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ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान: वो पठान देशभक्त जिन्होंने गांधी का रास्ता कभी नहीं छोड़ा - विवेचना
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
उन्हें ख़ान साहब या बादशाह ख़ान कहा जाता था. बहुत से लोग उन्हें फ़्रंटियर गांधी या सीमांत गांधी भी कहते थे.
छह फ़ीट चार इंच का क़द. बिल्कुल सीधी कमर, दयालु आँखें और अहिंसा के पुजारी, ये थे ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान. आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी से प्रेरणा पाकर बादशाह ख़ान ने उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में एक अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया था.
आमतौर पर पठानों को अहिंसा से जोड़कर नहीं देखा जाता, लेकिन बादशाह ख़ान के ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने अहिंसा का रास्ता चुना.
1930 के दशक में उन्होंने सेवाग्राम में गांधी के साथ ख़ासा वक़्त बिताया. वो रबीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन भी गए.
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27 साल जेलों में बिताए
मशहूर राजनयिक नटवर सिंह अपनी किताब 'वॉकिंग विद लायंस, टेल्स फ़्रॉम डिप्लोमेटिक पास्ट में' लिखते हैं, "काँग्रेस के पाँच लोगों ने भारत के विभाजन का विरोध किया, महात्मा गांधी, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद. 31 मई से 2 जून के बीच 1947 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान को स्वीकार करने का अहम फ़ैसला लिया गया. सीमांत गांधी को लगा कि उनके साथ धोखा किया गया है."
न सिर्फ़ ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कई साल जेल में रखा, बल्कि आज़ादी के बाद पाकिस्तान की सरकार भी उन्हें जेल में रखने से पीछे नहीं रही.
नेल्सन मंडेला की तरह बादशाह ख़ान ने भी अपनी ज़िंदगी के 27 साल जेल में बिताए. दिसंबर 1921 में बादशाह ख़ान को पेशावर जेल में रखा गया. अपने लंबे क़द की वजह से उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.
बादशाह ख़ान अपनी आत्मकथा 'माई लाइफ़ एंड स्ट्रगल' में लिखते हैं, "जब मैंने जेल के कपड़े पहने तो पायजामा मेरी पिंडली तक ही आया और कमीज़ मेरी नाभि तक भी नहीं पहुंच पाई. जब मैं नमाज़ पढ़ने बैठता था तो तंग होने की वजह से मेरा पायजामा अक्सर फट जाता था."
"मेरी कोठरी उत्तर की तरफ़ थी इसलिए उसमें सूरज की रोशनी कभी पहुंचती ही नहीं थी. रात में हर तीन घंटे पर संतरी बदलते थे. जब भी ऐसा होता था बहुत शोर मचता था."
क़िस्साख़्वानी बाज़ार की गोलीबारी
वर्ष 1930 में जब गांधी ने नमक सत्याग्रह किया तो बड़ा असर सीमांत प्रांत में भी दिखाई दिया. 23 अप्रैल 1930 को ब्रिटिश सरकार ने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और उनके कुछ साथियों को पेशावर जाते हुए गिरफ़्तार कर लिया.
ये ख़बर सुनते ही हज़ारों लोगों ने चारसद्दा जेल को घेर लिया जहाँ ग़फ़्फ़ार ख़ान को रखा गया था. पूरा पेशावर शहर सड़कों पर आ गया.
राजमोहन गांधी बादशाह ख़ान की जीवनी 'ग़फ़्फ़ार ख़ान, नॉन वॉयलेंट बादशाह ऑफ़ द पख़तून्स' में लिखते हैं, "उस दिन पेशावर के क़िस्साख़्वानी बाज़ार और सीमांत प्रांत में अंग्रेज़ पुलिस की गोलियों से तक़रीबन 250 पठान मारे गए. इसके बावजूद आमतौर से गर्म ख़ून वाले पठानों ने कोई जवाबी हिंसक कार्रवाई नहीं की. यहाँ तक कि सेना की गढ़वाल राइफ़ल्स के जवानों ने पठानों की निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया."
आज़ादी के दस महीनों के अंदर पाकिस्तानी जेल में
23 फ़रवरी 1948 को बादशाह ख़ान ने पाकिस्तान संविधान सभा के सत्र में भाग लिया और नए देश और उसके झंडे के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ ली.
पाकिस्तान के संस्थापक और संविधान सभा के प्रमुख मोहम्मद अली जिना ने उन्हें चाय पर बुलाया. इस मौके़ पर उन्होंने ग़फ़्फ़ार ख़ान को गले लगाते हुए कहा- "आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि मेरा पाकिस्तान बनाने का सपना पूरा हुआ."
पाँच मार्च, 1948 को ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने पहली बार पाकिस्तान की संसद में भाषण दिया. उन्होंने स्वीकार किया कि 'मैंने भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन का विरोध किया था.' उन्होंने विभाजन के दौरान हुए नरसंहार की तरफ़ सांसदों का ध्यान खींचा, लेकिन ये भी कहा कि अब जब विभाजन हो ही चुका है तो अब लड़ाई की गुंजाइश ही नहीं बनती.
