कैप्टन हनीफ़ुद्दीन की कहानी जिनका शव 43 दिनों के बाद वापस लाया गया- विवेचना

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

कई लोगों को लगता है कि फ़ौजियों का संगीत से कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता. 11 राजपूताना राइफ़ल्स के कैप्टन हनीफ़ुद्दीन ऐसे ही लोगों को अक्सर चौंकाते थे.

कारगिल की लड़ाई शुरू होने से एक साल पहले लद्दाख़ स्काउट ट्रेनिंग सेंटर के मेस में ‘हनीफ़ू’ के निकनेम से पहचाने जाने वाले हनीफ़ुद्दीन ने ‘लाखों हैं यहाँ दिलवाले, पर प्यार नहीं मिलता’ गाकर वहाँ मौजूद लोगों का दिल जीत लिया था.

एक हिंदू माँ और मुसलमान पिता के बेटे हनीफ़ुद्दीन ईद और दीवाली दोनों त्योहार मनाते बड़े हुए थे. उनकी यूनिट का युद्ध घोष था, ‘राजा राम चंद्र की जय.’

उनके पिता अज़ीज़उद्दीन और माँ हेमा अज़ीज़ दोनों सूचना-प्रसारण मंत्रालय के सॉन्ग एंड ड्रामा डिवीज़न में काम करते थे.

उनके पिता नाट्य कलाकार थे जबकि उनकी माँ शास्त्रीय गायिका थीं. आठ साल की उम्र में हनीफ़ुद्दीन ने अपने पिता को खो दिया था.

सैन्य इतिहास की जानी-मानी लेखिका रचना बिष्ट रावत अपनी किताब ‘कारगिल अनटोल्ड स्टोरीज़ फ्रॉम द वॉर’ में लिखती हैं, “हनीफ़ को सुबह जल्दी उठने की आदत थी. 22 साल की उम्र में जब इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) के लिए उनका चयन हुआ तो वो अपनी माँ के पास एक बॉन्ड पर दस्तख़त कराने गए.”

रचना बिष्ट लिखती हैं, “जब उन्होंने उसे पढ़ना चाहा तो उन्होंने अपनी माँ से कहा, ‘पढ़ क्यों रही हो, बस साइन कर दो न.’ जब उनकी माँ हेमा ने कहा कि किसी भी काग़ज़ पर दस्तख़त करने से पहले ये पढ़ना ज़रूरी होता है कि उसमें लिखा क्या है? तब हनीफ़ ने हँसते हुए कहा था, ‘इसमें लिखा है कि अगर मुझे ट्रेनिंग के दौरान कुछ हो गया तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा.’ हेमा का जवाब था, ‘भारतीय सेना में जाना तुम्हारा सपना रहा है. मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं.’’

मृदुभाषी और उत्साही कैप्टन हनीफ़

एक बार उनकी माँ को अपने विभाग की तरफ़ से यूरोप के दौरे पर जाना पड़ा. उस समय हनीफ़ की उम्र 10 साल और उनके बड़े भाई नफ़ीस की उम्र सिर्फ़ 12 साल की थी.

रचना बिष्ट रावत लिखती हैं, “उनकी माँ ने मुझे बताया था कि- मैं अपने इन दोनों बच्चों को घर में अकेला छोड़ कर विदेश गई थी. मैंने उन दोनों को कुछ पॉकेट मनी दिया और इमरजेंसी के लिए कुछ पैसे पड़ोसियों के पास छोड़ दिए."

"मैं गई तो थी सिर्फ़ डेढ़ महीनों के लिए लेकिन मुझे वहाँ तीन महीने रहना पड़ा. इन दोनों बच्चों ने मुझे घर में अकेले रहकर दिखाया. दोनों ने अपने स्कूल की फ़ीस दी. समय पर स्कूल गए. अपने लिए खाना बनाया. अपने कपड़े खुद प्रेस किए. हनीफ़ तो उस उम्र में पराठे तक बना लेता था.”

कारगिल की लड़ाई के दौरान 11 राजपूताना राइफ़ल्स के कमांडिंग अफ़सर रहे कर्नल अनिल भाटिया ने बीबीसी को बताया, “हनीफ़ हमारी बटालियन का सबसे युवा अफ़सर था. बहुत ही मृदुभाषी और हमेशा उत्साह से भरा हुआ."

