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श्रेयसी सिंह: अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज़ी में 'गोल्ड मेडलिस्ट' नीतीश कैबिनेट तक कैसे पहुंचीं?
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
10वीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में एक नया चेहरा श्रेयसी सिंह भी हैं.
जमुई विधानसभा सीट से दूसरी बार विधायक बनीं श्रेयसी सिंह अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज़ रही हैं. साथ ही वो राजनीतिक परिवार से भी हैं.
उनके पिता दिग्विजय सिंह बिहार की बांका लोकसभा सीट से सांसद रहे थे.
वह अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में विदेश राज्य मंत्री और रेल राज्य मंत्री थे. साथ ही वह नेशनल राइफ़ल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे.
दिग्विजय सिंह के निधन के बाद श्रेयसी सिंह की माँ पुतुल देवी भी बांका से सांसद रही थीं.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय लोग श्रेयसी को उनके पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखते हैं.
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अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
श्रेयसी सिंह के नाम कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेडल हैं. उन्होंने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स (गोल्ड कोस्ट, ऑस्ट्रेलिया) के महिला डबल ट्रैप इवेंट में गोल्ड मेडल जीता था.
इससे पहले उन्होंने साल 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स (ग्लासगो, स्कॉटलैंड) में रजत पदक हासिल किया था.
साल 1991 में पैदा हुईं श्रेयसी सिंह साल 2020 में सक्रिय राजनीति में आई थीं.
इसी साल उन्होंने बीजेपी के टिकट पर जमुई सीट से विधानसभा चुनाव जीता.
दिल्ली के हंसराज कॉलेज से आर्ट्स में ग्रैजुएशन करने वाली श्रेयसी सिंह अविवाहित हैं.
श्रेयसी सिंह के चुनावी हलफ़नामे के मुताबिक़ उनके ख़िलाफ़ कोई मुक़दमा दर्ज नहीं है.
उन्होंने 7.6 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति घोषित की है.
'चुनाव प्रबंधन और जनता से कनेक्ट'
वरिष्ठ पत्रकार फ़ैज़ान अहमद कहते हैं कि 2020 में बीजेपी पूर्व सांसद और केंद्र में मंत्री रहे दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल कुमारी को जमुई से विधानसभा टिकट देना चाहती थी.
पुतुल देवी पहले बांका से सांसद भी रह चुकी थीं. उन्होंने खुद विधानसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी बेटी श्रेयसी सिंह को टिकट दिया जाए.
बीजेपी ने उनकी बात मानी और श्रेयसी सिंह को विधानसभा चुनाव में उतारा, जिसे जीतकर वो पहली बार विधायक बनीं.
राजनीति में उनकी शुरुआत 2020 से मानी जाती है, लेकिन बांका के स्थानीय पत्रकार नागेंद्र द्विवेदी कहते हैं कि वह इससे पहले ही राजनीति में सक्रिय हो गई थीं.
द्विवेदी बताते हैं कि 2019 में जब उनकी माँ पुतुल देवी ने बांका से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा था, तो श्रेयसी सिंह ने ही उनके चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था.
उनके साथ कई ख्याति प्राप्त शूटर भी पुतुल देवी के चुनाव प्रचार में शामिल हुए थे.
'पिछली बार ही मंत्री पद की उम्मीद थी'
बिहार की राजनीति को करीब से जानने-समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का मानना है कि श्रेयसी सिंह का पहली बार विधायक के तौर पर भी कार्यकाल ठीक रहा था.
वह कहते हैं, "पहली बार विधायक बनी थीं लेकिन निष्क्रिय नहीं रहीं. विधानसभा में अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाती थीं और बहुत से लोगों को उसी समय लगता था कि इनको मंत्री पद क्यों नहीं दिया गया."
नचिकेता कहते हैं कि बीजेपी ने श्रेयसी सिंह को मंत्री बनाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं. "वो युवा हैं, महिला हैं, पढ़ी-लिखी हैं और जातीय समीकरण के लिहाज से भी बीजेपी के लिए उनकी अहमियत है."
