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नरेंद्र मोदी और जो बाइडन एक-दूसरे से क्या हासिल करना चाहते हैं?
ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता
इसमें कोई शक नहीं कि 21 से 23 जून तक अमेरिका की राजकीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुर्ख़ियों में छाये रहेंगे.
वो अमेरिका के सरकारी दौरे पर पहले भी चार बार जा चुके हैं लेकिन इस बार की यात्रा पहली स्टेट विज़िट है जिसके दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन उनकी मेज़बानी करेंगे.
पीएम मोदी अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे. उन्होंने 2016 में भी कांग्रेस को संबोधित किया था और अमेरिकी संसद को दो बार संबोधित करने वाले वो भारत के पहले प्रधानमंत्री होंगे.
स्टेट विजिट में आम तौर पर कई औपचारिक समारोह होते हैं. अमेरिका में इन समारोहों में टारमैक पर ख़ास मेहमान का अभिवादन, 21 तोपों की सलामी, व्हाइट हाउस आगमन समारोह, व्हाइट हाउस डिनर, राजनयिक उपहारों का आदान-प्रदान और अमेरिकी राष्ट्रपति के गेस्टहाउस ब्लेयर हाउस में रहने का निमंत्रण शामिल है.
कुछ समय पहले अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति ने कहा था कि अमेरिका को चाहिए कि वो भारत को "नेटो प्लस" में शामिल कराकर भारत को पश्चिम के रक्षा गठबंधन ‘नेटो’ का भागीदार बनने के लिए कहना चाहिए.
ये बात और है कि भारत ने अब तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है और इसकी संभावना कम ही है कि भारत "नेटो प्लस" या किसी और गठबंधन का सदस्य बनना चाहेगा क्योंकि विदेश मंत्री जयशंकर ने अक्सर कहा है कि उनका देश किसी क्लब का सदस्य बनने के बजाय पार्टनरशिप में यक़ीन रखता है.
अमेरिका को इस दौरे से क्या हासिल होगा?
अमेरिका का स्टेट विज़िट दुनिया के किसी भी नेता के लिए ये एक बड़ा सम्मान है लेकिन सवाल ये है कि मोदी के दौरे से अमेरिका को क्या हासिल होगा?
एक और अहम सवाल कि प्रधानमंत्री अमेरिका की अपनी राजकीय यात्रा से क्या हासिल करेंगे?
लंदन में भारतीय मूल के वरिष्ठ पत्रकार प्रसून सोनवलकर के मुताबिक़, इस सम्मान के पीछे अमेरिका का अपना राष्ट्रीय हित छिपा है.
वो कहते हैं, "अमेरिका-भारत संबंधों के इतिहास से पता चलता है कि अमेरिका ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर काम किया है, भले ही कभी-कभी इस पर दिल्ली में हंगामा हुआ हो. इस बार भी, भले ही वॉशिंगटन और नई दिल्ली की सरकारों की राजनीतिक विचारधारा एक समान नहीं है, चीन के मुक़ाबले भारत का लाभ उठाना अमेरिका के हित में है."
अजय जैन गुरुग्राम के मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट में थॉट एंड लीडरशिप के प्रोफ़ेसर और डीन हैं.
उन्होंने नरेंद्र मोदी के करियर को क़रीब से देखा है. वो कहते हैं कि भारत अमेरिका के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है.
उनके मुताबिक़, "भारत एक प्राचीन संस्कृति है, जिसके विश्वास और मूल्य बहुत ही व्यापक हैं. हमारा मूलमंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् है तो भारत के बारे में अमेरिका को ये स्पष्टता है कि भारत स्वार्थी देश नहीं है."
वो आगे कहते हैं कि अमेरिका एक ऐसा देश है जो अपनी अर्थव्यवस्था के दम पर खड़ा है, "भारत 140 करोड़ लोगों का देश है और अमेरिका की बहुत सारी कंपनियां भारत पर निर्भर हैं. अमेरिका भारत पर आर्थिक दृष्टिकोण से निर्भर करता है, अपने आर्थिक विकास और आर्थिक प्रगति के लिए भी. आज अमेरिका की सबसे बड़ी ज़रूरत आर्थिक प्रगति है, उसे चीन के मुकाबले खड़े रहना है."
प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और वैश्विक मंच पर भारत की हैसियत को बढ़ाने के उद्देश्य से अमेरिका के कई आधिकारिक दौरे किए हैं. इस दौरे में इन क्षेत्रों में और मज़बूती आएगी.
भारत को रूस से दूर करने की कोशिश?
स्टीव एच. हैंके जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में एप्लाइड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. वो राष्ट्रपति रेगन की आर्थिक सलाहकार परिषद में रह चुके हैं.