"हर काम के लिए सबसे पहले अपने आपको आगे करता था. कंप्यूटर्स पर उसकी बहुत अच्छी पकड़ थी. बहुत अच्छा गायक था. अपने बलबूते उसने हमारी यूनिट में एक जैज़ बैंड बनाया था. उसके सारे उपकरण वो दिल्ली से खुद ले आया था.”

सियाचिन से तुरतुक पहुंचने का आदेश

हनीफ़ को चार महीनों के लिए सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात किया गया था.

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र है जहाँ खड़े भर रहना ही बहुत जीवट और जोख़िम का काम है.

अपना टर्म पूरा करने के बाद हनीफ़ और उनकी कंपनी बेस कैंप लौट आई थी. वहाँ पर हनीफ़ को लोड मनीफ़ेस्ट ऑफ़िसर की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

उनका काम था सियाचिन ग्लेशियर के अलग-अलग हिस्सों की सैन्य चौकियों में राशन, दवाएं और चिट्ठियाँ पहुंचवाना.

अचानक तुरतुक सेक्टर में तैनात 12 जाट की यूनिट को ख़बर मिली उस इलाक़े में पाकिस्तान की तरफ़ से कुछ घुसपैठ हुई है.

चूँकि बटालिक सेक्टर में लड़ाई हो रही थी, इसलिए हालात से निपटने के लिए वहाँ सैनिकों की कमी पड़ रही थी.

तय हुआ कि आसपास की सैनिक यूनिटों से तुरतुक पहुंच कर हालात सँभालने के लिए कहा जाए. चूँकि हनीफ़ की यूनिट पास में ही थी इसलिए उन्हें भी उस इलाके़ में पहुंचने का आदेश मिला.

बर्फ़ से भरा हुआ ख़तरनाक रास्ता

11 राजपूताना राइफ़ल्स के सैनिक कई ट्रकों में बैठकर तेज़ बहती हुई नदी श्योक के साथ-साथ चल रहे थे. उनमें से अधिकतर लोग सियाचिन से अभी-अभी लौटे थे.

कुछ लोगों को छुट्टी से वापस भी बुलाया गया था.

कैप्टन हनीफ़ुद्दीन को अभी तक पता नहीं था कि उनका मिशन क्या है?

लेकिन उन्हें ये अंदाज़ा था कि सब-सेक्टर पश्चिम में गश्त भेजने के लिए उनके अतिरिक्त सैनिकों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि पाकिस्तानी सैनिकों ने किस हद तक घुसपैठ कर रखी है.

सैनिकों ने तुरतुक पहुंचने के बाद तुरतुक नाले के साथ आगे बढ़ना जारी रखा. जैसे-जैसे सैनिक ऊपर चढ़ते गए परिस्थितियाँ कठिन होती चली गईं.

तुरतुक से छोरबत ला का पूरा इलाक़ा गहरी खाइयों से भरा हुआ था. एक ग़लत क़दम किसी भी सैनिक को मौत की गहराइयों में ले जाने के लिए काफ़ी था.

जगपाल पार करने के बाद सैनिक एक दूसरे से रेडियो संपर्क में नहीं थे.

उनको ग्लेशियर की ज़िंदगी की आदत थी इसलिए उन्हें यहाँ की मुश्किलों का सामना करने में उनका पुराना अनुभव काम आ रहा था.

जाँघों तक बर्फ़ से गुज़रते हुए वो एक चट्टान के पास आ पहुंचे थे जहां उन्हें एक अस्थायी ठिकाना बनाना था.

हनीफ़ुद्दीन को गोलियाँ लगीं

6 जून, 1999 को हनीफ़ ने पेशकश की कि वो दिन में गश्त लेकर कारचेन ग्लेशियर तक जाएंगे.

कर्नल अनिल भाटिया बताते हैं, “हनीफ़ ने तय किया कि वो पाकिस्तानी ठिकाने के जितना क़रीब जा पाएंगे, जाएंगे और उन्हें अपने ऊपर फ़ायर करने के लिए उकसाएँगे ताकि उनकी असली लोकेशन का पता चल सके. उससे ये भी अंदाज़ा लगेगा कि उनके पास कितने और किस स्तर के हथियार हैं?”

नायब सूबेदार मंगेज सिंह और सात अन्य सैनिकों के साथ कैप्टन हनीफ़ ने एक जगह पार की जिसका नाम लेडगे था.