वहीं, फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, "मंत्रिमंडल के गठन से दो-तीन दिन पहले से ही चर्चा थी कि श्रेयसी सिंह को मंत्री बनाया जा रहा है. यह कोई अजीब बात भी नहीं है. वह बड़ा नाम हैं, परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि है. ख़ुद अंतरराष्ट्रीय शूटर रह चुकी हैं, युवा हैं, अच्छा बोलती हैं. इसलिए बीजेपी ने उन्हें आगे बढ़ाया और मंत्री बनाया."
इस सवाल के जवाब में कि बतौर मंत्री श्रेयसी सिंह से क्या उम्मीद की जानी चाहिए?
नचिकेता कहते हैं, "वह युवा हैं, लोगों को इनसे उम्मीदें रहेंगी लेकिन देखने की बात यह है कि इन्हें पोर्टफ़ोलियो क्या दिया जाता है. वह एक महत्वपूर्ण चीज़ है क्योंकि अब तो बहुत सारे विभाग बना दिए गए हैं, जो सिर्फ़ लाल बत्ती के लिए हैं. काम नहीं है वहां. वैसे जैसे इनकी पढ़ाई-लिखाई है मुझे लगता है कि ये ब्यूरोक्रेसी के साथ डील करने में भी सक्षम रहेंगी."
पिता की विरासत
नचिकेता नारायण कहते हैं कि श्रेयसी सिंह के पिता दिग्विजय सिंह का अपने क्षेत्र में बहुत मज़बूत आधार था, वह समता पार्टी के कोटे से अटल बिहारी सरकार में केंद्र में मंत्री रह चुके थे.
वह कहते हैं, "जब नीतीश कुमार से उनकी खटपट हुई, तो एनडीए की लहर के बावजूद 2010 में वह बांका से निर्दलीय सांसद बने थे. उनके देहांत के बाद श्रेयसी सिंह की मां पुतुल देवी उसी सीट से उपचुनाव जीतकर निर्दलीय सांसद बनीं, जिसे उनके पति की साख का ही असर माना गया."
वह कहते हैं कि हालाँकि पुतुल देवी 2019 का चुनाव हार गई थीं, लेकिन उनके प्रचार में श्रेयसी सिंह का चुनाव प्रबंधन और जनता से कनेक्ट सभी ने नोट किया था.
वह कहते हैं, "बांका के लोग श्रेयसी सिंह को ही उनके पिता दिग्विजय सिंह का असली राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि वह एक दिन बांका का संसद में प्रतिनिधित्व करेंगीं."
'लंबी रेस का घोड़ा'
नागेंद्र बताते हैं कि हालांकि श्रेयसी जमुई से विधायक हैं, लेकिन उनकी सक्रियता बांका क्षेत्र में बनी हुई है और वह यहाँ के लगभग सभी सामाजिक कार्यों में शरीक होती हैं.
वह कहते हैं, "इनकी माँ तो हाउस वाइफ़ थीं लेकिन इनमें अपने पिता की झलक दिखती है. बोल्ड डिसीजन लेने वाली हैं, वैसी ही प्रखर वक्ता हैं."
हालाँकि नचिकेता कहते हैं कि दिग्विजय सिंह और श्रेयसी सिंह की परिस्थितियां अलग हैं.
वे कहते हैं, "श्रेयसी सिंह बड़ी पार्टी से विधायक बनी हैं. बड़ी पार्टी का फ़ायदा यह है कि वह आपको चुनाव जितवाने में मदद करती है, आप सुरक्षित होते हैं लेकिन चुनौती यह होती है कि वहाँ अपनी छाप छोड़ना आसान नहीं होता."
वह कहते हैं, "मेरा मानना है कि वह बतौर विधायक सक्रिय रही हैं लेकिन इसके साथ ही धैर्य की कमी उनमें नज़र नहीं आती. उनके सामने वक़्त बहुत है, कम से कम 25-30 साल की राजनीति तो है ही. ऐसे में हो सकता है कि वह लंबी रेस का घोड़ा साबित हों."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.