विंटर ब्लूज़ क्या है और इसका मुक़ाबला कैसे किया जाए

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कल्पना करें की आप ऐसी जगह हों जहाँ तापमान ज़ीरो डिग्री से भी नीचे हो, महीनों सुबह ना हो और आपको रोशनी की शक्ल तक देखे महीनों हो जाएं.
भारत में रह कर ऐसा सोचना भी कंपकपी दे जाता है. लेकिन स्वीडन का एक छोटा सा गांव एबिस्को कुछ इसी तरह है. उत्तरी स्वीडन में बसा यह गाँव आर्कटिक सर्किल से लगभग दो सौ किलोमीटर उत्तर में है.
यहां लोग माइनस डिग्री में लंबे अरसे तक अंधेरे में रहते हैं. जहां सूरज महीनों-महीनों नहीं निकलता है. एबिस्को में सर्दियां सबसे लंबी पड़ती हैं.
यहाँ अक्टूबर के महीने से सूरज दिखना बंद हो जाता है. अगले चार महीने तक यही हाल रहता है. फिर फ़रवरी के महीने में सूरज दोबारा दिखता है.
यहाँ रहने वाले लोगों की ज़िंदगी में इसका बहुत असर पड़ता है. उनके मूड और उनकी एनर्जी लेवल पर भी इसका असर पड़ता है. घर से बाहर निकलने का दिल नहीं करता है.
सूरज की रोशनी नहीं देखने से क्या होता है हमारे शरीर में?

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बीबीसी रील्स से बातचीत के दौरान इसकी वजह बताते हुए स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी में स्लीप रिसर्चर अर्नो लॉडेन कहते हैं कि मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो डायूरनल है.
अगर इसे आसान भाषा में कहा जाए तो जो दिन के समय अधिक सक्रिय रहने और रात के समय नींद लेने में मदद करता है.
वो कहते हैं, ''हमारे शरीर का अपना एक बॉडी क्लॉक होता है. हमारे शरीर को बाहरी दुनिया की लाइट के हिसाब से एडजस्ट होने के लिए रोज़ाना कुछ रोशनी की आवश्यकता होती है.''
मेलोटोनिन एक तरह का हार्मोन है. जिसे अंधेरे का हार्मोन कहा जाता है. इस हार्मोन की वजह से हमें नींद आने लगती है. नींद महसूस कराता है, सूरज की रोशनी हमारे ब्रेन को मेलाटनिन के प्रोडक्शन को रोकने का मैसेज देती है.
रिसर्चर अर्नो लॉडेन कहते हैं कि मेलोटोनिन शाम आठ बजे के क़रीब एक्टिवेट होता है और आधी रात में एक बजे के क़रीब सोने के दौरान अपने चरम पर रहता है. सुबह होते ही सूरज की रोशनी से इस हार्मोन का बनना बंद हो जाता है और हमारी नींद पूरी हो जाती है.''
सूरज की रोशनी ना मिलने से हमारे शरीर का अंदरूनी बॉडी क्लॉक डिस्टर्ब हो जाता है और बाहरी दुनिया से तालमेल बिगड़ जाता है.
सूर्य की रोशनी और डिप्रेशन

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‘द लाइटिंग रिसर्च सेंटर’ की मरियाना फ़िग्यूरो कहती हैं कि बहुत से लोग सर्दियों में लंबी रातें और छोटे दिनों के साथ एडजस्ट नहीं कर पाते हैं.
इसका कारण बताते हुए वो कहती हैं, इस बारे में बहुत सी थ्योरी दी जाती है. एक तो यह है कि दिन के समय में हमारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में सनलाइट नहीं मिलती है.
इसके कारण कई लोग डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. कुछ लोगों में कार्बोहाइड्रेट की ज़्यादा इच्छा होती है और इस कारण उनका वज़न बढ़ जाता है. मरियाना के अनुसार इसे सीज़नल ऐफ़ेक्टिव डिसऑर्डर या विंटर ब्लूज़ कहा जाता है.
दिल्ली स्थित मैक्स सुपर स्पेशिलिटी में मेंटल हेल्थ विभाग के निदेशक डॉ समीर मल्होत्रा कहते हैं कि सूरज की रोशनी काफ़ी महत्वपूर्ण होती है.
बीबीसी हिंदी के लिए फ़ातिमा फ़रहीन से बात करते हुए डॉ मल्होत्रा कहते हैं, “हमारे ब्रेन के अंदर एक हिस्सा है जिसे हम हाइपोथैलेमस कहते हैं. यह हमारे शरीर के अंदर की एक घड़ी है जो बाहर के समय के साथ हमारे शरीर के समय को मैच करती है. अगर बाहर अंधेरा बहुत ज़्यादा है तो हमारी आंखों के ज़रिए हमें उतनी रोशनी नहीं मिल पाती है जो मिलनी चाहिए. ऐसे में जो लोग सेंसिटिव हैं उनमें मूड डिसॉर्डर आने के चांसेज़ हैं. इसे सीज़नल एफ़ेक्टीव डिसऑर्डर नाम दिया गया है.”
दिल्ली स्थित वरिष्ठ डॉक्टर शेख़ अब्दुल बशीर कहते हैं कि इस तरह के ज़्यादातर मामले उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में ही देखने को मिलते हैं.
फ़ातिमा फ़रहीन से बात करते हुए डॉ बशीर कहते हैं कि भारत में इस तरह की स्थिति नहीं होती है, इसलिए यहां विंटर ब्लूज़ के केस शायद ही कभी देखने को मिलते हैं. सिर्फ़ बरसात के मौसम के दौरान भारत में कुछ मामले देखने को मिलते हैं.
उनके अनुसार, सीज़नल एफ़ेक्टिव डिसऑर्डर की बात की जाए तो इसमें भी सारे लक्षण डिप्रेशन वाले होते हैं.
इसके मुख्य लक्षण बताते हुए डॉ बशीर कहते हैं कि लोग उदास रहने लगते हैं, किसी काम में उनका मन नहीं लगता है, लोग ज़िंदगी में ख़ुश रहना ही भूल जाते हैं, भूख भी कम लगती है, लोगों में सेक्स की भी इच्छा कम हो जाती है.
हमें सूरज की कितनी रोशनी चाहिए