उनके और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच सिर्फ़ 300 मीटर की दूरी रह गई थी.

कैप्टन हनीफ़ ने अपने साथियों को ख़बर दी कि पाकिस्तानी सैनिकों ने वहाँ आठ मोर्चे बना रखे हैं और उनके पास किस तरह के हथियार हैं.

जबकि उन्हें ये अंदाज़ा नहीं लग पाया कि वो ख़तरे के बहुत क़रीब पहुंच गए हैं और फ़ायरिंग रेंज में हैं.

हनीफ़ और उनके साथियों को निशाना बनाते हुए पाकिस्तानी सैनिकों ने ज़बरदस्त फ़ायरिंग शुरू कर दी.

सबसे पहले नायब सूबेदार मंगेज सिंह को गोली लगी और वो हवा में उछल कर नीचे गहरी खाई में जा गिरे.

हनीफ़ और राइफ़लमेन परवेश को भी गोलियाँ लगीं. घायल होने के बावजूद हनीफ़ ने जवाबी फ़ायर करना जारी रखा.

लेकिन तभी हनीफ़ के पेट में एक और गोली लगी, वो नीचे गिर पड़े. उनकी साँस धीमी होती चली गई और आखिर में जाकर पूरी तरह से रुक गई.

जिस समय हनीफ़ की मौत हुई उस समय उनकी उम्र थी मात्र 25 साल. उन्हें भारतीय सेना में आए हुए सिर्फ़ दो साल हुए थे.

भारतीय सैनिकों ने हनीफ़ के पार्थिव शरीर को अपनी तरफ़ लाने की भरपूर कोशिश की लेकिन लगातार फ़ायरिंग ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया.

आख़िरकार उन्होंने उनके शव को लाने का विचार त्याग दिया और वापस ज़ंगपाल लौट आए.

उनके शव को लाने के दो प्रयास और किए गए लेकिन उसमें भारतीय सैनिकों को क़ामयाबी नहीं मिली.

सेनाध्यक्ष जनरल मलिक ने हनीफ़ की माँ से मुलाक़ात की

इस बीच हनीफ़ की माँ हेमा अज़ीज़ को सूचना पहुंचा दी गई थी. तत्कालीन भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ख़ुद कैप्टन हनीफ़ुद्दीन की माँ से मिलने उनके पूर्वी दिल्ली स्थित निवास पर गए.

रचना बिष्ट रावत लिखती हैं, “जनरल मलिक ने उनकी माँ से कहा कि दुश्मन की लगातार फ़ायरिंग की वजह से हम हनीफ़ के शव को वापस नहीं ला पाए हैं."

"हेमा अज़ीज़ ने बहुत बहादुरी से उन्हें जवाब दिया, ‘मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे के शव को वापस लाने के लिए कोई और सैनिक अपनी ज़िंदगी जोख़िम में डाले. जब लड़ाई ख़त्म हो जाएगी तो मैं उस जगह पर जाना चाहूँगी जहाँ मेरे बेटे ने अंतिम साँस ली थी."

जनरल मलिक ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे उनके वहाँ जाने का बंदोबस्त करेंगे.

उधर हनीफ़ के निधन के क़रीब एक महीने बाद 11 राजपूताना राइफ़ल्स के बाक़ी सैनिक सियाचिन में अपनी डयूटी पूरी करके नीचे उतरे तब कर्नल अनिल भाटिया को हनीफ़ के नहीं रहने की जानकारी मिली.

बर्फ़ में पड़े रहने के 43 दिन बाद शव वापस लाया गया

कर्नल अनिल भाटिया बताते हैं, “हम 10 जुलाई को तुरतुक पहुंचे. मैंने अपने लोगों से कहा कि हम अपने साथियों के शवों को वापस लाएंगे."

"हनीफ़ की शहादत के 43 दिन बाद कैप्टन एसके धीमान और मेजर संजय विश्वास राव और उनके साथियों ने इसका बीड़ा उठाया. कठिन रास्ते पर चलते हुए वे उस जगह पर पहुंचे जहाँ हनीफ़ ने अपने प्राण त्यागे थे."

उन्हें दूर से ही हनीफ़ और परवेश के पार्थिव शरीर दिखाई दे गए जो अब तक पूरी तरह से जम चुके थे.