बादशाह ख़ान और पाकिस्तानी सरकार के बीच सुलह बहुत दिनों तक नहीं रह सकी. ब्रिटिश सरकार के जाने के दस महीनों के अंदर ही बादशाह ख़ान को देशद्रोह के आरोप में पश्चिम पंजाब की मॉन्टगोमरी जेल में तीन साल के लिए भेज दिया गया.
अप्रैल, 1961 में पाकिस्तान के सैनिक शासक अयूब ख़ान ने उन्हें फिर गिरफ़्तार कर सिंध की जेल में भेज दिया.
1961 तक बादशाह ख़ान पाकिस्तान की सरकार के लिए एक 'देशद्रोही', 'अफ़ग़ान एजेंट' और ख़तरनाक व्यक्ति हो गए थे. हालात ऐसे बने कि उन्हें पाकिस्तान छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान में शरण लेनी पड़ी.
काबुल में इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात
1969 में जब भारत की प्रधानमंत्री अफ़ग़ानिस्तान के दौरे पर गईं तो वहाँ भारत के राजदूत अशोक मेहता ने बादशाह ख़ान को इंदिरा गांधी के सम्मान में दिए गए भोज में आमंत्रित किया.
नटवर सिंह अपनी किताब 'वॉकिंग विद लायंस' में लिखते हैं, "इंदिरा गांधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान से पूरे 22 साल बाद मिलीं. उन्होंने अपने बड़े बेटे राजीव गांधी और बहू सोनिया का उनसे परिचय कराया. फ़्रंटियर गाँधी ने राजीव गांधी को गले लगाते हुए कहा कि जब वो दो साल के थे, उन्होंने उन्हें अपनी गोद में खिलाया था."
नटवर सिंह लिखते हैं, "अगले दिन मैं उस घर में गया जहाँ बादशाह ख़ान ठहरे हुए थे. वो ज़मीन पर बैठकर खाना खा रहे थे. मैंने बादशाह ख़ान को बताया कि इंदिरा गांधी आपकी सुविधानुसार आपके घर आकर आपसे मिलना चाहती हैं. उन्होंने मुझसे कहा, "इंदिरा गांधी यहाँ नहीं आएंगी. मैं खुद उनसे मिलने जाऊँगा."
तय हुआ कि वो अगले दिन चार बजे इंदिरा गांधी से मिलने स्टेट हाउस पहुंचेंगे.
नटवर सिंह ने लिखा, "मुझे उनको पोर्च में रिसीव करना था, लेकिन मुझे वहाँ पहुंचने में कुछ सेकेंड की देर हो गई." उन्होंने मुझे डाँटते हुए कहा, "आपको वक़्त पर आना चाहिए था.'
"उनकी समय की पाबंदी ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा. उसी बैठक में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने गांधी शताब्दी समारोह में भारत आने के लिए हामी भर दी."
कपड़ों की गठरी लेकर भारत पहुंचे
बादशाह ख़ान पूरे 22 सालों बाद भारत आ रहे थे. वो अपने पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भारत आए. उनका पासपोर्ट एक्सपायर हो चुका था, लेकिन काबुल के पाकिस्तानी दूतावास ने उस पर एक्सटेंशन की मोहर लगा दी.
हवाई-अड्डे पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण उनके स्वागत के लिए पहुंचे हुए थे.
बादशाह ख़ान के भतीजे मोहम्मद यूनुस अपनी आत्मकथा 'परसंस, पैशंस एंड पॉलिटिक्स' में लिखते हैं, "जब बादशाह ख़ान हाथों में अपने कपड़ों की गठरी लिए हुए नीचे उतरे तो इंदिरा गांधी ने उसे उनके हाथ से लेने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसे देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा आप वैसे ही बहुत बड़ा बोझ उठा कर चल रही हैं. मुझे अपना हिस्सा उठाने दीजिए. बादशाह ख़ान भारत में जहाँ-जहाँ गए लोगों की बड़ी भीड़ उनको सुनने के लिए उमड़ पड़ी."
बादशाह ख़ान के दिल्ली पहुंचने का रोचक वर्णन नटवर सिंह ने भी किया है.
वो लिखते हैं, "बादशाह ख़ान को खुली कार में हवाई अड्डे से शहर लाया जाना था और प्रधानमंत्री को उनके बग़ल में बैठना था. जयप्रकाश नारायण ने भी उस कार में बैठने की कोशिश की लेकिन इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि वो कार में बैठें. जब इंदिरा के सुरक्षा अधिकारी ने जेपी को कार में बैठने से रोका तो आमतौर से शांत रहने वाले जेपी नाराज़ हो गए. इस डर से कि कहीं कोई बखेड़ा न खड़ा हो जाए मैंने सुरक्षा अधिकारी से कहा कि वो जेपी को कार में चढ़ने दें."
