अमेरिका की उस रिपोर्ट पर चीन हुआ नाराज़ जिसमें भारत और पाकिस्तान का भी है ज़िक्र

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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट में चीन और भारत के संबंधों और पाकिस्तान के चीन के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग को लेकर कई दावे किए गए हैं.
अमेरिकी कांग्रेस को सौंपी गई 'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना से जुड़े सैन्य और सुरक्षा घटनाक्रम' नामक इस सालाना रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लद्दाख़ में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत के साथ तनाव को कम करके चीन इसका फ़ायदा उठाना चाहता है.
इसके अलावा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने अपनी तीन नई बनी फ़ैसिलिटीज़ में 100 से ज़्यादा इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें लोड की हैं
चीनी विदेश मंत्रालय ने इसकी निंदा करते हुए कहा है कि, "हम अमेरिकियों से बार-बार वही कहानी सुन रहे हैं."
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वहीं दूसरी ओर इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण चीन सागर, सेनकाकू द्वीपों और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन गंभीर रुख़ अपनाए हुए है.
साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे चीन और पाकिस्तान के रिश्ते लगातार गहराते जा रहे हैं. चीन ने पाकिस्तान को अलग-अलग तरीक़े के लड़ाकू विमान दिए हैं.
रिपोर्ट में भारत को लेकर क्या कहा गया है?

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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर ने बताया है कि बीते 25 सालों से अमेरिकी कांग्रेस ने उसे चीन से जुड़े सैन्य और सुरक्षा बदलावों पर एक सालाना रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है.
इस रिपोर्ट में चीन की सैन्य क्षमताओं और रणनीति के विकास का ब्यौरा दिया गया है. साथ ही उसके पड़ोसी देशों से जुड़े मुद्दों पर भी इसमें गहराई से प्रकाश डाला गया है.
उदाहरण के तौर पर भारत और चीन के रिश्ते बीते सालों में ख़ासे उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं लेकिन हाल ही में इसमें सुधार आना शुरू हुआ है.
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में एलएसी को लेकर भी टिप्पणी की गई है. इसमें कहा गया है कि "अक्तूबर 2024 में ब्रिक्स सम्मेलन से इतर राष्ट्रपति शी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक से दो दिन पहले भारतीय नेतृत्व ने चीन के साथ एलएसी को लेकर जारी गतिरोध को रोकने को लेकर एक समझौते की घोषणा की."
इस रिपोर्ट में लिखा है, "शी-मोदी की बैठक ने दोनों देशों के बीच हर महीने होने वाली उच्च-स्तरीय बातचीत का रास्ता साफ़ किया. जहां दोनों पक्ष सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय संबंधों के अगले कदमों पर चर्चा कर सकें, जिसमें सीधी उड़ानें, वीज़ा सुविधा, शिक्षाविदों और पत्रकारों का आदान-प्रदान शामिल है."
साथ ही रिपोर्ट में ये भी कह गया है, "चीन शायद एलएसी पर तनाव को कम करके इसका फ़ायदा उठाकर द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करना चाहता है. साथ ही वह अमेरिका-भारत संबंधों को और मज़बूत होने से रोकना चाहता है. हालांकि, भारत को अभी भी चीन के इरादों को लेकर शक है. लगातार आपसी अविश्वास और दूसरी परेशान करने वाली बातें निश्चित रूप से द्विपक्षीय संबंधों को सीमित कर देती हैं."

