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तारिक़ रहमान: ख़ालिदा ज़िया के बेटे का 17 साल बाद बांग्लादेश लौटना क्यों है अहम?
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के बेटे तारिक़ रहमान 17 साल तक देश से बाहर रहने के बाद एक बार फिर 25 दिसंबर को बांग्लादेश लौट रहे हैं.
बीती 16 दिसंबर को रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के लंदन में हुए एक कार्यक्रम के दौरान यह एलान किया था कि वह 2026 में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव के मद्देनज़र घर लौट रहे हैं.
रहमान बीएनपी के कार्यकारी चेयरमैन भी हैं. उनकी वापसी ऐसे समय हो रही है जब फ़रवरी में बांग्लादेश में इलेक्शन होना है और फिलहाल देश में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा जारी है और अंतरिम सरकार की भूमिका पर विवाद हो रहा है.
वहीं, तारिक़ रहमान की मां 80 वर्षीय ख़ालिदा ज़िया भी कई दिनों से बीमार हैं और ढाका के अस्पताल में वह भर्ती हैं. यहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है.
बांग्लादेश की राजनीति के 'क्राउन प्रिंस' कहे जाने वाले तारिक़ रहमान पूर्व राष्ट्रपति ज़िया-उर-रहमान और पूर्व पीएम ख़ालिदा ज़िया के तीन बच्चों में से सबसे बड़े हैं.
इतने बड़े राजनीतिक परिवार से आने के कारण ही तारिक़ रहमान काफ़ी समय पहले ही बीएनपी का प्रमुख चेहरा बन गए थे.
कौन हैं तारिक़ रहमान
20 नवंबर 1965 को जन्में तारिक़ रहमान कार्यकारी चेयरमैन से पहले पार्टी में सीनियर वाइस-चेयरमैन और सीनियर जॉइंट सेक्रेटरी से जैसे अहम पदों पर रहे.
सन 1971 में जब बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्त करवाने के लिए जंग जारी थी तो तारिक़ रहमान, उनकी मां ख़ालिदा ज़िया और उनके भाई को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था. बीएनपी तारिक़ रहमान को बांग्लादेश की आज़ादी की जंग में सबसे कम उम्र का क़ैदी बताती है.
शुरुआती पढ़ाई तारिक़ रहमान ने ढाका के बीएएफ़ शाहीन कॉलेज से की. इसके बाद उन्होंने 1980 के दशक में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ढाका से इंटरनेशनल रिलेशंस पढ़ा.
जैसे-जैसे समय बीतता गया तारिक़ रहमान ने अपनी मां के साथ राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना भी बढ़ा दिया. वह तत्कालीन सरकारों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे और 1988 में वह बीएनपी के जनरल मेंबर बन गए.
उन्होंने उस वक्त ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट किया और एच.एम. इर्शाद की सरकार को गिराने में एक अहम भूमिका निभाई.
साल 1991 में जब ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं, तो उस चुनाव में पूरे देश में उनके चुनाव प्रचार को तारिक़ रहमान ने ही संभाला था.
1993 में तारिक़ रहमान की शादी डॉक्टर जु़बैदा रहमान से हुई, जो बांग्लादेशी नौसेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ रह चुके महबूब अली ख़ान की बेटी हैं.
अब पिछले 17 सालों से रहमान लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे थे.
अगस्त 2004 में ढाका में आवामी लीग की एक रैली के दौरान ग्रेनेड हमला हुआ, जिसमें 24 लोगों की मौत हुई और 100 से अधिक नेता,कार्यकर्ता घायल हो गए थे. इस हमले में शेख़ हसीना भी बाल-बाल बची थीं.
इस मामले में तारिक़ रहमान का नाम भी आया था. उस समय ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं.
हालांकि, बीएनपी ने इसे बदले की राजनीति से प्रेरित मामला बताया था.
तारिक़ रहमान को साल 2007 में सेना के समर्थन से चल रही अंतरिम सरकार के सत्ता में रहने के वक्त भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान में गिरफ़्तार किया गया था.
बीएनपी यह दावा करती है कि हिरासत में रखने के दौरान तारिक़ रहमान को प्रताड़ित किया गया और वह बीमार पड़ गए.
साल 2008 में उन्हें बेल मिली और इलाज के लिए उन्हें लंदन जाने की इजाज़त मिली थी.
रहमान तबसे लंदन में ही थे और वहीं से बीएनपी की राजनीति में केंद्र भूमिका निभा रहे थे.
कितने आपराधिक मामले?
अक्तूबर 2018 में साल 2004 के ग्रेनेड हमले से जुड़े केस में तारिक़ रहमान और 18 अन्य लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.
24 मई 2023 को ढाका ट्रिब्यून ने साल 2001-2006 में बीएनपी सरकार के कार्यकाल में रिश्वतखोरी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोपों पर एक तीन पार्ट की सिरीज़ प्रकाशित की थी. ये सिरीज़ दस्तावेज़ी साक्ष्यों पर आधारित थी. इसमें रहमान को 'डार्क प्रिंस' बताया गया था.
