अनोखी तकनीक से इतिहास रचने वाले जेवियर सोटोमायोर का रिकॉर्ड आज भी क्यों नहीं टूट पाया है?

    • Author, हरप्रीत कौर लांबा
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए

क्यूबा के दिग्गज हाई जंपर जेवियर सोटोमायोर से मिलना एक अनोखा अनुभव है. 58 साल के सोटोमायोर ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता हैं और हाई जंप में वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर हैं.

सोटोमायोर की पहचान एक ऐसे एथलीट की रही है जिन्होंने अपनी अनोखी तकनीक से हाई जंप को नए तरीके से परिभाषित किया.

सोटोमायोर ने 14 साल की उम्र में हाई जंप शुरू किया. वह 8 फीट की छलांग लगाने वाले दुनिया के इकलौते हाई जंपर हैं.

उन्होंने साल 1989 में प्यूर्टो रिको में 2.44 मीटर और साल 1993 में स्पेन में 2.45 मीटर की छलांग लगाकर मानो ग्रेविटी को भी चुनौती दी. तीन दशक बाद आज भी उनका ये वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम है.

सोटोमायोर से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के पीछे वैज्ञानिक या तकनीकी रहस्यों पर बात करेंगे. लेकिन इसके बजाए वह अपनी 'सफलता के असामान्य दृष्टिकोण' से हैरान करते हैं.

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सोटोमायोर नहीं चाहते कि बाक़ी लोग, यहाँ तक कि उनका 17 साल का बेटा जैक्सियर भी उनकी तकनीक की नकल करे

"14 साल की उम्र में मैंने हाई जंपर बनने का फ़ैसला किया और यह तकनीक मैंने खुद खोजी. किसी ने मुझे नहीं सिखाया. मैं इस तकनीक पर कायम रहा, भले ही मेरे कोच इसे बदलना चाहते थे."

"वे कहते कि आपको इस तरह से कूदना नहीं चाहिए, लेकिन इससे मुझे नतीजे मिले और मैं इससे जुड़ा रहा. मेरे कोच को भी इस पर भरोसा हो गया."

सोटोमायोर ने ये बातें भारत में आयोजित एकमरा स्पोर्ट्स लिटरेचर फेस्टिवल के सातवें संस्करण में हिस्सा लेते वक्त कहीं.

'मैं नहीं चाहता मेरा बेटा मेरी नकल करे'

सोटोमायोर कहते हैं, "मैंने ज्यादा भागने पर बहुत जोर दिया ताकि टेक-ऑफ जितना संभव हो उतना बेहतर हो. मैं भागने के साथ जंप के समय बहुत फोर्स बना रहा था. मैंने अपने टखनों को मजबूत किया क्योंकि उन पर असर पड़ता था. अपने पूरे करियर के दौरान जंप से पहले मेरा आखिरी कदम बहुत लंबा होता था, जो दुनिया के बाकी खिलाड़ियों से अलग था."

वो बताते हैं, "आमतौर पर अन्य एथलीटों का आखिरी कदम छोटा होता है. लेकिन मैं इसे लंबा रखता था. मैं दो तकनीकों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था, एक तकनीक भागने पर निर्भर थी और दूसरी ताकत पर. इसी वजह से मुझे कामयाबी मिली."

वो हंसते हुए बताते हैं, "हालांकि, मैं नहीं चाहता कि बाकी लोग इसे अपनाएं क्योंकि यह हाई जंप की पारंपरिक विधि नहीं है. मैं अपने बेटे को भी जो स्पेन में ट्रेनिंग करता है, सलाह देता हूं कि इस तरीके को न अपनाए. फिर भी वह मेरी नकल करता है!"

अपने बचपन और शानदार करियर को याद करते हुए सोटोमायोर कहते हैं, "मैं शिक्षा और खेल पर ध्यान देते हुए सामान्य हालात में बड़ा हुआ. क्यूबा में फिजिकल एजुकेशन पर बहुत जोर दिया जाता है. मैंने रेस, हर्डल्स, ट्रिपल जंप से शुरुआत की और आखिर में समझा कि हाई जंप में मैं सबसे अच्छा हूं."

"80 और 90 का दशक मॉडर्न साइंस, सुविधाओं या ज्यादा नॉलेज का समय नहीं था. हाई जंप के बारे में जानने के लिए हमारे पास केवल अन्य प्रतियोगियों की तस्वीरें होती थीं, या फिर कभी-कभी लाइव स्क्रीनिंग."

सोटोमायोर बताते हैं, "मैं उनके पैर रखने के तरीके, लैंडिंग, पोजिशनिंग की स्टडी करता था ताकि अपना प्रदर्शन बेहतर कर सकूं. ये शुरुआती दिनों की बात है."

सोटोमायोर को है ये मलाल

साल 1984 में हवाना में सोटोमायोर 2.33 मीटर की छलांग लगाते हुए जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया. टॉप फॉर्म में होने के बावजूद वो 1984 लॉस एंजिल्स और 1988 सिओल ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले पाए, क्योंकि क्यूबा ने इन गेम्स का बायकॉट किया था.