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हमें यह तो पता चल गया कि सूरज की रोशनी नहीं मिलने की वजह से हमारे शरीर पर इसका बुरा असर पड़ता है और मेडिकल भाषा में इसे विंटर ब्लूज़ कहा जाता है.
लेकिन इससे सवाल पैदा होता है कि विंटर ब्लूज़ से बचने के लिए एक दिन में हमारे शरीर को कितनी रोशनी की ज़रूरत होती है.
प्रोफ़ेसर लॉडेन के अनुसार, यह हर आदमी के लिए अलग-अलग होती है, लेकिन आम तौर पर यह माना जाता है कि रोज़ाना कम से कम 20 मिनट तक हमारे शरीर को सूरज की तेज़ रोशनी मिलनी चाहिए. और वो भी सुबह की रोशनी होनी चाहिए.
मरियाना कहती हैं कि हमें एक दो घंटे के लिए घर से बाहर निकलना चाहिए. अगर वो संभव नहीं है तो हमें अपने घर की खिड़की के पास बैठना चाहिए और अगर वो भी संभव नहीं है तो हम अपने घरों में जहां बैठते हैं उसके आस-पास टेबल लैंप जलाकर ज़्यादा से ज़्यादा रोशनी इस्तेमाल करनी चाहिए.
लेकिन यह सब तो उन स्थानों पर संभव है जहां धूप निकलती है, अगर आप दुनिया के उस कोने में रहते हैं जहां महीनों तक धूप नहीं निकलती है तो फिर वहां क्या किया जाए?
इस सवाल पर डॉ बशीर कहते हैं कि एक आसान रास्ता तो यह है कि आप मौसम के बदलने का इंतज़ार करें. लेकिन कुछ देशों में तो छह-छह महीने तक धूप नहीं निकलती है.
डॉ बशीर कहते हैं कि जितना संभव हो उतना एक्सरसाइज़ करनी चाहिए, अच्छी संतुलित डाइट और अच्छी नींद लेनी चाहिए. इसके अलावा वो मेडिटेशन का भी सुझाव देते हैं. वो कहते हैं कि आमतौर पर लोग जाड़े के मौसम में पानी बहुत कम पीते हैं. डॉ बशीर कहते हैं कि सर्दी के मौसम में भी पानी पीना कम नहीं करना चाहिए.
वो कहते हैं कि इससे प्रभावित लोगों को अपनी हॉबी में समय देना चाहिए और दोस्तों के साथ ज़्यादा समय बिताना चाहिए.
स्कैनडिनेवियन देशों में लोगों ने इसका एक इलाज ढूंढा है. वहां लोगों को लाइट थिरेपी दी जाती है. घर के अंदर ही आर्टिफ़िशियल सन रूम (Sun Room) बनाया जाता है. इससे लोगों को विंटर ब्लूज़ का मुक़ाबला करने में मदद मिलती है. हालांकि अभी तक इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिसकी बुनियाद पर यह कहा जा सके कि आर्टिफ़िशियल लाइट थिरेपी कितनी प्रभावी होती है.
और शायद इसीलिए फ़रवरी में जब दोबारा धूप निकलती है तो स्वीडन के एबिस्को गांव में लोग पहाड़ी पर जाकर रोशनी का स्वागत करते हैं और उसका जश्न मनाते हैं.
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