रिपोर्ट में तारिक़ रहमान के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और मीडिया को डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए.
अमेरिकी दूतावास के केबल्स का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया कि रहमान ने अवैध तरीकों से सैकड़ों करोड़ डॉलर की संपत्ति जमा की.
रहमान को अवैध संपत्ति जुटाने के मामले में साल 2023 में नौ साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी.
फ़र्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2024 में छात्रों के आंदोलन की वजह से शेख़ हसीना की सरकार गिरने से तारिक़ रहमान की किस्मत भी बदली. इसके बाद से उन्हें सभी लंबित 84 मामलों में बरी कर दिया गया, जिसमें साल 2004 के ग्रेनेड अटैक और मनी लॉन्ड्रिंग, राजद्रोह जैसे मामले भी शामिल थे.
वापसी कितनी अहम?
बांग्लादेश में 12 फ़रवरी 2026 को राष्ट्रीय चुनाव होने हैं.
बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक़, रहमान की वापसी ऐसे समय हो रही है जब बीएनपी देश में अपनी खोई राजनीतिक ज़मीन वापस पाने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है.
पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कई ज़बरन वसूली समेत कई आपराधिक मामले चल रहे हैं.
ऐसे में ये उम्मीद जताई जा रही है कि तारिक़ रहमान का बांग्लादेश लौटना बीएनपी के काडर में जान फूंक देगा, साथ ही मतदाताओं के बीच भी अच्छा संदेश जाएगा.
अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया फेलो माइकल कुगलमैन ने फॉरेन पॉलिसी के लिए एक लेख में लिखा है कि बीते साल शेख़ हसीना को सत्ता से हटाने के लिए हुए आंदोलन ने तारिक़ रहमान की वापसी का रास्ता खोला है.
वह लिखते हैं, "बांग्लादेश लौटने के बाद रहमान के लिए परिस्थितियां आसान नहीं रहने वाली हैं. हालांकि, बीएनपी नेतृत्व और पार्टी के समर्थक उनका उत्साहपूर्वक स्वागत करेंगे, लेकिन लगभग दो दशकों तक देश से बाहर रहने के बाद उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि अब वह अगुवाई के लिए तैयार हैं. क्योंकि जब रहमान लंदन में आरामदायक जीवन बिता रहे थे, तब पार्टी के अन्य नेताओं को शेख़ हसीना के दमन का सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा."
उन्होंने लिखा, "हालांकि, चुनाव में बीएनपी को प्रबल दावेदार माना जा रहा है, लेकिन पार्टी चुनाव को हल्के में भी नहीं ले सकती है. बीएनपी की पूर्व सहयोगी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी का असर भी बढ़ता दिखा है, ख़ासकर सितंबर में ढाका विश्वविद्यालय के कैंपस चुनावों में उसकी स्टूडेंट विंग की जीत के बाद. इस चुनाव को बांग्लादेश में लंबे समय से राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाता रहा है."
साथ ही जमात-ए-इस्लामी ख़ुद को भ्रष्टाचार विरोधी और सामाजिक कल्याण पर केंद्रित बताती है. जनता के बीच सुधार की चाहत और बांग्लादेश पर आर्थिक दबाव के मौजूदा दौर में जमात-ए-इस्लामी का ये संदेश ख़ासा असरदार भी साबित हो रहा है.
ऐसा माना जा रहा है कि जमात-ए-इस्लामी के उभार और आवामी लीग की नेता शेख़ हसीना के देश छोड़कर जाने की वजह से ऐसे मतदाता, जिन्होंने ये तय नहीं किया कि वोट किसे देने जा रहे हैं, वे बीएनपी का रुख़ कर सकते हैं.
जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी के जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट आसिफ़ बिन अली ने द प्रिंट से कहा, "असल मुद्दा फ्लोटिंग वोटरों का है. वे जो इस्लामिस्ट को पसंद नहीं करते, जो किसी इस्लामी पार्टी को वोट नहीं देना चाहते, जो बीएनपी को लेकर संदेह में हैं लेकिन उसे एक उदार लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखने को तैयार हैं. अगर बीएनपी सत्ता में आना चाहती है तो इन फ्लोटिंग वोटरों का भरोसा बहाल करना होगा. अगर तारिक़ वापस नहीं लौटते हैं, तो बीएनपी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और यह खालीपन जमात भर सकती है."
आसिफ़ अली का मानना है कि बीएनपी को आगामी चुनावों में संभालने के लिए ज़मीन पर एक नेता की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "लंदन से घोषणाएं करना या लाइव संबोधन एक बात है. लेकिन घर वापस आकर, लोगों से हाथ मिलाकर, आम लोगों से सड़कों पर बात कर के, मस्जिदों में नमाज़ पढ़कर, हिंदुओं के मंदिर जाने, लोगों के सामने भाषण देने, इन सब से एक उम्मीद पैदा होती है. अब बहुत से लोगों के लिए तारिक़ उसी उम्मीद का प्रतीक बन गए हैं लेकिन भरोसा कमज़ोर हो रहा है."
बीबीसी हिन्दी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.