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अरुणाचल प्रदेश का भी ज़िक्र
इस रिपोर्ट में चीन के तीन 'मुख्य हितों' की भी बात की गई है जिस पर किसी भी तरीक़े के किसी समझौते की गुंजाइश नहीं है. इसमें बताया गया है कि पहला मामला चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के नियंत्रण, दूसरा चीन के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और तीसरा चीन की संप्रभुता के विस्तार और क्षेत्रीय दावों से जुड़ा है.
रिपोर्ट में कहा गया है, "चीन के नेतृत्व ने 'मुख्य हित' शब्द का दायरा बढ़ाकर उसमें ताइवान और दक्षिण चीन सागर, सेनकाकू द्वीप समूह और पूर्वोत्तर भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश में क्षेत्रीय विवादों के बीच चीन के संप्रभुता के दावों को शामिल कर लिया है."
साथ ही यह भी कहा गया है कि चीन की राष्ट्रीय रणनीति साल 2049 तक "चीनी राष्ट्र का महान पुनरुद्धार" हासिल करने की है. इस विज़न में, एक नया चीन अपने "प्रभाव, आकर्षण और घटनाओं को आकार देने की शक्ति को एक नए स्तर पर ले जाएगा," और एक "वर्ल्ड-क्लास" सेना तैयार करेगा जो "लड़ सके और जीत सके" और देश की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास के हितों की "पूरी मज़बूती से रक्षा" कर सके.
इसके अलावा इस रिपोर्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व का भी ज़िक्र है. रिपोर्ट कहती है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका और चीन के रिश्ते "कई सालों में सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं", और डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर इस प्रगति को आगे बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन करेगा.
रिपोर्ट में कहा गया है, "हम ऐसा कुछ हद तक पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) के साथ मिलिट्री-टू-मिलिट्री बातचीत का दायरा बढ़ाकर करेंगे, जिसमें रणनीतिक स्थिरता के साथ-साथ टकराव कम करने और तनाव घटाने पर भी ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा. हम अपने शांतिपूर्ण इरादों को साफ़ करने के लिए दूसरे तरीक़े भी खोजेंगे."
पाकिस्तान को लेकर क्या कहा गया?
चीन और पाकिस्तान के संबंध जगज़ाहिर हैं और इस रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है.
इसमें बताया गया है कि चीन किन-किन देशों को सहायता दे रहा है और उसके पास किस तरह के हथियार हैं.
साथ ही इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीजिंग ने 100 से ज़्यादा इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें लोड कर ली हैं.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने अपनी तीन नई बनी फ़ैसिलिटीज़ में 100 से ज़्यादा इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें लोड की हैं, जिससे चीन की 'अर्ली वॉर्निंग काउंटरस्ट्राइक' कैपेबिलिटी बढ़ सकती है.
रिपोर्ट पर जवाब देते हुए, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, "हम अमेरिकियों से बार-बार वही कहानी सुन रहे हैं. अमेरिकी न्यूक्लियर पावर के तेज़ी से अपग्रेडेशन को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं. उनका इरादा है कि इसका असर ग्लोबल स्ट्रेटेजिक स्टेबिलिटी पर पड़े. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बारे में गंभीरता से पता होना चाहिए."
उन्होंने कहा, "अमेरिका ख़ुद एक न्यूक्लियर सुपरपावर है जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर हथियारों का भंडार है. उसे न्यूक्लियर हथियारों को ख़त्म करने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी चाहिए."
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चीन ने फ्रिगेट सहित एडवांस्ड हथियार सप्लाई किए हैं, जिनमें से पिछले दशक में चार पाकिस्तान को दिए गए हैं, और लड़ाकू विमान भी दिए हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, "चीन एक्सपोर्ट के लिए तीन मुख्य लड़ाकू विमान पेश करता है: पांचवीं पीढ़ी का एफ़सी-31, चौथी पीढ़ी का जे-10सी मल्टीरोल फाइटर, और चीन-पाकिस्तान द्वारा मिलकर बनाया जा रहा जेएफ़-17 हल्का लड़ाकू विमान."
रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2025 तक किसी भी देश को कोई एफ़सी-31 एयरक्राफ्ट नहीं बेचा गया है, लेकिन मिस्र, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने उनमें दिलचस्पी दिखाई है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन शायद बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया, श्रीलंका, ताजिकिस्तान, थाईलैंड, यूएई और कुछ दूसरे देशों में मिलिट्री बेस बनाने पर विचार कर रहा है.
इसमें कहा गया है कि चीनी सेना अफ्रीका और मिडिल ईस्ट में मलक्का स्ट्रेट, होर्मुज़ और दूसरे समुद्री कम्युनिकेशन रूट तक पहुंचने में दिलचस्पी रखती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