वो कहते हैं, "भारत सभी देशों के साथ ऐसे संबंध बनाए रखना चाहता है ताकि वह सभी के साथ बिज़नेस और ट्रेड कर सके. यह भारत के विकास और समृद्धि के लिए अच्छा है. अमेरिका वह करने की कोशिश कर रहा है जो उसने दशकों से करने की कोशिश की है. रूस के साथ भारत के संबंधों एक हद से आगे न बढ़ने देना, और पश्चिम के साथ भारत के लंबे समय से चले आ रहे स्वाभाविक संदेह को खत्म करना."
लेकिन क्या अमेरिका इसमें कामयाब होगा? जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि पीएम मोदी की यात्रा से आपसी व्यापार और रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन को और बढ़ावा मिलेगा.
चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है. लेकिन प्रो. स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, "चीन के साथ तनाव को देखते हुए, भारत-अमेरिका का आपसी व्यापार 2022 तक 190 अरब डॉलर से ऊपर पहुँच गया है जो मौजूदा चीन-भारत व्यापार का लगभग दोगुना है."
भारत और अमेरिका के बीच फलते-फूलते रक्षा क्षेत्र में सहयोग को लेकर प्रो. सिंह का कहना है, "रूस के यूक्रेन में फंस जाने से रूस के डिफ़ेंस एक्सपोर्ट के लिए भारत का सबसे बड़ा और सबसे विश्वसनीय ग्राहक बने रहने पर गंभीर सवाल पैदा हो गया है और इससे अमेरिकी रक्षा सौदों के लिए भारत और अधिक आकर्षक बन गया है. मोदी की यात्रा से रक्षा क्षेत्र में अमेरिका-भारत के संयुक्त उत्पादन के एक नए चैप्टर की शुरुआत कर सकता है."
वो कहते हैं, "अमेरिका रक्षा उपकरणों का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है और दुनिया के कुल रक्षा निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 40% से अधिक है. वो पहले से ही दुनिया के 17 सबसे बड़े रक्षा आयातक देशों में 13 के लिए सबसे बड़ा डिफ़ेंस एक्सपोर्टर है. दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक भारत अब तक इस सूची से बाहर रहा है, लेकिन जल्द ही वो उनमें से एक बन सकता है."
उनका कहना है कि अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्ते भारत की अपनी शर्तों पर हुए हैं, "सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत ने अमेरिका के साथ इस मज़बूत साझेदारी और करीबी को अपनी बढ़ती मुखर विदेश नीति के तेवर और विशेष रूप से यूक्रेन युद्ध पर अपनी तटस्थता से समझौता किए बिना हासिल किया है."
दोनों देशों के बीच रक्षा के क्षेत्र में बढ़ते रिश्तों के कारण विशेषज्ञ कहते हैं कि इसने भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत किया है, इसकी क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत किया है और चरमपंथ सहित आम ख़तरों का मुकाबला करने में दोनों देशों के हितों को करीब ले आया है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका की यात्राओं ने वैश्विक नेताओं के साथ जुड़ने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को मजबूत करने के अवसर प्रदान किए हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासभा और अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र में उनके भाषणों ने उन्हें जलवायु परिवर्तन, चरमपंथ जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत की स्थिति को स्पष्ट करने का मौक़ा दिया है.
नरेंद्र मोदी को क्या फ़ायदा?
प्रो. अजय जैन मानते हैं कि पीएम मोदी की ताज़ा यात्रा इस बात का संकेत है कि भारत और अमेरिका बराबरी के साझीदार हैं और मोदी का क़द काफ़ी ऊंचा हो चुका है.
विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी यात्राओं के दौरान मोदी की भारतीय मूल के लोगों के साथ आदान-प्रदान ने सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने और विदेशों में भारत की सॉफ़्ट पावर को पेश करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
टेक्सस में 2019 में "हाउडी, मोदी" जैसे कार्यक्रम ने भारत की उपलब्धियों और अवसरों को उभारने के लिए एक मंच प्रदान करते हुए, इंडियन-अमेरिकन समुदाय और भारत के बीच मज़बूत रिश्ते को दिखाया है.
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज में भारतीय प्रवासियों के योगदान को उजागर किया गया है, जिससे भारत और इसके प्रवासी समुदाय की सकारात्मक छवि बनी है.
प्रो. अजय जैन कहते हैं, "अमेरिका में भारतीय मूल के 50 लाख लोग रहते हैं. मोदी उनको भारत से सक्रिय रूप से जोड़ रहे हैं और उनका अमेरिकी समाज में जो सम्मान है उसे भी बढ़ाना चाहते हैं. आप देख सकते हैं कि भारतीय मूल के लोग दुनिया के कई देशों को नेतृत्व दे रहे हैं."
इस दौरे से प्रधानमंत्री मोदी को अगले साल होने वाले चुनाव में भी फ़ायदा हो सकता है.
प्रो. अजय जैन कहते हैं, "जब तक आप चुनाव नहीं जीतेंगे विश्व को आप क्या नेतृत्व दे सकेंगे. ये एक प्रैक्टिकल हकीकत है."
विशेषज्ञ कहते हैं कि इस ताज़ा यात्रा से भारत और अमेरिका के रिश्तों में गर्मजोशी आएगी.
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