बादशाह ख़ान की शिकायत भारत ने गांधी को भुलाया
बादशाह ख़ान के भारत पहुंचने के एक या दो दिन बाद देश के कई भागों में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए. बादशाह ख़ान ने इन दंगों को रोकने के लिए तीन दिन के अनशन की घोषणा की. ये सुनते ही दंगे रुक गए. 24 नवंबर, 1969 को उन्होंने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित किया.
संसद में दो टूक बात करते हुए उन्होंने कहा, "आप गांधी को उसी तरह भुला रहे हैं जैसे आपने गौतम बुद्ध को भुलाया था."
कुछ दिन बाद जब वो इंदिरा गांधी से मिले तो उन्होंने उनसे भी बिना किसी लाग-लपेट के कहा, "आपके पिता और पटेल ने तो मुझे और पख़्तूनों (पठानों) को भेड़ियों के सामने फेंक दिया था."
राजमोहन गांधी लिखते हैं, "इंदिरा गांधी की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने बादशाह ख़ानकी इस साफ़गोई का बुरा नहीं माना और काबुल में तैनात होने वाले हर भारतीय राजदूत को यही सलाह दी कि वो बादशाह ख़ान की ज़रूरतों का ध्यान रखें."
अफ़ग़ानिस्तान में निर्वासन
सत्तर के दशक की शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने उन्हें जलालाबाद में रहने के लिए एक घर दे दिया.
बादशाह ख़ान उस घर में पलंग की जगह चारपाइयों का इस्तेमाल करते थे. वो अपने शयनकक्ष में न सोकर जाड़े में भी पहली मंज़िल के बरामदे में सोया करते थे.
जब मशहूर लेखक वेद मेहता उनसे मिलने गए थे तो उन्होंने उनसे शिकायत भरे लहजे में कहा था, "भारत में गांधीवाद मर चुका है. वहाँ गांधी को भुला दिया गया है. आपकी सरकार वो हर काम कर रही है जिसका गांधी ने विरोध किया था."
सोवियत हस्तक्षेप का अफ़ग़ानिस्तान में विरोध
बादशाह ख़ान ने शुरू में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप का समर्थन किया लेकिन 1981 में जब वो इलाज के सिलसिले में भारत आए तब तक वो अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत उपस्थिति के ख़िलाफ़ हो चुके थे.
उन्होंने इंदिरा गांधी से अनुरोध किया कि वो उनकी सोवियत नेता लियोनिद ब्रेज़नेव से बैठक तय करवाएं.
भारत के पूर्व सुरक्षा सलाहकार जेएन दीक्षित अपनी किताब 'एन अफ़गान डायरी' में लिखते हैं, "बादशाह ख़ान चाहते थे कि वो ब्रेज़नेव से मिलकर उनसे अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेना हटाने का अनुरोध करेंगे. इंदिरा गांधी ये प्रयास करने में झिझक रही थीं. उनका मानना था कि सोवियत उनकी तरफ़ से आए इस अनुरोध को पसंद नहीं करेंगे. दूसरे उनका ये भी मानना था कि थोड़े समय के लिए अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत उपस्थिति भारत के हितों के ख़िलाफ़ नहीं है."
लेकिन इंदिरा गांधी बहुत दिनों तक बादशाह ख़ान के दबाव की अनदेखी नहीं कर पाईं.
जेएन दीक्षित लिखते हैं, "इंदिरा गांधी ने बादशाह ख़ान के संदेश को सोवियत राजदूत वोरोंतसोव और भारत की यात्रा पर आए सोवियत उप-राष्ट्रपति वेज़िली कुज़नेतसोव तक पहुंचाया और जब अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री शाह मोहम्मद दोस्त भारत आए तो उन्होंने उनसे पूछा कि आप अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेना हटाने के लिए क्या कर रहे हैं?"
अंतिम संस्कार में राजीव गांधी और ज़िया उल हक़ शामिल हुए
वर्ष 1987 में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान एक बार फिर भारत आए, जहाँ उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया.
20 जनवरी 1988 की सुबह 6 बजकर 55 मिनट पर बादशाह ख़ान ने 98 वर्ष की उम्र में अंतिम साँस ली.
उनकी अंतिम इच्छा थी कि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद में उनके घर के अहाते में दफ़नाया जाए.
फ़्रंटियर गांधी के क़रीब बीस हज़ार प्रशंसकों और समर्थकों ने पाकिस्तान में उतमनज़ई से उनके जनाज़े के साथ बिना किसी पाकिस्तानी पासपोर्ट और अफ़ग़ान वीज़ा के डूरंड लाइन पार कर अफ़ग़निस्तान में प्रवेश किया.
उनके साथ कारों, ट्रकों और बसों का एक लंबा काफ़िला गया. जलालाबाद में इस जलूस में कई और हज़ार लोग शामिल हो गए.
उनके अंतिम संस्कार में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ और भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी दोनों मौजूद थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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