पहले वो उनको चट्टानों के पीछे ले गए और फिर उन्हें अपने कंधों पर लादकर वो पूरी रात चलते रहे. सुबह सात बजे वो ज़ंगपाल पहुंचे.

हनीफ़ का चेहरा तब तक काला पड़ चुका था लेकिन उनको तब भी पहचाना जा सकता था.

अगले दिन एक हेलिकॉप्टर ने वहाँ लैंड किया जिसका काम पार्थिव शरीर को ले जाना था.

उसी दिन 11 राजपूताना राइफ़ल्स के सैनिकों ने तय किया कि वो प्वाइंट 5590 पर क़ब्ज़ा करके रहेंगे. इस पूरे मिशन को ‘ऑपरेशन हनीफ़’ का नाम दिया गया.

प्वाइंट 5590 पर हमले की योजना

कर्नल भाटिया ने तय किया कि उनके सैनिक ग्लेशियर पर सीधे न चढ़कर और मुश्किल रास्ता लेते हुए पाकिस्तान की तरफ़ से प्वाइंट 5590 पर चढ़ेंगे.

ये मुश्किल काम ज़रूर होगा लेकिन पाकिस्तानी सैनिक कतई उम्मीद नहीं करेंगे कि हमला उस तरफ़ से हो सकता है.

कर्नल भाटिया ने इस हमले के लिए पूरे नौ दिनों तक इंतज़ार किया. तीन दिन पहले पाकिस्तानी ठिकानों पर तोपों से हमले किए गए.

क़रीब 40 सैनिकों को दो हिस्सों में बाँटा गया. ब्रावो कंपनी का नेतृत्व कैप्टन अनिरुद्ध चौहान ने संभाला. वो एक प्रशिक्षित पर्वतारोही थे. चार्ली कंपनी का नेतृत्व लेफ़्टिनेंट आशीष भल्ला ने किया.

कुछ दिन पहले ही सियाचिन से लौटने के कारण सैनिकों के पास ग्लेशियर में पहने जाने वाले कपड़े और जूते थे. लेकिन शून्य से कई डिग्री नीचे के तापमान में तीन महीने तक लड़ने की थकान ने उनकी शारीरिक क्षमता को प्रभावित कर दिया था.

क़रीब-क़रीब हर सैनिक का वज़न घट गया था. सबके सिर में दर्द रहने लगा था और उनका रक्तचाप घटता-बढ़ता रहता था.

पास पहुँच कर सैनिक वापस लौटे

कर्नल अनिल भाटिया बताते हैं, ‘’मैंने अपने सैनिकों से कहा, ऊपर आपको जो प्वाइंट 5590 दिखाई दे रहा है. दुश्मन ने वहीं से फ़ायर कर हमारे साथियों को मारा था.”

‘राजा राम चंद्र की जय’ के नारे के साथ भारतीय सैनिक बढ़ने लगे. थकान से उनकी साँस फूल रही थी, ठंड से उनकी उंगलियाँ जम गई थीं.

उनको अपने पैर जमाने में मुश्किल हो रही थी. कई जगह ऊपर चढ़ने के लिए उन्होंने रस्सियों का सहारा लिया. क़रीब 9 घंटे की चढ़ाई के बाद वो चोटी से 40 मीटर की दूरी तक पहुंच गए.

उस समय सुबह के 4 बज रहे थे. उनके सामने अब भी 80 डिग्री की एक चढ़ाई और बाकी थी.

कर्नल भाटिया बताते हैं, “जब उन्होंने ये ख़बर मुझे दी तो मैंने उन्हें वापस लौटने का आदेश दिया. उस समय मैं कार्चन ग्लेशियर के बेस पर था. उनको वापस लाने की वजह ये थी कि जैसे ही सूरज निकलता, आसपास की चोटियों पर मौजूद पाकिस्तानी सैनिक उन्हें देखकर उन पर गोली चलाने लगते. मैं वो जोखिम नहीं उठाना चाहता था."

"मायूस होकर हमारे सैनिक वापस लौट आए. वापस लौटने में उन्हें दो घंटे लगे. तब तक वो इतने थक चुके थे कि जिसे जहाँ जगह मिली वो वहीं गिर गया और सो गया."

"हमारे पास उन्हें खिलाने के लिए बासी शकरपारों के अलावा कुछ नहीं था. उन्होंने शाम तक आराम किया और रात को फिर ऊपर चढ़ने की दोबारा कोशिश शुरू कर दी.”

