ग़ज़ा पर कब्ज़ा करना चाहते हैं ट्रंप, क्या ये मुमकिन है?

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक, बीबीसी न्यूज़

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग़ज़ा को नियंत्रण में लेने और वहां के लोगों को फिर से बसाने की योजना पूरी नहीं होने वाली है. ऐसी किसी भी योजना के लिए अरब देशों के सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी. लेकिन अरब देशों ने इस योजना को सिरे से ख़ारिज कर दिया है.

योजना को ख़ारिज करने वाले अरब देशों में जॉर्डन और मिस्र भी शामिल हैं. ट्रंप चाहते हैं कि ये दो देश ग़ज़ा के मौजूदा बाशिंदों को अपने यहाँ बसा लें. वह चाहते हैं कि इसका ख़र्च सऊदी अरब उठाए लेकिन वो भी इस योजना से सहमत नहीं है.

अमेरिका और इसराइल के पश्चिमी सहयोगी भी इस विचार के ख़िलाफ़ हैं. लेकिन ग़ज़ा में कुछ या शायद कई फ़लस्तीनियों को अगर मौका मिले तो वो वहां से बाहर निकलने का रास्ता चुन सकते हैं.

लेकिन अगर दस लाख लोग वहाँ से निकल भी गए तो भी वहां 12 लाख लोग बच जाएंगे. और शायद अमेरिका को ट्रंप की योजना पूरी करने के लिए इन लोगों को जबरन वहां से हटाना पड़े. साल 2003 में इराक़ में हस्तक्षेप के बाद ऐसी कोई भी कोशिश अमेरिका में बेहद अलोकप्रिय होगी.

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ट्रंप की योजना पर क्यों उठे सवाल?

साथ ही ये अरसे से 'दो-देशों' के समाधान वाली योजना की उम्मीद का भी अंत होगा. दो देशों वाले समाधान का मकसद इसराइल के साथ-साथ एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी देश की स्थापना करना रहा है ताकि एक सदी से चला आ रहा है यह ख़ूनी संघर्ष थम जाए.

इसराइल की नेतन्याहू सरकार दो देश बनाने की इस योजना के सख़्त ख़िलाफ़ है.

कई वर्षों की विफल शांति वार्ताओं के दौरान, 'दो देशों' वाला ये समाधान महज़ एक खोखला नारा बन कर रह गया है.

लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत से ही यह समाधान अमेरिकी विदेश नीति का केंद्रीय मुद्दा रहा है.

ट्रंप की योजना अंतरराष्ट्रीय कानून का भी उल्लंघन करेगी.

अमेरिका हमेशा कहता रहा है कि वो कानून के तहत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यक़ीन करता है.

ट्रंप की योजना पर अमल इस विचार के भी विरुद्ध होगा. इसके अलावा यूक्रेन में रूस की और ताइवान में चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को भी बल मिलेगा.

मध्य-पूर्व के लिए ट्रंप की योजना के क्या मायने?

अब सवाल ये है कि अगर ऐसा नहीं होने वाला है तो इस सब के बारे में चिंता क्यों करें? इसका उत्तर यह है कि ट्रंप की टिप्पणियाँ चाहे कितनी भी अजीब क्यों न हों, उनका कुछ न कुछ परिणाम तो ज़रूर होगा.

ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति हैं. वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है, भले ही ट्रंप पहले एक रियलिटी टीवी होस्ट और सुर्खियां बटोरने की कोशिश करने वाले राजनीतिक उम्मीदवार रहे हों.

उनकी ये आश्चर्यजनक घोषणा ग़ज़ा में चल रहे एक नाज़ुक युद्धविराम को कमज़ोर कर सकती है. एक वरिष्ठ अरब सूत्र ने मुझे बताया कि ये घोषणा युद्धविराम के लिए 'मौत की घंटी' हो सकती है.

वैसे भी ग़ज़ा में भविष्य का शासन कैसा होगा उसपर युद्धविराम समझौता ख़ामोश है क्योंकि दोनों पक्षों में इस विषय पर सहमति नहीं है.

अब ट्रंप ने इस मुद्दे का एक समाधान सुझाया है. भले ही ट्रंप की ग़ज़ा योजना पूरी न हो पर फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के दिमाग में अब एक नया विचार घर कर जाएगा.

इसराइल में यहूदी चरमपंथियों के मन की बात

ग़ज़ा पर ट्रंप की योजना अति-राष्ट्रवादी यहूदी चरमपंथियों के सपनों को पोषित करेगी.

ऐसी विचारधारा के लोग मानते हैं कि भूमध्य सागर और जॉर्डन नदी के बीच और शायद उससे आगे की सारी भूमि यहूदियों की है.

