल किया क्योंकि उस समय यह बहुत चर्चित मामला हो गया था.
रिपोर्टों के मुताबिक़, फ़्रांसिस गार्नेट ओर्म भारत में एक दशक से भी लंबे समय से रह रही थीं और स्टीफ़ेंस से उनकी मुलाक़ात और दोस्ती हो गई, जोकि आध्यात्मिक थीं और लखनऊ की रहने वाली थीं.
उस समय छपी ख़बरों के अनुसार, ओर्म अकेली महिला थीं और स्टीफ़ेंस से उन्होंने भविष्यवाणी और अन्य तंत्र मंत्र की विद्याएं सीखी थीं.
वे दोनों सेवॉय होटल में कुछ दिन तक साथ ठहरे थे. स्टीफ़ेंस का दावा था कि उन्होंने ओर्म के ख़राब स्वास्थ्य के चलते उनकी देखभाल की.
लेकिन अभियोजन पक्ष ने स्टीफ़ेंस पर आरोप लगाया कि उन्होंने ओर्म को ज़हर दिया ताकि उनकी वसीयत से फ़ायदा उठा सकें क्योंकि उसमें स्टीफ़ेंस को अच्छा ख़ासा धन, तीन नेकलेस और अन्य ज्वैलरी दिए जाने की बात लिखी गई थी.
जबकि दूसरी तरफ़ बचाव पक्ष ने दावा किया कि ओर्म ने आत्महत्या की क्योंकि वो बहुत सदमे में थीं. बचाव पक्ष का तर्क था कि जिस आदमी से शादी करने वो भारत आई थीं, उसकी मृत्यु हो गई और वो अपनी ख़राब सेहत से भी बहुत परेशान थीं.
गुत्थी जो सुलझी नहीं
अपने उतार चढ़ाव की वजह से इस मामले ने पुलिस समेत कई लोगों को भ्रमित कर दिया. जैसे, एक, जांच से पता चला कि ओर्म के मरने के पहले स्टीफ़ेंस ने लखनऊ छोड़ दिया था. दूसरे, जिस कमरे से ओर्म का शव मिला वो अंदर से बंद था.
पुलिस को ओर्म के कमरे से नींद की दवा वाली दो शीशियां और आर्सेनिक और प्रूसिक एसिड के दो लेबल के अलावा कोई दवा नहीं मिली.
1900 की शुरुआत में ख़रीदारों को केमिस्ट से दवा लेते वक़्त हस्ताक्षर करने होते थे लेकिन अभियोजन ने ध्यान दिलाया कि प्रूसिक एसिड के लिए किया गया हस्ताक्षर ओर्म की चिट्ठियों वाले हस्ताक्षर से मेल नहीं खाता.
अभियोजन ने ये भी कहा कि स्टीफ़ेंस ने अपनी एक दोस्त से बातचीत में छह महीने पहले ही ओर्म की मौत का अनुमान लगाया था और एक फ़िज़िशियन से शादी करने और अपनी सारी दौलत उसके हवाले करने की ओर्म की मंशा पर नाराज़गी जताई थी.
लेकिन बचाव पक्ष ने कहा कि स्टीफ़ेंस, ओर्म की बहुत क़रीबी दोस्त थीं और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने ज़हर ख़रीदा या अपनी दोस्त को ज़हर दिया.
स्टीफ़ेंस को अंत में बरी कर दिया गया. जज ने अपने फ़ैसले में टिप्पणी की, “मिस ओर्म की मौत का असली कारण शायद अब कभी नहीं पता चल पाएगा.”
क्रिस्टी की किताब में ये सारी घटनाएं मिलती जुलती हैं. एमिली की भी मौत ज़हर से हुई और ओर्म की तरह ही उनका शव एक ऐसे कमरे से पाया गया जो अंदर से बंद था.
अंत में पता चलता है कि यह उनकी दोस्त थी जिसने ज़हर दिया था. उसने जाली हस्ताक्षर करके ज़हर ख़रीदा, और अपनी दोस्त को मारने के पीछे पैसा पाने का मकसद था.
किताब में हूबहू परिस्थितियां
दशकों बाद आज भी इन मामलों के बीच समानता प्रशंसकों को रोमांचित कर देती है. 2022 में इंटरनेशनल अगाथा क्रिस्टी फ़ेस्टिवल में भारतीय क्राइम राइटर मंजिरी प्रभु ने क्रिस्टी के पहले उपन्यास और मसूरी मर्डर के बारे में दिलचस्प संबंध पर बात रखी थी.
लेकिन अकेली क्रिस्टी ही नहीं थी जो भारत में ज़हर से होने वाली मौतों से प्रेरित हुईं. सेसिल वाल्स ने एक अपराथ का कहानी लिखी जो आगरा में हुई. तब यह ब्रिटिश शासित भारत में यह शहर यूनाइटेड प्राविंस ऑफ़ आगरा और अवध के अंतर्गत आता था.
द आगरा डबल मर्डरः अ क्राइम ऑफ़ पैशन फ्राम द राज, में वो लिखते हैं कि मेरठ में रहने वाली अंग्रेज़ महिला ऑगस्टा फुलैम और एंग्लो इंडियन व्यक्ति डॉ. क्लार्क ने कैसे अपने अपने पार्टनर को ज़हर देने की योजना बनाई ताकि वे दोनों एक साथ रह सकें.
अमेरिका और यूरोप की तरह ही 19वीं सदी में भारत में ज़हर देकर हत्या करने के मामले आम थे. आर्सेनिक जैसे ज़हरीले पदार्थों की बिक्री पर कोई नियंत्रण नहीं था. अपनी किताब ‘टॉक्सिक हिस्ट्रीज़ः प्वॉइज़न एंड पॉल्यूशन इन मॉडर्न इंडिया’ में डेविड अर्नाल्ड लिखते हैं कि कैसे आर्सेनिक ज़हर की वजह से ही 1904 में इंडियन प्वॉइज़न एक्ट बनाया गया और इसकी ख़रीद और इस्तेमाल को नियंत्रित किया गया.
वो लिखते हैं, “दस साल बाद जब इस क़ानून की समीक्षा की गई तो यूनाइटेड प्राविंस सरकार ने हाल के सालों में ज़हर देकर हत्या के दो कुख्यात मामलों का ज़िक्र किया, उनमें ओर्म और फ़ुलैम-क्लार्क का केस था.”
सच घटनाओं पर आधारित अपराध का कहानियां एक दिलचस्प शैली रही है और फ़िल्मों, पॉडकास्ट और वेब सिरीज़ के माध्यम से दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनी हुई है.
लेकिन क्रिस्टी के प्रशंसकों के लिए मिस्टीरियस अफ़ेयर एट स्टाइल्स हमेशा ही उनके दिल के करीब बनी रहेगी.
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