सोटोमायोर को इन दो ओलंपिक खेलों में नहीं खेल पाने की तकलीफ आज भी है.

उन्होंने बताया, "ओलंपिक किसी भी एथलीट के लिए एक सपना होते हैं. इन खेलों में हिस्सा नहीं ले पाने पर मैं बेहद निराश था. मैं अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन फॉर्म में था और मैं ओलंपिक गोल्ड मेडल जीत सकता था. जब मैंने 1992 के गेम्स में हिस्सा लिया तो मैंने खुद से गोल्ड मेडल जीतने का वादा किया था."

सोटोमायोर ने 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता और 2000 सिडनी ओलंपिक में उनके हिस्से सिल्वर मेडल आया.

विजुलाइजेशन की ताकत

सोटोमायोर से सवाल किया गया कि 32 साल बाद भी उनका रिकॉर्ड क्यों नहीं टूट पाया है.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं मालूम रिकॉर्ड क्यों नहीं टूट पाया है. लेकिन मुझे पता है कि मैंने उन्हें कैसे बनाया. मेरी अपनी तकनीक के अलावा मैं खुशकिस्मत रहा कि मैंने हाई जंप के सबसे बेहतरीन दौर में खेला. हमें बेस्ट बनने के लिए पुश किया जाता था."

"वो सोशल मीडिया का दौर नहीं था. हम बेहद अनुशासित थे. हम हर दिन खुद से बेहतर बनने की कोशिश करते थे. मैं अपने कौशल को लेकर बेहद गंभीर था और हाई जंप ही मेरा एकमात्र लक्ष्य था. बेशक ये कितना भी साधारण या खास लगे लेकिन यही मेरी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण था"

सोटोमायोर विजुलाइजेशन की ताकत को भी अपनी सफलता का श्रेय देते हैं.

वो बताते हैं, "मैं अपनी ट्रेनिंग का बड़ा हिस्सा विजुलाइजेशन में गुजारता था. अगर मैंने 2.45 मीटर का जंप किया तो मैं उसे कई दिन तक विजुलाइज करता था. ये मेरी ट्रेनिंग का अहम हिस्सा था और मैं मानता हूं कि मेरे थेरापिस्ट का भी मेरी कामयाबी में अहम योगदान रहा."

उनसे सवाल किया गया कि क्या उन्हें कभी लगा उनकी जंप परफेक्ट रही है.

उन्होंने कहा, "परफेक्ट जंप की मेरी परिभाषा ये थी कि मैं तेज गति से भाग रहा हूं और मेरा टेक ऑफ पावरफुल है. हर पोजिशन सही वक्त पर आए और आप उसका आनंद लें. जब आप ऐसा करते हैं तो उसकी अलग खुशी मिली है. ऐसे लगता है मानो आप उड़ रहे हैं. मेरे लिए परफेक्ट जंप यही है."

"लेकिन क्या मैं परफेक्ट था जब मैंने दोनों वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया? जवाब है- पूरी तरह नहीं, लेकिन परफेक्ट के बेहद नजदीक."

मौजूदा एथलीट्स के लिए क्या सलाह?

सोटोमायोर मौजूद हाई जंपर में से कतर के मुताज बार्शिम को चुनते हैं और मानते हैं कि वो उनका रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं.

भारतीय एथलीट्स के लिए उनकी सलाह साधारण है.

वो कहते हैं, "दूसरों से नहीं अपने आप से प्रतिस्पर्धा करें. हर दिन बेहतर बनने की कोशिश करें. अनुशासन के साथ जमे रहें और ऊंचाई हासिल करने पर फोकस करें."

क्या कोई सोच सकता है कि आज के मॉर्डन इक्विपमेंट्स, बायोमैकेनिक्स, स्पोर्ट्स साइंस के दौर में सोटोमायोर कितनी ऊंचाइयों तक पहुंच सकते थे?

सोटोमायोर से जब यही सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, "सच कहूं तो मुझे यकीन नहीं है कि आज के समय में इतने सारे डिस्ट्रेक्शन के बीच मैं वही सफलता हासिल कर पाता. जैसा कि मैंने बताया, 80 और 90 के दशक में हमारे पास एक्सपर्ट ट्रेनिंग और स्पोर्ट्स साइंस नहीं थी."

"आपको एक दिलचस्प बात बताऊं, मेरे एक जूते का वजन उतना था जितना आज के एथलीट्स की एक जोड़ी जूतों का होता है. मुझे एक चोट से उबरने में छह महीने लगे, जबकि आज वही चोट एक महीने में ठीक हो जाती है. फिर भी मुझे नहीं लगता कि ये सब सफलता की गारंटी देते हैं. मेरा फोकस, समर्पण और अनुशासन मेरी सबसे बड़ी ताकत थे और इसमें कोई मुझे हरा नहीं सकता था."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.