अति-राष्ट्रवादी यहूदी चरमपंथियों के नेता नेतन्याहू की सरकार का हिस्सा हैं और उन्हें सत्ता में बनाए रखने में अहम रोल अदा कर रहे हैं. ये सारे लोग ट्रंप के विचार से ख़ुश हैं.

वो चाहते हैं कि ग़ज़ा का युद्ध फिर से शुरू हो ताकि वहां से फ़लस्तीनियों को हटाकर यहूदियों को बसाया जा सके.

इसराइल के वित्त मंत्री बेजेलेल स्मोट्रिच ने कहा कि ट्रंप ने 7 अक्टूबर के हमलों के बाद ग़ज़ा के भविष्य का हल खोज लिया है.

उनके बयान में कहा गया है 'जिसने भी हमारी ज़मीन पर सबसे भयानक नरसंहार किया है, उसे हमेशा के लिए अपनी भूमि खोनी पड़ेगी. आख़िरकार अब हम भगवान की मदद से, एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी देश के ख़तरनाक विचार को दफनाने के लिए काम करेंगे.'

इसराइल विपक्षी नेताओं ने योजना का स्वागत किया है क्योंकि शायद उन्हें अपने भविष्य का डर सता रहा है.

ऐसा हो सकता है कि हमास और अन्य फ़लस्तीनी सशस्त्र समूह ट्रंप को जवाब देने के लिए बल के प्रदर्शन की ज़रूरत समझें.

फ़लस्तीनियों के लिए, इसराइल के साथ संघर्ष अपनी ज़मीन से बेदखली है जिसे वे अल-नकबा या 'तबाही' का नाम देते रहे हैं. अल-नक़बा 1948 में इसराइल के गठन के बाद शुरू हुआ फ़लस्तीनियों का पलायन था.

तब 700,000 से अधिक फ़लस्तीनी या तो भाग गए थे या इसराइली सेना ने उन्हें अपने घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया था.

कुछ मुट्ठी भर फ़लस्तीनियों के अलावा बाकी सभी को कभी भी वापस जाने की अनुमति नहीं दी गई. इसके बाद इसराइल ने ऐसे कानून पारित किए जिनका उपयोग वह अभी भी फ़लस्तीनियों की संपत्ति को ज़ब्त करने के लिए करता है.

अब डर ये रहेगा कि ये सब दोबारा हो सकता है.

कई फ़लस्तीनियों को पहले से ही लग रहा था इसराइल हमास के ख़िलाफ़ युद्ध का इस्तेमाल ग़ज़ा को तबाह करने और वहां की आबादी को बाहर निकालने के लिए कर रहा है.

इसलिए फ़लस्तीनी इसराइल पर नरसंहार का आरोप लगाते रहे हैं. और अब उन्हें लग सकता है कि डोनाल्ड ट्रंप इसराइल की योजनाओं का समर्थन कर रहे हैं.

ट्रंप ने ये योजना क्यों पेश की?

सिर्फ इसलिए कि ट्रंप ने कहा है, इससे कोई बात सच या निश्चित नहीं हो जाती. उनके बयान अक्सर अमेरिका की तयशुदा नीति की तुलना में किसी रियल एस्टेट डील के दांव पेच जैसे होते हैं.

शायद ट्रंप किसी और योजना पर काम कर रहे हों और यहां सिर्फ़ भ्रम फैला रहे हों. कहा तो ये भी जाता है कि ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार के इच्छुक रहे हैं. मध्य-पूर्व में शांति की पहल को बढ़ावा देने वालों को नोबेल पुरस्कार मिलते रहे हैं.

जब दुनिया उनकी ट्रंप की ग़ज़ा के बारे में घोषणा को समझने का प्रयास कर रही थी, उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर ईरान के साथ 'सत्यापित परमाणु शांति समझौते' की इच्छा पोस्ट की.

ईरान इस बात से इनकार करता है कि वह परमाणु हथियार बनाना चाहता है लेकिन तेहरान में इस बात पर खुली बहस चल रही है कि क्या अब ख़तरा इतना बढ़ गया है कि उन्हें ऐसा कोई हथियार बना लेना चाहिए.

नेतन्याहू कई वर्षों से चाहते हैं कि अमेरिका, इसराइल की मदद से, ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट कर दे. ईरान के साथ डील करना कभी भी उनकी योजना का हिस्सा नहीं था.

ट्रंप के पहले कार्यकाल में नेतन्याहू ने ईरान के साथ बराक ओबामा के दौरान हुए परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकालने के लिए सफल अभियान चलाया था.

अगर ट्रंप का मकसद ईरान के बारे में बात कर के धुर दक्षिणपंथियों को ख़ुश करना था तो वे इसमें सफल रहे हैं. लेकिन ट्रंप ने दुनिया के सबसे अशांत इलाक़े में एक अनिश्चितता और अस्थिरता पैदा की है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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