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भारत में कब हुआ था पहला लोकसभा चुनाव और क्या थी चुनावी प्रक्रिया?
भारत के लोकसभा चुनाव को दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव माना जाता है. इसमें लाखों की संख्या में कर्मचारी काम करते हैं और करोड़ों मतदाता मतदान करते हैं.
भारत में लोकसभा के चुनाव साल 1951 से कराए जा रहे हैं. अब तक लोकसभा के 17 चुनाव हो चुके हैं. भारत का निर्वाचन आयोग इन चुनावों को संपन्न करवाता है.
आइए जानते हैं लोकसभा, लोकसभा चुनाव, लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव और भारत निर्वाचन आयोग के बारे में.
कब हुआ था पहली लोकसभा का चुनाव?
संविधान के मुताबिक़ लोकसभा में सदस्यों की संख्या राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए पाँच सौ तीस से अधिक नहीं होनी चाहिए. केंद्र शासित क्षेत्रों से चुने गए सदस्यों की संख्या 20 से अधिक नहीं होनी चाहिए.
लोकसभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को देखते हुए राष्ट्रपति इस समुदाय के दो सदस्यों को मनोनीत करते थे.
नरेंद्र मोदी सरकार ने कानून संशोधन कर इस व्यवस्था को बंद कर दिया.
2019 में हुए सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में 543 सदस्य चुने गए थे.
पहली लोकसभा के चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच कराए गए थे. उस समय लोकसभा में कुल 489 सीटें थीं लेकिन संसदीय क्षेत्रों की संख्या 401 थी.
लोकसभा की 314 संसदीय सीटें ऐसी थीं जहां से सिर्फ़ एक-एक प्रतिनिधि चुने जाने थे.
वहीं 86 संसदीय सीटें ऐसी थी जिनमें दो-दो लोगों को सांसद चुना जाना था. वहीं नॉर्थ बंगाल संसदीय क्षेत्र से तीन सांसद चुने गए थे.
किसी संसदीय क्षेत्र में एक से अधिक सदस्य चुनने की यह व्यवस्था 1957 तक जारी रही.
लोकसभा की बेवसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक पहली लोकसभा 17 अप्रैल,1952 को अस्तित्व में आई थी. इसकी पहली बैठक 13 मई, 1952 को आयोजित की गई थी.
गणेश वासुदेव मावलंकर पहली लोकसभा के अध्यक्ष थे. वो 15 मई,1952 से 27 फरवरी,1956 तक इस पद पर रहे.
पहली लोकसभा के उपाध्यक्ष एम अनंतशयनम अय्यंगर थे. उनका कार्यकाल 30 मई,1952 से सात मार्च, 1956 तक था.
लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है?
लोकसभा अध्यक्ष पद का संसदीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान है.
लोकसभा अध्यक्ष सदन का प्रतिनिधित्व करते हैं. वहीं संसद के सदस्य अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.
अध्यक्ष के चुनाव के लिए कोई विशेष योग्यता निर्धारित नहीं है लेकिन उनका लोकसभा का सदस्य होना अनिवार्य है.
सामान्य तौर पर सत्तारूढ़ दल के सदस्य को ही लोकसभा का अध्यक्ष चुना जाता है.
एक संसदीय परंपरा यह है कि सत्तारूढ़ दल अन्य दलों और समूहों से विचार-विमर्श कर अपना उम्मीदवार घोषित करता है.
उम्मीदवार का चयन हो जाने के बाद प्रधानमंत्री और संसदीय कार्य मंत्री उसके नाम का प्रस्ताव करते हैं.
यदि एक से अधिक प्रस्ताव आते हैं तो उनको क्रमबद्ध रूप से दर्ज किया जाता है और अगर ज़रूरत पड़ती है तो मतदान कराया जाता है.
जब एक नाम पर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अन्य प्रस्तावों को पेश नहीं किया जाता है.
अगर लोकसभा नवगठित होती है तो प्रोटेम स्पीकर उस बैठक की अध्यक्षता करते हैं जिसमें अध्यक्ष का चुनाव होता है.
लेकिन लोकसभा का कार्यकाल जारी है और इस दौरान चुनाव होता है तो उपाध्यक्ष बैठक की अध्यक्षता करते हैं.
परिणाम घोषित किए जाने के बाद नवनिर्वाचित अध्यक्ष को प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष अध्यक्ष के आसन तक ले जाते हैं.
इसके बाद सभी राजनीतिक दलों और समूहों के नेता अध्यक्ष को बधाई देते हैं. अध्यक्ष धन्यवाद भाषण देते हैं. इसके बाद नया अध्यक्ष अपना कार्यभार ग्रहण करता है.
अध्यक्ष का कार्यकाल उनके चुनाव की तारीख से लेकर जिस लोकसभा में उसका निर्वाचन किया गया हो, उसके भंग होने के बाद नई लोकसभा की प्रथम बैठक के ठीक पहले तक होता है.
अध्यक्ष किसी भी समय उपाध्यक्ष को लिखित सूचना देकर त्याग-पत्र दे सकता है. अध्यक्ष को उसके पद से लोकसभा में उपस्थित सदस्यों द्वारा बहुमत से पारित संकल्प द्वारा ही हटाया जा सकता है.
राज्यसभा का चुनाव कैसे होता है?
राज्यों की परिषद या राज्य सभा संसद का ऊपरी सदन है.
राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि और भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्य शामिल होते हैं.
उपराष्ट्रपति राज्य सभा का सभापति होता है. राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति भी चुनती है. सभापति और उपसभापति राज्य सभा की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं.
संविधान के अनुच्छेद 80 के ज़रिए राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है.
राष्ट्रपति 12 लोगों को राज्य सभा का सदस्य मनोनीत करते हैं. ये सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र से चुने जाते हैं. राज्य सभा के 238 सदस्य राज्यों और तीन सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं.
भारत के निर्वाचन आयोग की स्थापना कब हुई थी?
भारत के निर्वाचन आयोग की स्थापना संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत की गई है.
अनुच्छेद-324 निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची के रख-रखाव और स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से चुनाव के संचालन की शक्तियां देता है.
इसकी स्थापना 25 जनवरी,1950 को की गई थी. सुकुमार सेन को देश का पहला मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था.
उनका कार्यकाल 21 मार्च 1950 से 19 दिसंबर 1958 तक रहा.
चुनाव आयोग में पहले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही होता था. लेकिन 16 अक्टूबर 1989 से 1 जनवरी 1990 तक इसमें तीन आयुक्त नियुक्त किए गए.
इसके बाद 1 अक्टूबर 1993 से तीन आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था को नियमित कर दिया गया.
यह व्यवस्था आज भी जारी है. इनमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं.
चुनाव आयोग राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद के दोनों सदनों (राज्य सभा और लोकसभा), राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों का चुनाव कराता है.
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