रात होने का किया इंतज़ार

तेज़ चलती हवा के बीच कर्नल भाटिया ने अपने सैनिकों को जमा कर कहा, “हम अगर ये काम पूरा किए बिना वापस जाएंगे तो लोग क्या कहेंगे? वो बोलेंगे 11 राजपूत राइफ़ल्स वापस आ गई. ये हमारी पल्टन की इज़्ज़त का सवाल है. मुझे वॉलेंटियर चाहिए. कौन जाएगा?”

सबसे पहले नायब सूबेदार अभय सिंह ने अपना हाथ ऊपर उठाया. इसके बाद कई सैनिक सामने आ गए.

कर्नल अनिल भाटिया आगे बताते हैं, “अनिरुद्ध के नेतृत्व में टास्क फ़ोर्स-वन के सैनिक कठिन चढ़ाई चढ़ते हुए 5590 के बेस तक पहुंच गए. अब उनके सामने फिर 80 डिग्री की चढ़ाई थी. उन्होंने फिर रस्सियाँ लगाईं और साढ़े पाँच बजे तक अपने लक्ष्य पर पहुँच गए. तब तक भोर होनी शुरू हो गई थी.”

सैनिकों ने मुझे सूचित किया कि वो तीन पाकिस्तानी मोर्चों को देख सकते हैं उनमें से एक मोर्चे पर छेद से मशीन गन की नाल निकली हुई है. यह मोर्चा उनसे सिर्फ़ 25 मीटर की दूरी पर है.

कर्नल भाटिया ने आदेश दिया कि वो चट्टानों के पीछे छिपे रहें और रात होने का इंतज़ार करें.

चौकी पर क़ब्ज़ा हासिल किया

जैसे ही अँधेरा हुआ सबसे पहले कान सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना पाकिस्तानी सैनिकों पर धावा बोला. उनकी गर्दन में गोली लगी.

जैसे ही वो नीचे गिरे उनके साथी दिलबाग सिंह ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की लेकिन उनके हाथ में उनकी राइफ़ल ही आ सकी और कान सिंह नीचे खाई में गिरते चले गए.

दिलबाग ने आगे कूदकर पाकिस्तानी सैनिकों पर हमला बोल दिया. दोनों तरफ़ के सैनिक हथियारों के साथ-साथ अपने हाथों से लड़ने लगे.

नायब सूबेदार अभय सिंह ने पाकिस्तानी सैनिकों को भ्रमित करने के उद्देश्य से चिल्ला कर कहा, ‘आधे मेरे पीछे आओ. थोड़े आदमी दाएं से जाओ. बाकी बाएं से जाओ. आगे बढ़ो.’

पाकिस्तानी सैनिकों को लगा कि उनके ऊपर 100 सैनिकों की एक पूरी कंपनी ने हमला किया है.

कर्नल भाटिया बताते हैं, “मैंने परतापुर स्थित 102 ब्रिगेड हेडक्वार्टर से अपना रेडियो कनेक्शन स्विच ऑफ़ कर दिया ताकि उनकी तरफ़ कोई हस्तक्षेप न किया जा सके. मैंने अपना रेडियो सुबह 5 बजे ऑन किया. तब तक प्वाइंट 5590 पर हमारा कब्ज़ा हो चुका था. इसमें सात पाकिस्तानी सैनिक मारे गए.”

इस पूरे ऑपरेशन में राजपूताना राइफ़ल्स का सिर्फ़ एक जवान मारा गया.

चूँकि तब तक युद्ध की समाप्ति की घोषण की जा चुकी थी इसलिए यूनिट को कोई वीरता पुरस्कार नहीं दिया गया.

कैप्टन हनीफ़ को मिला मरणोपरांत वीर चक्र

कारगिल युद्ध में बहादुरी दिखाने के लिए कैप्टन हनीफ़ुद्दीन को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया और सब-सेक्टर वेस्ट को उनके नाम पर ‘सब-सेक्टर हनीफ़’ रखा गया.

उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली लाया गया जहाँ राजकीय सम्मान के साथ उनको अंतिम विदाई दी गई.

जनरल मलिक ने अपना वादा पूरा किया और हेमा अज़ीज़ तुरतुक की उस जगह पर गईं जहाँ उनके बेटे ने अंतिम सांस ली थी.

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